भोपाल रियासत, जहाँ लंबे समय तक चला औरतों का शासन

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- Author, शुरैह नियाज़ी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, भोपाल से
विश्व महिला दिवस दुनिया भर में महिलाओं की बढ़ती ताक़त और समाज में उनके योगदान को बताता है.
अगर नज़र भोपाल की रियासत पर डाला जाया तो यहाँ पर महिला शासकों ने वो सब किया जो शायद पुरुषों के लिए भी कर पाना आसान न था.
भोपाल रियासत की नींव सरदार दोस्त मोहम्मद ख़ान ने फ़तेहगढ़ का क़िला बनाकर रखी थी लेकिन इसको सही पहचान दी यहाँ की बेगम नवाबों ने.
इस शासन की शुरुआत कुदसिया बेगम से होती है, जो तक़रीबन 107 साल चली और नवाब सुल्तान, जहाँ बेगम के दौर तक क़ायम रही. बेगमों के हाथ में यहां की सत्ता 1819 से लेकर 1926 तक रही.
सबसे पहली महिला नवाब की बात की जाए तो कुदसिया बेगम का नाम आता है, जिन्हें गौहर बेगम भी कहा जाता था. उनके पति की 1819 में हत्या के बाद उन्हें 18 साल की उम्र में नवाब बना दिया गया था.
हालांकि वो पढ़ी-लिखी नहीं थीं लेकिन इसके बावजूद इतिहासकार उन्हें अपने वक़्त से आगे चलने वाली महिला बताते हैं. उन्होंने अपनी सेना के साथ कई जंग भी लड़ी.

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उनका बनाया हुआ गौहर महल आज भी बड़े तालाब के किनारे मौजूद है. उन्होंने भोपाल की जामा मस्जिद का भी निर्माण किया था.
इतिहासकार और सैफिया कॉलेज में प्रोफेसर अशर किदवई बताते हैं, "आज भी लोग महिलाओं को अपने ऊपर नहीं देखना चाहते हैं. लेकिन भोपाल एक ऐसी रियासत रही, जहाँ पर औरतों ने राज किया और पूरे स्टेट को हर तरह से आगे बढ़ाया."
उन्होंने यह भी बताया, "इन महिलाओं ने न सिर्फ़ राज किया बल्कि हिंदू और मुसलमानों को साथ लेकर चलीं. इनके राजकाज के दौरान हिंदू और मुसलमान दोनों ही मंत्री के तौर पर काम करते रहे."
अशर किदवाई का कहना है कि दूसरे नंबर पर राज करने वाली सिकंदर जहां बेगम के लिए चुनौतियां कम नहीं थीं. उस वक़्त उनके मामा फौजदार मोहम्मद ख़ान को भी उनकी मदद के लिये मंत्री बना दिया गया. लेकिन इस वजह से प्रशासन चलाने में उन्हें दिक्क़तें आती रहीं. आख़िरकार फौजदार मोहम्मद ख़ान को इस्तीफ़ा देना पड़ा.
सिकंदर जहां बेगम की ख़ासियत यह थी कि वो घोड़े पर बैठकर पूरी रियासत का दौरा करती थीं.
उन्होंने अंग्रेज़ों से दिल्ली की जामा मस्जिद को वापस मुसलमानों को दिलवाने के लिये बहुत बड़ा किरदार निभाया था. 1857 के विद्रोह के बाद जामा मस्जिद को बंद कर दिया गया था. अंग्रेज मानते थे कि मुसलमान मस्जिद में इकठ्ठा होकर उनके ख़िलाफ़ साज़िश रच सकता है.

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किदवई बताते हैं, "सिकंदर जहां बेगम ने अपनी रियासत में आने वाले हर एक गांव का दौरा किया था और हर चीज़ की मैंपिग करवाई थी. इसे मैप को हाथ से बनाया गया था और उसमें हर चीज़ की जानकारी मौजूद थी जैसे उसमें लिखा गया था कि कहां पर रियासत में पहाड़ है और कहां पानी के स्रोत हैं."
वह बताते हैं कि यह काम उस वक़्त पहली बार किसी नवाब ने किया था.
सिकंदर जहां ने शिक्षा के लिए भी काफ़ी काम किया और उन्होंने शिक्षा का बढ़ावा देने के लिए बाहर से भी विद्वानों को भी बुलाया.
एक अन्य इतिहासकार डॉ. शम्भुदयाल गुरु के मुताबिक़, 'सिकंदर जहां बेगम ने बहुत अच्छे से प्रशासन को चलाया और उनकी कुशलता की वजह से भोपाल रियासत पर जो 30 लाख का कर्ज़ था उसे उन्होंने आसानी से चुका दिया.'

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वो बताते हैं, "सिकंदर जहां बेगम ने राजस्व की वसूली जो ठेका पद्धति से होता था उसे उस वक़्त समाप्त कर दिया था."
तीसरे नंबर की महिला नवाब में शाहजहां बेगम का नाम आता है. शाहजहां बेगम ने भी अपने से पहली वाली दोनों नवाबों के काम को आगे बढ़ाया लेकिन उन्हें इमारत बनवाने का भी बहुत ज़्यादा शौक था.
शायद कम ही लोगों को मालूम होगा कि आगरा के बाद भोपाल में भी ताज महल नाम की एक इमारत है, जिसे शाहजहां बेगम ने बनवाया था. इसके साथ ही उन्होंने ताजुल मस्जिद का भी निर्माण शुरू करवाया लेकिन उसे पूरा नहीं करवा पाईं.
ताजुल मस्जिद देश की सबसे बड़ी मस्जिदों में शुमार होती है. उनकी मौत के बाद ही यह पूरी हो पाई.

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वहीं उन्होंने इंग्लैड़ की पहली मस्जिद जो शाहजहांनी मस्जिद के नाम से जानी जाती है उसका निर्माण भी करवाया था. एक कुशल प्रशासक के साथ ही शाहजहां बेगम एक अच्छी लेखिका भी थीं. उन्होंने ऊर्दू में कई किताबें भी लिखीं.
कई इतिहासकार बताते हैं कि उन्होंने हिंदुओं की सुरक्षा के लिए कई क़ानून बनाएं. उन्होंने हिंदूओं की संपत्तियों के संरक्षण और सुरक्षा के लिए एक हिंदू संपत्ति ट्रस्ट की स्थापना भी की थी.
मुसलमान लड़कियों की शिक्षा के लिए उन्होंने स्कूलिंग की शुरुआत की लेकिन वहाँ पर क़ुरान और दीन की भी शिक्षा दी जाती थी. हिंदू बच्चियां वहां नहीं पढ़ सकती थीं इसलिए उन्होंने हिंदू लड़कियों के लिए कन्याशाला शुरू करवाई.
भोपाल की आख़िरी महिला नवाब सुल्तान जहां बेगम थीं. जिन्होंने 1901 में गद्दी संभाली. सुल्तान जहां बेगम भी शिक्षा को बहुत ज़्यादा महत्व देती थी.
भोपाल को आधुनिक बनाने वाली बेगम

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किदवई का कहना है कि उन्होंने जब भी शिक्षा की बात की तो उसे बताया कि क़ुरान और हदीस में भी औरतों की शिक्षा के बारे में कितना कहा गया है.
किदवई उन्हें एक ऐसी महिला मानते हैं जिन्होंने उस समय अपनी रियासत में आधुनिक चीज़ों को लाने पर ज़ोर दिया.
उन्होंने कस्र ए सुल्तानी पैलेस का निर्माण कराया जिसे अब अहमदाबाद पैलेस के नाम से भोपाल में जाना जाता है. इसके साथ ही उन्होंने मिंटो हॉल का निर्माण कराया जिसे बाद में काफ़ी लंबे समय तक मध्य प्रदेश विधानसभा के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा.
इसके अलावा उन्होंने उस वक्त सुल्तानिया गर्ल्स स्कूल का निर्माण भी कराया जो अब भी चालू है. वो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की पहली चांसलर थीं और उसके साथ ही ऑल इंडिया कॉन्फ्रेंस ऑन एजुकेशन की पहली अध्यक्ष रही हैं.
स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर की प्रोफेसर सविता राजे, जिन्होंने भोपाल की नवाबी काल के आर्किटेक्चर पर काफ़ी काम किया है, उनका कहना है कि ज़रूरत इस बात की है कि भोपाल में जो महल और तरह तरह की चीज़ें इन बेगमों ने बनाई उन्हें बचाया जाए.

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वह कहती हैं,"जब देश के दूसरे महलों की बात होती है तो वहाँ पर आप को औरतों, मर्दों के अलग-अलग हिस्से मिलते हैं. यहां पर लेकिन वो नहीं मिलेंगे क्योंकि भोपाल ऐसा शहर है, जहां पर औरतें ही ही मर्द बन कर काम कर रही थीं."
राजे बताती हैं कि यहां के महलों की यह ख़ासियत इसे अलग बनाती है.
हर साल याद ए बेगमात प्रोग्राम का आयोजन करने वाले बरकतुल्लाह यूथ फोरम भोपाल के कॉर्डिनेटर अनस अली बताते हैं कि इन महिला नवाबों ने शहर को एक अलग ही पहचान दी.
उन्होंने बताया कि आख़िरी महिला नवाब सुल्तान जहां बेगम ने भोपाल में किंग जॉर्ज हास्पिटल का निर्माण कराया जो अब हमीदिया अस्पताल के नाम से जाना जाता है और शहर का सबसे प्रमुख अस्पताल है.
अनस अली कहते हैं, "इन औरतों ने इमारतें बनवाईं,अमन क़ायम किया, कारखाने लगवाए, लड़कियों की तालीम के लिए स्कूल खुलवाये. ऐसे गौरवशाली इतिहास को याद रखना उसको दोहराना हमारा फर्ज़ है."
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