हिमाचल प्रदेश: बाग़ियों ने बढ़ाया बीजेपी-कांग्रेस का सिरदर्द

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- Author, पंकज शर्मा
- पदनाम, शिमला से बीबीसी हिंदी के लिए
कभी प्रधानमंत्री की बाग़ियों से चुनाव में बैठने की अपील, कभी केंद्रीय मंत्री का भावुक होकर आंसू बहाना, तो कहीं मंच पर स्थानीय नेताओं का अपना दर्द बयान करना और कहीं 'मुझे याद रखना' जैसे पोस्टर से सियासत करना. बाग़ियों को रिझाने वाले ऐसे तमाम पल पिछले एक महीने में हिमाचल की राजनीति में देखने को मिले.
2022 विधानसभा चुनाव लंबे समय बाद ऐसा पहला चुनाव है जिसमें हिमाचल प्रदेश की राजनीति के बड़े नाम, बीजेपी के सबसे बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल ने हिस्सा नहीं लिया, वहीं कांग्रेस की तरफ़ से भी छह बार के मुख्यमंत्री स्वर्गीय वीरभद्र सिंह और पूर्व मंत्री स्वर्गीय सुखराम के ना होने से सियासी माहौल एकदम अलग था.
असल में हिमाचल का ये चुनाव दोनों दलों की दूसरी पीढ़ी ने लड़ा. इनमें राष्ट्रीय स्तर के और प्रदेश के बड़े कई नेताओं की साख दांव पर लगी हुई है. लेकिन चुनावी नतीजे से पहले कोई भी ज़ोर शोर से जीत का दावा नहीं कर रहा है.
इसकी सबसे बड़ी वजह दोनों पार्टियों के बाग़ी उम्मीदवार हैं जिनकी ज़मीन पर मज़बूत पकड़ है. बीजेपी के 21 और कांग्रेस के क़रीब सात बाग़ी उम्मीदवार ऐसे हैं जो अपनी अपनी पार्टी का खेल बिगाड़ सकते हैं.
हिमाचल प्रदेश के 12 ज़िलों की 68 विधानसभा सीटों में से 33 सीटें काँगड़ा, मंडी और शिमला ज़िले में हैं. यहां किसी भी पार्टी को सरकार बनाने के लिए 35 विधायकों की ज़रूरत होती है. ऐसे में बाग़ियों की बग़ावत दोनों दल पर भारी पड़ सकती है.

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बाग़ी उम्मीदवार बने सिरदर्द
कांग्रेस जहां अपने कुछ असंतुष्टों को मनाने में काफ़ी हद तक कामयाब हुई ,तो वहीं बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के ज़ोर के बावजूद भी बीजेपी अपने ज़्यादातर बाग़ियों को मनाने में नाकाम रही.
इनमें से एक हैं बिलासपुर सीट पर बीजेपी के पूर्व विधायक सुभाष शर्मा, जो टिकट कटने के बाद भी मैदान से नहीं हटे. इसके अलावा बिलासपुर ज़िले की घुमारवीं सीट और झण्डूता सीट से भी बीजेपी के बाग़ी उम्मीदवार मैदान में डटे रहे.
ऐसा ही हाल हिमाचल के सबसे बडे ज़िले काँगड़ा का है. चुनाव से कुछ महीने पहले कांगड़ा से कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष पवन काजल बीजेपी में शामिल हो गए. उनको पार्टी ने उम्मीदवार बनाया तो स्थानीय नेता उनके ख़िलाफ़ हो गए. यहाँ से भी बीजेपी के बाग़ी चुनाव मैदान में हैं.
काँगड़ा की ही फ़तेहपुर सीट पर बीजेपी ने मौजूदा मंत्री राकेश पठानिया को उनकी नूरपुर सीट बदल कर भेजा. इसके चलते यहाँ बीजेपी के क़द्दावर नेता कृपाल परमार पार्टी से बाग़ी हो गए. उनको मनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फ़ोन वाला वीडियो सोशल मीडिया पर भी ख़ूब वायरल हुआ, लेकिन वो फिर भी नहीं माने.
काँगड़ा ज़िले की 15 निर्वाचन क्षेत्रों में से बीजेपी कम से कम पांच जगहों में असंतोष का सामना कर रही है. पार्टी के बाग़ी उम्मीदवार धर्मशाला, कांगड़ा, फ़तेहपुर, देहरा और इंदौरा से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं.
जिस काँगड़ा ज़िले से बीजेपी और कांग्रेस के बाग़ी दोनों के लिए सिरदर्द बने हुए हैं, वहां के बारे में कहा जाता है हिमाचल में सरकार की कुर्सी का रास्ता यहीं से खुलता है. पिछले चुनाव में बीजेपी ने यहाँ से 11 सीटें जीती थीं.
काँगड़ा के बाद मंडी ज़िले में सबसे ज़्यादा 10 विधानसभा सीटें हैं. मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर भी इसी ज़िले से आते हैं. यहाँ भी बाग़ियों की लिस्ट लंबी है जिनमें सबसे प्रतिष्ठित मंडी सदर सीट से बीजेपी के उम्मीदवार अनिल शर्मा हैं. अनिल शर्मा पूर्व दूरसंचार मंत्री स्वर्गीय पंडित सुखराम के बेटे हैं. उनको बीजेपी के ही बाग़ी प्रवीण शर्मा चुनौती दे रहे हैं.

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शिमला ज़िले का गणित
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला ज़िले में 8 सीटें है. यहाँ बीजेपी से ज़्यादा कांग्रेस के बाग़ी सिरदर्द बने हुए हैं. इनमें चौपाल सीट पर कांग्रेस ने दो बार विधायक रह चुके सुभाष मंगलेट का टिकट काट दिया. मंगलेट की जगह कांग्रेस ने नए उम्मीदवार रजनीश किम्टा को मैदान में उतारा.
शिमला ज़िले में बीजेपी के लिए राहत की बात ये है कि यहां की सीटों पर पार्टी का कोई बाग़ी नहीं है.
बाग़ियों की बग़ावत को लेकर हिमाचल की वरिष्ठ पत्रकार अर्चना फ़ुल कहती हैं, "बीजेपी के ज़्यादातर बाग़ी ज़मीन पर मज़बूत हैं क्योंकि उन्होंने सींटिग विधायक के टिकट काटे हैं. दूसरी तरफ़ कांग्रेस के बाग़ी कम हैं. दूसरा बड़ा फ़ैक्टर एंटी -इनकंबेंसी का है. बीजेपी को बाग़ियों की चुनौती के साथ इसका भी सामना करना पड़ेगा."
सोलन में पांच सीटें हैं जिनमें नालागढ़ सीट पर बीजेपी ने कांग्रेस से आए लखविन्द्र राणा को टिकट दिया है. इसके चलते बीजेपी के पूर्व विधायक के एल ठाकुर निर्दलीय उम्मीदवार बनकर अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार को चुनौती पेश कर रहे हैं,
ऐसी ही कहानी सोलन की अर्की सीट से है जहां कांग्रेस के बाग़ी राजेंन्द्र ठाकुर नहीं माने. नतीजतन कांग्रेस के संजय अवस्थी को बीजेपी के गोविंद राम से कड़ी टक्कर का सामना करना पड़ सकता है.

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कांग्रेस के लिए राहत की ख़बर
सिरमौर ज़िले की पांच सीटों पर भी बीजेपी का कोई बाग़ी ना होना उनके लिए राहत वाली ख़बर है. वैसे दोनों पार्टियों ने अपने बाग़ियों को मनाने की पुरज़ोर कोशिश की.
बीजेपी ने सख़्त कार्रवाई करते हुए कुल्लू विधानसभा क्षेत्र से अपने पार्टी के महेश्वर सिंह का टिकट अंतिम क्षण में इसलिए काट दिया क्योंकि महेश्वर सिंह के पुत्र हितेश्वर सिंह ने कुल्लू की बंजार सीट से टिकट ने मिलने पर निर्दलीय पर्चा भर दिया. महेश्वर सिंह तो मान गए, लेकिन उनके पुत्र हितेश्वर सिंह नहीं माने.
कुल्लू में विधानसभा की चार सीटें हैं और इन चारों सीटों पर बीजेपी के बाग़ी है जबकि कांग्रेस का एक बाग़ी आनी सीट से है.

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दोनों दल बाग़ियों के संपर्क में
इसके अलावा चंबा, हमीरपुर और ऊना ज़िले में पांच-पांच सीटें हैं. इन ज़िलों में भी बाग़ियों का साफ़ असर दिख रहा है. दो बड़े दलों में बाग़ियों की सियायत पर पड़ने वाले असर पर हिमाचल ग्राम परिवेश के संपादक महेंद्र प्रताप सिंह राणा बताते हैं, "बाग़ियों की कम संख्या और पुरानी पेंशन की बहाली जैसे मुद्दों की वजह से कांग्रेस की राह थोड़ी आसान हो गई है."
हिमाचल प्रदेश की 68 विधानसभा सीटों पर 412 प्रत्याशी मैदान में हैं. इसमें मंडी की द्रंग विधानसभा सीट ऐसी है जहां सिर्फ़ दो ही प्रत्याशी हैं. लेकिन ज़्यादातर सीटों पर मुक़ाबला कड़ा होने से कुछ बाग़ियों के जीतने की संभावना बनी है.
ऐसे में दोनों दल बाग़ियों से संपर्क में हैं. देखना दिलचस्प होगा कि आठ दिसंबर के नतीजे कितने बागियों को विधायक बनाते हैं और ये किस दल को नुक़सान पहुँचाते हैं.
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