नेताजी सुभाष चंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू: कितने नज़दीक, कितने दूर - विवेचना

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नेहरू और सुभाष चंद्र बोस एक दूसरे के आठ साल के अंतराल पर पैदा हुए थे, नेहरू 14 नवंबर 1889 को बोस 23 जनवरी, 1897 को. नेहरू ने अपनी ज़िंदगी के शुरुआती दिन इलाहाबाद में बिताए थे जबकि सुभाष का आरंभिक जीवन ओडिशा के शहर कटक में बीता था.
दोनों नेता संपन्न परिवारों में पैदा हुए थे. जवाहरलाल के पिता मोतीलाल नेहरू और सुभाष के पिता जानकीनाथ बोस दोनों नामी वकील थे. जवाहरलाल अपने माता-पिता के अकेले बेटे थे जबकि सुभाष बोस के नौ भाई बहन थे.
जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस, दोनों बहुत अच्छे छात्र थे. कटक से कलकत्ता आकर बोस ने मशहूर प्रेसिडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया था.
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वहाँ जब एक अंग्रेज़ अध्यापक ने एक छात्र के साथ दुर्व्यवहार किया तो उन्होंने प्रधानाध्यापक से मिलकर माँग की कि वो अध्यापक अपने इस काम के लिए माफ़ी माँगें. लेकिन इसके लिए सुभाष बोस को ही कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया.
बाद में उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज में दाखिला लिया जहाँ उन्होंने बीए की परीक्षा में विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान प्राप्त किया.
सुभाष चंद्र बोस ने लंदन में आईसीएस की परीक्षा भी दी जहाँ उन्हें मेरिट लिस्ट में चौथा स्थान मिला.
नेहरू जब केंब्रिज से पढ़कर भारत लौटे तो उनकी उम्र 23 साल थी जबकि जब सुभाष इंग्लैंड से भारत लौटे तो वो 25 साल के हो चुके थे.
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महात्मा गाँधी के प्रति दोनों की अलग-अलग धारणा
नेहरू की महात्मा गाँधी से पहली मुलाकात 1916 के लखनऊ कांग्रेस सम्मेलन में हुई थी. युवा जवाहरलाल गाँधी से पहली मुलाकात में ख़ास प्रभावित नहीं हुए थे लेकिन धीरे-धीरे वो गाँधी के मोहपाश में बँधते चले गए और उनका बहुत सम्मान करने लगे.
इसके ठीक विपरीत सुभाष चंद्र बोस पर गाँधी का कोई ख़ास असर नहीं पड़ा था.
मशहूर इतिहासकार रुद्रांग्शु मुखर्जी अपनी किताब 'नेहरू एंड बोस पैरेलल लाइव्स' में लिखते हैं, "1927 आते-आते दोनों के पैर राजनीति में जम चुके थे और दोनों ब्रिटिश भारतीय जेलों में अपनी पहली सज़ा काट आए थे. दोनों ने गाँधी के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया था लेकिन बोस गांधी के असर में पूरी तरह से नहीं आए थे."
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वो लिखते हैं, "नेहरू सितंबर, 1921 में मोतीलाल नेहरू, गाँधी और दूसरे कांग्रेसी नेताओं के साथ कांग्रेस के विशेष सत्र में भाग लेने कलकत्ता आए थे."
"उस समय बोस चितरंजन दास के साथ काम कर रहे थे. अधिकतर कांग्रेसी नेता चितरंजन दास के घर पर ही ठहरे थे. इस बात की संभावना बहुत कम है कि उस दौरान जवाहरलाल नेहरू और सुभाष बोस की मुलाकात नहीं हुई होगी."
कमला नेहरू के अंतिम संस्कार में शामिल
बोस और जवाहरलाल की नज़दीकी तब बढ़ी जब उनकी पत्नी कमला नेहरू टीबी का इलाज कराने यूरोप गईं. उस समय जवाहरलाल जेल में बंद थे.
सुभाष बोस ख़ासतौर से कमला को देखने बाडेनवाइलर गए. जब कमला की हालत बिगड़ी तो नेहरू को जेल से रिहा कर दिया गया.

सुगत बोस अपनी किताब 'हिज़ मेजेस्टीज़ अपोनेंट' में लिखते हैं, "जब नेहरू यूरोप पहुँचे तो बोस नेहरू से मिलने ब्लैक फ़ॉरेस्ट रिसॉर्ट गए और दोनों एक ही बोर्डिंग हाउस में रुके. जब कमला नेहरू की हालत थोड़ी बेहतर हुई तो सुभाष ऑस्ट्रिया चले गए."
वो आगे लिखते हैं, "वहाँ से उन्होंने नेहरू को पत्र लिखकर कहा कि अगर मैं आपकी परेशानी में थोड़ा-बहुत भी काम आ सकता हूँ तो मुझे बुलवा भेजने में हिचकिचाइएगा नहीं. जब 28 फ़रवरी, 1936 को स्विटज़रलैंड के शहर लुज़ान में कमला नेहरू ने अंतिम साँस ली तो जवाहरलाल नेहरू, सुभाष बोस और इंदिरा गाँधी वहाँ मौजूद थे."
वो लिखते हैं, "बोस ने ही कमला नेहरू के अंतिम संस्कार की व्यवस्था करवाई. नेहरू के दुखद दिनों में सुभाष की उनके पास उपस्थिति ने दोनों के बीच संबंधों को और घनिष्ठ कर दिया."
गांधी के कहने पर नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बने
जब जवाहरलाल नेहरू यूरोप में अपनी पत्नी कमला नेहरू की तीमारदारी में लगे हुए थे, उनको अप्रैल, 1936 में लखनऊ में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन का अध्यक्ष चुन लिया गया.
उनको अध्यक्ष बनाने का विचार गाँधी का था. नेहरू के यूरोप रवाना होने से पहले गाँधी ने नेहरू को पत्र लिखकर कहा, "आपको अगले साल कांग्रेस के जहाज़ की कमान अपने हाथों में लेनी चाहिए."
कुछ दिनों बाद उन्होंने उनसे सीधे अनुरोध करके कहा, "मैं चाहता हूँ कि अगले साल आप अपने आप को कांग्रेस का अध्यक्ष बनने की अनुमति दें. आपकी रज़ामंदी कई मुश्किलों का हल निकाल देगी."
शुरू में नेहरू ने हाँ कहने में थोड़ी झिझक दिखाई लेकिन बाद में उन्होंने गाँधी के अनुरोध को स्वीकार कर लिया, लेकिन गाँधी के इस फ़ैसले पर कांग्रेस के कुछ हल्कों में विरोध के स्वर सुनाई दिए.
गाँधी से अपील की गई कि वो राजगोपालाचारी को नेहरू के खिलाफ़ चुनाव लड़ने की अनुमति दें, लेकिन गाँधी ने उनकी बात नहीं मानी और नेहरू को कुल 592 सदस्यों में 541 सदस्यों के वोट मिले.
जीत के बावजूद नेहरू पर हमले कम नहीं हुए. कावसजी जहाँगीर ने उन्हें पूरा का पूरा 'कम्युनिस्ट' कह कर पुकारा. होमी मोदी ने सचेत किया कि नेहरू मॉस्को की तरफ़ झुकने में ज़रा सी देर नहीं लगाएंगे.

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नेहरू के दोबारा पार्टी अध्यक्ष बनने पर कांग्रेस में मतभेद
जब दिसंबर, 1936 में फ़ैज़पुर कांग्रेस सम्मेलन में नेहरू के दोबारा पार्टी अध्यक्ष चुनने का प्रस्ताव आया तो सरदार पटेल ने उसका ज़ोरदार विरोध किया.
पटेल ने गांधी के सचिव महादेव देसाई को पत्र लिखा जिसमें नेहरू को ऐसा 'सजा हुआ दूल्हा' कहा जो 'जितनी भी लड़कियाँ देखे, सबसे शादी करने के लिए तैयार है'.
देसाई की सलाह पर गाँधीजी ने राजगोपालाचारी को पत्र लिख कर कहा कि पटेल चाहते हैं कि आप कांग्रेस का काँटों भरा ताज पहनें. जब गोपालाचारी ने उनकी बात नहीं मानी तो पटेल ने गोविंद बल्लभ पंत का नाम सुझाया.
पटेल ने यहाँ तक कहा कि अगर जवाहरलाल पार्टी अध्यक्ष के पद पर बने रहते हैं तो उनके पास पार्टी की सदस्यता छोड़ देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा.
राजमोहन गाँधी सरदार पटेल की जीवनी 'पटेल' में लिखते हैं, "नेहरू ने कृपलानी के सामने गाँधी से अपने पद पर बने रहने की इच्छा जताई. उनका तर्क था कि काँग्रेस में जान फूँकने के लिए आठ महीने का कार्यकाल बहुत कम है. गाँधी ने इसका जवाब देते हुए कहा कि वो देखेंगे कि वो इस बारे में क्या कर सकते हैं. उन्होंने पटेल को नेहरू के खिलाफ़ चुनाव न लड़ने के लिए मना लिया."

गांधी की सहमति से बोस कांग्रेस के अध्यक्ष बने
सन 1937 में कांग्रेस अध्यक्षता के लिए महात्मा गांधी ने सुभाष चंद्र बोस का नाम सुझाया. जब तक जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष रहे सुभाष बोस या तो जेल में थे या विदेश में.
जब सुभाष बोस कांग्रेस अध्यक्ष बने तो नेहरू भारत में नहीं थे लेकिन इन दोनों में उस दौर में कोई वैचारिक मतभेद नहीं था. दोनों हिंदुओं-मुसलमानों के बीच किसी तरह का समझौता चाहते थे. यही कारण था कि 14 मई, 1938 को सुभाष ने मोहम्मद अली जिन्ना के बंबई स्थित निवास स्थान पर जाकर उनसे मुलाकात की, लेकिन इस बातचीत का कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला.
नेहरू की तरह सुभाष चंद्र बोस ने भी एक और वर्ष के लिए कांग्रेस का अध्यक्ष बनने की इच्छा प्रकट की. इसका सबसे ज़ोरदार समर्थन रबींद्रनाथ टैगोर ने किया. उनकी नज़र में कांग्रेस में आधुनिक सोच के सिर्फ़ दो ही व्यक्ति थे, सुभाष और जवाहरलाल.
नेहरू चूँकि प्लानिंग कमेटी के अध्यक्ष थे इसलिए टैगोर चाहते थे कि बोस एक बार फिर कांग्रेस के अध्यक्ष बनें, लेकिन गांधी सुभाष चंद्र बोस को दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के पक्ष में नहीं थे.

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बोस और गांधी का टकराव
गांधी के नज़दीकी पट्टाभि सीतारमैया को सुभाष बोस के खिलाफ़ चुनाव में उतारा गया. गाँधी का विरोध होने के बावजूद सुभाष बोस की जीत हुई. उन्हें कुल 1580 मत मिले जबकि सीतारमैया सिर्फ़ 1377 लोगों का ही समर्थन ले पाए.
बोस को अधिकतर मत बंगाल, मैसूर, पंजाब, उत्तर प्रदेश और मद्रास से मिले, लेकिन इस परिणाम के बाद आए महात्मा गांधी के बयान ने सबको चौंका दिया.
गाँधी ने कहा, "चूँकि मेरे कहने पर ही सीतारमैया इस मुकाबले से नहीं हटे थे, इसलिए ये हार, उनकी न होकर मेरी है."
रुद्रांग्शु मुखर्जी लिखते हैं, "सुभाष ने ये स्वीकार किया कि उन्हें गाँधीजी के इस बयान से चोट पहुँची है. उन्होंने ये साफ़ किया कि कांग्रेस सदस्यों से गाँधी के पक्ष या विपक्ष में वोट करने के लिए नहीं कहा गया था.
वो लिखते हैं, "गाँधी के साथ संबंधों के बारे में उन्होंने कहा कि कुछ मौकों पर गांधी के साथ उनके मतभेद रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद मेरे अंदर उनके प्रति आदर में कभी कोई कमी नहीं आई है. मेरी पूरी कोशिश होगी कि मैं भारत के इस महानतम व्यक्ति का विश्वास जीत सकूँ."

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नेहरू और सुभाष के बीच मतभेद बढ़े
यहाँ से सुभाष और नेहरू के बीच मतभेदों की शुरुआत हुई. फ़रवरी के आरंभिक दिनों में नेहरू और सुभाष के बीच एक घंटे तक शांतिनिकेतन में एक मुलाकात हुई.
इस मुलाकात में क्या बातचीत हुई उसका कोई रिकार्ड तो नहीं मिलता लेकिन इसके बाद नेहरू ने बोस को जो पत्र लिखा, उसका रिकार्ड ज़रूर है.
रुद्रांग्शु मुखर्जी लिखते हैं, "नेहरू को कांग्रेस के अंदर के लोगों के लिए सुभाष बोस की ओर से 'वामपंथी' और 'दक्षिणपंथी' शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति थी. नेहरू की नज़र में इन शब्दों से ये आभास मिलता था कि गाँधी और उनका समर्थन करने वाले लोग दक्षिणपंथी ख़ेमे से हैं और जो उनका विरोध कर रहे हैं वो वामपंथी हैं."
वो लिखते हैं, "नेहरू ने इस पत्र में हिंदु-मुसलमानों, किसानों, मज़दूरों और विदेश नीति के मुद्दे भी उठाए. नेहरू जानना चाहते थे कि क्या इन मुद्दों पर सुभाष की राय कांग्रेस के उनके साथियों से अलग है? नेहरू की राय थी कि इस सबका सबसे अच्छा समाधान है कि सुभाष बोस इस बारे में एक स्पष्टीकरण नोट जारी करें."

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सरदार पटेल और पंत ने किया सुभाष का विरोध
उधर सरदार पटेल भी तब तक सुभाष बोस के विरोधी बन चुके थे. राजमोहन गांधी लिखते हैं, "पटेल ने राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर कहा कि बोस के साथ काम करना असंभव हो गया है और वो चाहते भी हैं कि पार्टी को चलाने में उन्हें खुली छूट दी जाए."
जब 22 फ़रवरी को वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई तो उसमें सुभाष बोस बीमारी की वजह से हिस्सा नहीं ले पाए.
गाँधी के कहने पर नेहरू और शरद चंद्र बोस को छोड़कर पटेल समेत कार्यसमिति के सभी सदस्यों ने इस्तीफ़ा दे दिया. इसके बाद 10 से 12 मार्च के बीच त्रिपुरी में कांग्रेस की बैठक हुई जिसमें बुखार होने के बावजूद बोस भाग लेने पहुंचे.
गाँधी ने बैठक में भाग नहीं लिया क्योंकि वो उस समय राजकोट में उपवास कर रहे थे.
पट्टाभि सीतारमैया अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ़ द कांग्रेस' में लिखते हैं, "गोविंदवल्लभ पंत ने प्रस्ताव पेश किया जिसमें कहा गया कि कांग्रेस गाँधी की मूलभूत नीतियों के प्रति प्रतिबद्ध है. इसमें पिछले एक साल से काम कर रही कार्यसमिति के काम में विश्वास प्रकट किया गया और अध्यक्ष से अनुरोध किया गया कि वो गांधी की इच्छा के अनुसार कार्यसमिति का गठन करें."

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बोस ने नेहरू को 27 पन्नों का पत्र भेजा
जब सुभाष महात्मा गाँधी के साथ अपने मतभेदों को दूर करने की कोशिश कर रहे थे, उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को 27 पन्नों का एक टाइप किया हुआ पत्र लिखा.
उसका पहला ही वाक्य था, "पिछले कुछ समय से मुझे लग रहा है कि आप मुझे बहुत नापसंद करने लगे हैं."
आगे उन्होंने लिखा, "जब से मैं 1937 में जेल से बाहर आया हूँ, निजी और सार्वजनिक ज़िदगी में मैंने हमेशा आपका सम्मान किया है. मैंने हमेशा आपको अपना बड़ा भाई समझा है और अक्सर आपकी सलाह ली है. लेकिन मेरे प्रति आपका रवैया हमेशा अस्पष्ट रहा है."
पूरे पत्र का लहजा कड़ुवाहट से भरा हुआ था. 26 जनवरी को नेहरू के बयान का ज़िक्र करते हुए सुभाष ने लिखा, "आपने कहा कि हमें नीतियों और योजनाओं पर बात करनी चाहिए, व्यक्तियों पर नहीं."

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उन्होंने लिखा, "जब कुछ ख़ास लोगों का ज़िक्र हो, तब तो आप चाहते हैं कि हम लोगों को भूल जाएँ, लेकिन जब सुभाष बोस दोबारा चुनाव में खड़े होते हैं, तब तो आप व्यक्तित्व को नज़रअंदाज़ कर सिद्धांतों की बात करते हैं, लेकिन जब मौलाना आज़ाद दोबारा चुनाव लड़ने की बात करते हैं तो आपको उनके क़सीदे पढ़ने से कोई परहेज़ नहीं करते."
सुभाष को ख़ासतौर से 22 फ़रवरी को नेहरू के कांग्रेस कार्यसमिति के 12 सदस्यों के इस्तीफ़े के बाद दिए गए बयान पर एतराज़ था. सुभाष का कहना था कि ये आपके व्यक्तित्व को शोभा नहीं देता. (नेताजी कलेक्टेड वर्क्स, भाग 9 )

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सुभाष का 'बड़बोलापन' बुरा लगा
जवाहरलाल नेहरू ने इस पत्र का जवाब देते हुए सुभाष बोस की स्पष्टवादिता की तारीफ़ की. उन्होंने लिखा, "स्पष्टवादिता कुछ लोगों को चोट पहुँचा सकती है लेकिन ये ज़रूरी है, ख़ासतौर से उन लोगों के बीच, जिन्हें साथ-साथ काम करना है. निजी तौर पर आपके प्रति मेरे मन में हमेशा स्नेह और सम्मान रहा है और अब भी है, बावजूद इसके कि कभी-कभी मैंने आपके काम और आपके काम करने के तरीके को पसंद नहीं किया है."
पत्र के अगले भाग में उन्होंने सुभाष बोस के मुद्दों का सिलसिलेवार जवाब दिया. रुद्रांग्शु मुखर्जी लिखते हैं, "कभी-कभी नेहरू को सुभाष का कथित बड़बोलापन अरुचिकर लगता था."
नेहरू ने सुभाष बोस को लिखे एक पत्र में लिखा, "मुझे लगा कि आप कांग्रेस का दोबारा अध्यक्ष बनने के लिए कुछ ज़्यादा ही आतुर हैं. राजनीतिक रूप से इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है और आपको दोबारा चुनाव लड़ने और इसके लिए काम करने का पूरा अधिकार है लेकिन मुझे इससे पीड़ा हुई क्योंकि मेरा मानना है कि आप इन सब चीज़ों से कहीं ऊपर हैं."

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सुभाष और गाँधी के बीच मतभेद बरकरार रहे
लेकिन इस पत्राचार के बावजूद सुभाष ने गाँधी और नेहरू को मनाने के अपने प्रयास कम नहीं किए. जून में वो गाँधी से मिलने वर्धा गए और वहीं गाँधी और सुभाष की आख़िरी मुलाकात हुई.
लेकिन इस मुलाकात का कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला. सुभाष के प्रति गांधी के विचार और दृढ़ होते गए.
दिसंबर, 1939 में टैगोर ने गाँधीजी को तार भेजकर कहा कि वो सुभाष पर लगे प्रतिबंध को उठा लें, तो गाँधीजी ने उसके जवाब में कहा कि उन्हें चाहिए कि वो सुभाष बोस को अनुशासन में रहने की सीख दें.
जनवरी, 1940 में सीएफ़ एंड्रूज़ को लिखे पत्र में गाँधी ने टैगोर के इस तार का ज़िक्र करते हुए लिखा, "मुझे लगता है कि सुभाष परिवार के बिगड़े हुए बच्चे की तरह व्यवहार कर रहे हैं. मुझे ये साफ़ है कि इस जटिल मामले को सुलझाना गुरुदेव के बस का नहीं है." (गांधी कलेक्टेड वर्क्स, खंड 71 )

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सुभाष की मौत की ख़बर सुनकर नेहरू हुए भावुक
अंतत: सुभाष बोस को कांग्रेस से इस्तीफ़ा देना पड़ा. उन्होंने एक नई पार्टी फ़ॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया. सन 1941 में सुभाष बोस गुप्त रूप से भारत से बाहर जाने में सफल हो गए.
वो अफ़गानिस्तान होते हुए जर्मनी पहुंचे जहाँ उन्होंने हिटलर से मुलाकात की.
कांग्रेस में नेता बनने का मौका न मिलने के बावजूद उन्होंने 1943-44 में दिखाया कि वो क्या कुछ कर सकते हैं.

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उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज (आइएनए) का नेतृत्व किया. बचपन से ही उन्हें सैनिक करियर की चाह रही थी. उन्होंने अपने जीवन के आख़िरी कुछ वर्ष सैनिक वर्दी में बिताए.
इस दौरान नेहरू 9 अगस्त, 1942 से 15 जून, 1945 तक जेल में रहे. ये उनके जीवन का सबसे लंबा जेल प्रवास था. जब नेहरू को विमान दुर्घटना में सुभाष बोस के निधन की ख़बर मिली तो वो रो पड़े.
भावुक होकर उन्होंने कहा, "सुभाष अब उन सब मुसीबतों से कहीं दूर चले गए हैं जिनका बहादुर सैनिकों का अपने जीवन में सामना करना पड़ता है. मैं कई मामलों में सुभाष से सहमत नहीं था लेकिन भारत की आज़ादी के लिए संघर्ष में उनकी ईमानदारी में कोई संदेह नहीं था."

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रेजीमेंट का नाम नेहरू के नाम पर रखा
सुभाष के साथ मतभेद के बावजूद नेहरू सुभाष के साथ बिताए दिनों को कभी भुला नहीं पाए. सुभाष के मन में भी अंतिम समय तक नेहरू के मन में सम्मान रहा, तभी तो उन्होंने आजाद हिंद फ़ौज की एक रेजिमेंट का नाम 'नेहरू रेजिमेंट' रखा.
दूसरा विश्व युद्ध समाप्त हो जाने के बाद जब अंग्रेज़ सरकार ने आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों पर दिल्ली के लाल किले में मुकदमा चलाया तो जवाहरलाल नेहरू ने 25 सालों बाद अपना वकील का गाउन पहना और अदालत में पुरज़ोर तरीके से इन सैनिकों की पैरवी की.

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रुद्रांग्शु मुखर्जी लिखते हैं, "सुभाष को विश्वास था कि वो और नेहरू मिलकर इतिहास बना सकते हैं, लेकिन नेहरू गाँधी के बिना अपना भविष्य देखने के लिए तैयार नहीं थे. बोस नेहरू संबंधों के प्रगाढ़ न हो पाने की सबसे बड़ी वजह यही थी."
नेहरू सुभाष संबंधों को भारतीय राजनीति की एक बड़ी प्रतिद्वंदिता के तौर पर देखा जाता है. ये प्रतिद्वंदिता और आगे भी चलती लेकिन नियति ने बोस को भारत के राजनीतिक पटल से हटा दिया.
कुछ लोगों की सोच है कि अगर सुभाष जीवित होते तो वो आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बनने के प्रबल दावेदार होते और ये देखना दिलचस्प होता कि भारत के नेतृत्व की ज़िम्मेदारी नेहरू को मिलती या सुभाषचंद्र बोस को.
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