जब कालापानी में पठान ने की अंग्रेज़ वायसराय लॉर्ड मेयो की हत्या

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लार्ड मेयो को भारत के सबसे घुमक्कड़ वायसरायों में गिना जाता है. भारत के चौथे वायसराय लॉर्ड मेयो ने भारत में अपने तीन वर्ष के कार्यकाल के दौरान करीब बीस हज़ार मील का सफ़र तय किया था. इसमें से अधिकतर सफ़र घोड़े की पीठ पर बैठ कर किया गया था.
उनके बारे में मशहूर था कि वो एक दिन में घोड़े की पीठ पर बैठ कर 80 मील तक चले जाया करते थे. इसके अलावा उन्होंने भारत में अपनी नियुक्ति के दौरान यातायात के उन सभी साधनों का उपयोग किया जो उस समय अंग्रेज़ों को उपलब्ध थे - स्टीमर, रेल, हाथी, याक और यहाँ तक कि ऊँट भी.
जे एच रिवेट कार्नाक अपनी किताब 'मेनी मेमोरीज़' में लिखते हैं, 'एक बार मध्य भारत में जब मेयो को पता चला कि एक स्थान पर जाने के लिए सिर्फ़ बैलगाड़ी का ही सहारा लिया जा सकता है, उन्होंने अपने पायजामे के ऊपर एक कोट पहना और बैलगाड़ी में बिछी पुआल पर लेट गए. उन्होंने अपना सिगार सुलगाकर एलान किया कि इससे सुकून की जगह हो ही नहीं सकती. सुबह अपने गंतव्य पर पहुंच कर उन्होंने कहा मुझे बहुत अच्छी नींद आई. नीचे उतर कर उन्होंने अपनी यूनिफॉर्म पहनी और अपने कोट पर लगे पुआल के तिनके को झाड़ कर नीचे गिराया.'

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अंतिम समय पर माउंट हैरियट जाने की योजना बनी
वर्ष 1872 में लॉर्ड मेयो ने तय किया कि वो बर्मा और अंडमान द्वीपों की यात्रा पर जाएंगे. अंडमान में उस समय ख़तरनाक कैदियों को रखा जाता था और इससे पहले किसी वायसराय या गवर्नर जनरल ने अंडमान का दौरा नहीं किया था.
पहली बार 1789 में लेफ़्टिनेंट ब्लेयर के मन में अंडमान में बस्ती बसाने का विचार आया था. लेकिन 1796 में अंग्रेज़ों ने मलेरिया फैल जाने और स्थानीय जनजातियों के विरोध की वजह से इन द्वीपों को छोड़ दिया था.

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वर्ष 1858 में अंग्रेज़ों ने यहाँ ख़तरनाक कैदियों को भेजना शुरू किया. पहली बार जनवरी 1858 में 200 कैदियों का जत्था यहाँ पहुंचा. जब लॉर्ड मेयो अंडमान गए तो वहाँ की कुल जनसंख्या 8,000 थी जिसमें 7,000 कैदी, 900 महिलाएं और 200 पुलिसकर्मी थे.
मेयो की अंडमान यात्रा 8 फ़रवरी, 1872 को शुरू हुई. सुबह नौ बजे उनके जहाज़ ग्लास्गो ने पोर्टब्लेयर की जेटी पर लंगर डाला. उतरते ही उन्हें 21 तोपों की सलामी दी गई. उसी दिन उन्होंने रॉस आइलैंड पर यूरोपीय बैरकों और कैदियो के कैंप का मुआयना किया. उन्होंने अपने दल के साथ चाथम द्वीप का दौरा किया. जब चाथम द्वीप पर उनके सभी कार्यक्रम समय से पहले समाप्त हो गए तो उन्होंने कहा कि अभी सूरज डूबने में एक घंटा बाकी है. क्यों न समय का सदुपयोग करते हुए माउंट हैरिएट का नज़ारा लिया जाए.

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अँधेरे में शेर अली आफ़रीदी ने किया छुरे से वार
सर विलियम विल्सन हंटर जो इस यात्रा में मेयो के साथ थे, मेयो की जीवनी 'लाइफ़ ऑफ़ अर्ल ऑफ़ मेयो' में लिखते हैं, 'माउंट हैरियेट करीब 1,116 फ़ीट की ऊँचाई पर था. उसकी चढ़ाई सीधी और बहुत सख़्त थी. कड़ी धूप में चढ़ते हुए उनके दल के अधिकतर सदस्य थक कर निढाल हो गए थे. लेकिन मेयो इतने तरोताज़ा थे कि उन्होंने एक साथ चल रही घोड़ी पर चढ़ने से ये कहते हुए मना कर दिया कि इसका इस्तेमाल कोई और कर ले. चोटी पर पहुंच कर उन्होंने 10 मिनट तक सूर्यास्त का आनंद लिया और अपने आप से कहा कितना हसीन है ये सब!'
जब तक मेयो का दल वापस जाने के लिए नीचे उतरा अँधेरा घिर आया था. होपटाउन जेटी पर एक नौका वायसराय को उनके जहाज़ तक ले जाने के लिए इंतज़ार कर रही थी.
मशाल लिए हुए कुछ लोग मेयो के आगे चल रहे थे. मेयो के दाहिने तरफ़ उनके निजी सचिव मेजर ओवेन बर्न और बाएं तरफ़ अंडमान के चीफ़ कमिश्नर डोनाल्ड स्टीवर्ट थे. मेयो नौका पर चढ़ने ही वाले थे कि स्टीवर्ट गार्ड्स को निर्देश देने आगे बढ़ गए. तभी झाड़ियों में छिपे एक लंबे पठान ने मेयो की पीठ पर छुरे से वार किया.

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हंटर लिखते हैं कि 'मशाल की रोशनी में लोगों ने एक आदमी का हाथ और छुरा उठते हुए देखा. उसने मेयो के दोनों कंधों के बीच दो बार छुरे का वार किया. मेयो के सचिव मेजर बर्न ने देखा कि एक शख़्स चीते की तरह मेयो की पीठ पर सवार हो गया था. दो सेकेंड के अंदर ही हत्यारे को पकड़ लिया गया. घुटने भर पानी में गिरे मेयो ने किसी तरह अपनेआप को ऊपर उठाया और अपने सचिव से बोले 'बर्न दे हैव डन इट.' फिर उन्होंने ऊँची आवाज़ में चिल्ला कर कहा, मुझे नहीं लगता कि मुझे ज़्यादा चोट लगी है. ये कहते ही मेयो दोबारा गिर गए. उनके सिलेटी रंग के कोट की पीठ उनके ख़ून से लाल हो गई. वहाँ मौजूद लोगों ने उनका कोट फाड़ दिया और रुमाल और अपने हाथों से बहते हुए ख़ून को रोकने की कोशिश की. कुछ सैनिकों ने उनके हाथ और पाँव मलने शुरू कर दिए.'

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लॉर्ड मेयो ने दम तोड़ा
इस घटना का आँखों देखा हाल बताते हुए मेयो के सचिव मेजर बर्न ने केंब्रिज विश्वविद्यालय पुस्तकालय में रखे हुए अपने कागज़ों में लिखा, 'वायसराय ने धीमी आवाज़ में कहा, मुझे जहाज़ तक ले चलो. हमने उन्हें नाविकों की मदद से तुरंत उठा लिया और नाव तक ले आए. उनके आख़िरी शब्द थे मेरे सिर को ऊपर उठाओ. मेयो को आनन फानन में नाव पर लाद कर इंतज़ार कर रहे जहाज़ तक पहुंचाया गया.'
हंटर लिखते हैं, 'जहाज़ पर मौजूद लोग रात के खाने की तैयारी कर रहे थे. जैसे ही मेयो की नाव जहाज़ तक पहुंची, पूरे जहाज़ की बत्तियाँ बुझा दी गईं ताकि लोग देख न सकें कि मेयो के साथ क्या हुआ है. मेयो को उठा कर उनके केबिन तक पहुंचाया गया. जब उनको उनकी पलंग पर लिटाया गया तो सबने देखा कि मेयो दम तोड़ चुके थे. सुबह होते ही पोत पर लहरा रहे ब्रिटिश झंडे को आधा झुका दिया गया.'

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1869 में ही ऊँचे ओहदे वाले अंग्रेज़ को मारने का प्रण
मेयो को छुरा भोंकने वाले शेर अली को वही सज़ा दी गई जो उस ज़माने में इस अपराध के लिए दी जाती थी. मेयो की हत्या के बाद शेर अली को भी उसी जहाज़ पर लाया गया जिस पर मेयो का पार्थिव शरीर रखा हुआ था. वहाँ पर जब अंग्रेज़ अधिकारियों ने शेर अली से पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया तो उसका जवाब था 'ख़ुदा ने हुक्म दिया.'
जब उससे ये पूछा गया कि 'इस काम में किसी ने उसकी मदद की तो उसने कहा 'मर्द शरीक कोई नहीं था. इसमें शरीक ख़ुदा है.'
शेर अली उत्तर पश्चिम सीमांत प्रदेश में तीरा घाटी के रहने वाले थे और वो पंजाब की घुड़सवार पुलिस में नौकरी करते थे. पेशावर में अपने चचेरे भाई हैदर की हत्या के आरोप में उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई थी. अपील करने पर इस सज़ा को अंडमान में उम्र क़ैद के तौर पर बदल दिया गया था. बाद में फ़ाँसी से पहले दिए गए वक्तव्य में उन्होंने कहा था कि उनकी नज़र में अपने ख़ानदानी दुश्मन को मौत के घाट उतारना अपराध नहीं था और 1869 में उन्हें सज़ा सुनाए जाने के बाद से ही उन्होंने प्रण किया था कि वो इसका बदला किसी ऊँचे ओहदे वाले अंग्रेज़ को मार कर लेंगे.

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शेर अली को फ़ाँसी की सज़ा
अंडमान में सज़ा काटने के दौरान उन्होंने तीन साल तक अपने शिकार का इंतज़ार किया. 8 फ़रवरी 1872 को जब उन्होंने लॉर्ड मेयो के आने की ख़बर सुनी तो वो सुबह से ही अपना चाकू तेज़ करने लगे. शेर अली पहाड़ों के रहने वाले एक बलिष्ठ इंसान थे. उनका क़द 5 फ़ीट 10 इंच था. अपनी काल कोठरी में हथकड़ियों और बेड़ियों से बँधे रहने के बावजूद उन्होंने अपनी शारीरिक ताकत के बल पर एक अंग्रेज़ संतरी से उसकी संगीन छीन ली थी.
शुरू में अंग्रेज़ों को शक था कि अंडमान में सज़ा काट रहे मौलवी थानेसरी और दूसरे मुजाहिदीनों ने शेर अली को मेयो की हत्या करने के लिए 'ब्रेनव़ॉश' किया था. लेकिन गहरी जाँच के बाद इसे सही नहीं पाया गया.
इस घटना पर ऑस्ट्रेलियन नैशनल विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर हेलेन जेम्स अपने शोधपत्र 'द असैसिनेशन ऑफ़ लॉर्ड मेयो: द फ़र्स्ट जेहाद?' में लिखती हैं, 'शेर अली के साथियों से पूछताछ में पता चला कि उन्होंने बहुत सावधानी से इस हत्या की तैयारी की थी. मेयो की यात्रा से पहले ही उन्होंने अपने सभी साथियों से अंतिम विदा ले ली थी. उन्होंने सब के लिए खाने की कुछ चीज़ें बनाई थीं और उसमें अपना सारा पैसा ख़र्च कर दिया था. लेकिन उनमें से किसी को इसका आभास तक नहीं हुआ था कि शेर अली इस हद तक जा सकते हैं. इससे पहले शेर अली ने पेशावर में एक घुड़सवार सैनिक के रूप में मेजर ह्यूज जेम्स और रेनेल टेलर के लिए काम किया था. टेलर उनसे इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने शेर अली को इनाम में एक घोड़ा, पिस्तौल और सर्टिफ़िकेट दिया था.'
शेर अली की मौत के आदेश को नियमानुसार समीक्षा के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट भेजा गया. 20 फ़रवरी 1872 को ट्राएबुनल ने सज़ा की पुष्टि कर दी और 11 मार्च 1872 को शेर अली को वाइपर द्वीप पर फ़ाँसी पर लटका दिया गया.

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लॉर्ड मेयो को आयरलैंड में दफ़नाया गया
इस घटना ने ब्रिटिश साम्राज्य को हिला कर रख दिया. बहुत दिनों तक जानबूझ कर इस घटना पर बहुत अधिक चर्चा नहीं की गई.
प्रोफ़ेसर हेलेन जेम्स अपने शोध पत्र 'द असैसिनेशन ऑफ़ लॉर्ड मेयो: द फ़र्स्ट जेहाद' में लिखती हैं - 'ये पूरी तरह से अप्रत्याशित था लेकिन 1857 के विद्रोह में वहाबियों की भूमिका और 20 सितंबर, 1871 को कलकत्ता के कार्यवाहक चीफ़ जस्टिस जॉन नॉर्मन की एक वहाबी समर्थक अब्दुल्लाह की छुरे से की गई हत्या के बाद ब्रिटिश सरकार को इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति के लिए तैयार रहना चाहिए था. इससे पहले भी 10 सितंबर, 1853 को पेशावर में वहाँ के कमिश्नर कर्नल फ़्रेड्रिक मेकसन की एक पठान ने उनके बंगले के बरामदे में छुरा भोंक कर हत्या कर दी थी.'

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लॉर्ड मेयो के पार्थिव शरीर को उसी पोत ग्लास्गो के ज़रिए कलकत्ता (अब कोलकाता) लाया गया जिससे वो पोर्टब्लेयर गए थे. 17 फ़रवरी, 1872 को कलकत्ता पहुंचने के बाद प्रिंसेप घाट से उनके शव को गवर्नमेंट हाउस लाया गया.

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उनकी शव यात्रा में कलकत्ता में रहने वाला लगभग हर अंग्रेज़ मौजूद था.

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उनके शव को दो दिनों तक गवर्नमेंट हाउस में राजकीय सम्मान के साथ रखा गया. फिर उसको सैनिक पोत से पहले बंबई और फिर डबलिन ले जाया गया जहाँ 25 अप्रैल, 1872 को उनको राजकीय सम्मान के साथ एक चर्च के अहाते में दफ़नाया गया.
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