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गुजरात में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत की रणनीति में क्या अलग रहा
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अहमदाबाद से
गुजरात की राजधानी गांधीनगर में भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय 'श्री कमलम' को आठ दिसंबर को विधानसभा चुनाव के वोटों की गिनती शुरू होने से एक दिन पहले इस तरह से सजाया जा रहा था मानो पार्टी की जीत पक्की है और नतीजों का इंतज़ार केवल एक औपचारिकता है.
राज्य में पार्टी के प्रवक्ता यमल व्यास ने मुस्कुराते हुए कहा था कि उनकी पार्टी 130 से अधिक सीटें हासिल करेगी. ऑन रिकॉर्ड उन्होंने 150 सीटें पाने की बात की जो पार्टी का घोषित लक्ष्य था. मगर पार्टी का प्रदर्शन सभी नेताओं की उम्मीदों से कहीं बेहतर साबित हुआ और पार्टी 156 सीटें हासिल करने में कामयाब रही.
राज्य में 27 साल तक सत्ता में रहने के बाद पार्टी का ये दृढ़ आत्मविश्वास समझ में आता है. लेकिन उसकी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस पार्टी ने 27 साल से सत्ता से बाहर रहने के बाद भी इस चुनाव में जिस तरह का खोखला आत्मविश्वास दिखाया वो समझ से परे है.
कांग्रेस ने अहमदाबाद में अपने प्रदेश मुख्यालय के बाहर एक लाइव इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड डिस्प्ले कर रखा था जो बीजेपी के सत्ता के अंत की गिनती बता रहा था.
हम जब सात दिसंबर को लगभग चार बजे शाम में वहां पहुंचे तो इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड के अनुसार बीजेपी के सत्ता में 21 घंटे और 45 मिनट बच गए थे.
लेकिन बीजेपी की ऐतिहासिक चुनावी जीत ने एक बार फिर साबित कर दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के राज्य में बीजेपी को फ़िलहाल शिकस्त देना मुमकिन नहीं है.
इस बार के परिणाम ये दर्शाते हैं कि 2017 के विधानसभा चुनावों में 99 सीटें हासिल करने वाली बीजेपी ने एक ऐसी चुनावी रणनीति अपनायी जिसके कारण इसने 1985 में कांग्रेस द्वारा हासिल किए रिकॉर्ड 149 सीटों को भी पार कर लिया.
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बीजेपी की चुनावी रणनीति
इस बार तो आम आदमी पार्टी की शक्ल में राज्य में एक तीसरी ताक़त बीजेपी के सामने आई, लेकिन इसका बीजेपी के नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ा.
गुजरात में बीजेपी की सियासी सरगर्मियों पर बारीक नज़र रखने वाले दिलीप पटेल कहते हैं, "पार्टी की इस भारी जीत का एक मुख्य कारण नरेंद्र मोदी थे, लेकिन दूसरे कारण भी रहे. पार्टी हर चुनाव को बड़ी गंभीरता से लड़ती है और इसमें पूरी ताक़त लगा देती है."
बीबीसी गुजराती के संवाददाता रॉक्सी गागडेकर छारा गुजरात विधानसभा के कई चुनावों पर सालों से रिपोर्टिंग करते आये हैं, उनका कहना है कि उन्होंने हमेशा बीजेपी को चुनावी मोड में देखा है, चुनाव सर पर हो या न हो.
उन्होंने बताया, "आज एक चुनाव ख़त्म होता है और बीजेपी पांच साल बाद होने वाले अगले चुनाव की तैयारी आज से ही शुरू कर देती है जबकि कांग्रेस पार्टी चुनाव से कुछ महीने पहले जागती है."
भाजपा नेतृत्व ने कभी भी आधिकारिक तौर पर राज्य सरकार की कोविड-19 महामारी से निपटने में विफलता को स्वीकार नहीं किया, लेकिन अंदर से इसे लोगों की नाराज़गी का पता था.
इसके रणनीतिकारों ने सत्ता विरोधी लहर को दूर करने के लिए राज्य में मुख्यमंत्री समेत कई मंत्रियों को हटाकर सरकार में नए चेहरे लाए गए.
इसके अलावा, पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को चुनाव क्षेत्रों में चुनाव से महीनों पहले भेज देती है ताकि वो आम वोटरों से संपर्क स्थापित कर सकें. इस बार भी गुजरात विधानसभा के लिए चुनाव में पार्टी ने कोई कसर नहीं रखी.
जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आया पार्टी की रणनीति भी बदली. इसने ग्रामीण इलाक़ों में जगह-जगह मैजिक शो और 'स्मार्ट' रथ अभियान शुरू किया और लोगों को पार्टी से जोड़ना शुरू कर दिया.
मोदी की रैलियों का असर
पार्टी की राज्य इकाई के नेताओं ने बीबीसी हिंदी से साझा किया कि कैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियां इस बार पार्टी के चुनाव अभियान के केंद्र में थीं. प्रधानमंत्री ने 31 रैलियां कीं और इन जनसभाओं को अधिकतर उन क्षेत्रों में आयोजित किया गया जहां पार्टी तुलनात्मक रूप से कमज़ोर थी.
पार्टी ग्रामीण इलाक़ों में कमज़ोर रही है. ग्रामीण मतदाताओं तक पहुंचने के लिए पार्टी के पास कई अनूठी पहल थी.
पार्टी की स्टेट यूनिट के एक नेता ने कहा, "पार्टी ने 3500 से अधिक स्थानों पर जादूगर के शो कराए, 4000 जगहों पर नुक्कड़ नाटक किए गए, 1400 स्थानों पर लाइव झांकी और विकास का गरबा नामक कार्यक्रम आयोजित किया."
इस बार के चुनाव में इन सबका सकारात्मक असर हुआ, जबकि राज्य में 27 साल तक सत्ता में रहने के बाद कई जगहों पर, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, इस बार पार्टी का बढ़ती सत्ता विरोधी लहर से सामना था.
इसके अलावा राज्य की राजनीति में दाखिल होने वाली आम आदमी पार्टी के मुखर अभियान के बाद पार्टी को चिंता होने लगी थी.
पार्टी के चुनावी रणनीतिकारों ने इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया था कि पिछले चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने कुल 182 विधानसभा सीटों में से 77 सीटें जीती थीं.
बीजेपी की सीटें घटकर 99 पर आ गयी थीं. इसके अलावा 2017 में 33 से अधिक सीटों पर बीजेपी और कांग्रेस उम्मीदवारों के बीच हार-जीत का अंतर 2,000 वोट या उससे भी कम था.
बीजेपी ने 2017 में 1.49 करोड़ वोट हासिल किए और 2019 के लोकसभा चुनावों तक उसने 1.85 करोड़ वोट हासिल किए. इस बार पार्टी का कहना था कि उसने खुद को दो करोड़ वोट का लक्ष्य दिया था जो हासिल हो गया.
बीजेपी को इस बार एक ऐसी पार्टी से विरोध का सामना था जो इसकी तरह हिन्दू कार्ड खेल सकती थी और हिंदुत्व की भाषा बोल सकती थी.
इसलिए इस बार पार्टी ने सांप्रदायिक टिप्पणियों को कम से कम रखा. पार्टी ने इस बार इस बात का भी ध्यान रखा कि चुनावी रैलियों के दौरान पीएम मोदी केजरीवाल या आम आदमी पार्टी का बहुत अधिक उल्लेख ना करें.
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आम आदमी पार्टी का असर
दूसरी तरफ़ पिछले चुनाव में कांग्रेस पार्टी के अच्छे प्रदर्शन से लोगों को ऐसा लगने लगा था कि पार्टी बीजेपी का मुक़ाबला कर सकती है.
लेकिन पिछले पांच सालों में पार्टी के कई विधायक बीजेपी में शामिल हो गए जिससे पार्टी कमज़ोर होती गयी और फिर कई लोग मानते हैं कि आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध मारी है.
आम आदमी पार्टी ने इस चुनाव में लगभग 13 प्रतिशत वोट हासिल किया जिसका मतलब ये हुआ कि केवल पांच सीटें जीतने के बावजूद पार्टी खुश है क्योंकि अब वो एक नेशनल लेवल की पार्टी बन गयी है.
कांग्रेस पार्टी की क़ीमत पर आम आदमी पार्टी की क़ामयाबी से कांग्रेस को दुःख हुआ है.
लेकिन राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि इससे बीजेपी वाले अधिक दुखी होंगे क्योंकि अगर इसने उसके गढ़ गुजरात में अपने पैर जमा लिए तो आगे चलकर उसे आम आम आदमी पार्टी से दिक़्क़त का सामना कर पड़ सकता है.
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