बिहार का कुढ़नी उपचुनाव- नीतीश कुमार का क्या-क्या दांव पर लगा है?

इमेज स्रोत, Vishnu Narayan/BBC
- Author, विष्णु नारायण
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, बिहार में मुज़फ़्फ़रपुर के कुढ़नी विधानसभा क्षेत्र से
बिहार के कुढ़नी विधानसभा में होने वाले विधानसभा उपचुनाव में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने साझा तौर पर चुनावी जनसभा को संबोधित किया. बीजेपी का साथ छोड़ने के बाद नीतीश कुमार राष्ट्रीय जनता दल के साथ साझा चुनाव प्रचार में पहली बार दिखे. कुछ दिनों पहले हुए मोकामा और गोपालगंज उपचुनावों में वे प्रचार के लिए नहीं गए थे.
कुढ़नी विधानसभा के उपचुनाव को नीतीश-लालू के साथ आने के बाद महागठबंधन के बदलते स्वरूप और समीकरण के साथ ही लालू-नीतीश के वोट बैंक के साथ आने या न आने के तौर पर भी देखा जा रहा है.
कुढ़नी में पांच दिसंबर को वोट डाले जाएंगे और इन दिनों यह पूरा इलाक़ा चुनावी शोर से गुंज रहा है.
सूबे के तमाम बड़े दल और उनसे जुड़े नेता कुढ़नी की गलियों में घूम रहे हैं. यहां रोज़ चुनावी सभाएं हो रही हैं. कहीं नेता अपने कहे-अनकहे के लिए माफ़ी मांग रहे हैं, तो कहीं विवादित बयानबाज़ी के माध्यम से मोमेंटम अपने पक्ष में करने की कोशिशें हो रही हैं.
दरअसल, इस विधानसभा से राजद विधायक 'अनिल सहनी' को एमपी-एमएलए कोर्ट से अयोग्य ठहराए जाने के बाद उपचुनाव हो रहे हैं, लेकिन यहां प्रयोग के तौर पर राजद के बजाय जनता दल यूनाइटेड ने अपना उम्मीदवार मैदान में उतारा है.

इमेज स्रोत, Vishnu Narayan/BBC
शुक्रवार यानी 2 दिसंबर, 2022 को जब सीएम नीतीश कुमार और डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने कुढ़नी विधानसभा के केरमा मैदान के भीतर चुनावी मंच साझा किया तो सबकी नजरें नीतीश कुमार पर टिकी थीं, कि आख़िर वे क्या कहेंगे?
नीतीश अब लालू की बजाय बीजेपी नेतृत्व पर हमलावर हैं. मंच से वे बीजेपी को भ्रामक और दुष्प्रचार करने वाली पार्टी करार देते नज़र आए. साथ ही अपने पिछले काम जैसे सात निश्चय के आधार पर वोट मांगते नज़र आए.
इसी चर्चा-परिचर्चा और सूबे के भीतर हर रोज़ बदल रहे राजनीतिक समीकरण को समझने के लिए बीबीसी कुढ़नी विधानसभा पहुंची. यहां लोगों से बातचीत कर बीबीसी ने कुढ़नी और सूबे की राजनीति का रुख़ भांपने की कोशिश की.

इमेज स्रोत, Vishnu Narayan/BBC

कुढनी विधानसभा उपचुनाव
इस सीट से आरजेडी विधायक के एमपी-एमएलए कोर्ट से अयोग्य ठहराए जाने के बाद यहां चुनाव कराए जा रहे हैं.
मुज़फ्फरपुर ज़िले में पड़ने वाली इस सीट पर राजद और जदयू दोनों मिलकर जदयू उम्मीदवार को मैदान में उतारा है.
2020 में हुए चुनावों में यहां विजेता आरजेडी उम्मीदवार और दूसरे नंबर पर रहे बीजेपी उम्मीदवार के बीच वोटों का फर्क महज 712 वोटों का था.
यहां से इस बार 13 उम्मीदवार मैदान में हैं.
बीजेपी ने एक बार फिर केदार प्रसाद गुप्ता को मैदान में उतारा है, जिन्होंने 2020 के चुनाव में आरजेडी उम्मीदवार को कड़ी टक्कर दी थी.
मतदान 05 दिसंबर 2022 को होगा.
नतीजे 08 दिसंबर 2022 को आएंगे.


इमेज स्रोत, Vishnu Narayan/BBC
क्या कह रही है कुढ़नी की जनता?

कुढ़नी विधानसभा के खरौना गांव के बाशिंदे सीताराम चौधरी के हिसाब से इस बार बीजेपी प्रत्याशी का पलड़ा भारी है. ऐसा क्यों पूछने पर वे कहते हैं कि बात जातीयता की अधिक है. वो कहते हैं, "चारों तरफ़ जातीय गोलबंदी करने की कोशिश हो रही है."
सीताराम भूमिहार बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं और इस बिरादरी के अधिकांश लोग बीजेपी की ओर देख रहे हैं. जब हमने उन्हें वीआईपी की ओर से भूमिहार बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले प्रत्याशी 'नीलाभ' का ज़िक्र किया तो उन्होंने वीआईपी प्रत्याशी को 'वोटकटवा' करार दे दिया.
खरौना गांव के ही सीवान में हमारी मुलाक़ात सुनील महतो और सीताराम शाह से हुई. दोनों ने एक स्वर में बीजेपी के पक्ष में वोट देने की बात कही. उनका कहना था कि पिछले तीन साल से राशन जब 'मोदी' दे रहे हैं तो वोट किसी और क्यों दें? वहीं सुनील महतो नीतीश कुमार की शराबबंदी नीति और हाल-फिलहाल ताड़ी के कारोबार से जुड़े पासी समुदाय के साथ किए गए व्यवहार से भी ख़फ़ा दिखे.

इमेज स्रोत, Vishnu Narayan/BBC
मुसहरी ब्लॉक में एक ताल के किनारे मछली मारकर अपनी आजीविका चलाने वाले राम बाबू सहनी कहते हैं, "इस वक़्त तो गाड़ियों का तांता लगा हुआ है लेकिन बाद में कोई नहीं पूछता. हमारे समाज का नेता तो मुकेश सहनी ही है, लेकिन सहनी समाज से भी कई लोग खड़े हो गए हैं. जैसे शेखर सहनी और संजय सहनी. जीत-हार का असल फ़ैसला तो एक रात पहले होगा. समाज के बड़े लोग जिधर तय करेंगे, सबका वोट उधर ही जाएगा."
केरमा के लालू चौक पर हमारी मुलाक़ात मोहम्मद ज़हीरुद्दीन से हुई. वो कहते हैं, "हम लोग पहले भी राजद के साथ थे. अब नीतीश कुमार के साथ आ जाने से वो कन्फ्यूजन भी ख़त्म हो गया है."
जब हमने उनके सामने ओवैसी फ़ैक्टर का ज़िक्र किया तो उन्होंने उसे सिरे से नकार दिया.
वहीं केरमा बाज़ार में ही बातचीत में अवधेश राय, लखींदर राय और बिरजू राय एक स्वर में तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार का हाथ मज़बूत करने की बात की.

इमेज स्रोत, Vishnu Narayan/BBC
साल 2015 और 2020 में क्या कुछ हुआ?

साल 2015 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के केदार प्रसाद गुप्ता ने जदयू उम्मीदवार मनोज कुशवाहा को पटखनी दी थी. जबकि तब जदयू और राजद ने साथ आकर चुनाव लड़ा था. तब केदार प्रसाद गुप्ता को जहां 73,227 वोट मिले थे, वहीं मनोज कुशवाहा को 61,657 वोट मिले थे. हालांकि इस सीट पर साल 2005 से ही मनोज कुशवाहा ही जीत दर्ज करते रहे हैं. साथ ही वे नीतीश कैबिनेट के भी सदस्य रहे.
साल 2020 के चुनाव के दौरान बीजेपी और जदयू का गठबंधन था और बीजेपी ने अपने सीटिंग विधायक 'केदार प्रसाद गुप्ता' को ही अपना उम्मीदवार बनाया था. तब केदार प्रसाद गुप्ता को 77,837 वोट मिले थे और राजद के 'अनिल सहनी' को 78,549 वोट मिले थे. जीत-हार का फ़ासला महज 712 वोटों का रहा. तब बीएलएसपी उम्मीदवार राम बाबू सिंह को जहां 10,041 वोट मिले, वहीं स्वतंत्र उम्मीदवार संजय सहनी को 4,802 वोट मिले. संजय सहनी इस बार भी स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं.

इमेज स्रोत, Vishnu Narayan/BBC
कुढ़नी में इस बार क्या है नया-पुराना?

वैसे तो सूबे के भीतर महागठबंधन के बदलते स्वरूप और लालू-नीतीश के साथ आने के बाद यह दूसरा मौक़ा है कि उपचुनाव हो रहे हैं. वो भी लगभग एक महीने के भीतर. विश्लेषकों की नज़र विशेष तौर पर नीतीश कुमार पर होगी. ऐसा इसलिए भी क्योंकि तब नीतीश कुमार दोनों सीटों (मोकामा और गोपालगंज) में प्रचार करने नहीं गए थे और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को प्रचार के दौरान कई जगहों पर विरोध झेलना पड़ा था.
अब जब नीतीश और तेजस्वी सालों बाद कुढ़नी में चुनावी मंच साझा कर रहे हैं और राजद ने इस सीट जदयू से उम्मीदवार को लड़ने के लिए दे दी है, ऐसे में नज़रें नीतीश कुमार पर होना स्वाभाविक है.
मंच से इस चुनावी सभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने किए गए कामों का हवाला देते हुए वोट मांगे. साथ ही उन्होंने इस विधानसभा क्षेत्र और बिहार के लोगों को दिल्ली वालों (बीजेपी) से बचकर रहने की बात कही. दूसरी ओर तेजस्वी यादव जदयू प्रत्याशी के पिछले काम के लिए माफ़ी मांगते नज़र आए.
जदयू ने जहां अपने पुराने काडर और नेता मनोज कुशवाहा पर विश्वास जताते हुए उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया है. तो दूसरी तरफ़ हैं भाजपा के केदार प्रसाद गुप्ता. वे भी इस विधानसभा क्षेत्र के प्रतिनिधि रहे हैं. तो वहीं तीसरा मोर्चा खोलने और अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश में हैं विकासशील इंसान पार्टी, एआईएमआईएम जैसे दल और कुछ स्वतंत्र उम्मीदवार.

इमेज स्रोत, Vishnu Narayan/BBC
कुढ़नी विधानसभा के भीतर जातीय गुणा-गणित और हालिया समीकरण पर यहां के वोटर और स्थानीय पत्रकार मुकुल कुमार कहते हैं, "वैसे तो सारी पार्टियां जातीय गोलबंदी ही कर रही हैं और मुद्दों की बात गौण हो गई है, लेकिन प्रत्याशियों की छवि एक मसला ज़रूर है."
"ऐसा इसलिए भी क्योंकि दोनों मुख्य दलों के प्रत्याशी पहले इस विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. लोग दोनों के कार्यकाल से वाकिफ हैं. बीजेपी उम्मीदवार को सुलभता का फायदा मिलता दिख रहा. तेजस्वी यूं ही नहीं माफ़ी मांग रहे. हालांकि मनोज कुशवाहा काम करा ले जाने के मामले में मजबूत हैं."
"दोनों मुख्य दलों के अलावा सूबे के पूर्व कैबिनेट मंत्री मुकेश सहनी की ओर से उतारे गए उम्मीदवार और एआईएमआईएम की उम्मीदवारी पर उनका कहना था कि वैसे तो और भी कई प्रत्याशी हैं जैसे शेखर और संजय सहनी लेकिन उन्हें अधिक वोट मिलने की उम्मीद नहीं. ओवैसी कुढ़नी में इतने असरदार नहीं साबित होने वाले."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)














