ममता बनर्जी और राज्यपाल आनंद बोस के बीच कैसा तालमेल है

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में यूं तो दिसंबर में ज़्यादा सर्दी नहीं पड़ती, लेकिन महानगर के बीचों बीच बने राजभवन में इस साल समय से पहले से ही मौसम 'सर्द' हो गया है. सीधे कहें तो जगदीप धनखड़ के उप-राष्ट्रपति बनते ही राजभवन का मौसम अचानक बदल गया है.
धनखड़ के राज्यपाल रहते शायद ही कोई ऐसा दिन बीता हो जब राजभवन से सरकार या उसके मंत्रियों की ओर से ट्वीट या पत्र के तौर पर हमले नहीं किए गए हों. लेकिन उनके बाद अस्थायी कार्यभार संभालने वाले ला गणेशन हों या फिर मौजूदा राज्यपाल सीवी आनंद बोस, राजभवन के कामकाज का तरीक़ा ही बदल गया है.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुरुवार शाम पांच बजे राजभवन जाकर राज्यपाल से मुलाकात की. बैठक के बाद उन्होंने पत्रकारों से कहा, "राज्यपाल बहुत अच्छे और भद्र इंसान हैं, उन्होंने बहुत बढ़िया व्यवहार किया है. मैं उनको मेरी क्रिसमस और हैप्पी न्यू ईयर कहने आई थी.
राज्य सरकार के साथ संबंध इतना अच्छा है कि अब कोई समस्या नहीं होगी. बातचीत के ज़रिए तमाम समस्याओं का संधान हो जाएगा. वे सहयोग कर रहे हैं, इसके लिए हम कृतज्ञ हैं."
बोस छह फ़रवरी को शुरू होने वाले बजट सत्र के दौरान पहली बार सदन को संबोधित करेंगे.

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सीवी बोस का सफ़र
- पश्चिम बंगाल के नए राज्यपाल डॉक्टर सीवी आनंद बोस का जन्म 1951 में केरल के कोट्टायम ज़िले में हुआ था.
- स्वतंत्रता सेनानी पीके वासुदेवन नायर के घर जन्म लेने वाले बोस ने अपने करियर की शुरुआत में कलकत्ता के एक बैंक में काम किया था.
- डॉक्टर बोस ने बिट्स पिलानी से पीएचडी की डिग्री हासिल करने के बाद 1977 में भारतीय सिविल सेवा की नौकरी शुरू की.
- नौकरशाह के रूप में उन्होंने केरल समेत कई राज्यों में शीर्ष पदों को संभाला जिनमें केरल के मुख्यमंत्री के करुणाकरण के सचिव का पद भी शामिल है.
- इसके साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार में भी कई विभागों में शीर्ष पदों से जुड़ी तमाम ज़िम्मेदारियां संभाली हैं.
एक महीने का लेखा जोखा
बरसों बाद यह शायद पहला मौका है जब पश्चिम बंगाल में किसी राज्यपाल के कार्यकाल का पहला महीना इतनी चुप्पी के साथ गुज़रा है. धनखड़ के उलट बोस सार्वजनिक समारोह में कम नज़र आए .
23 नवंबर को शपथ लेने के बाद 25 नवंबर को उन्होंने पश्चिम बंगाल की जनता को संबोधित किया. इस संबोधन में उन्होंने बंगाल से अपने पुराने कनेक्शन पर दिल खोल कर अपनी बात रखी.
यहां तक बताया कि कैसे उनके जीवन की पहली कविता का शीर्षक बंगाल से प्रेरित था.
इस संबोधन के बाद वो तुंरत दिल्ली गए. वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति से उन्होंने मुलाकात भी की.
राज्यपाल का पदभार ग्रहण करते ही एक नया काम जो उन्होंने किया वो था, नया ट्वीटर हैंडल बनवाने का.
पूर्व राज्यपाल जगदीप धनखड़ अपने नाम का ट्विटर हैंडल इस्तेमाल करते थे. लेकिन बोस उस रास्ते पर नहीं चले.

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पूर्व राज्यपाल धनखड़ के कैसे अलग
ट्विटर पर वो हैं, लेकिन पश्चिल बंगाल के गवर्नर के तौर पर. ख़ास बात ये कि उनका अकाउंट ब्लू टिक भी नहीं है. फ़ॉलो भी वो केवल राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को करते हैं. पश्चिम बंगाल सरकार, ममता बनर्जी और ना ही प्रधानमंत्री को वो फ़ॉलो करते हैं.
तृणमूल कांग्रेस के एक नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "अब तक तो राज्यपाल के रवैए से ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि वे धनखड़ के नक़्शेक़दम पर चलेंगे. आगे क्या होगा, यह कहना मुश्किल है. लेकिन उम्मीद है कि वे संवैधानिक दायरे में रहते हुए तटस्थता से अपनी ज़िम्मेदारियों का पालन करेंगे."
तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता कुणाल घोष कहते हैं, "हमें उम्मीद है कि बोस तटस्थ तरीके से अपनी भूमिका निभाएंगे."
इतना ही नहीं, कोलकाता फ़िल्म फ़ेस्टिवल में जहां फ़िल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन और शाहरुख़ ख़ान के बयानों की चर्चा ख़ूब हुई, उस समारोह में ममता बनर्जी के साथ बोस मौजूद थे. लेकिन समारोह के बाद कार्यक्रम में दिए गए बयानों पर उनकी तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई.
धनखड़ अगर उस कार्यक्रम में होते तो मौके पर ही उन्होंने जवाब दिया होता और अगले दिन अख़बारों की हेडलाइन में वही नज़र आते. शायद ही कोई दिन ऐसा बीता हो जब धनखड़ के बयान पहले पन्ने पर नहीं छपे हों.
वरिष्ठ पत्रकार तापस कुमार भट्टाचार्य कहते हैं, "बंगाल ने शायद ही ऐसा कोई राज्यपाल देखा है जो सोशल मीडिया पर धनखड़ की तरह अति सक्रिय हो. वे सुबह होते ही विभिन्न मुद्दों पर ट्वीट शुरू कर देते थे."

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धनखड़ ने पद संभालते ही क्या किया था
लेकिन धनखड़ के उलट उन्होंने इस एक महीने के दौरान न तो कोई राजनीतिक हेडलाइन देने वाला कोई ट्वीट किया है, न ही राजनीतिक प्रतिद्वंदिता वाला कोई पत्र भेजा है और न ही सत्तारूढ़ पार्टी, उसके किसी नेता, सरकार या किसी मंत्री पर हमले किए हैं.
इसके साथ ही उन्होंने अब तक कोई प्रेस कांफ्रेंस भी नहीं की है. इसके उलट धनखड़ ने तो शपथ लेने के साथ ही सरकार पर बाउंसर फेंकना शुरू कर दिया था. ऐसा कोई मुद्दा नहीं था जिस पर सरकार के साथ उनका टकराव नहीं हुआ. आखिरी दौर में तो नौबत यहां तक पहुंच गई कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्विटर पर धनखड़ को ब्लॉक तक कर दिया था.
धनखड़ ने राजभवन में आते ही जहां पत्रकारों का एक व्हाट्सएप ग्रुप बना कर उसमें सरकार के ख़िलाफ़ अपने ट्वीट और पत्र डालने शुरू कर दिए थे, वहीं बोस ने अब तक न तो ऐसा कोई ग्रुप बनाया है और न ही मीडिया को कोई बयान जारी किया है.
शपथ ग्रहण के बाद ममता से औपचारिक मुलाकात के दौरान दोनों के बीच राज्य की विरासत और मिठाइयों की चर्चा हुई. ममता ने उनको राज्य के विभिन्न हिस्सों का दौरा कर बंगाल की धनी विरासत को देखने-समझने का अनुरोध किया और साथ ही मिठाइयों के बारे में भी जानकारी दी.
शपथ ग्रहण से पहले ही ममता ने बोस को रसगुल्ले भिजवाए थे. राज्यपाल ने इसके लिए ममता का आभार जताया था.
धनखड़ और ममता के बीच विवाद
पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल धनखड़ और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच अभी छत्तीस का आंकड़ा रहा है. बीच में एकाध बार उनमें सुलह के आसार ज़रूर दिखे, लेकिन यह संभावना क्षणभंगुर ही रही.
उनके राज्यपाल के पद पर नियुक्ति के बाद शायद ही कोई दिन ऐसा गुज़रा, जब राज्यपाल ने अपने ट्वीट के ज़रिए सरकार, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को कठघरे में खड़ा न किया हो.
चाहे कोरोना का मुद्दा हो, राशन वितरण का, चुनाव के दौरान या चुनाव के बाद होने वाली हिंसा का या फिर अंफन तूफान के बाद राहत औऱ बचाव कार्यों का, राज्यपाल लगातार सरकार पर हमले करते रहे. नौबत यहां तक पहुंच गई कि ममता ने एक बार धनखड़ को ट्विटर पर ब्लॉक कर दिया. लेकिन यह नाराज़गी स्थाई नहीं रही.
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बीजेपी नेताओं के साथ रिश्ते
लेकिन शपथ ग्रहण के तुरंत बाद विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी को राजभवन आने का न्योता देकर बोस ने ममता को एक कड़ा संदेश जरूर दे दिया. पहली क़तार में सीट नहीं मिलने की वजह से शुभेंदु शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं हुए थे.
राजभवन के एक अधिकारी बताते हैं, "शुभेंदु अधिकारी ने राज्यपाल से मिलने का समय मांगा था. आमतौर पर कोई राज्यपाल शपथ लेने के तुरंत बाद किसी को मिलने का समय नहीं देता. लेकिन शुभेंदु के बायकॉट का पता चलने पर उन्होंने तुरंत विपक्ष के नेता को राजभवन आने का न्योता भेजने को कहा."
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि शुभेंदु को तुरंत राजभवन आने का न्योता देकर बोस ने ममता को एक संदेश ज़रूर दे दिया है.
राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर सुकुमार पाल कहते हैं, "कार्यभार संभालने के तुरंत बाद विपक्ष के नेता को राजभवन आने का न्योता देकर उन्होंने ममता को एक मज़बूत संदेश दे दिया है. राज्यपाल अधिकारी के बैठने की व्यवस्था से ख़ुश नहीं थे."
हालांकि तृणमूल कांग्रेस के नेता ऐसा नहीं मानते. एक वरिष्ठ नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "राज्यपाल को किसी पार्टी के हित में काम करने की बजाय तटस्थ रहना चाहिए. संवैधानिक प्रमुख की हैसियत से विपक्ष के नेता से मुलाकात में कोई बुराई नहीं है."
विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने पत्रकारों से कहा था, ''हमें उम्मीद है कि संविधान की रक्षा के लिए नए राज्यपाल भी पूर्व राज्यपाल धनखड़ के नक़्शेक़दम पर चलेंगे ताकि बंगाल की हालत में बदलाव हो सके.
उधर, तृणमूल कांग्रेस नेता तापस राय कहते हैं, "हमें उम्मीद है राज्यपाल बंगाल की निर्वाचित सरकार के साथ रिश्तों को मधुर बनाने की राह पर चलेंगे."
बोस ने राज्यपाल के तौर पर नियुक्ति के बाद पीटीआई के साथ अपने पहले इंटरव्यू में कहा था, "केंद्र और राज्य के बीच राज्यपाल की भूमिका एक ब्रिज की तरह है ताकि तमाम विवादों को निपटाया जा सके.
राजभवन और राज्य सरकार के बीच मतभेदों को अलग-अलग राय के तौर पर देखना चाहिए, टकराव के तौर पर नहीं. दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं." उनका कहना था कि हर समस्या का समाधान है. राज्यपाल को समाधान की राह पता होनी चाहिए, इसकी राह दिखानी चाहिए और उस पर चलना चाहिए.

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ममता के साथ रिश्ते
वैसे, राजभवन का मौसम तो धनखड़ के जाने के बाद ही बदलने लगा था. उनके बाद अस्थायी तौर पर प्रभार संभालने वाले ला. गणेशन से ममता बनर्जी के रिश्ते बेहद मधुर हो गए थे. ममता उनके पारिवारिक समारोह में हिस्सा लेने चेन्नई तक चली गई थीं.
यह बात भाजपा को नागवार गुज़र रही थी. उसके बाद केंद्रीय नेतृत्व से भी इसकी शिकायत की गई. अगले साल ही राज्य में अहम पंचायत चुनाव होने थे. उससे पहले स्थायी राज्यपाल की नियुक्ति ज़रूरी थी.
अब प्रदेश भाजपा नेतृत्व की निगाहें इस बात पर टिकी हैं बोस धनखड़ के नक़्शेक़दम पर चलते हैं या फिर ला गणेशन के. हालांकि बोस के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के क़रीबी होने के कारण उनसे भाजपा को उम्मीदें हैं. लेकिन बोस ने अब तक ऐसा कोई ठोस संकेत नहीं दिया है. अगर धनखड़ के कार्यकाल से उनके एक महीने के कार्यकाल की तुलना की जाए तो इस बारे में कोई भविष्यवाणी करना या अनुमान लगाना मुश्किल है.
राजनीतिक पर्यवेक्षक सुकुमार पाल कहते हैं, यह सही है कि धनखड़ के मुक़ाबले बोस के कार्यकाल का पहला महीना शांत रहा है और उन्होंने तटस्थ रवैया अपना रखा है. लेकिन एक महीना किसी के कार्यकाल के आकलन के लिए काफ़ी नहीं है. बोस की भूमिका की असली परीक्षा अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव के दौरान ही होगी.
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