त्रिपुरा: बीजेपी की मुश्किलें बढ़ाता लेफ़्ट-कांग्रेस गठबंधन और राजघराने का पेच

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- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अगरतला से
अगरतला शहर के बरजला का सरकारी स्कूल. स्कूल के मैदान में महिलाएं, नौजवान, पुरुष जुटे हैं. मौका है रक्षा मंत्री और बीजेपी के कद्दावर नेता राजनाथ सिंह और राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके माणिक साह की विजय संकल्प रैली का.
लाल रंग की कुर्सियों के भरने की रफ़्तार काफ़ी धीमी है.
यहां आई ज़्यादातर महिलाएं ग्रामीण परिवेश की हैं और इनमें से एक-दो ही हिंदी बोल और समझ पाती हैं. जो मेरी बात समझ सकती थीं उनमें से एक हनोरी से मैंने पूछा कि किसकी रैली में आई हैं तो जवाब मिला-"बीजेपी के मंत्री की रैली है." ये मंत्री कौन हैं? उनका नाम क्या है? जब मैं ये पूछती हूं तो वो हंस देती हैं.
तभी बगल में खड़ा एक नौजवान उन्हें बताता है 'अरे राजनाथ सिंह बोलो', लेकिन हनोरी कुछ नहीं बोलतीं बल्कि साड़ी के कोर से अपना मुंह छुपा लेती हैं.
थोड़ी देर में मैदान में रखी कुर्सियां भर जाती हैं, लेकिन इस छोटे से मैदान के लगभग 60 फ़ीसदी हिस्से में लगी कुर्सियों को भरने में लगा समय इस बात की ओर इशारा करता है कि त्रिपुरा का ये चुनाव बीजेपी के लिए बहुत आसान नहीं होने वाला है.
दिल्ली से 2500 किलोमीटर की दूरी पर बसा पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा, जिसकी दिल्ली के न्यूज़रूम्स में सबसे ज़्यादा चर्चा साल 2018 में हुई.
तब 25 साल से चले आ रहे लेफ़्ट के शासन को बीजेपी ने ख़त्म कर दिया और 60 में से 36 सीटें जीत कर इंडिजिनस पीपुल्स फ़्रंट ऑफ़ त्रिपुरा यानी आईपीएफ़टी के साथ मिलकर पहली बार राज्य में सरकार बनाई.
लेकिन पांच साल बाद त्रिपुरा में बीजेपी के लिए जीत का रास्ता इतना आसान नज़र नहीं आता क्योंकि इस बार यहां राजनीतिक समीकरण 2018 से पूरी तरह बदल चुके हैं. इस बार लेफ़्ट फ़्रंट और कांग्रेस गठबंधन में एक साथ चुनाव लड़ रहे हैं और त्रिपुरा के शाही प्रिंस की नई पार्टी तिपरा मोथा भी पहली बार चुनावी मैदान में है.
सांप्रदायिकता और 2021 में हुई हिंसा

राजनाथ सिंह की रैली में हमारी नज़र पड़ी उस झंडे पर जो यूपी-बिहार की रैलियों में ख़ूब दिखते हैं. लाल रंग के झंडे पर गुस्साए भगवान हनुमान की तस्वीर और साथ लिखा मिला- जय श्री राम.
कुछ नौजवान इस झंडे के साथ रैली में शामिल हो रहे थे. एक नौजवान से मैंने पूछा कि इस धार्मिक झंडे का रजनीतिक रैली में क्या काम? बदले में उसने कहा, " ये हमारी आस्था है, बीजेपी इसे मानती है, जहां बीजेपी है, वहां भगवान राम हैं."
पूर्वोत्तर की राजनीति उत्तर और मध्य भारत की राजनीति से काफ़ी अलग है. त्रिपुरा में आठ फ़ीसदी मुस्लिम आबादी है. यहां सांप्रदायिकता अतीत में कभी मुद्दा नहीं रही. राज्य की सीमा बांग्लादेश से लगती है और यहां लगभग 65 फ़ीसदी बांग्लाभाषी रहते हैं. लेकिन साल 2021 में बांग्लादेश में दुर्गा पंडालों में जो हिंसा हुई, उसकी आंच त्रिपुरा तक पहुंची.

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ग्रामीण इलाकों का सच

राज्य में पहली बार सांप्रदायिक हिंसा हुई, कुछ ईदगाह और मुसलमानों की दुकान जलाने की घटनाएं रिपोर्ट की गईं. राज्य की पुलिस पर मामले को दबाने के आरोप भी लगे.
राजधानी में लोगों से बात करने पर ऐसा नहीं लगता कि यहां हिंदू-मुसलमान की राजनीति जैसी कोई चीज़ है. लोगों के बीच सांप्रदायिकता कोई मुद्दा नहीं लगता.
लेकिन जैसे-जैसे हम शहरी इलाकों से गावों की ओर बढ़ने लगे तो तस्वीर थोड़ी अलग दिखी.
अगरतला से 65 किलोमीटर दूर हम कांकराबन के एक ऐसे ही गांव होरीजोला पहुंचे, इस गांव में एक नमाज़ पढ़ने के कमरे को अक्टूबर 2021 में हुई सांप्रदायिक हिंसा में जलाया गया था.
लगभग डेढ़ साल बाद यहां कोई इस बारे में बात नहीं करना चाहता. जो इस घटना के चश्मदीद थे उन्होंने भी मस्जिद के बारे में बात करने से मना कर दिया.
जला दिए गए नमाज़ के कमरे की जगह नया कमरा बना दिया गया है, लेकिन जले हुए ढांचे के अवशेष अभी भी पास में ही पेड़ों के बीच पड़े हुए दिख जाते हैं. इस जगह से बस कुछ क़दम की दूरी पर गांव का बीजेपी दफ़्तर है.
गांव के कुछ लोग हमें कैमरा बंद होने पर बताते हैं कि पहले यहां हिंदू-मुसलमान जैसा कुछ भी नहीं था, लेकिन इस घटना ने उन्हें डराया है. अगर वो इस बारे में कैमरे पर बात करेंगे तो उन्हें इसकी 'क़ीमत चुकानी पड़ सकती है.'
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बीजेपी का पक्ष

चौक के पास एक छोटे से मंदिर के पुजारी से जब हमारी मुलाकात हुई और तो उन्होंने इस तरह की बात को ख़ारिज किया. वह कहते हैं, "बीजेपी ने काम किया है मुझे दो हज़ार रुपया पेंशन मिल रहा है. हम खुश हैं."
बीजेपी सरकार ने हर महीने बुज़ुर्गों को 2000 रुपये पेंशन देने की योजना शुरू की और कुछ ग्रामीण इलाकों में इस योजना की लोग तारीफ़ करते हैं.
सीपीएम के त्रिपुरा महासचिव जितेंद्र चौधरी कहते हैं, "मध्य प्रदेश, यूपी, असम जहां भी हिंदू-मुसलमान होता है ये बीजेपी के लोग कराते हैं, यहां भी उन्होंने ये करने की शुरुआत में कोशिश की, लेकिन फिर उन्हें समझ आ गया कि त्रिपुरा में ऐसा नहीं हो पाएगा."
लेकिन त्रिपुरा में बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधानसभा स्पीकर रतन चतुर्वेदी कहते हैं, "ये सरासर ग़लत है, 2021 में इक्का-दुक्का घटनाएं हुईं, क्या वो हमारी पार्टी ने किया. अगर मीडिया उसे बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया है तो हम कुछ नहीं कर सकते, लेकिन सांप्रदायिकता हमने ना कभी बर्दाश्त की है ना आगे करेंगे."
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'संवैधानिक संस्थाओं को बचाने की लड़ाई'

हालांकि इस चुनाव में 2021 में हुई हिंसा या इसके बाद हुई छोटी-मोटी घटनाएं कोई मुद्दा नहीं हैं. लेकिन जो एक मुद्दा हमें लोगों के बीच नज़र आया वो है राजनीतिक हिंसा का.
इस चुनाव में बीजेपी की सरकार पर एक बड़ा आरोप है कि उसके पांच साल के शासन के दौरान राजनीतिक हिंसा बढ़ी है और सरकार ने क़ानून-व्यवस्था (लॉ-एंड ऑर्डर) सुधारने के लिए कुछ नहीं किया.
कई लोग हमसे इस बात का ज़िक्र करते हैं. ऐसा नहीं है कि राजनीतिक हिंसा त्रिपुरा में पहली बार हो रही है. लेफ़्ट और कांग्रेस के दौर से राज्य में ऐसा होता था. लेकिन लेफ़्ट, कांग्रेस के कुछ लोग और कुछ पत्रकार समेत कुछ आम लोग ये बात दोहराते हैं कि 'बीजेपी की सरकार में ख़ासकर बिप्लब देब के सीएम रहते हुए राजनीतिक हिंसा काफ़ी ज़्यादा हुई.'
त्रिपुरा में सीपीएम के सचिव और लेफ़्ट कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार माने जा रहे जितेंद्र चौधरी कहते हैं, "हम आपको चैलेंज देते हैं आप ट्रैवेल एजेंसी से एक गाड़ी लीजिए और उस पर सीपीआईएम का झंडा लगाइए. उस गाड़ी से आप बस 18-20 किलोमीटर दक्षिण या उत्तर जाइए और अगर आपकी गाड़ी पर कोई हमला ना हुआ या आप बिना चोटिल हुई वापस आ गईं तो मैं आपको एक करोड़ रुपये दूंगा."
"हमारा घोषणापत्र हमने जारी किया है, लेकिन हमारे लिए ये चुनाव संविधान बचाने की और संवैधानिक संस्थाओं को वापस चलाने के लिए ठीक माहौल बनाने की ज़िम्मेदारी है."
लेफ़्ट और कांग्रेस साल 2018 तक एक-दूसरे की विरोधी रहीं. क्या उनके गठबंधन को जनता ईमानदार मानेगी?
चौधरी का कहना है कि ''कांग्रेस और लेफ़्ट की विचारधारा में अंतर है और वो आगे भी रहेगा, लेकिन चुनावों में हम साथ इसलिए आए हैं क्योंकि ये मतभेद और विरोधी बने रहने के लिए संविधान और उसकी संस्थाओं का बचा रहना ज़रूरी है.''
उदयपुर में सीपीएम की रैली में सीताराम येचुरी भी मंच से त्रिपुरा के इस चुनाव को 'देश का संविधान बचाने का चुनाव' बताते हैं. इस रैली में वो अदानी का भी ज़िक्र करते हैं.
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बीजेपी का पांच साल का शासन

त्रिपुरा की राजनीति को बेहतर तरीके से समझने वाले और टेलीग्राफ़ अख़बार के लिए 30 सालों तक त्रिपुरा को कवर करने वाले शेखर गुप्ता कहते हैं, "बीजेपी को सबसे बड़ा नुक़सान इस बात का हो सकता है कि उसने बीते पांच साल में कोई नया काम राज्य में नहीं किया. कोई नया इंफ्रास्ट्रक्चर बीजेपी ने नहीं तैयार किया.
कई प्रोजेक्ट का ठेका त्रिपुरा की कंपनियों को ना देकर बाहर की कंपनी को दिया गया. मैं आपको लाइटहाउस प्रोजेक्ट का उदाहरण देता हूं जिसका कॉन्ट्रैक्ट गुजरात की कंपनी को मिला, आज तक वो काम बीच में लटका हुआ है."
शेखर गुप्ता कहते हैं, ''ये सही है कि राज्य में हिंसा, राजनीतिक पार्टियों के दफ़्तर पर हमले हुए हैं. सबसे अहम ये है कि बीते पांच सालों में जो चुनाव हुए वो ठीक से नहीं हुए, काउंसलर का चुनाव, लोकसभा चुनाव, सिविक बॉडी के चुनाव या फिर उपचुनाव - बीजेपी के समर्थकों ने मनमानी की, फ़ोर्स्ड वोटिंग हुई. सरकार ने निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए कुछ नहीं किया.''
हालांकि शेखर ये साफ़ करते हैं कि राज्य में सांप्रदायिक माहौल बिल्कुल नहीं है. ना ही इस तरह की कोई हिंसा हुई. दिल्ली में बैठी मीडिया में 2021 की हिंसा को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया.
बीजेपी नेता और विधानसभा स्पीकर रहे रतन चतुर्वेदी कहते हैं कि राजनीतिक हिंसा की बात कहना ग़लत है. उनके मुताबिक़, "कुछ घटनाएं अगर हुई भी हों तो हमने उन पर कार्रवाई की है. हमने तो अपने काउंसलर को भी एक मामले में गिरफ़्तार किया था. जो लेफ़्ट आज ये कह रही है उसके वक़्त में तो ऐसा सोच भी नहीं सकते थे, लेफ़्ट और कांग्रेस के बीच जो हिंसा हुई, उसमें तो हत्याएं होती थीं."
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लेफ़्ट-कांग्रेस गठबंधन बीजेपी के लिए चुनौती?

अतीत में एक-दूसरे के धुर विरोधी रहने वाले लेफ़्ट फ़्रंट और कांग्रेस इस बार एक साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रहे हैं.
इस गठबंधन में 60 सीटों की शेयरिंग कुछ यूं है- कांग्रेस 13 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, सीपीएम ने 43 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं और सीपीआई, आरएसपी, फ़ॉरवर्ड ब्लॉक को एक-एक सीट मिली है. रामनगर सीट पर ये गठबंधन निर्दलीय उम्मीदवार को समर्थन दे रहा है.
वहीं बीजेपी, अपनी पुरानी सहयोगी आईपीएफ़टी के साथ एक बार फिर गठबंधन में चुनाव लड़ रही है. लेकिन इस बार बीजेपी ने इसे पांच सीटें दी हैं और 55 सीटों पर वह ख़ुद चुनाव लड़ रही है.
साल 2018 में आईपीएफ़टी के साथ गठबंधन होने का फ़ायदा बीजेपी को मिला और यहां के स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि कांग्रेस का वोट और जनजातीय वोट का अच्छा हिस्सा बीजेपी को मिला. इसलिए जो बीजेपी 2013 तक एक भी सीट नहीं जीत सकी थी वो साल 2018 में 36 सीटें जीत गई और आईपीएफ़टी ने आठ सीटें जीतकर सरकार बनाई.
साल 2018 के नतीज़ों पर एक नज़र डालें तो उस समय लेफ़्ट ने 16 सीटें जीती थीं और बीजेपी ने 36, लेकिन दोनों के बीच का वोट शेयर का अंतर एक फ़ीसदी से भी कम था. बीजेपी को 43.59 फ़ीसदी वोट मिले थे और लेफ़्ट का वोट शेयर 43.35 फ़ीसदी था. वहीं कांग्रेस का वोट शेयर जो 2013 में 35.5 फ़ीसदी था वो 2018 में गिरकर 1.7 फ़ीसदी हो गया.
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चुनावी समीकरण क्या कहता है

मतलब साफ़ था कि लेफ़्ट का वोट बीजेपी को ट्रांसफ़र नहीं हुआ. लेकिन सभी एंटी-लेफ़्ट वोट जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा कांग्रेस के वोटरों का था और कुछ हद तक जनजातियों का वोट, वो बीजेपी को मिला.
साल 2018 में कांग्रेस के राज्य के कई वरिष्ठ नेता बीजेपी में शामिल हुए और ऐसे में बीजेपी की बड़ी जीत का कारण कांग्रेस का वोट शिफ़्ट होना माना जाता है.
शेखर गुप्ता कहते हैं, "इस बार जो तस्वीर दिख रही है उसमें मामला कड़ी टक्कर का है क्योंकि इस बार लेफ़्ट के प्रति एंटी-इनकम्बेंसी नहीं है जो साल 2018 में थी. इस बार कांग्रेस लेफ़्ट एक साथ हैं. ऐसे में अगर बंगाली हिंदुओं का वोट नहीं बंटा और त्रिपुरा मोर्था भी जनजातीय इलाकों में बेहतर कर ले गई तो बीजेपी के लिए जीत की राह आसान नहीं होगी."
बीजेपी के लिए एक मुश्किल अपने नेताओं की रैली में भीड़ जुटाना भी है. हमने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की विजय संकल्प रैली से एक दिन पहले उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्य नाथ का शहर के बीचोंबीच हुआ रोड शो भी देखा. बीजेपी के दोनों ही स्टार प्रचारकों के लिए कोई ख़ास भीड़ नहीं जुटी थी.
इसके मुकाबले उदयपुर में सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी और कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की जनसभा में मैदान भी बड़ा था और भीड़ भी बीजेपी के मुक़ाबले ज़्यादा दिखी.
लेकिन राज्य में अगरतला से लेकर ग्रामीण इलाकों तक घूमने पर ऐसा लगता है कि सूबे में बस बीजेपी ही चुनाव लड़ रही है. हर तरफ़ बीजेपी के झंडे और पोस्टर नज़र आते हैं. स्थानीय अख़बार भी बीजेपी के चुनावी इश्तेहार से पटे पड़े हैं.

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नई पार्टी तिपरा मोथा क्या किंगमेकर बनेगी?

त्रिपुरा के चुनाव में इस बार लेफ़्ट-कांग्रेस का एक साथ आना तो बड़ी बात है ही, लेकिन सबसे रोचक फ़ैक्टर है त्रिपुरा के रॉयल प्रिंस प्रद्योत ब्रिक्रम माणिक्य देवबर्मा की पार्टी तिपरा मोथा.
ये पार्टी यहां की 31% जनजातीय आबादी के लिए एक अलग राज्य 'ग्रेटर त्रिपरा लैंड' बनाने की बात कर रही है.
आदिवासी लोग त्रिपुरा के चुनाव में एक बड़ा मुद्दा हैं. बीते चुनाव में बीजेपी को इसका फ़ायदा भी हुआ था. साल 2018 में बीजेपी ने इंडिजिनस पीपुल्स फ़्रंट ऑफ़ त्रिपुरा, आईपीएफ़टी के साथ गठबंधन किया और इस पार्टी की नींव ही अलग त्रिपुरालैंड बनाने की मांग के साथ रखी गई थी.
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यानी एक अलग राज्य जो यहां की जनजाति के लिए हो. लेकिन बीते पांच सालों में ना तो आईपीएफ़टी ने इस पर बात की और ना ही बीजेपी ने. इस बार आईपीएफ़टी के घोषणापत्र में त्रिपुरालैंड का कोई ज़िक्र नहीं है. लेकिन इस चुनाव में उसी पुरानी मांग को एक नई पार्टी लेकर फिर चुनावी मैदान में है.
तिपरा मोथा ने इस चुनाव में नारा दिया है 'ग्रेटर त्रिपुरालैंड' का.
बीते दिनों तिपरा मोथा के मुखिया प्रिंस रॉयल प्रिंस प्रद्योत ब्रिक्रम माणिक्य देवबर्मा ने दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की, और इस मुलाकात में उन्होंने गृह मंत्री शाह से कहा कि वह ग्रेटर त्रिपुरालैंड बनाने की बात लिखित में दें जिसे सीधे तौर पर उन्होंने मना कर दिया.

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तिपरा मोथा के प्रवक्ता एंटनी देब बर्मा कहते हैं, "हम ये चाहते हैं कि एक ऐसी व्यवस्था हो जहां नेता, प्रशासन हमारा हो और हम अपने लोगों के हितों की रक्षा के लिए नियम बनाएं. आज हम अपने राज्य में अल्पसंख्यक हैं. बातचीत के लिए हमें बीजेपी ने बुलाया था, हमारे लीडर ने लिखित में मांगा. उन्होंने (अमित शाह) देने से इनकार किया तो हमने साथ जाने से मना कर दिया."
तिपरा मोथा की मांग को बीजेपी और लेफ़्ट-कांग्रेस दोनों ही वास्तविकता से दूर बताती हैं. बीजेपी ने अपनी पिछली सरकार में ही साफ़ कर दिया है कि वह नए राज्य की इस मांग को नहीं मानती.
वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता कहते हैं, "त्रिपुरा के राजा ने ही बंगाली लोगों को त्रिपुरा में बसाया. उनके बुलाने पर ही बंगाली लोग यहां आए, दरअसल मैदानी इलाकों में खेती करने के लिए इन्हें राजा ने बुलाया था जो आय का बड़ा ज़रिया था. जनजातीय लोग पहाड़ी इलाकों में खेती करते थे जहां से आय नहीं होती थी. लेकिन आज उसी राजघराने की पार्टी अलग राज्य की बात कर रही है, सवाल तो ये है कि इन्हें बसाया किसने? "
बीजेपी सरकार में विधानसभा के स्पीकर रहे और पार्टी के वरिष्ठ नेता रतन चक्रवर्ती कहते हैं, "आख़िर उसका मैप क्या होगा ये क्यों नहीं बताती तिपरा मोथा. इन्हें लोगों की भावनाओं के साथ मज़ाक करना बंद करना चाहिए."
त्रिपुरा गोवा और सिक्किम के बाद देश का तीसरा सबसे छोटा राज्य है. ऐसे में इसे दो हिस्सों में बांट देने की मांग को राजनीतिक पार्टियां असंभव-सी मांग मानती हैं.
लेकिन तिपरा मोथा अपनी मांग को जायज़ ठहराने के लिए हैदराबाद से तेलंगाना के अलग होने के वाक़ये की याद दिलाती है.
जब हमने टिपरा मोथा के प्रवक्ता से पूछा कि क्या पार्टी के पास अलग राज्य की अर्थव्यवस्था कैसे चलेगी. इसकी कोई योजना है तो हमें कोई साफ़ जवाब नहीं मिला. एंटनी देब बर्मा कहते हैं, ''ये तो भारत सरकार को तय करना है.''
शेखर गुप्ता कहते हैं कि ''इससे पहले बीजेपी के साथ गठबंधन करने वाली आईपीएफ़टी भी त्रिपुरालैंड की मांग करती थी, लेकिन चुनाव के बाद क्या ऐसा कुछ हुआ. यहां चुनावों में ऐसी मांग लेकर पार्टियां वोट लेती हैं और फिर ग़ायब हो जाती हैं.''
लेकिन एक बात जो हमें ग्रामीण इलाकों में साफ़ नज़र आई वो है इस पार्टी के लिए समर्थन. जिस इलाके में जनजातियों की आबादी वाले गांव हैं वहां लोग तिपरा मोथा की बात करते दिखते हैं, ख़ास कर त्रिपरासा जनजाति के नौजवानों के बीच प्रिंस देब बर्मा की पार्टी के पीले-लाल रंगों वाले झंडे खूब नज़र आते हैं.

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10323: वो संख्या जो चुनाव में एक अहम मुद्दा है

त्रिपुरा में 10323 टीचरों की नौकरी जाना एक बड़ा चुनावी मुद्दा है. 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने 10323 शिक्षकों की भर्ती के नियमों को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था.
साल 1978 में त्रिपुरा में लेफ़्ट की सरकार आई तो शिक्षकों की भर्ती ने लिए नियम बनाए गए. इस नियम में 'मेरिट कम नीड बेसिस' के तहत ग़रीब तबके से आने वाले आवेदकों को योग्यता के मुक़ाबले वरीयता दी जा रही थी, लेकिन इसे कोर्ट में चुनौती दी गई और सुप्रीम कोर्ट ने इस नियम को संविधान में तय आरक्षण के नियम के प्रतिकूल पाया और इस प्रक्रिया को रद्द कर दिया गया.
इससे साल 2010 और साल 2013 में जिन शिक्षकों की भर्ती हुई थी उनकी नौकरी चली गई.
कई साल नौकरी करने वाले ये शिक्षक बेरोज़गार हो गए. इनमें से कई लोग खेतों में मज़दूरी करने को मजबूर हुए तो कुछ ने सब्ज़ी-फलों की रेहड़ी लगा ली. कुछ ने ग़रीबी और लाचारी में आत्महत्या कर ली.
राजधानी से सौ किलोमीटर उत्तर की ओर रबर के जंगलों के बीच बसे जोलाइबारी इलाके के एक आदिवासी गांव की जयश्री त्रिपरा के पति धर्मेंद्र त्रिपरा उन टीचरों में से एक थे जिनकी नौकरी चली गई.
बीते साल अक्टूबर में दुर्जापूजा के एक दिन पहले उन्होंने गांव के पास एक रेलवे ट्रैक पर आत्महत्या कर ली.
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उनकी पत्नी बताती हैं कि जब नौकरी छूटी तो उन्होंने लोगों के खेतों में मज़दूरी का काम शुरू किया. घर बनवाने के लिए बैंक से क़र्ज़ लिया था और मज़दूरी से वो क़र्ज़ भरना तो दूर घर चलाना मुश्किल था.
बैंक वाले क़र्ज़ की वसूली के लिए घर भी आने लगे थे.
जयश्री टूटी-फूटी हिंदी में हमें बताती हैं, "मेरे पति ने मुझसे और मेरी छह साल की बेटी से बात करना बंद कर दिया था. वो चुप ही रहते थे. उस दिन दुर्गा अष्टमी का दिन था, बेटी के पास नया कपड़ा नहीं था और गांव के बच्चे नये कपड़ा पहन रहे थे तो उसने बोला पापा मेरे पास तो नया ड्रेस भी नहीं है, मेरे दोस्त सब अच्छे कपड़े पहन रहे हैं, मैं क्या पहन कर जाऊं. मुझे नई ड्रेस दिला दो. ये सुन कर मेरे पति कुछ बोल नहीं पाए बस उनकी आंख में आंसू थे, जो मैंने देखा." अपनी बात कहते हुए जयश्री फ़फ़क पड़ती हैं.
रुंधे गले से जयश्री बताती हैं कि ''चार अक्टूबर, 2022 को दोपहर का वक्त था, मैं सो रही थी और के पास से ट्रेन निकली, मुझे आवाज़ सुनाई दी और लगा कि ये रोज़ जाती है, लेकिन थोड़ी देर में ही मुझे गांव वालों ने बताया कि उनकी लाश पटरी पर पड़ी है.''
जयश्री के पास आय का कोई सहारा अब नहीं है, ना ही उनके पास रबर के खेतों में काम करने का हुनर है. जयश्री चाहती हैं कि उन्हें कोई नौकरी मिल जाए ताकि वो अपनी छह साल की बेटी इस्ता त्रिपरा को पढ़ा सकें.

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टीचरों की नौकरी लेफ़्ट की सरकार में गई, लेकिन इनकी नाराज़गी बीजेपी से इसलिए है क्योंकि उसने अपना चुनावी वादा नहीं पूरा किया और नौकरी नहीं दी.
इनमें से एक शिक्षक अपना नाम ना छापने की शर्त पर कहते हैं, "मैं प्राइमरी स्कूल के बच्चों को पढ़ाता था, अब सब्ज़ी बेच रहा हूं. हमारी नौकरी चली गई और केंद्र में सरकार ईडब्लूएस कोटा लेकर आई, वो क्या है? वहां तो सालाना आठ लाख पाने वाले को आरक्षण दे रहे हैं. लेकिन हमारे लिए कुछ नहीं किया."
इन शिक्षकों ने कई बार प्रदर्शन किए, सरकार से बातचीत की, शिक्षकों की भर्ती किए जाने की अपील की, लेकिन इनका कहना है कि पांच सालों में इन्हें कोई सफलता नहीं मिली. यहां सरकार ने 7वां वेतन आयोग तो लागू कर दिया, लेकिन अब तक भत्ते उसके मुताबिक़ नहीं दिए जाते.
त्रिपुरा एक छोटा-सा राज्य है जहां जनजातियों के मुद्दे, हिंसा, रोज़गार सहित कई मुद्दे हैं जिनका देश के नेशनल न्यूज़रूम में शायद ही कभी ज़िक्र होता है.
बीजेपी के लिए यहां बीते पांच साल में सब कुछ आसान नहीं था. इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उसे विधानसभा चुनाव से चंद महीने पहले मई 2022 में बिप्लव देब को बदलकर माणिक साह को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा.
राज्य की आबादी लगभग 40 लाख है, लेकिन ये राज्य पूर्वोत्तर की राजनीति में काफ़ी अहम है. लेफ़्ट के लिए ये वजूद को बचाए रखने की लड़ाई है और बीजेपी के लिए पूर्वोतर में ख़ुद को मज़बूत करने की और इन सब में एक नई पार्टी तिपरा मोथा किंगमेकर बन सकती है. लेकिन किसके हिस्से में क्या आएगा इसका पता 2 मार्च को मतगणना के दिन चलेगा.
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