बिहारः कोसी की बाढ़ से डूबते-उजड़ते स्कूलों के कारण दफ़न हो रहा लाखों बच्चों का भविष्य- ग्राउंड रिपोर्ट

- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बेलागोट (सुपौल), बिहार
महज़ 48 घंटों में ही कोसी के 'सुरक्षित क्षेत्रों में गिने जाने वाले' बेलागोट के दर्जनों घर, चौड़ी कच्ची सड़क, और उसके पास लगे बांस के सैंकड़ों पेड़ कोसी में समा गए, साथ ही डूब गया वो स्कूल भी जहां गांव के एक से लेकर पांचवीं कक्षा तक के बच्चे पढ़ते थे.
सुपौल शहर से कोई सात-आठ किलोमीटर दूर बसे बेलागोट में (अगस्त के पहले शनिवार को) एक अजीब अव्यवस्था का माहौल पसरा था.
सड़क किनारे तक पहुंच गई नदी में नावों, केले के पेड़ों को जोड़कर तैयार प्लेटफ़ॉर्म्स, और कई बार सिर पर बकरियां, सामान, मुर्ग़ियां और झोपड़ियां लादकर ले जाते मर्द, औरत और बच्चे.
बांस के पेड़ों और दूसरे दरख़्तों को कुल्हाड़ियों और दरांतियों से काटते लोग- जिन्हें गिरने के बाद रस्सियों से बांधकर खींचा जा रहा था, सूखे स्थान पर पहुंचाने के लिए.
'तीन बार पहले गांव में अलग-अलग जगहों पर झोपड़ी' खड़ी कर चुके यदुनंदन चौथी बार अपना आशियाना उजाड़कर, 'यहां जगह न मिलने के कारण बेटी-दामाद के घर' बसने को जा रहे हैं.

कोसी की धारा का प्रवाह
जिस जगह उनके घर का साज़-सामान लक्कड़-बोट पर लद रहा है, वहीं पर कल तक बेलागोट का प्राइमरी स्कूल था.
दिलख़ुश कुमार कभी इसी स्कूल में पढ़ते थे, अब सातवीं कक्षा में पहुंच चुके बालक को 'अंग्रेज़ी पढ़ना अच्छा लगता है,' और एक अंग्रेज़ी कविता भी वो हमें सुनाते हैं.
स्कूल के स्टोर-रूम-किचन से बचे-खुचे सामानों को शिफ्ट करवाने को वहीं मौजूद शिक्षक कैलाश पासवान कहते हैं कि फिलहाल तो बच्चे नाते-रिश्तेदारों के पास टिके हैं, अगर इधर रहने का इंतज़ाम हो गया और स्कूल के लिए कोई ऊंची जगह मिल गई तो यहीं पढ़ेंगे, 'वरना चले गए तो क्या कह सकते हैं.'
वो जिन गांवों को स्कूल का 'पोषक क्षेत्र' बताते हैं, यानी जहां के बच्चे प्राथमिक स्कूल में पढ़ने को आते थे, वो सब पानी से घिरे दिखे, इस बीच कोसी की धारा का प्रवाह मिनट-दर-मिनट और ख़ौफ़नाक होता रहा.

नावों में पंपिंग मशीन
शायद इसीलिए इस क्षेत्र के अधिकतर स्कूल, सिवाए जो पक्की सड़क के किनारे हैं, यहां के ज़्यादातर घरों की तरह बांस या टाट के बने होते हैं. कुछ में फर्श या खंभों का निर्माण कर दिया जाता है.
कोसी की दो दिनों की यात्रा में हमें पानी में डूबे गांवों या कटाव के क्षेत्र में, ऐसे विद्यालयों को हथौड़े लेकर तोड़ते लोग दिखे.
बेलागोट में हमारी मौजूदगी के दौरान ही तेज़ बारिश शुरू हो जाती है, जिससे बचने के लिए लोग आधी खड़ी, आधी उजाड़ दी गई झोपड़ियों के नीचे किसी तरह खड़े हो जाते हैं.
दूसरे दिन हम तटबंध के और अधिक अंदरूनी इलाक़ों के लिए लक्कड़ बोट से निकलते हैं.
नावों में पंपिंग मशीन लगाकर तैयार लक्कड़-बोट मोटर बोट ही इन इलाक़ों में आने-जाने का मुख्य साधन है.

कोसी परियोजना से काफ़ी थी उम्मीद
तिब्बत और नेपाल से होते हुए भारत पहुंचने वाली कोसी नदी को एक संधि के तहत तटबंधों से घेरा गया है, फिर छोटे-छोटे बांध भी हैं. नदी पर बैराज भी तैयार किए गए.
1950 के दशक में जब कोसी नदी परियोजना की नींव पड़ी थी, तो कहा गया था कि इससे क्षेत्र में ख़ुशहाली बिखर जाएगी.
लेकिन अपने साथ लाखों टन कीचड़ और पत्थर-कंकड़ बहाकर लाने वाली नदी अब भी हर चंद सालों में धारा बदलती रहती है और तटबंध के भीतर बसे गांव हर साल दो साल में उजड़ने को मजबूर हो जाते हैं.
बांध निर्माण के चलते बिहार में ही 300 से अधिक गांव डूब क्षेत्र में गए थे. हालांकि फिर से बसाहट का काम पूरी तरह से न हो सका और हज़ारों लोग आज भी तटबंध के भीतरी इलाक़ों में रहते हैं.
बोट में ही हमारे साथ हैं, छुट्टियों में घर जा रहे- विकास और उनके छोटे भाई, रूपेश. दोनों माना टोला, अपने गांव से कोसों दूर सुपौल शहर में अकेले रहकर पढ़ाई करते हैं.

विकास और रूपेश की कहानी
नौवीं क्लास में पढ़ रहे विकास कुमार कहते हैं कि दोनों भाई मिलकर रहते हैं शहर में, खाना भी ख़ुद से बनाना होता है.
विकास जो आईपीएस बनना चाहते हैं, कहते हैं, 'मां-बाप से दूर रहकर कुछ कर लेंगे, कुछ बन जाएंगे तो उनका नाम रोशन होगा.'
रूपेश पांचवीं में पढ़ते हैं, मगर उन्हें शहर में 'मां की बहुत याद आती है.'
मां सीता देवी पंजाब में छोटा-मोटा काम करनेवाले पति की मदद के लिए मेहनत-मज़दूरी करती हैं ताकि किसी तरह बच्चों का भविष्य बेहतर हो जाए. दूसरे बच्चे विकास और रूपेश जैसे ख़ुशक़िस्मत नहीं.
'कोई किताबें कौपी (कॉपी) लाकर न देई छई, त सब बिसर गेलिए' (कोई किताब कॉपी लाकर नहीं देता है तो सब भूल-भाल गए), बेहद हंसमुख और ख़ुशमिजाज़ एक बच्चा हमसे कहता है.
उसके साथ भैंस चरा रहे दूसरे बच्चों-युवकों में से किसी ने 10 साल पहले पढ़ाई छोड़ दी, क्योंकि स्कूल खुलता ही नहीं था, तो किसी दूसरे का कहना था कि मास्साब ऐवे नहीं (आते नहीं) करते हैं.

स्कूल न खुलने की शिकायत संतोष मुखिया भी हमसे करते हैं, "शिक्षक लोग छह महीने में 10 या 15 दिन आते हैं, जब वेतन बंटने का दिन होता है उसके आसपास, या फिर 15 अगस्त और 26 जनवरी को, जब झंडा फहराना होता है."
हालांकि खोखनाहा गोट प्राथमिक विद्यालय में ताला देखकर हमें ताजुब्ब नहीं हुआ था क्योंकि वो रविवार यानी छुट्टी का दिन था.
अधिकतर गांवों में स्कूल सिरे से न खुलने की शिकायत हमसे लोगों ने की. साथ ही ये भी कहा कि 'इसके लिए कुछ कीजिए.'

बाढ़ के चलते हो रहा स्कूल का विस्थापन
शिक्षक सजल कुमार दास बताते हैं कि जब बाढ़ आती है या कोई गांव कटाव में चला जाता है तो लोग स्कूल की झोपड़ी को भी बाक़ी सामानों के साथ ढोकर ले जाते हैं, जिन्हें अगर ऊंची जगह पर खड़ा कर दिया जाता है.
हालांकि शिक्षकों की सजगता इस मामले में निहायत ज़रूरी लगी क्योंकि बेलागोट के स्कूल को शिफ्ट किए जाते समय प्राइमरी विद्यालय के दोनों शिक्षक वहां मौजूद दिखे.
हालांकि उन्हें ठीक तौर पर ये नहीं मालूम था कि स्कूल के लिए जगह कहां मिलेगी? ज़मीन मिलनी इतनी आसान भी नहीं.

बोट से सफ़र के बीच ही घुटनों से कुछ नीचे तक कीचड़ वाले घास से भरी ज़मीन पर हमें मोहम्मद मारूफ़ खड़े हुए मिले, जिन्होंने किसी दूसरे गांव से घर यहां शिफ्ट किया था.
कहने लगे, "खूंटे गाड़ दिए हैं, और चौकी पर चौकी चढ़ा दी है, क्योंकि नीचे कीचड़ है, देखते हैं आगे क्या इंतज़ाम होता है, कोई रास्ता ढूंढना होगा क्योंकि ऐसे कितने दिनों रह सकते हैं."
स्वंयसेवी संस्था कोसी नवनिर्माण मंच के महेंद्र यादव कहते हैं, "इनके गांव थे, इनके खेत थे, जिसे हम लोगों ने दोनों तरफ़ तटबंध बांधकर इन्हें नदी के बीच क़ैद कर दिया. उनके बुनियादी सवाल शिक्षा, स्वास्थ्य, विस्थापन, पुनर्वास, विकास ये सारे सवाल आज की राजनीति में गौण है."

कोसी नवनिर्माण मंच इस इलाक़े में आठ ट्रेनिंग सेंटर, जिन्हें वो 'जीवनशाला' बुलाते हैं, चलाते हैं, जिनमें पढ़ाई के साथ-साथ दूसरी चीज़ों का प्रशिक्षण दिया जाता है और लोगों को उनके अधिकारों को लेकर जागरूक बनाने की कोशिश भी होती है.
हालांकि इन जीवनशालाओं में सेवा दे रहे कई शिक्षक और ट्रेनर्स ख़ुद नौकरी की तलाश में हैं और ऐसा होने पर ज़ाहिर है वो यहां से चले जाएंगे लेकिन कोसी क्षेत्र में पढ़ाई की इच्छा रखनेवाले छात्रों के लिए फिलहाल उम्मीद की यह एक मज़बूत किरण नज़र आती है.
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