बिनॉय-बादल-दिनेश: आज़ादी की लड़ाई के वो सेनानी जिन्होंने अंग्रेज़ आईजी को मारी गोली - विवेचना

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लेफ़्टिनेंट कर्नल नॉर्मन सिंपसन 1940 के दशक में बंगाल के आईजी (जेल) हुआ करते थे. वे जेल में बंद स्वतंत्रता सेनानियों को यातनाएं देने के लिए जाने जाते थे.
नॉर्मन की निगरानी में स्वतंत्रतता सेनानियों पर शातिर अपराधियों से हमले कराना आम बात थी. एक बार नॉर्मन के इशारे पर कैदियों के एक झुंड ने जेल में सुभाष चंद्र बोस पर हमला किया था. उस दिन सुभाष बोस के कई साथियों जैसे देशप्रिय जतींद्र मोहन, किरण शंकर रॉय और सत्य गुप्त को मारा-पीटा गया था.
इसके बाद बंगाल वॉलेंटियर्स ने अपने दो कार्यकर्ताओं दिनेश चंद्र गुप्त और सुधीर बादल गुप्ता को कोलकाता तलब किया. बिनॉय कृष्ण बसु वहां पहले से ही मौजूद थे.
इन तीनों को एक ऐसा दुस्साहसी काम करने की ज़िम्मेदारी दी गई जिसकी अंग्रेज़ सरकार ने कल्पना भी नहीं की थी.
इन तीनों से कहा गया कि आईजी सिंपसन को जीने का अब कोई अधिकार नहीं रह गया है, उनको इस दुनिया से जाना ही होगा.
इसके बाद सवाल ये उठा कि उन्हें कहां और कैसे मारा जाए? ये तय हुआ कि उन्हें ऐसी जगह मारा जाए जिससे ब्रिटिश प्रशासन की चूलें हिल जाएं. इस बात पर सहमति बनी कि सिंपसन को बंगाल में ब्रिटिश प्रशासन के गढ़ राइटर्स बिल्डिंग में उनके दफ़्तर में सरेआम गोली मारी जाए.

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सुभाष चंद्र बोस ने की थी बंगाल वॉलंटियर्स की स्थापना
बंगाल वॉलेंटियर्स की स्थापना सुभाष चंद्र बोस ने 1928 के कांग्रेस सत्र के दौरान की थी. उन्होंने ऐसे लोगों का संगठन बनाया था जो त्याग और देशभक्ति की भावना से भरे हुए थे.
बंगाल वॉलेंटियर्स के सदस्य रोज़ वर्दी में पार्क सर्कस में मार्च-पास्ट करते थे. मेजर सत्य गुप्ता इसमें शामिल लोगों को लोगों को लड़ने का प्रशिक्षण दिया करते थे.
उन्होंने 1930 बंगाल की विभिन्न जेलों में पुलिस की क्रूरता के ख़िलाफ़ विद्रोह करने के लिए 'ऑपरेशन फ़्रीडम' की शुरुआत की थी.
सिंपसन को मारने का प्लान चाहे सफल हो या विफल, ये बात तय थी कि वहां से जीवित बच निकलने की संभावना बिल्कुल नहीं के बराबर थी.
इसके बावजूद इन तीनों युवाओं को इस बात की खुशी थी कि उन्हें इस बड़े मिशन के लिए चुना गया है. इस मिशन की जानकारी गिने-चुने लोगों को ही थी.
इससे पहले बिनॉय कृष्ण बसु ढाका के मेडिकल कालेज में ढाका के कुख्यात आईजी लॉसन को गोली मार चुके थे. चप्पे-चप्पे पर पुलिस का जाल बिछा होने के बावजूद बिनॉय ढाका से कोलकाता पहुंचने में कामयाब हो गए थे.

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कौन थे बिनॉय-बादल-दिनेश?
बिनॉय कृष्ण बसु का जन्म 11 सितंबर, 1908 को मुंशीगंज ज़िले में हुआ था जो कि अब बांग्लादेश में है. 22 साल की उम्र में उन्होंने देश के लिए जीने-मरने का फ़ैसला कर लिया था.
दिनेश गुप्ता भी मुंशीगंज ज़िले में ही पैदा हुए थे. बादल गुप्ता के साथ-साथ ये दोनों भी बंगाल वॉलेंटियर्स के सदस्य थे. उन्होंने अपने चाचाओं धरनीनाथ गुप्ता और नगेंद्रनाथ गुप्ता के जीवन से प्रभावित होकर क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने का फ़ैसला किया था.
ये दोनों लोग अलीपुर कॉन्सपिरेसी केस में शामिल थे और उन्होंने अरबिंदो घोष के साथ कई दिन जेल में बिताए थे. सिंपसन को मारने के मिशन के लिए इन तीनों युवाओं के लिए पश्चिमी तरीक़े के सूट सिलवाए गए. उनके लिए रिवॉल्वरों और गोलियों का भी इंतज़ाम किया गया.
बिनॉय को वलीउल्ला लेन से मटियाबुर्ज़ में राजेंद्रनाथ गुहा के घर ले जाया गया. बादल और दिनेश को न्यू पार्क स्ट्रीट के एक गुप्त ठिकाने पर पहुंचा दिया गया.
सिंपसन को मारने के लिए आठ दिसंबर की तारीख़ तय की गई और प्लान बना कि ये तीनों खिदिरपुर में पाइप रोड पर मिलेंगे.

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सूट-बूट पहन कर राइटर्स बिल्डिंग पहुंचे
आठ दिसंबर, 1930 को इन तीनों ने आख़िरी बार अपने कोट की पॉकेट में हाथ डाला और जेबें चेक की. उनकी जेबों के अंदर रिवॉल्वर और कारतूस थे. बादल ने अपनी जेब में पोटेशियम साइनाइड का कैप्सूल भी रख लिया.
जैसे ही घड़ी ने 12 बजाए, इन तीनों का सफ़र शुरू हुआ. उन्होंने एक टैक्सी ड्राइवर से उन्हें राइटर्स बिल्डिंग ले जाने के लिए कहा.
सुप्रतिम सरकार अपनी क़िताब 'इंडिया क्राइड दैट नाइट' में लिखते हैं, "जैसे ही टैक्सी राइटर्स बिल्डिंग के मेन गेट पर रुकी, वहां तैनात पुलिस अफ़सर ने सूट-बूट पहने तीन लोगों को नीचे उतरते हुए देखा. टैक्सी का किराया देने के बाद ये तीनों पूरे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़े."
"पुलिस अफ़सर और उसकी टीम को उनके इरादे के बारे में कोई शक़ नहीं हुआ. वो सीढ़ियां चढ़ते हुए पहली मंज़िल पर पहुंचे. लेफ़्टिनेंट कर्नल सिंपसन अपने कमरे में बैठे पत्र लिख रहे थे. पास में उनके निजी सहायक जेसी गुहा और चपरासी बागल ख़ाँ खड़े थे. दरवाज़े के बाहर सहायक चपरासी फ़ागू सिंह मौजूद थे."

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चपरासी को धक्का देकर सिंपसन के कमरे में घुसे
सिंपसन का दफ़्तर लंबे गलियारे के पश्चिमी छोर पर था. साथ ही वहां कई अंग्रेज़ अफ़सरों के दफ़्तर थे. साहबों के कमरों के बाहर उनके अर्दली खड़े हुए थे. गलियारे में कई क्लर्क अपनी बग़ल में फ़ाइलें और कागज़ लिए गुज़र रहे थे.
तेज़ी से चलते हुए तीनों युवक सिंपसन के कमरे के बाहर पहुँचे.
कमरे के बाहर मौजूद फ़ागू सिंह ने उनसे सवाल किया, 'क्या आप साहब से मिलने आए हैं ?' बिनॉय ने उलटा उससे सवाल किया 'क्या वो अंदर हैं?' फ़ागू ने कहा, 'वो अंदर हैं लेकिन व्यस्त हैं. क्या आपने उनसे मिलने का समय ले रखा है? अगर आपके पास विज़िटिंग कार्ड है तो मुझे दे दीजिए या फिर इस रजिस्टर में अपना नाम लिख दीजिए. मैं साहब को आपके बारे में बता दूंगा लेकिन आपको तब तक इंतज़ार करना होगा जब तक अंदर से जवाब नहीं आ जाता.'
तीनों ने आव देखा न ताव, फ़ागू सिंह को धक्का देते हुए उन्होंने ज़ोर से दरवाज़ा खोल दिया. इसके बाद पलक झपकते ही उनके रिवॉल्वर उनके हाथों में आ गए.

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सिंपसन का शरीर हुआ गोलियों से छलनी
सुप्रतिम सरकार लिखते हैं, "सिंपसन ने सिर उठा कर देखा कि तीन युवक सामने रिवॉल्वर ताने खड़े हैं. उनके सहायक गुहा जैसे ही पीछे हटे तीनों के रिवॉल्वरों से निकली गोलियों ने सिंपसन के शरीर को छलनी कर दिया. आईजी (जेल) को अपनी जगह से हिलने तक का मौक़ा नहीं मिल पाया और अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे ही वो दुनिया से विदा हो गए.
ये नज़ारा देखकर गुहा चिल्लाते हुए कमरे के बाहर गलियारे के पश्चिमी छोर की तरफ़ भागे. फ़ागू सिंह ने दौड़कर एक दूसरे अंग्रेज़ अफ़सर टफ़नल बैरेट के कमरे में शरण ली.
बैरेट ने तुरंत पास में लाल बाज़ार फ़ोन कर सुरक्षाबलों को सचेत कर दिया. उन्होंने चिल्ला कर कहा, "राइटर्स बिल्डिंग में गोली चली है. सिंपसन मारे गए हैं. तुरंत सशस्त्र सुरक्षा सैनिकों को भेजिए."
'बैटल ऑफ़ वरांडाज़'
पुलिस कमिश्नर चार्ल्स टेगार्ट ने वाहन बुलाने की बजाए दौड़ कर राइटर्स बिल्डिंग पहुंचना ज़्यादा मुनासिब समझा. उनके साथ रिज़र्व फ़ोर्स के कुछ सैनिक थे. दो या तीन मिनटों के अंदर वो राइटर्स बिल्डिंग पहुंच गए.

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इस बीच बंगाल के आईजी क्रेग दूसरी मंज़िल के अपने कमरे से हाथ में रिवॉल्वर लिए पहली मंज़िल पर उतर आए.
सिंपसन को गोली मारने के बाद दिनेश चंद्र गुप्त, सुधीर बादल गुप्ता और बिनॉय कृष्ण बसु ने हाथों में रिवॉल्वर लिए गलियारे में पश्चिम से पूर्व की तरफ़ चलना शुरू कर दिया.
इस बीच चारों तरफ़ गोलीबारी की ख़बर फैल गई कि और गलियारे में चल रहे लोग भागकर जहां जगह मिली वहां छिप गए. गलियारे में सन्नाटा छा गया. तभी इन तीनों ने ज़ोर-ज़ोर से 'बंदे मातरम' के नारे लगाने शुरू कर दिए.
बाद में इस पूरी मुठभेड़ को 'बैटल ऑफ़ वरांडाज़' की संज्ञा दी गई. उस समय फ़ोर्ड नाम का एक सार्जेंट अपने निजी काम से राइटर्स बिल्डिंग आया हुआ था. उसके पास कोई हथियार नहीं था. वो सीढ़ियों के पास खड़ा होकर सारा नज़ारा देख रहा था.

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तीनों युवक पासपोर्ट ऑफ़िस में घुसे
सुप्रतिम सरकार लिखते हैं, "आईजी क्रेग ने इन तीनों युवकों को देखते ही उन पर गोली चला दी, लेकिन वो गोली इनमें से किसी को नहीं लगी. फ़ोर्ड ने क्रेग से उनकी रिवॉल्वर लेकर इन युवकों पर दोबारा फ़ायर किया."
"बिनॉय-बादल-दिनेश ने दौड़ते हुए जवाबी फ़ायर करना शुरू किया. कुछ ही देर में उनकी गोलियां ख़त्म होने लगीं. अब ज़रूरी था कि वो अपनी रिवॉल्वर को दोबारा लोड करें. उन्होंने अपने-आप को वरिष्ठ अधिकारी जेडब्लू नेल्सन के कमरे के बाहर खड़े पाया."
बग़ल में ही पासपोर्ट ऑफ़िस था. बिनय और बादल अपनी रिवॉल्वर लोड करने के लिए उसके अंदर घुस गए. दिनेश ने बाहर खड़े-खड़े ही अपना रिवॉल्वर लोड करने की कोशिश की.
जैसे ही नेल्सन ने अपने कमरे का दरवाज़ा खोला, दिनेश ने उन पर फ़ायर किया. गोली नेल्सन की जांघ में लगी लेकिन गोली लगने के बावजूद वो दिनेश से भिड़ गए और उनके हाथ से रिवॉल्वर छीनने की कोशिश करने लगे.
गोली की आवाज़ सुनकर बिनॉय और बादल हाथ में रिवॉल्वर लिए पासपोर्ट दफ़्तर से बाहर निकले. बिनॉय ने अपने रिवॉल्वर के बट से नेल्सन के सिर पर प्रहार किया. नेल्सन ज़मीन पर गिर गए लेकिन इसके बावजूद वो रेंगते हुए कमरे से बाहर निकलने में कामयाब हो गए. उनके पूरे शरीर से खून बह रहा था. इस बीच तीनों युवक भाग कर फिर से पासपोर्ट दफ़्तर में घुस गए.
बिनॉय-बादल-दिनेश चारों ओर से घिरे
जब तक वहां लाल बाज़ार से रिज़र्व फ़ोर्स नहीं पहुंची, क्रेग और फ़ोर्ड के अलावा किसी शख़्स की अपने कमरे से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं पड़ी.
दूसरी मंज़िल पर पुलिस के उच्चाधिकारियों के कमरे थे लेकिन कोई भी बाहर नहीं निकला. जैसे ही सुरक्षाकर्मियों का दल वहां पहुंचा हालात बदलने लगे. जिस पासपोर्ट दफ़्तर में बिनॉय-बादल-दिनेश मौजूद थे, उसे चारों तरफ़ से घेर लिया गया.
दरवाज़े की एक झिर्री से दिनेश ने बाहर गोली चलाई लेकिन गोली निशाने पर नहीं लगी. एक पुलिस अफ़सर जोंस ने जवाबी फ़ायर किया. इस बार गोली ने दिनेश के कंधे पर लगी, वो घायल हो गए.

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सुप्रतिम सरकार लिखते हैं, "वो चारों और से घिर चुके थे. दरवाज़े के दोनों ओर बंदूकधारी सैनिकों ने पोज़ीशन ले ली थी. तीनों ने एक दूसरे की तरफ़ देखा. उनको पता था कि सिर्फ़ एक चमत्कार ही उन्हें वहां से सुरक्षित निकाल सकता था. जब ये लगने लगा कि वो पकड़े जाने वाले हैं और उनकी गोलियां ख़त्म होने लगीं, उन्होंने अपने-आप को मौत के लिए तैयार किया. बादल ने अपनी जेब से पोटेशियम साइनाइड का कैप्सूल निकाल कर उसं निगल लिया."
उनका शरीर निर्जीव होकर नीचे लुढ़क गया. तभी बाहर खड़े पुलिसवालों को कमरे के अंदर से गोली चलने की दो आवाज़ें सुनाई दीं.
बिनॉय और दिनेश ने भी खुद को सिर में गोली मार ली थी.
बिनॉय और दिनेश को अस्पताल पहुंचाया गया
डिप्टी कमिश्नर बार्टली ने दरवाज़े के नीचे से झांक कर देखा. उन्हें ज़मीन पर दो लोग पड़े दिखाई दिए. फ़र्श पर ख़ून ही ख़ून पड़ा था. जब पुलिस ने दरवाज़ा खोला तो देखा कि दिनेश के बग़ल में .455 की वेबली रिवॉल्वर पड़ी हुई थी.
बिनॉय की पतलून की पिछली पॉकेट में .32 बोर की आइवर जॉन्सन रिवॉल्वर थी. बादल के शरीर के पास भी .32 बोर की एक अमेरिकन रिवॉल्वर पड़ी हुई थी. ज़मीन पर गोलियों को खोल बिखरे पड़े थे और तीनों के हैट भी गिरे हुए थे.
इसके अलावा वहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो झंडे ज़मीन पर पड़े हुए थे. एक झंडा बिनॉय की पतलून में भी पाया गया.
बादल के पार्थिव शरीर को मुर्दाघर ले जाया गया जबकि बिनॉय और दिनेश को अस्पताल पहुंचाया गया.
अंग्रेज़ों की पूरी कोशिश थी कि इन दोनों को किसी तरह बचा लिया जाए ताकि उन्हें षडयंत्र के बारे में जानने का मौक़ा मिल सके. अगले दिन आनंदबाज़ार पत्रिका की सुर्ख़ी थी, 'बंगाल्स इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ प्रिज़न शॉट डेड.'

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दिनेश को मौत की सज़ा
डाक्टरों ने इन दोनों को बचाने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया लेकिन वो बिनॉय को नहीं बचा पाए. 13 दिसंबर, 1930 को उन्होंने अपनी आखिरी साँस ली.
उनकी मौत से दो दिन पहले उनके पिता ने ब्रिटिश सरकार से अपने बेटे को आख़िरी बार देखने की अपील की. सरकार ने उनके इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया.
आश्चर्यजनक रूप से दिनेश, जो इस घटना में बुरी तरह घायल हो गए थे, मौत के मुंह से बाहर निकल आए.
मामला कोर्ट तक पहुंचा. सुनवाई करते हुए जज राल्फ़ रेनॉल्ड्स गार्लिक ने अपना फ़ैसला सुनाया, "हत्या की सज़ा मौत है. मुझे इस बात में कोई शक नहीं कि जिन तीन लोगों ने कर्नल सिंपसन की हत्या की थी, दिनेश चंद्र गुप्त उनमें से एक थे. इसलिए मैं उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत मौत की सज़ा सुनाता हूं."

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सज़ा सुनाने वाले जज को भी गोली मारी गई
7 जुलाई, 1931 को सुबह 4 बज कर 45 मिनट पर दिनेश फांसी के फंदे पर झूल गए. उस समय उनकी उम्र थी मात्र 19 वर्ष.
दिनेश की मौत को रुकवाने के लिए हस्ताक्षर अभियान चलाया गया. अंत में गवर्नर के पास उनकी मौत को रुकवाने की याचिका भेजी गई जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया.
क़ानून और व्यवस्था भंग होने की संभावना को देखते हुए उनकी फांसी की तारीख और वक्त को गुप्त रखा गया.
लेकिन इसके बावजूद उस ख़बर को छिपाया नहीं जा सका. अगले दिन 'एडवांस' अख़बार की सुर्ख़ी थी, 'डॉन्टलेस दिनेश डाइज़ एट डॉन.'
अगले दिन कोलकाता की हर सड़क पर लोगों ने पुलिस के भारी जमावड़े को देखा. ये संकेत था कि दिनेश चंद्र गुप्त को फांसी दे दी गई है.

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दिनेश को फांसी दिए जाने के 20 दिन बाद उन्हें फांसी की सज़ा सुनाने वाले जज राल्फ़ रेनॉल्ड्स गार्लिक को उनकी ही अदालत में कनाईलाल भट्टाचार्य ने गोली मार दी.
आज़ादी के बाद कोलकाता में उनके सम्मान में डलहौज़ी स्कवायर का नाम 'बीबीडी बाग़' रखा गया. बीबीडी यानी बिनॉय, बादल और दिनेश.
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