बजट 2023: निर्मला सीतारमण का पांचवां बजट और वो रस्में जो बन रही हैं इतिहास

बजट 2023

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इमेज कैप्शन, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 2019 का बजट पेश करने से पहले संसद जाने की तैयारी में
    • Author, आलोक जोशी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

एक फ़रवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अपना पांचवां बजट पेश कर रही हैं.

भारत में सबसे लंबा बजट भाषण देने का रिकॉर्ड भी उन्हीं के नाम है. इसलिए इस बार भी लोगों की नज़र इस बात पर है कि बजट भाषण कितना लंबा होगा.

लेकिन नई पीढ़ी के कुछ ही लोग जानते होंगे कि आज़ादी के बाद कई दशक तक यह बजट भाषण दिन के ग्यारह बजे नहीं बल्कि शाम पांच बजे हुआ करता था.

ऐसा क्यों होता था, इसके पीछे भी तरह-तरह के किस्से प्रचलित रहे.

मसलन एक बार किसी ने पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से पूछा कि जब भारत की संसद 10 बजे से चलने लगती है तो बजट पांच बजे क्यों आता है? जवाब में उन्होंने कहा कि अंग्रेज़ों के ज़माने से यही नियम चल रहा है.

बहुत से लोग यह भी कहते थे कि बजट शाम को इसलिए आता है क्योंकि तब तक शेयर बाज़ार बंद हो चुका होता है और सरकार नहीं चाहती कि बजट का शेयर बाज़ार पर तुरंत कोई असर पड़े.

इस तर्क के पीछे क्या था पता नहीं, लेकिन शेयर बाज़ार के खिलाड़ी बजट की शाम को एक विशेष सत्र में शेयरों का लेन-देन किया करते थे, इसलिए यह बात बहुत गले से नहीं उतरती.

कुछ लोग यह भी कहते थे कि यह समय लंदन में शेयर बाज़ार खुलने के साथ जुड़ा है.

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बजट की टाइमिंग का इतिहास

सबसे तार्किक बात यही लगती है कि ग़ुलामी के दौर में भारत का बजट ब्रिटेन की संसद में पेश होता था. वहां उसका समय साढ़े ग्यारह बजे का था.

फिर जब भारत में बजट भाषण होने शुरू हुए तब भी ब्रिटेन में सांसद उस भाषण को संसद में बैठकर सुना करते थे, इसीलिए भाषण होता तो भारत में था, लेकिन वक्त हाकिमों के हिसाब से तय हो गया.

यह काम शुरू तो तब हुआ जब ईस्ट इंडिया कंपनी के बाद ब्रितानी सरकार ने सीधे भारत पर राज करना शुरू किया था.

अब आज़ादी के बाद भी बजट का समय क्यों नहीं बदला गया? यह एक सवाल है जिसका जवाब मिलना मुश्किल है.

माना जा सकता है कि जो चंद्रशेखर ने कहा उसी तर्ज़ पर पहले के नेताओं को भी लगा हो कि शायद यह पुरानी परंपरा है जिसे छेड़ने की ज़रूरत नहीं है.

बीच-बीच में सवाल भी उठते रहते थे, लेकिन जवाब 2001 में ही मिल पाया. वाजपेयी सरकार के वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने फ़ैसला किया और बजट भाषण का वक़्त बदलकर 11 बजे कर दिया.

समय को लेकर दूसरा मसला यही है कि किसका बजट भाषण कितना लंबा या छोटा हुआ? यानी उसे पढ़ने में कितना वक़्त लगा.

सबसे लंबे बजट भाषण का रिकॉर्ड तो मौजूदा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के ही नाम है. उन्होंने 2020 में 2 घंटे 42 मिनट का बजट भाषण दिया. वो भी तब जब तबीयत बिगड़ने की वजह से वह पूरा भाषण नहीं पढ़ पाई थीं. इसके दो पन्ने रह गए थे. वरना यह समय कुछ और होता.

इससे पहले सबसे लंबे भाषण का रिकॉर्ड जसवंत सिंह के नाम था जिन्होंने 2 घंटे 15 मिनट का भाषण दिया था.

हालांकि शब्दों की गिनती के लिहाज़ से सबसे लंबा बजट भाषण पूर्व प्रधानमंत्री और तब के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने 1991 में दिया था.

आर्थिक सुधारों की शुरुआत करनेवाला यह बजट भाषण 18,520 शब्दों का था. मोदी सरकार के पहले वित्तमंत्री अरुण जेटली इसके काफ़ी क़रीब पहुंचे थे, लेकिन फिर भी 16,536 शब्दों के साथ दूसरे नंबर पर ही रहे.

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इमेज कैप्शन, शब्दों की गिनती के लिहाज़ से सबसे लंबा बजट भाषण पूर्व प्रधानमंत्री और 1991 में वित्त मंत्री रहे मनमोहन सिंह ने दिया था

सबसे छोटा बजट भाषण और हलवा सेरेमनी

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सबसे छोटे बजट भाषण का रिकॉर्ड एच एम पटेल के नाम है जिन्होंने 1977 में मात्र 800 शब्दों का बजट भाषण दिया था. हालांकि यह अंतरिम बजट था. लेकिन पूर्ण बजट में सबसे छोटा बजट था.

बजट दस्तावेज़ और भाषण की गोपनीयता भी एक गंभीर विषय है. इसे गोपनीय रखने के लिए भी तरह-तरह के नियम बनाए गए हैं. न सिर्फ़ बजट के फ़ैसलों बल्कि उसे लिखने और उसके छपने तक की प्रक्रिया में हर क़दम पर गोपनीयता ज़रूरी है.

इसलिए बजट से कई दिन पहले वित्त मंत्रालय के एक हिस्से में सिर्फ़ बजट से जुड़े लोग ही काम करते हैं और बाक़ी लोगों के लिए वहां आना-जाना रोक दिया जाता है. बजट से लगभग दस दिन पहले यानी जब बजट तैयार होकर छपाई के लिए जाता है तब इससे जुड़ी पूरी टीम को एक जगह बंद कर दिया जाता है और उनके बाहर निकलने ही नहीं बल्कि बाहर किसी से बात करने पर भी रोक होती है.

क्योंकि यह लोग अब अपने घर परिवार से भी अलग हो जाते हैं इसलिए यह काम शुरू होते वक्त पारंपरिक रूप से हलवा बनाया जाता है और वित्त मंत्री रस्मी तौर पर सबको हलवा खिला कर टीम को तालाबंद करते/करती हैं.

इसी को हलवा समारोह या हलवा सेरेमनी कहते हैं. पर पिछले साल हलवा नहीं बना था. उसकी जगह मिठाई के डिब्बे बांटे गए थे. हालांकि अब डिजिटल युग में टीम को बंद रखने का समय कम होता जा रहा है, लेकिन परंपरा अभी जारी है.

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जब बजट हुआ लीक

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बजट पहले राष्ट्रपति भवन की प्रिंटिंग प्रेस में छपता था. लेकिन 1950 में बजट संसद में पेश होने से पहले ही उसके लीक हो जाने से काफ़ी हंगामा मचा. तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई को इसी कारण हटना पड़ा और तब से बजट छापने का काम मिंटो रोड पर मौजूद सरकारी सिक्योरिटी प्रेस को सौंप दिया गया.

1980 से बजट की छपाई का काम वित्त मंत्रालय के तहखाने में ही होने लगा.

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अब हलवा सेरेमनी के बाद बजट की टीम इसी इलाके में बंद होती है. हालांकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट के ब्रीफ़केस को लाल बस्ते में बदल दिया है और बजट भी वो काग़ज़ से पढ़ने के बजाय मेड इन इंडिया टैबलेट से पढ़ती हैं.

इसलिए वो दिन दूर नहीं लगता जब शायद बजट के छपने और उसकी गोपनीयता से जुड़ी बाक़ी रस्में भी इतिहास बन जाएँ और बजट सीधे वित्त मंत्री के कंप्यूटर से ही संसद के केंद्रीय रिकॉर्ड में अपलोड कर दिया जाए.

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