हिमाचल प्रदेश चुनाव: बीजेपी ने पांच साल में कितने वादे पूरे किए, कितने रहे अधूरे

- Author, ब्रजेश मिश्र
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों में बीजेपी पैटर्न बदलने की बात कर रही है. यानी बीजेपी का दावा है कि वो सत्ता बरक़रार रखेगी.
हिमाचल प्रदेश में 90 के दशक से अब तक ऐसा नहीं हुआ है कि कोई पार्टी लगातार दो बार सत्ता में रही हो.
बीजेपी के सत्ता में वापसी के दावे पर न सिर्फ़ विपक्षी कांग्रेस पार्टी सवाल उठा रही है बल्कि आम जनता भी नाख़ुश है. इसकी वजह यह भी है कि महंगाई और बेरोज़गारी जैसे मुद्दों के साथ राज्य के किसान भी सरकार से नाराज़ हैं.
बीबीसी ने हिमाचल प्रदेश के कुछ इलाकों में युवाओं, किसानों और महिलाओं से बात की और यह जानने की कोशिश की कि बीजेपी ने पिछले चुनाव में जो वादे किए थे, क्या वो पूरे हुए हैं.

बेरोज़गारी और नशे की लत
कई सालों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे वेद बीजेपी सरकार से निराश हैं. वो कहते हैं कि हिमाचल प्रदेश में बीते पांच साल में सिर्फ़ एक बार आयोग ने वैकेंसी निकाली जो कि सरकार की नाकामी है.
वेद ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "मैं दो बार एमए कर चुका हूं. बीएड कर चुका हूं. चार बार टेट (टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट) पास किया है, सीटेट मेरे पास है. उसके बाद भी अगर मुझे रोज़गार नहीं मिल रहा तो यह चिंता का विषय है. हिमाचल प्रदेश की मौजूदा सरकार इस मुद्दे पर पूरी तरह फ़ेल रही है. चुनाव में भी राजनीतिक दलों के मुद्दे असलियत से अलग हटकर जा रहे हैं."
वेद केंद्र सरकार की अग्निवीर योजना पर भी सवाल उठा रहे हैं. वो कहते हैं कि मल्टीटास्क वर्कर के लिए भी रिसर्च करने वाले लोग, पीएचडी कर चुके लोग अप्लाई कर रहे हैं, जो साबित करता है कि यहां रोज़गार का संकट कितना बड़ा है और लोग जो मिल जाए वो नौकरी कर लेना चाहते हैं, क्योंकि आय का कोई और स्रोत नहीं बन पा रहा.
बीते पांच साल में बेरोज़गारी की दर प्रदेश में तेज़ी से बढ़ी है. विपक्षी दलों का दावा है कि राज्य में 60 हज़ार सरकारी पद खाली हैं. वहीं बीजेपी राज में हुई पुलिस भर्ती पर भी सवाल उठे हैं. रोज़गार न मिलने की वजह से बहुत से युवा तनाव झेल रहे हैं और कुछ नशे की ओर बढ़ रहे हैं.

एक नज़र हिमाचल चुनावों पर
- 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 68 में ले 44 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी और कांग्रेस को 20 सीटें मिली थीं.
- 2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट प्रतिशत 38.47 प्रतिशत था जो 2017 में बढ़कर 48.8 प्रतिशत होगया.
- प्रदेश में वोट शेयर के मामले में बीजेपी का यह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था.
- जबकि 2017 में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 42.81 से घटकर 41.7 प्रतिशत हो गया.
- राज्य में 55.74 लाख से अधिक मतदाता हैं.


मंडी में हमारी मुलाक़ात सुबीर ख़ान से हुई. वो कहते हैं कि बेरोज़गारी की मार झेल रहा युवा जब हताश होता है तो वो नशे का सहारा लेता है और धीरे-धीरे एक पूरी पीढ़ी बर्बाद हो रही है.
सुबीर ख़ान कहते हैं, "अलग-अलग तरह का नशा हमारे प्रदेश में फैला है. नशे की समस्या यहां इतनी गंभीर है कि अगर अभी इस पर रोक नहीं लगाई गई तो धीरे-धीरे हिमाचल भी पंजाब के जैसा हो जाएगा.
जो युवा नौकरियां न मिलने से हताश होते हैं वो या तो नशे में जा रहे हैं या पैसा कमाने के लिए नशा बेच रहे हैं. सरकार रोज़गार देगी तो युवाओं का भविष्य बेहतर होगा."
स्कूलों की स्थिति भी ठीक नहीं
हिमाचल में सरकारी स्कूलों की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है. शिक्षकों की कमी से अधिकतर स्कूल जूझ रहे हैं. कुछ जगहों पर गांव के लोगों ने ही निजी शिक्षकों को सरकारी स्कूल में पढ़ाने के लिए रखा है.
चिंडी इलाके के एक प्राइमरी स्कूल में छुट्टी के वक़्त हम ख़ुशहाल चंद से मिले. वो बताते हैं कि स्कूल उनके घर से क़रीब पांच किलोमीटर दूर है और रास्ता पहाड़ी है.

ख़ुशहाल चंद कहते हैं, "रास्ता ठीक नहीं है. इतनी दूर से बच्चे आते हैं. रोज़ सुबह स्कूल छोड़ने आना पड़ता है और फिर छुट्टी के वक़्त उन्हें लेने भी आते हैं. सरकार ने वादा किया था कि गांव में स्कूल बनेगा, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ. उम्मीद है आगे हो जाएगा."
स्कूल के एक टीचर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि आसपास के कई गांवों के बच्चे यहां पढ़ने आते हैं. प्राइमरी स्कूल में दो सरकारी शिक्षक हैं जबकि दो पद खाली हैं. उनकी जगह पर दो निजी शिक्षक रखे गए हैं. उन्हें हर महीने तीन हज़ार रुपये मिलते हैं. लेकिन वो कभी दो महीने पढ़ाते हैं कभी तीन महीने.
ख़ुशहाल चंद बताते हैं कि आस-पास के गांवों से ग़रीब परिवार के बच्चे इस स्कूल में पढ़ने आते हैं. वो कहते हैं सरकार स्कूल की हालत सुधारे और रास्ते ठीक कराए ताकि बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो सके.
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाली कोमल भी आरोप लगाती हैं कि सरकार ने जो वादे किए थे, वो पूरे नहीं किए.
वो कहती हैं कि बीजेपी ने लोगों को जो सपने दिखाए थे उनके लिए उसे पिछले चुनाव में वोट मिला, लेकिन अब लोगों में नाराज़गी है, क्योंकि शिक्षा और रोज़गार दोनों की स्थिति बेहतर नहीं है.

सड़कों पर गड्ढे और धूल
बीजेपी ने पिछले चुनाव में राज्य की सड़कें बेहतर करने का वादा किया. हालांकि कई इलाकों में यह वादा भी एक सपने की तरह ही दिखता है.
रामपुर से मंडी जाने वाले रास्ते का हाल बेहाल है. करसोग में हमारी मुलाक़ात दौलत राम से हुई. वो कहते हैं कि घर सड़क के किनारे है और यहां से उड़ने वाली धूल न सिर्फ़ घर ख़राब कर रही है बल्कि स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डाल रही है.
दौलत राम कहते हैं, "मैंने इसकी शिकायत भी की है. कब से ये सड़क ऐसे ही उखड़ी पड़ी है. अब देखिए धूल ही धूल है. घर में घुसकर देखिए कपड़ों में धूल, पानी में धूल... पूरा घर धूल से ढका है. इससे कितनी बीमारी बढ़ती है. अभी तबीयत ख़राब हो जाए तो यहां सही से इलाज भी नहीं होता. छोटी-छोटी बीमारी के लिए शिमला भागना पड़ता है."
राज्य के किसान सरकार की नीतियों से ख़ुश नहीं नज़र आते. हालांकि सरकार की ओर से साल भर में मिलने वाले 6000 रुपये उन्हें थोड़ी राहत देते हैं, लेकिन बीज और खाद महंगा होने और मौसम की मार से फ़सलें ख़राब होने की वजह से किसानों को भारी नुक़सान उठाना पड़ता है.
करसोग के पेंदा गांव के संतराम सरकार के काम पर सवाल उठाते हैं.
संतराम कहते हैं कि मंडी में सही दाम नहीं मिलता. सरकार फ़सलों को मंडी तक पहुंचाने का सही बंदोबस्त भी नहीं करती. सड़कें बंद होने से किसानों का माल कई दिन तक फंसा रहता है.

वो कहते हैं, "किसान क्या करे. सरकार किसानों के लिए क्या कर रही है. मंडी तक माल सही टाइम पर नहीं पहुंचता. यहां लोग बिचौलियों को फ़सल बेच देते हैं जो मंडी में ऊंचे दामों में बेचकर मुनाफ़ा कमाते हैं. सरकार छोटे किसानों को मंडी तक पहुंचने के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराए."
सुरेश कुमार भी किसान हैं. वो सेब, गेहूं और मक्के की खेती करते हैं. वो बताते हैं कि बेमौसम बारिश की वजह से कई बार सेब के बागानों को बहुत नुक़सान होता है.
वो कहते हैं, "सरकार ने जो वादे किए थे उनमें से 30-40 फ़ीसदी ही पूरे हुए हैं. पांच सालों में क्यों नहीं पूरे कर पाए वादे ये तो सरकार ही जाने. लेकिन अगर जनता की नहीं सुनी तो नुक़सान झेलना पड़ेगा. किसान को फ़सलों के दाम सही नहीं मिल रहे हैं वो इस बात पर सरकार से नाराज़ है."
हालांकि सुरेश यह भी मानते हैं कि लोग नरेंद्र मोदी के लिए वोट करते हैं और बीजेपी सत्ता में वापसी कर सकती है.

महंगाई भी बड़ा मुद्दा
राज्य में महिलाएं महंगाई और बेरोज़गारी के मुद्दे पर सरकार से सवाल करती हैं. नौकरियां न होने से रोज़ी-रोटी का संकट भी खड़ा हो रहा है.
पैन्दा गांव में मिली कपूरी देवी कहती हैं, सरकार जो कुछ मुफ़्त में दे रही है वो बंद कर दे और चीज़ों की क़ीमत थोड़ी सस्ती करे.
उन्होंने कहा, "राशन जो फ़्री मिलता था पहले, वो अब बंद हो गया है. राशन वाले ने कहा कि अब तुम्हारा बेटा फ़ौज में भर्ती हो गया है तो अब फ़्री राशन नहीं मिलेगा. सरकार हमें क्या सुविधा दे रही है. सिलेंडर इतना महंगा है. मेरे पति विकलांग हैं, वो कुछ कर नहीं सकते. कैसे कमाएं, कैसे खाएं."
झुंगी पंचायत में रहने वाली देविंद्रा का मानना है कि सरकार अगर ग़रीबों के बच्चों को रोज़गार नहीं देगी और महंगाई कम नहीं करेगी तो उसे नुक़सान झेलना ही पड़ेगा.
वो कहती हैं, "महंगाई इतनी ज़्यादा है. खाने की चीज़ें इतनी महंगी हैं. सरकार बच्चों को रोज़गार नहीं दे रही. पढ़े-लिखे बच्चे घर बैठे हैं, मज़दूरी करने को मजबूर हैं. जैसे हालात बने हैं उसमें तो यही लगता है कि सरकार बदलने से ही शायद भला होगा."
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