चैंपियन की उत्तराखंड सरकार को दो टूक- बधाइयां तो ठीक हैं, नौकरी कब दोगे सरकार

चेन्नई में दौड़ में हिस्सा लेती हुई और गोल्ड मेडल जीतने के बाद मानसी नेगी

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इमेज कैप्शन, चेन्नई में दौड़ में हिस्सा लेती हुई और गोल्ड मेडल जीतने के बाद मानसी नेगी
    • Author, राजेश डोबरियाल
    • पदनाम, देहरादून से, बीबीसी हिंदी के लिए

उत्तराखंड की रेस वॉकर मानसी नेगी ने तमिलनाडु में आयोजित 82वीं ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी एथलेटिक्स प्रतियोगिता में बीते मंगलवार को 20 किमी वॉक रेस में गोल्ड जीता है.

यह गोल्ड उत्तराखंड के लिए जीते गए मानसी के कई मेडलों में से एक है. इसे मिलाकर वह अब तक राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में 17 मेडल जीत चुकी हैं जिनमें से 8 स्वर्ण हैं. उन्होंने नेशनल जूनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप. 2022 और इंडियन ओपन रेस वॉकिंग चैंपियनशिप, 2023 में नए नेशनल रिकॉर्ड भी बनाए हैं.

लेकिन इस बार की जीत अलग है क्योंकि इस बार जीत के बाद मिले बधाई संदेशों के बाद मानसी नेगी ने जो टिप्पणी की उससे उत्तराखंड के खेल जगत में एक नई बहस शुरू हो गई है.

मानसी नेगी ने बधाई संदेशों को स्वीकारते हुए कहा कि यह सब तो ठीक है लेकिन मुझे उत्तराखंड में नौकरी चाहिए ताकि मैं अपने खेल पर ध्यान दे सकूं.

इस पर खेल मंत्री की भी प्रतिक्रिया आई है लेकिन मानसी की टिप्पणी से यह सवाल फिर खड़ा हो गया है कि क्यों उत्तराखंड की खेल प्रतिभाएं दूसरे राज्यों में जाकर खेलने को मजबूर हो रही हैं.

मानसी नेगी… गांव से खेलो इंडिया तक

अपने गांव में मानसी नेगी

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उत्तराखंड के सीमांत ज़िले चमोली के मजोठी गांव में 3 मई, 2003 को पैदा हुई मानसी नेगी की शुरुआती पढ़ाई गांव में ही हुई. इसके बाद चौथी से 10वीं तक की पढ़ाई उन्होंने गोपेश्वर से की. इसके बाद 11वीं, 12वीं की पढ़ाई उन्होंने देहरादून से की.

इसके बाद लवली प्रोफ़ेशनल यूनिवर्सिटी, जालंधर से उन्हें खेल कोटे में एडमिशन और स्कॉलरशिप मिल गई यानी कि उनकी पढ़ाई का खर्च यूनिवर्सिटी उठा रही है.

इसके साथ ही मानसी 2018 से देहरादून के रायपुर में स्थित सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस में रेस वॉकिंग की ट्रेनिंग भी कर रही हैं.

लेकिन यह सब इतना आसान नहीं रहा. और अगर नवीं-दसवीं की पढ़ाई के दौरान उन्हें जीजीएचएसएस में एलटी फ़िज़िकल एजुकेशन लता झिंक्वाण मानसी को नहीं मिली होतीं तो खुद मानसी के अनुसार, "पता नहीं मैं कहां होती... शायद मेरी शादी हो गई होती और..."

लता झिंक्वाण ने बीबीसी हिंदी को बताया कि 2017 में जब मानसी उनके स्कूल आई तो उसकी आर्थिक, मानसिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी. हालांकि खेलों में वह सक्रिय थी और लंबी दूरी की दौड़ में हिस्सा लेती थी.

2016 में भारत के मनीष रावत रियो ओलंपिक में 13वें स्थान पर तो रहे लेकिन देश भर में उनकी और रेस वॉकिंग को एक नई पहचान मिली. ख़ासतौर पर चमोली के युवा खिलाड़ियों के लिए मनीष प्रेरणास्रोत बनकर उभरे क्योंकि वह खुद भी चमोली के ही हैं और कमज़ोर आर्थिक वर्ग से आते हैं.

2016 में मानसी नेगी के पिता की मृत्यु हो गई. इसके बाद लता ने 'अपनी बेटी की तरह' मानसी का, उसकी ज़रूरतों का ख़्याल रखा.

अपनी मां के साथ मानसी नेगी

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इसके बाद मानसी ने 2017 में खेलो इंडिया अभियान के तहत रेस वॉकिंग में देश भर में गोल्ड मेडल जीता तो लता को लगा कि अब इस लड़की को यहीं तक रुकना नहीं है.

मानसी की मां को समझा-बुझाकर उन्होंने देहरादून के रायपुर के एक सरकारी स्कूल में मानसी का एडमिशन करवा दिया और साथ ही रायपुर में ही स्थित स्पोर्ट्स सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस में कोच अनूप बिष्ट से बात कर उसकी ट्रेनिंग भी शुरू करवा दी.

ख़ास बात यह रही कि लता झिंक्वाण ने न सिर्फ़ मानसी की पढ़ाई और ट्रेनिंग का इंतज़ाम किया बल्कि बतौर अभिभावक उन्होंने मानसी के रहने के लिए किराए के कमरे का इंतज़ाम किया और खुद उसके साथ कुछ दिन रही भीं.

वह बीच-बीच में देहरादून आकर मानसी से मिलती भी रहीं और उसकी ज़रूरतों का ख़्याल रखती रहीं.

ट्रेनिंग और मेडल

मानसी नेगी

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2018 मई में देहरादून आने के बाद मानसी ने जल्द ही महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स कॉलेज में ट्रेनिंग भी शुरू कर दी.

एक साल बाहर रहकर मानसी ने कोच अनूप बिष्ट के नेत़ृत्व में ट्रेनिंग की. इस दौरान न सिर्फ़ कोच बिष्ट बल्कि ओलंपियन मनीष रावत ने भी उन्हें मानसिक संबल दिया और यह अहसास दिलाया कि वह अकेली नहीं हैं, उन्हें सिर्फ़ अपने खेल पर ध्यान देने की ज़रूरत है.

इस दौरान लगातार कोशिशों के बाद तत्कालीन खेल मंत्री अरविंद पांडेय के दखल के बाद महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स कॉलेज में, जो कि लड़कों के लिए है, पहली बार लड़कियों के लिए हॉस्टल शुरू हुआ. अक्टूबर 2019 में मानसी नेगी और एक अन्य लड़की को कॉलेज के एक्सीलेंसी विंग में आधिकारिक रूप से एडमिशन मिला.

देहरादून में कोच अनूप बिष्ट के पास ट्रेनिंग शुरू करने के बाद मानसी ने स्कूल और कॉलेज लेवल पर कई चैंपियनशिप में मेडल हासिल किए.

लेकिन लॉकडाउन और उसके बाद का समय मानसी के लिए ठीक नहीं रहा. 2020 में लॉकडाउन के दौरान वह घर पर ही रहीं जिसकी वजह से न सिर्फ़ ट्रेनिंग बाधित हुई बल्कि घर में एक पारिवारिक समस्या पैदा हो जाने की वजह से उनकी मानसिक और भावनात्मक मज़बूती पर भी असर पड़ा.

इसकी वजह से 2021 में वह एक के बाद पांच प्रतियोगिताओं में हारती गईं. यह वह समय था जब कोच अनूप बिष्ट ने उनका संबल टूटने नहीं दिया. हालांकि तब स्पोर्ट्स कॉलेज बंद था लेकिन उन्होंने अपने घर में मानसी को रखकर उसकी ट्रेनिंग जारी रखी.

लता झिंक्वाण के साथ देहरादून में मानसी नेगी

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सितंबर 2021 से हार का क्रम टूटा और मानसी ने दिल्ली में हुई नेशनल एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 20 किलोमीटर रेस वॉक में अंडर-23 में रजत पदक प्राप्त किया.

इसके बाद वह सुर्खियों में तब आईं जब 11 से 15 नवंबर, 2022 के बीच गोहाटी में हुई 37वीं नेशनल जूनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंन न सिर्फ़ गोल्ड जीता बल्कि 47.30 मिनट के साथ नया नेशनल रिकॉर्ड भी बनाया.

इसके बाद 14 से 15 फरवरी के दौरान रांची में हुई इंडियन ओपन रेस वॉकिंग प्रतियोगिता, 2023 में उन्होंने 49.01 मिनट के साथ नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाते हुए पहला स्थान प्राप्त किया.

और फिर बीते 14 मार्च को उन्होंने 82वीं ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी एथलेटिक्स मीट 2022-23 में 20 किलोमीटर रेस वॉक में गोल्ड जीता.

बस कोरी बधाइयां बहुत हुईं

जैसा कि होता है, हर जीत के बाद मानसी नेगी को बधाइयों का तांता लग गया. मुख्यमंत्री, खेल मंत्री, डीजीपी और भी बहुत से नेता, अधिकारी उन्हें उत्तराखंड का गौरव बताते हुए बधाइयां देने लगे.

लेकिन इस बार मानसी ने जो जवाब दिया वह महज़ धन्यवाद तक सीमित नहीं रहा. सोशल मीडिया पोस्ट (देखें तस्वीर) में मानसी ने #job#support#saveyoungathletefuture के साथ लिखा, "बधाइयों, शुभकामनाओं और समर्थन के लिए दिल से धन्यवाद लेकिन मैं उत्तराखंड में नौकरी चाहती हूं. मैंने हर बार खुद को साबित किया है लेकिन खिलाड़ियों के लिए नौकरी का कोई मौका (job opportunity) नहीं है, स्पोर्ट्स कोटा नहीं है. मैं प्रार्थना करती हूं कि नौकरियों में स्पोर्ट्स कोटा दें, बहुत से उदीयमान युवा एथलीट उत्तराखंड को जीत दिलाकर गर्व महसूस करना चाहते हैं."

फ़ेसबुक पर इस पोस्ट के साथ मानसी ने मुख्यमंत्री (#PushkarSinghDhami), खेल मंत्री (#rekhaarya), डीजीपी (#AshokKumarIPS), उत्तराखंड एथलेटिक्स एसोसिएशन (#uttrakhandathleticsassociation), उत्तराखंड खेल विभाग (#sportsdepartmentuttrakhand) को भी अन्य कई के साथ टैग किया.

फ़ेसबुक पर मानसी नेगी के लिए पोस्ट

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इसका असर यह हुआ कि मानसी की यह पोस्ट उनकी जीत की ख़बर की तरह ही वायरल हो गई.

कांग्रेस ने इस मौके का फ़ायदा उठाते हुए मानसी की पोस्ट के एक दिन बाद ही सही इस चैंपियन एथलीट को कोरी बधाई नहीं दी. अपनी फ़ेसबुक में पार्टी ने दावा किया कि वह हर संभव प्रयास करेगी कि सरकार मानसी नेगी को स्पोर्ट्स कोटे से किसी उचित पद पर नियुक्त करे.

हालांकि गैरसैंण में चल रहे विधानसभा सत्र के दौरान मानसी नेगी के मुद्दे को उठाया खानपुर से निर्दलीय विधायक उमेश कुमार शर्मा ने. उन्होंने खिलाड़ियों को दी जाने वाली मात्र 1500 रुपये की छात्रवृत्ति पर सवाल उठाए और पूछा कि क्या इसे बढ़ाने का सरकार का कोई विचार है?

उन्होंने कहा कि इतने पैसे में तो महीने भर एक किलो दूध भी रोज़ नहीं लिया जा सकता. ऐसे में सरकार कैसे इस पैसे से खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन के लिए तैयार होने की उम्मीद कर सकती है?

सदन में पूछे गए सवाल का ठीक से जवाब न दे पाईं खेल और युवा कल्याण मंत्री रेखा आर्य ने सत्र समाप्त होने के बाद 17 मार्च को जो पोस्ट की वह उनकी 15 तारीख को की गई पोस्ट के एकदम विपरीत थी.

15 तारीख को की पोस्ट में रेखा आर्य ने मानसी नेगी को जीत की बधाई दी थी और कहा था कि वह प्रदेश का नाम रोशन कर रही हैं.

17 तारीख को की पोस्ट में उन्होंने मानसी नेगी को अब तक खेल विभाग द्वारा इनाम के रूप में मिले 2,35,000 रुपये का ब्यौरा पोस्ट कर दिया. इसके साथ ही यह भी बताया कि उनके कोच को भी द्रोणाचार्य अवॉर्ड दिया गया है.

बधाई देते हुए कांग्रेस का पोस्ट

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हालांकि इस पोस्ट में भी एक तथ्यात्मक गलती हो गई और मानसी नेगी का महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स कॉलेज, सेंटर फॉर एक्सीलेंस में चयन 2017 को दिखाया गया जबकि गोपेश्वर के स्कूल में नवीं की पढ़ाई कर रही थीं. हालांकि बाद में स्पोर्ट्स कॉलेज के प्रिंसिपल की ओर से भूल सुधार भी जारी किया गया.

लेकिन इस सफ़ाई के साथ ही मानसी के सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस में प्रवेश के बाद से अब तक उन पर किए गए सारे खर्च का ब्यौरा भी जारी कर दिया गया.

उत्तराखंड में जगह नहीं मिलती प्रदेश के टैलेंट को

वरिष्ठ पत्रकार राजू गुसाईं को लगता है कि उत्तराखंड की खेल प्रतिभाओं को प्रदेश में मौका न मिंलने की वजह खेल विभाग के रवैये से भी ज़्यादा खेल संघों की भूमिका है.

वह कहते हैं उत्तराखंड के खेल संघों पर ज़्यादातर ऐसे लोगों का कब्ज़ा है जिन्हें खेलों के, खिलाड़ियों के विकास से ज़्यादा अपनी राजनीति, अपने निजी हितों की फ़िक्र है. बहुत से खेल संघों पर काबिज़ पदाधिकारी तो उत्तराखंड के निवासी तक नहीं हैं जबकि भारतीय ओलंपिक संघ की नियमावली के अनुसार ऐसा होना नहीं चाहिए.

वह कहते हैं एथलेटिक्स की हालत तो फिर भी ठीक है कि यहां टूर्नामेंट तो हो रहे हैं और उनसे मानसी नेगी जैसे खिलाड़ियों को मौका मिल रहा लेकिन ज़्यादातर खेलों की तो प्रतियोगिताएं ही नहीं हो रही हैं.

उत्तराखंड के राज्य खेल फ़ुटबॉल का 20 साल में राज्य स्तरीय टूर्नामेंट आयोजित नहीं हुआ है, बाकी खेलों को तो छोड़ दो.

राजू दिल्ली और मुंबई के लिए खेल चुके क्रिकेटर पवन सुयाल का उदाहरण देते हैं. वह कहते हैं पौड़ी गढ़वाल का एक गरीब लड़का दिल्ली नौकरी की तलाश में गया था और एक एटीएम में गार्ड बनने वाला था. एक दिन उसने देखा कि कुछ लोग क्रिकेट खेल रहे हैं.

मानसी नेगी

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खेल सिमटते-सिमटते वह कोच के पास गया और कहा कि वह भी क्रिकेट खेलता है. कोच ने उसे बॉलिंग करने को कहा और देखा कि उसमें टैलेंट है.

इस तरह पवन सुयाल, जो एक एटीएम में गार्ड बनने वाला था, वह प्रोफ़ेशनल क्रिकेटर बन गया.

राजू कहते हैं क्या यह उत्तराखंड में संभव है? कतई नहीं. यहां पदाधिकारी तय करते हैं कि कौन खेलेगा और उसका टैलेंट से कोई लेना-देना नहीं होता.

राजू कहते हैं कि अगर उत्तराखंड के खिलाड़ियों को यहां मौका देना है तो सबसे पहले खेल संघों पर लगाम कसनी पड़ेगी.

प्रदेश में चल रही इस बहस के बीच मानसी नेगी ने रेलवे में नौकरी के लिए स्पोर्ट्स कोटे से ट्रायल दिया है. जानकार मानते हैं उनकी पर्फॉर्मेंस को देखते हुए उन्हें नौकरी मिलने की संभावनाएं अच्छी हैं.

एक बार राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय फलक पर चमक दिखाने के बाद खिलाड़ी के लिए कहीं न कहीं नौकरी, आर्थिक सुरक्षा की संभावनाएं तो पैदा हो ही जाती हैं लेकिन वह सवाल अभी उत्तराखंड के सामने खड़ा रहेगा जो मानसी ने उठाया है.

राज्य सरकार उत्तराखंड के प्रतिभावान खिलाड़ियों को नौकरी देने का कोई प्रावधान क्यों नहीं करती? आर्थिक सुरक्षा होगी तो बहुत सारे खिलाड़ी राज्य का नाम रोशन करने आगे आएंगे.

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