राहुल गांधी बोले, मीडिया में नरेंद्र मोदी छाए इसलिए शुरू की 'भारत जोड़ो यात्रा'- प्रेस रिव्यू

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि मुख्यधारा की मीडिया के व्यवहार ने पार्टी को 'भारत जोड़ा यात्रा' के लिए प्रेरित किया ताकि लोगों से सीधे संवाद किया जा सके.
बुधवार को 'भारत जोड़ा यात्रा' ने अपने कार्यक्रम में पहला बदलाव करते हुए हिमाचल प्रदेश में एक दिन बिताने का फ़ैसला किया.
द टेलीग्राफ़ में छपी इस ख़बर के अनुसार, राहुल गांधी पहले भी कह चुके हैं कि मीडिया का इस्तेमाल प्रोपेगैंडा के हथियार की तरह किया जा रहा है.
बुधवार को कांगड़ा में एक रैली में उन्होंने कहा, मीडिया में लोगों की असल चिंताओं के लिए जगह नहीं है और ये इसलिए नहीं कि मीडिया को उनकी ख़बर नहीं बल्कि ये परेशानी उनके रवैये के कारण है. उन्होंने कहा कि ऐसे में विपक्ष के लिए मुश्किलें बढ़ जाती हैं.
रैली में राहुल गांधी ने कहा, "मीडिया में बेरोज़गारी, नौकरियों में कटौती और अग्निवीर योजना की कमियों जैसे मुद्दों पर बात नहीं होती. कन्याकुमारी से हिमाचल तक हमने युवाओं से बात की तो उन्होंने बताया कि प्रोफ़ेशनल डिग्री होने के बावजूद उन्हें मज़दूरी करनी पड़ रही है."
"हम महंगाई का मुद्दा उठाते हैं, लेकिन मीडिया इसे नज़रअंदाज़ करती है. समाज में डर और नफ़रत फैल रहा है, समुदाय एक-दूसरे से लड़ रहे हैं. लेकिन मीडिया केवल नरेंद्र मोदी का चेहरा दिखाने में व्यस्त है, वो क्रिकेटर और बॉलीवुड कलाकारों का चेहरा दिखा रही है."
राहुल गांधी ने कहा कि 'इन मुद्दों को संसद में उठाना असंभव हो गया है, ऐसा करने पर या तो माइक बंद कर दिया जाता है या फिर कैमरा हटा लिया जाता है. इसलिए कांग्रेस के पास यात्रा शुरू करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था.'
अख़बार के अनुसार, 'भारत जोड़ा यात्रा' के रूट में हिमाचल प्रदेश शामिल नहीं था, लेकिन वहां की नई कांग्रेस सरकार की गुज़ारिश पर यात्रा एक दिन के लिए हिमाचल पहुंची. अब ये यात्रा पंजाब से होते हुए गुरुवार को जम्मू कश्मीर की तरफ़ बढ़ेगी. गुरुवार को पठानकोट में एक रैली होनी है.

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छात्रों की संख्या बढ़ी, पर लर्निंग लेवल कम हुआ
कोरोना महामारी के दौरान स्कूल बंद होने के बावजूद स्कूलों में छात्रों की संख्या बढ़ी है, ये आशंका थी कि स्कूलों में अधिक उम्र की लड़कियों की संख्या कम हो सकती है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है.
ये जानकारी मिली है छह से 14 साल की उम्र के बच्चों के स्कूलों में दाखिला और पढ़ाई से जुड़े एएसईआर सर्वे (द ऐनुअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट) से जिसे प्रथम फ़ाउंडेशन ने कराया है. ये सर्वे 616 ज़िलों में सात लाख बच्चों पर किया गया है.
प्रथम की सीईओ रुक्मिणी बनर्जी के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि सर्वे के अनुसार, 'अधिक बच्चों ने सरकारी स्कूलों में ऐडमिशन लिया है. इससे सरकार की ज़िम्मेदारी और बढ़ गई है क्योंकि अब स्कूलों को बच्चों के अटेन्डेंस पर अधिक ध्यान देना है. अटेन्डेंस के मामले में पैटर्न पहले से अधिक नहीं बदला है, लेकिन इसे बदलने की ज़रूरत है.'
अख़बार के अनुसार, मिडडे मील, मुफ़्त किताबों और शौचालय जैसी सुविधाओं के कारण भी बच्चे सरकारी स्कूलों की तरफ़ आकर्षित हुए हैं. ग्रामीण इलाकों में कोविड के दौरान निजी स्कूल ज़्यादा कुछ कर नहीं सके, लेकिन सरकारी स्कूल सुविधाएं देने में और टीचर की मौजूदगी के मामले में बेहतर थे. इसका एक कारण ये भी हो सकता है कि इस दौरान परिवार की आय पर सीधा असर पड़ा जो बच्चों की शिक्षा में भी नज़र आया.
अख़बार लिखता है कि सर्वे में पाया गया है कि निजी ट्यूशन बढ़ा है. इसका एक कारण ये हो सकता है कि निजी ट्यूशन में फ़ीस देने की समयसीमा की पाबंदी नहीं होती और फिर कोविड के समय स्कूल बंद होना भी एक कारण हो सकता है.

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अख़बार लिखता है कि 2018 के बाद से लर्निंग लेवल में कमी देखी गई है, लेकिन ये भी अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग है.
इसी ख़बर पर हिंदुस्तान टाइम्स ने लिखा है कि सरकारी और निजी स्कूलों में कक्षा दो की किताब पढ़ सकने वाले कक्षा तीन के बच्चों की पढ़ने की क्षमता 2018 में जहां 27.3 फ़ीसदी थी, वहीं साल 2022 में घटकर 20.5 फ़ीसदी हो गई.
इस मामले में केरल (2018 में 52.1 फ़ीसदी और 2022 में 38.7 फ़ीसदी), हिमाचल प्रदेश (2018 में 47.7 फ़ीसदी और 2022 में 28.4 फ़ीसदी) और हरियाणा (2018 में 46.4 फ़ीसदी और 2022 में 31.5 फ़ीसदी) में सबसे अधिक गिरावट देखी गई. इसी तरह की गिरावट पांचवीं कक्षा के बच्चों में भी दर्ज की गई.
सर्वे के अनुसार, गणित के सवाल हल करने की बच्चों की क्षमता में भी गिरावट देखी गई है, लेकिन अपने से छोटी कक्षा की किताब पढ़ने में हुई गिरावट के मुक़ाबले ये गिरावट कम है. उदाहरण के तौर पर कक्षा तीन में जोड़-घटाव कर सकने वाले बच्चों की संख्या जहां 2018 में 28.2 फ़ीसदी थी, वहीं ये 2022 में घटकर 25.9 फ़ीसदी हो गई.
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चंद्रशेखर राव के नेतृत्व में बन रहा विपक्षी गठबंधन
तेलंगाना के खम्मम में सत्तारूढ़ भारत राष्ट्र समिति की एक रैली में विपक्षी खेमे ने अपनी ताक़त का प्रदर्शन किया है.
जनसत्ता में छपी इस ख़बर के अनुसार, रैली में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के अलावा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान, केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन, समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी राजा भी दिखे.
इस दौरान चंद्रशेखर राव ने कहा कि अगर विपक्षी गठबंधन चुनाव जीतेगा तो देशभर के किसानों को मुफ़्त बिजली की सुविधा जी जाएगी.
वहीं डी रजा ने कहा कि 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा का मुक़ाबला करने के लिए सभी धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक दलों को साथ आने की ज़रूरत है.
पिनराई विजयन ने कहा कि भाजपा ने लोकतंत्र की नींव को कमज़ोर किया है, इसलिए विपक्ष आज एक नए प्रतिरोध की शुरूआत कर रहा है. उन्होंने कहा कि सभी देशी भाषाओं को दरकिनार करते हुए हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में पहचान देने की कोशिश की जा रही है, इससे राष्ट्रीय अखंडता प्रभावित होगी.
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दक्षिण बन रहा मोदी की चिंता
वहीं 17 जनवरी को ख़त्म हुई बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में देखा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दक्षिण के राज्यों में पैर जमाने और क्षेत्रीय दलों से निपटने में मुश्किलों का सामना कर रहे हैं.
द हिंदू में छपी एक ख़बर के अनुसार, बैठक में मोदी ने तेलंगाना के बीजेपी प्रमुख की तारीफ़ की जो राज्य की यात्रा कर रहे हैं. सूत्रों के हवाले से अख़बार ने लिखा है कि मोदी ने कहा है कि सभी राज्यों के पांच प्रतिनिधि यात्रा में शामिल हों.
इस दौरान उन्होंने कर्नाटक के पूर्व सीएम बीएस येदियुरप्पा से चर्चा की, वाराणसी में हुए काशी संगमम कार्यक्रम का ज़िक्र किया और सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों की बात की.
अख़बार लिखता है कि कर्नाटक बीजेपी के लिए अहम है क्योंकि ये दक्षिण का इकलौता राज्य है जहां बीजेपी ने कांग्रेस का मुक़ाबला किया है और अपने पैर जमाए हैं. लेकिन तेलंगाना और तमिलनाडु में उसकी लड़ाई क्षेत्रीय दलों से है.
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इस साल बढ़ेंगी आर्थिक परेशानियां
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की डिप्टी प्रबंध निदेशक गीता गोपीनाथ ने कहा है कि पहले कोरोना महामारी, उसके बाद रूस-यूक्रेन युद्ध और बढ़ रही महंगाई के कारण इस साल दुनियाभर में आर्थिक परेशानियां बढ़ेंगी.
अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक ख़बर के अनुसार, दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम में हिस्सा लेते हुए गीता गोपीनाथ ने कहा कि 'अगर मैं इस साल के लिए मुद्रा कोष के आउटलुक की बात करूं तो एक वाक्य में वो ये है कि ये साल मुश्किलों होने वाला है, हालांकि हालात बदलने के संकेत भी मिल रहे हैं.'
उन्होंने कहा, "ये एक मुश्किल साल होगा क्योंकि बीते कुछ महीनों में दुनियाभर के देशों में महंगाई में थोड़ी गिरावट तो आई है, लेकिन इसे महंगाई कम होना नहीं कहा जा सकता. साल मुश्किल इसलिए भी होगा क्योंकि युद्ध अभी ख़त्म नहीं हुआ है और इसका असर दुनिया के सभी मुल्कों पर पड़ रहा है."
उन्होंने कहा, "स्थिति में सुधार के संकेत मिल रहे हैं. यूरोप और अमेरिका समेत कई देशों में लेबर मार्केट मज़बूत हो रहा है और कई जगहों पर लोगों ने ख़र्च में कटौती की है. हम उम्मीद कर रहे हैं कि इस साल वैश्विक ग्रोथ कम ही रहेगा, लेकिन साल की दूसरी छमाही और उसके बाद सुधार की गुंजाइश बनती दिख रही है."
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