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गुजरात 2002 के दंगों के बाद कितना बदला और नरेंद्र मोदी पर क्या असर पड़ा?
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, राजकोट से
अहम बातें
- सात अक्तूबर 2001 को नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने
- मोदी मुख्यमंत्री बनने के बाद 24 फ़रवरी 2002 को राजकोट-2 विधानसभा सीट से उपचुनाव जीते
- 27 फ़रवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आग लगी और 59 कारसेवकों की मौत हो गई
- इसके बाद गुजरात के कई इलाक़ों में भीषण दंगा फैल गया
- दिसंबर 2002 में गुजरात में विधनसभा चुनाव हुए बीजेपी को गुजरात में सबसे बड़ी जीत मिली
- मोदी भी मणिनगर से 75,331 मतों के अंतर से विधानसभा चुनाव जीते
- कई लोग मानते हैं 2002 के दंगों के बाद मोदी की लोकप्रियता भारत भर में बढ़ी
2002 के गुजरात दंगों के समय सलमान शेख़ (बदला हुआ नाम) 35 साल के थे. वह अपने तीन बच्चों और पत्नी के साथ राजकोट के एक अपार्टमेंट में रहते थे.
सलमान का फ़्लैट ग्राउंड फ्लोर पर था. उस अपार्टमेंट में सलमान शेख़ का इकलौता मुस्लिम परिवार था. बाक़ी सारे फ़्लैट में हिन्दू परिवार थे.
2002 में 27 फ़रवरी के बाद दंगा शुरू हुआ, तो राजकोट में भी भय का माहौल था. सलमान शेख़ भी डरे हुए थे.
सलमान शेख़ से पूछा कि हिन्दुओं के बीच इकलौते मुस्लिम परिवार होने के कारण क्या वे डरे हुए थे?
सलमान शेख़ कहते हैं, ''अपार्टमेंट के टॉप फ़्लोर पर एक हिन्दू परिवार हर रात हमें अपने घर में बुला लेते थे. कई रात हम पूरे परिवार के साथ उनके घर में ही सोए. वह गुजरात सरकार के भूमि और राजस्व विभाग में ड्राइवर थे. मन तो कर रहा है कि उनका नाम बताऊँ, लेकिन डर लग रहा है कि इस वजह से उनके परिवार को मुश्किलों का सामना न करना पड़े. अब तो वह इस दुनिया में हैं भी नहीं. दो साल पहले उनकी मौत हो गई थी.''
सलमान शेख़ बताते हैं, ''राजकोट में दंगे का कोई असर नहीं था, लेकिन वह मेरे परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते थे. 2002 के पहले मुझे कभी नहीं लगा कि मैं धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक हूँ, इसलिए डरकर रहना है. हमेशा हिन्दुओं के बीच रहा और कभी मन में असुरक्षा की भावना नहीं आई. गुजरात के सौराष्ट्र इलाक़े में तो हिन्दू बनाम मुस्लिम की कोई फ़ीलिंग तक नहीं थी.''
सलमान शेख़ के जीवन पर 2002 के दंगे का क्या असर पड़ा?
वे कहते हैं, ''असर यही पड़ा कि जो हिन्दू परिवार हर रात अपने घर में मेरे परिवार को सुरक्षा के लिए रखता था, उसका नाम लेने से डर रहा हूँ. उन्होंने तो इंसानियत के लिहाज़ से अच्छा काम किया लेकिन तब भी नाम बताने में डर लग रहा है कि कहीं इससे मुश्किलें पैदा ना हो जाएँ. दूसरी तरफ़ मैं भी अपनी पहचान ज़ाहिर करने से डर रहा हूँ. 2002 के पहले इस तरह का डर नहीं था.''
सलमान शेख़ के दो बेटे कनाडा में रहते हैं. दोनों डॉक्टर हैं. सलमान चाहते हैं कि दोनों वहीं की नागरिकता ले लें.
56 साल के सलमान से पूछा कि क्या वह अपने बेटों के बिना अकेले ज़िंदगी काट लेंगे? उनका जवाब था, ''हर पिता यही चाहता है कि अपनी संतान को अच्छा माहौल मुहैया कराए, जहाँ वे महफ़ूज़ रहें. मेरे लिए तो यही मातृभूमि है और यहीं मर खप जाना है.''
पिछले दो हफ़्तों से गुजरात चुनाव को लेकर अलग-अलग इलाक़ों में घूम रहा हूँ. हमलोग जिस गाड़ी से घूम रहे हैं, उसके ड्राइवर हिन्दू हैं.
जहाँ भी ब्रिज, पुल, फ़्लाईओवर, नई सड़क, रिवर फ़्रंट और स्टेडियम दिखते हैं, वहाँ वह गाड़ी स्लो कर देते हैं और उत्साह के साथ बताते हैं; सर, देखिए ये सब मोदी जी ने बनाया है. यहाँ फ़्लाईओवर नहीं था तो बहुत जाम लगता था. देखिए सर, ये स्टेडियम कितना बढ़िया हो गया है. सबसे बड़ी बात तो यह है कि गुंडागर्दी बिल्कुल ख़त्म हो गई.
मैंने पूछा कि गुंडागर्दी कैसे ख़त्म हुई? वह बिना देर किए बताते हैं, ''2002 के बाद गुंडागर्दी नहीं रही. 2002 के पहले इतनी गुंडागर्दी थी कि ना कोई कारोबार कर सकता था और न ही बहन-बेटियाँ सुरक्षित थीं.''
मायने
अहमदाबाद के वरिष्ठ पत्रकार राजीव शाह कहते हैं, ''2002 के बाद गुजरात में बदलाव को इस रूप में भी चिह्नित कर सकते हैं कि घर जलाने वाला गर्व के साथ आपसे अपना किया बता सकता है लेकिन दंगाइयों के डर से मुसलमानों को अपने घर में रखने वाला बहुत संभलकर बताता है.''
राजीव शाह कहते हैं, ''2002 के दंगों के बाद बीजेपी गुजरात में अब तक कोई भी चुनाव हारी नहीं है. गुजरात का शहरी हिन्दू मध्यवर्ग 2002 के दंगों से बहुत असहमत नहीं था. गुजरात में शहरीकरण बाक़ी राज्यों की तुलना में बहुत तेज़ी से हुआ है और मध्यवर्ग का उभार भी हुआ है.''
''शहरीकरण और मध्यवर्ग के उभार का सीधा रिश्ता है. शहरों और मध्यवर्ग में बीजेपी की अच्छी पकड़ है. मैंने इस बार कांग्रेस के एक बड़े नेता से पूछा कि गुजरात का चुनावी नतीजा क्या रहेगा? उनका जवाब था- शहर की 60 सीटें बीजेपी के लिए छोड़ दीजिए और 160 सीटें आधा-आधा कर लीजिए. गुजरात चुनाव का नतीजा यही रहेगा. शहरी हिन्दू मध्यवर्ग को लगता है कि बीजेपी मुसलमानों की ठीक करके रखती है.''
राजीव शाह कहते हैं, ''गुजरात में किसी विपक्षी पार्टी के पास हिम्मत नहीं है कि वह हिन्दुओं को समझाने की कोशिश करे कि 2002 में जो हुआ था, वो ग़लत था. उन्हें डर लगा रहता है. अहमद पटेल बोलते थे कि वे हार जाएँगे, इसलिए चुनाव लड़ने का कोई मतलब नहीं है. वह कांग्रेस अध्यक्ष बनने से भी इनकार करते थे. कहते थे कि इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. अहमद पटेल को लगता था कि इससे मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगेगा. सोचिए हिन्दू समर्थक दिखने का बीजेपी का प्रेशर किस हद तक काम करता है. आम आदमी पार्टी भी इतना दबाव में है कि नोट पर गणेश और लक्ष्मी की तस्वीर लगाने की बात कर रही है.''
बिहार में दंगे के बाद कांग्रेस साफ़, गुजरात में दंगे के बाद बीजेपी मज़बूत
1989 में बिहार के भागलपुर में भी भयावह दंगा हुआ था. इस दंगे के बाद कांग्रेस सत्ता में आज तक नहीं लौट पाई.
दंगे के वक़्त कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह थे. सत्येंद्र नारायण सिंह इस दंगे के बाद बिहार की राजनीति से ग़ायब हो गए.
तब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और उन्होंने भागलपुर के तत्कालीन एसपी केएस द्विवेदी के तबादले को रोक दिया था.
द्विवेदी पर दंगे के दौरान दंगाइयों को लेकर नरमी बरतने का आरोप था. तब सत्येंद्र नारायण सिंह ने राजीव गांधी के इस फ़ैसले को लेकर नाराज़गी जताई थी.
सत्येंद्र नारायण सिंह ने कहा था कि केएस द्विवेदी के तबादला रोकने से मुसलमानों के बीच ग़लत संदेश गया था. उसी तरह 1987 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी थे और मेरठ ज़िले के हाशिमपुरा में 42 मुसलमानों को मार दिया गया था. इस जनसंहार के बाद यूपी से भी कांग्रेस ख़त्म हो गई.
भागलपुर दंगे के बाद बिहार की जनता ने कांग्रेस को मानो हमेशा के लिए अलविदा कह दिया. वही हाल यूपी में कांग्रेस का हाशिमपुरा के बाद हुआ. लेकिन गुजरात में ऐसा क्या हुआ कि 2002 के दंगे के बाद बीजेपी कभी हारी नहीं और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता गुजरात से बाहर भी बढ़ी.
जाने-माने समाज विज्ञानी अच्युत याग्निक कहते हैं, ''गुजरात में मध्यवर्ग के बीच हिन्दुत्व की जड़ें लंबे समय से मज़बूत की जा रही थीं. उसको खाद-पानी देने का काम कभी रुका नहीं. गुजरात में सांप्रदायिक राजनीति को मज़बूत करने में वहाँ के संप्रदायों का भी हाथ है. जैसे स्वामीनारायण सेक्ट और स्वाध्याय सेक्ट.''
''इन संप्रदायों के कारण जाति का कुनबा कमज़ोर पड़ा. जातीय पहचान शहरों में आने के बाद कमज़ोर पड़ जाती है. शहरीकरण के कारण जातीय जुड़ाव कमज़ोर हुआ. ऐसे में शहरों में आने पर लोग यहाँ सेक्ट ज्वाइन करते हैं. यहाँ के जो सेक्ट हैं वो अप्रत्यक्ष रूप से हिन्दुत्व की राजनीति को ही आगे बढ़ा रहे हैं.''
अच्युत याग्निक कहते हैं, ''गुजरात की तुलना में बिहार में शहरीकरण की रफ़्तार बहुत धीमी है. इसीलिए यहाँ जाति का जुड़ाव अब भी मज़बूत है. जैस-जैसे शहरीकरण बढ़ेगा कास्ट का असोसिएशन कमज़ोर होगा. इसके विकल्प में कुछ तो चाहिए. सेक्ट विकल्प की तर्ज़ पर उभर रहा है और यह हिन्दुत्व की राजनीति को खाद-पानी दे रहा है. ग्राउंड लेवल पर आरएसएस मज़बूत होता गया और कांग्रेस के सेवा दल को देखिए तो कहीं बचा नहीं है. हम जातीय जुड़ाव को बनाए रखने के लिए शहरीकरण को रोक नहीं सकते हैं. शहरीकरण तो होगा ही लेकिन इसके साथ सेक्ट का बढ़ना और इसका हिन्दुत्व से जुड़ना ख़तरनाक है.''
अच्युत याग्निक कहते हैं, ''कांग्रेस ने सत्ता में रहने के दौरान भी अपने संगठनों को मज़बूत नहीं किया. गुजरात कांग्रेस में झिन्ना भाई दर्जी जैसे नेता हुआ करते थे. उनके पास गुजरात के कोने-कोने की जानकारी थी. वो जातीय समीकरण उंगली पर गिना देते थे. कांग्रेस में अब न ऐसे नेता हैं और न ही उन नेताओं से कांग्रेस सीखने को तैयार हैं.''
गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार दर्शन देसाई कहते हैं, ''कांग्रेस अपने शासन में हुए दंगों को नीति और दर्शन के आधार पर जस्टिफाई नहीं कर सकती है. हालांकि बीजेपी भी आधिकारिक रूप से दंगों को नीति और दर्शन की बुनियाद पर सही नहीं ठहराती है लेकिन उसके पास हिन्दुत्व का स्पष्ट एजेंडा है.''
''वह हिन्दुत्व को लेकर खुलकर बात करती है. गुजरात दंगे को बीजेपी हिन्दुओं के बीच जस्टिफाई करने में कामयाब रही है. गुजरात, क्या आप गुजरात के बाहर भी 2002 के दंगों की बात करेंगे तो बहुसंख्यक हिन्दू यही कहते हैं कि पहले गोधरा की बात कीजिए. गुजरात में दंगे के बाद मोदी ने क्रिया और प्रतिक्रिया की बात कही थी. मोदी के इस बयान से लोग व्यापक पैमाने पर सहमत दिखते हैं कि 2002 का दंगा गोधरा का जवाब था.''
दर्शन देसाई कहते हैं, ''कांग्रेस इस तरह से किसी दंगे को न तो जस्टिफाई कर पाती है और न ही कोशिश करती है. बल्कि वह दंगों में विलेन के तौर पर उभरती है. वो चाहे भागलपुर हो या हाशिमपुरा. 2002 के दंगों के महज़ दो साल बाद कांग्रेस केंद्र की सत्ता में आ गई थी लेकिन उसे जिस तरह से गुजरात दंगे की जाँच करानी चाहिए थी, वो मौक़ा हाथ से जाने दिया. कांग्रेस के लोग अहमद पटेल का नाम लेते हैं कि उन्होंने ही ऐसा नहीं होने दिया.''
पत्रकार प्रदीप सिंह इस बात को मानते हैं कि 2002 के दंगों के बाद नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बढ़ी है.
वह कहते हैं, ''2002 के बाद हिन्दुओं को लगा कि उन्हें एक ऐसा नेता मिल गया है जो भारत में उसे दोयम दर्जे का नागरिक बनकर नहीं रहने देगा. आपको याद रखना चाहिए कि गुजरात में दंगा गोधरा के बाद हुआ था. ऐसे में बीजेपी के लिए यह जस्टिफाई करना आसान रहा कि दंगे क्यों हुए. दूसरी बात यह कि गुजरात के हिन्दू बहुत धार्मिक हैं. वे अपनी चीज़ों को लेकर बहुत आग्रही रहते हैं. गुजरात में यूपी बिहार की तरह मुसलमानों का उस तरह से दबाव नहीं है. यानी यहाँ मुस्लिम आबादी कम है. गुजरात को भले आप हिन्दुत्व की प्रयोगशाला कहें, लेकिन बीजेपी ने अपने संगठनों को भी सबसे ज़्यादा मज़बूत यहीं किया है.''
हालांकि गुजरात के पूर्व उपमुख्यमंत्री और गुजरात बीजेपी के वरिष्ठ नेता नितिन पटेल इस तर्क से सहमत नहीं हैं कि 2002 के दंगों के बाद गुजरात में कुछ ऐसा बदलाव हुआ, जिससे लोकतंत्र कमज़ोर हुआ हो या किसी के साथ भेदभाव को बढ़ावा मिला.
वे कहते हैं, ''2002 के दंगों पर अदालत ने सब कुछ साफ़ कर दिया है. दोषियों को सज़ा भी मिली. मोदी जी के नेतृत्व में गुजरात का चौतरफ़ा विकास हुआ है, इसलिए बीजेपी मज़बूत हुई है.''
2002 का दंगा और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता
साल 2001 में नरेंद्र मोदी ने सात अक्तूबर को गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. मोदी 24 फ़रवरी 2002 को राजकोट-2 से विधानसभा उपचुनाव जीते. यह मोदी के राजनीतिक जीवन का पहला चुनाव था. तब जीत का अंतर महज़ 14700 वोट था.
27 फ़रवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आग लगी और 59 कारसेवकों की मौत हो गई. इसके बाद गुजरात के कई इलाक़ों में भीषण दंगा फैल गया.
दिसंबर 2002 में गुजरात विधानसभा चुनाव हुआ और इस बार मोदी राजकोट-2 के बदले गांधीनगर के पास मणिनगर विधानसभा सीट से चुनाव लड़े.
फ़रवरी में मोदी 14 हज़ार मतों से उपचुनाव जीते थे लेकिन इसी साल दिसंबर में उन्होंने कांग्रेस के यतिन ओझा को 75,331 मतों से हराया.
2007 में मोदी की जीत अंतर और बढ़ गया. मणिनगर से ही 2007 में वह 87,000 मतों से जीते. 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में मोदी का मणिनगर से जीत का अंतर 86,373 रहा.
बीजेपी गुजरात में 1995 से चुनाव जीत रही है लेकिन सबसे बड़ी जीत गुजरात में 2002 के दंगों के बाद उसी साल दिसंबर महीने में हुए विधानसभा चुनाव में मिली.
1995 में 182 सदस्यों वाली गुजरात विधानसभा में बीजेपी को 121 सीटों पर जीत मिली थी. 1998 में मध्यावधि चुनाव हुआ और बीजेपी को 117 सीटों पर जीत मिली.
फिर दिसंबर 2002 में विधानसभा चुनाव हुआ और बीजेपी ने सबसे बड़ी जीत हासिल की.
बीजेपी ने 127 सीटें अपनी झोली में डालीं. 2007 में 116 और 2012 में 115 सीटों पर जीत मिली. सबसे छोटी जीत 2017 में मिली.
2017 में बीजेपी 99 सीटों पर ही सिमटकर रह गई थी. 2013 में बीजेपी ने प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में मोदी को आगे किया और 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने गुजरात की सभी 26 लोकसभा सीटें जीतीं.
2019 में भी बीजेपी ने यह जीत कायम रखी.
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर और जाने-माने समाज विज्ञानी घनश्याम शाह कहते हैं, ''2002 के पहले नरेंद्र मोदी को कोई गुजरात में भी नहीं जानता था. मोदी ने अपनी राजनीति को सुनियोजित तरीक़े से आगे बढ़ाया है. मोदी ने मुस्लिम विरोधी राजनीति के साथ भ्रष्टाचार विरोधी स्लोगन भी उछाले. मोदी ने कहा कि न खाऊंगा न खाने दूंगा. मध्यवर्ग को यह राजनीति पसंद आई.''
''मध्यवर्ग को यह भी लगा कि मोदी का कोई परिवार नहीं है तो भ्रष्टाचार किसके लिए करेंगे. मोदी ने दंगे के बारे में क्रिया और प्रतिक्रिया की बात कही थी. लेकिन मैं यह नहीं कहूँगा कि मोदी की लोकप्रियता केवल हिन्दुत्व की राजनीति के कारण बढ़ी. मोदी विकास की बात भी करते रहे. मोदी को भी पता था कि ये सेंटिमेंट लंबी अवधि तक नहीं रहेगी. मोदी के लिए हिन्दुत्व मिशन है और आर्थिक विकास के साथ सुशासन की बात करना उस मिशन को हासिल करने का ज़रिया है. मोदी को लगता है कि संकट गहरा रहा है तो हिन्दुत्व ट्रंप कार्ड की तरह आता है.''
महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर रहे इफ़्तिख़ार ख़ान कहते हैं कि 2002 के दंगों के बाद गुजरात में कुछ चीज़ें स्थापित हो गई हैं.
वे कहते हैं, ''गुजरात में मुसलमानों को हिन्दू किराए पर घर नहीं देंगे यह अब चौंकाता नहीं है. यह अब आम बात लगती है. मुसलमानों के साथ भेदभाव होगा, यह भी अब चौंकाता नहीं है.''
''बीजेपी के डर से हर राजनीतिक पार्टियाँ प्रदेश के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में मुसलमानों को टिकट देने से परहेज़ करेंगी, यह भी अब सवाल नहीं रहा. मुसलमानों को बिना कोई ठोस सबूत के किसी भी जुर्म के आरोप में सालों तक बंद रखा जा सकता है. पीड़ित मुस्लिम हैं और अपराध करने वाले हिन्दू हैं तो अपराधियों एक ख़ास मज़हब के होने का फ़ायदा मिल सकता है. इसे हम बिलकिस बानो मामले में देख सकते हैं.''
सूरत में सोशल साइंस स्टडी सेंटर के प्रोफ़ेसर किरण देसाई कहते हैं, ''2002 के दंगों के बाद गुजरात में लिबरल स्पेस ख़त्म हो गई है. हिन्दुत्व की विचारधारा हर इलाक़े में परिवारों के भीतर पहुँच गई है. बीजेपी ने चुनावी राजनीति में अधिनायकवाद को स्वीकार्य बना दिया है. बीजेपी में अटल बिहारी वाजपेयी और प्रमोद महाजन जैसे तुलनात्मक रूप से उदार नेताओं के लिए अब कोई जगह नहीं बची है. मोदी ने चुनावी राजनीति में जीत की लैंग्वेज को साध लिया है और विपक्ष अपने पास इसकी काट में कोई उपाय नहीं तलाश पा रहा है.''
28 फ़रवरी, 2002 को अहमदाबाद के नरोदा पाटिया और आसपास के इलाक़ों में 97 अल्पसंख्यकों को दंगाइयों ने मार दिया था. इस जनसंहार में जिन 32 लोगों को दोषी ठहराया गया था, उनमें स्थानीय मनोज कुकरानी भी थे.
इस बार के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने मनोज कुकरानी की बेटी पायल कुकरानी को ही टिकट दिया है. सलीम शेख़ नरोदा पाटिया के दंगा पीड़ित हैं.
उनसे पायल कुकरानी को टिकट देने पर सवाल पूछा को उनका जवाब था- 2002 के दंगे में पायल कुकरानी के पिता ने ग़रीब मुसलमानों को मारने में बहुत मेहनत की थी. ऐसे में उनको इनाम तो मिलना ही था. क़ानून के हिसाब से दोषी को टिकट नहीं दिया जा सकता है तो उसने उनकी बेटी को दे दिया.''
गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और 1995 में बीजेपी को पूर्ण बहुमत से पहली बार सत्ता में लाने वाले शंकर सिंह वाघेला कहते हैं कि 2002 के दंगों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते थे, लेकिन आडवाणी अड़ गए थे.
वाघेला कहते हैं, ''अप्रैल 2002 में गोवा में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई थी. इस बैठक में वाजपेयी ने मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री से हटाने का मन बना लिया था लेकिन आडवाणी तैयार नहीं हुए थे. 2016 में आडवाणी जी की पत्नी कमला जी का निधन हुआ तो मैं उनसे मिलने गया था. उनसे मैंने कहा कि मोदी को गोवा में आपने ही बचाया था और आपकी हालत पार्टी में क्या हो गई? आडवाणी कुछ नहीं बोले और रोने लगे.''
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