गुजरात चुनाव: 2002 के दंगों के ज़िक्र के बीच क्या है विस्थापितों का हाल

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- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता (अहमदाबाद) गुजरात से
"2002 में एक बार नरेंद्र मोदी के समय में दंगे करने की कोशिश की, तो ऐसा सबक सिखाया कि 2002 के बाद 2022 आ गया, कोई गर्दन नहीं उठाता."
केंद्रीय गृह मंत्री, अमित शाह
"मैं केंद्रीय गृह मंत्री को बताना चाहता हूं, आपने 2002 में जो सबक सिखाया था, वह यह था कि बिलकिस बानो के बलात्कारियों को आप मुक्त कर देंगे, आप बिलकिस की 3 साल की बेटी अहसान के हत्यारों को मुक्त कर देंगे. जाफरी मारा जाएगा… कौन सा पाठ हम याद रखेंगे?"
एआईएमआईएम प्रमुख, असदुद्दीन ओवैसी
"अगर गोधरा में दंगे न होते, डब्बे को जलाया न गया होता और राजधर्म उस समय निभाया गया होता, तो बीजेपी के सत्ता में आने का सवाल ही नहीं था. गुजरात में रक्षक ही भक्षक बन गए."
गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री, शंकर सिंह वाघेला
गुजरात विधानसभा चुनाव प्रचार में पाकिस्तान, देशद्रोह, सर्जिकल स्ट्राइक, राम मंदिर से लेकर गुजरात दंगों तक की एंट्री हो गई है.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, गुजरात में हुए 2002 दंगे में 790 मुसलमान और 254 हिंदू मारे गए थे. 223 लोग लापता हो गए और 2500 घायल हुए थे. इसके अलावा करोड़ों रुपयों की संपत्ति का नुक़सान हुआ था.
ऐसे में हमने इन दंगों में विस्थापित हुए परिवारों का हाल जानने की कोशिश की है.
ठहरी हुई ज़िंदगी
अहमदाबाद इन दिनों गुजरात की सियासत का केंद्र बना हुआ है. चुनावी शोर और जगह-जगह पार्टियों के झंडे लहराए जा रहे हैं. देश के बड़े-बड़े नेताओं के आने का सिलसिला जारी है. शहर में पांच दिसंबर तक बड़े होटलों में ठहरने के दाम तक बढ़ गए हैं.
सियासत के इस सेंटर में एक तरफ़ जहां साबरमती रिवर फ्रंट चमक रहा है तो दूसरी तरफ अहमदाबाद का ऐसा इलाका भी है, जो विकास की उम्मीद लगाए बैठा है.
पिछले बीस सालों में साबरमती से बहुत पानी बह गया लेकिन यहां के लोगों के ज़िंदगी आज भी ठहरी हुई है.

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कूड़े के पहाड़ ने ज़िंदगी बनाई मुश्किल
ये वो इलाका है जो अहमदाबाद की शहरी चकाचौंध से क़रीब दस किलोमीटर दूर कूड़े-कचरे के पहाड़ के साथ सटा हुआ है. यहां साल 2002 में हुए गुजरात दंगों के क़रीब 60 पीड़ित परिवार रहते हैं.
बीते बीस सालों से इस इलाके का हाल ऐसा है कि यहां आने पर किसी बाहरी व्यक्ति को नाक पर रूमाल रखना पड़ता है, लेकिन यहां रहने वाले लोगों को इसकी आदत हो गई है.
कूड़े-कचरे के विशालकाय दिखने वाले पहाड़ को पार करने पर एक रास्ता, मुख्य सड़क से सिटीजन नगर की तरफ़ जाता है. आसपास कई गोदाम और फैक्ट्रियां भी दिखाई देती हैं. इलाके में दाखिल होने पर गली के दोनों तरफ़ एक-एक कमरे के छोटे घर बने हुए हैं.
कुछ और अंदर जाने पर कच्ची गलियां, गंदगी से भरी पड़ी हैं और वहां भी कई परिवार रह रहे हैं. कुछ औरतें गुस्से में कहती हुई सुनाई देती हैं कि 'फिर से आ गए, फ़िल्म बनाकर ले जाएंगे और होगा कुछ नहीं.'

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इन्हीं में से एक परिवार खातून बेन का है जिन्हें 20 साल पहले अपना पुश्तैनी घर छोड़ना पड़ा था. 52 साल की खातून बेन तब अपने चार बेटों और पति के साथ गुजरात के नरोदा पाटिया में रहती थीं.
कुछ दिन रिलीफ़ कैंप में गुज़ारे और आखिर में सिर ढकने के लिए किसी तरह सिटीजन नगर में छत मिल पाई, लेकिन यहां रहना उतना आसान नहीं जितना उन्होंने सोचा था.
खातून बेन के यहां से पांच घर छोड़कर कचरे का पहाड़ शुरू हो जाता है.
वे कहती हैं, "टाइम ऐसा आ गया है कि कचरे के बीच में रहना पड़ा रहा है."
"गर्मी के दिनों में इस कचरे में ख़ुद से आग लग जाती है और सारा दिन घर में धुंआ रहता है. उससे सांस लेने में तक़लीफ होती है. कुछ समय पहले से सरकारी पानी आना शुरू हुआ है."
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न सिर्फ़ गर्मी, बल्कि बारिश का मौसम भी कम तक़लीफदेह नहीं है.
खातून बेन कहती हैं, "बरसात के दिनों में हर तरफ कीचड़ हो जाता है, इस बार घर तक में पानी भर गया था. पूरा सिटीजन नगर पानी में पड़ा था, कपड़े बिस्तर सब भीग गए थे."
खातून बेन कहती हैं कि न तो पास में कोई अस्पताल है और न ही कोई स्कूल, दोनों के लिए पांच किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. कुछ समय से सरकारी पानी आने लगा है.
एक गली छोड़कर एक कमरे के मकान में रहने वाली हसीना बानो राखी बनाने का काम करती हैं. परिवार में चार बेटे और एक बेटी है.
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जब वे यहां आईं तो उनके बच्चे गोद में खेलते थे, समय के साथ वो सब जवान तो हो गए हैं लेकिन कचरे के चलते शादी करने में अब मुश्किल हो रही है.
हसीना बानो कहती हैं, "कचरे से इतनी बुरी बास आती है कि तुम चौमासे में एक मिनट नहीं ठहरोगे, कचरे की वजह से हमारे बच्चों की सगाई नहीं हो रही."
"कोई अपनी बेटी को कचर-पट्टी में नहीं देना चाहता, कहते हैं कि ये जगह खाली करो तो अपनी लड़की देंगे. अभी यहां कई लोगों की शादी नहीं हो पा रही है."
एक कमरे के साफ़-सुथरे मकान में राखी बनाते हुए वे कहती हैं, "ये जो आप बिजली का मीटर देख रहे हैं इसमें दो महीने में 1,500 रुपये बिल आता है."
राखी बनाने को बीच में ही छोड़कर हसीना बानो बिजली का बिल ला कर दिखाती हैं कि हर महीने एक पंखा, लाइट चलाने पर 750 रुपये बिल भरना पड़ रहा है.

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'बीस साल बाद भी नहीं मिले घर के कागज़ात'
सिटीजन नगर में रहने वाले कई परिवारों के पास आज भी अपने घर के कागज़ात नहीं हैं. हसीना बानो के साथ पास में ही रहने वाले सईद मोहसिन भाई का परिवार भी उनमें से एक है.
गुजरात दंगों के समय हज़ारों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा. ऐसे में कुछ समाजसेवी संस्थाओं ने विस्थापित परिवारों की मदद की और मिलकर उनके लिए छोटे-छोटे घर बनाए. कुछ परिवारों को तो उनके घर के कागज़ मिल गए, लेकिन कुछ अभी भी उम्मीद लगाए बैठे हैं.
मोहसिन भाई कहते हैं, "यहां पर करीब 30 परिवारों को मकान के कागज मिल गए हैं, बाकी का भरोसा है कि हमारे नाम पर हो जाएंगे, जिन्होंने हमें घर दिए हैं हमें उन पर भरोसा है कि वो हमारे नाम कर देंगे. हमें इसके लिए कुछ भी पैसा नहीं देना पड़ा था."
मोहसिन बताते हैं कि इलाके में फैली गंदगी और कचरे के पहाड़ की वजह से उनके पिता का फेफड़ा ख़राब हो गया, जिसके इलाज में उन्हें काफी पैसे खर्च करने पड़े.
वे कहते हैं, "यहां कचरे की दिक्कत है. आप बाहर में कचरा साफ़ करने की मशीनें लगा सकते हैं. यहां जनता रहती है, तो यहां क्यों नहीं लगा सकते हैं? यहां लगानी चाहिए. वहां पब्लिक नहीं है तो लगा रहे हैं. बच्चे सांस लेते हैं. हमारी तो ज़िंदगी पूरी हो गई है. बच्चों का भविष्य है. न जाने कितने लोग तो इस कचरे की वजह से मर गए."

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कैसे बसा सिटीजन नगर?
2002 के दंगों के समय, बहुत सारे गांवों, कस्बों और इलाकों से लोगों को घर छोड़कर जाना पड़ा. इनमें सबसे ज़्यादा विस्थापन मुस्लिम परिवारों का हुआ है.
बुनियाद एनजीओ के साथ काम करने वाले हुज़ैफा उज्जैनी बताते हैं कि हिंसा की वजह से विस्थापित हुए परिवारों को शुरू के दिनों में रिलीफ कैंप में रहना पड़ा.
हुज़ैफा उज्जैनी कहते हैं, "काफ़ी सारी संस्थाएं इकट्ठा हुईं और तय किया कि इनके लिए टेंपरेरी शेल्टर बनाएंगे. इन जगहों से लोग वापस नहीं जा पाए और धीरे-धीरे ये टेंपरेरी शेल्टर परमानेंट हो गए. अब उन्हीं को रिलीफ़ कॉलोनी कहा जाता है."
सिटीजन नगर की तरह अहमदाबाद के अलावा गुजरात के कई ज़िलों में ऐसी रिलीफ़ कॉलोनियां हैं. दंगा पीड़ितों के लिए काम करने वाले एनजीओ 'जनविकास' ने उन परिवारों का एक सर्वे किया था जो रिलीफ़ कॉलोनी में रह रहे हैं.
हुज़ैफा बताते हैं, "गुजरात के क़रीब आठ ज़िलों में रिलीफ़ कॉलोनी बनाई गई थी. जिन ज़िलों में हिंसा सबसे ज़्यादा हुई, उन्हीं शहरों के बाहरी क्षेत्रों में इन्हें बनाया गया."
"इनमें अहमदाबाद, वडोदरा, पंचमहाल, अरवली, मोडासा, हिम्मतनगर, मेहसाणा, आनंद और खेड़ा ज़िले शामिल हैं. इन ज़िलों में 83 कॉलोनियां बनाई गईं, जिसमें 3 हज़ार 87 परिवार और क़रीब 16 हज़ार लोग आज भी रह रहे हैं."
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एकता फ्लैट में रह रहे 36 परिवार
सिटीजन नगर की तरह की अहमदाबाद के जुहापुरा में दंगा पीड़ित परिवारों के लिए साल 2003 में एकता फ्लैट बनाए गए थे. उस समय यहां 36 परिवारों को बसाया गया.
18 परिवार पहली मंज़िल पर रहते हैं और 18 दूसरी मंज़िल पर. बिल्डिंग के नीचे दुकानें बनाई गई हैं.
उन्हीं परिवारों में से एक हैं मलिक नयाज बीबी. प्यार से लोग इन्हें नियाज अप्पा बुलाते हैं. एक कमरे के फ़्लैट में 71 साल की अप्पा अपने पति के साथ रहती हैं. बच्चों की शादी हो गई है जो अब अलग रहते हैं.
पुराने दिनों को याद करते हुए वे कहती हैं, "मेरे गांव में बंगला था, घर के आगे-पीछे जगह खाली छोड़ी हुई थी, लेकिन सब छोड़कर एक कमरे के घर में रहना पड़ रहा है. जब हम निकले तो उस दिन जुमा था, सबसे पहले हम जुहापुरा के एक स्कूल में बने कैंप में आए, दूसरे दिन यहां के लड़के मांग कर खाना लाए तो खाना खाए, फिर सरकार ने अनाज देना शुरू किया और ऐसे आठ महीने तक वहां रहे."
यहां रह रहे विस्थापित परिवारों का जीवन सिटीजन नगर से काफ़ी बेहतर है.
यहां बिजली, पानी और सफ़ाई जैसी सभी मूलभूत सुविधाएं मौजूद हैं.
अप्पा कहती हैं, "शुरू में दिक्कत होती थी लेकिन अब सब अच्छा है, सब सुविधा मिली हुई है."

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मदद मिलने में क्या हैं मुश्किलें?
दंगा पीड़ितों के लिए केंद्र में रही बीजेपी और कांग्रेस सरकार, दोनों ने आर्थिक मदद की.
साल 2002 में केंद्र सरकार ने स्पेशल रिलीफ़ एंड इकोनॉमिक रिहैबिलिटेशन पैकेज के तहत क़रीब 155 करोड़ रुपये गुजरात सरकार को दिए.
ये पैसे इन परिवारों तक पहुंचे भी, लेकिन उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं आया. वजह थी कि ये परिवार कभी वापस अपने घर नहीं लौट पाए.
हुज़ैफा उज्जैनी कहते हैं, "दंगों में पांच कैटेगरी के तहत मदद की गई, पहला जिनकी मौत हुई, दूसरा मिसिंग लोग, तीसरा घायल, चौथा-जिनके घर बर्बाद हुए और पांचवां जिनके बिजनेस को नुकसान हुआ, लेकिन जो लोग वापस अपने घर नहीं जा पाए तो पता चला कि 'इंटरनली डिस्पलेस्ड पर्सन' की एक बड़ी कैटेगरी है, लेकिन इसे माना नहीं गया, सरकार ने इस कैटेगरी के लोगों के लिए कुछ नहीं किया."
रिलीफ़ कॉलोनियों में रहने वाले ज़्यादातर परिवार आज भी बेसिक सुविधाओं से जूझ रहे हैं. हुज़ैफा इसके लिए नीतियों को भी ज़िम्मेदार मानते हैं.
वे कहते हैं, "जब विकास के नाम पर बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए विस्थापन होता है, तो नीतियां बनी हुई हैं उसके तहत उन परिवारों को दूसरी जगह बसाया जाता है, लेकिन जिन्हें हिंसा की वजह से मजबूरी में अपनी जगह छोड़नी पड़ी, उनके लिए वैसी नीतियां नहीं हैं."

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सिटीजन नगर, अहमदाबाद के दानीलिमड़ा विधानसभा क्षेत्र में है. यहां की बुनियादी सुविधाओं की ख़राब स्थिति को लेकर म्युनिसिपल काउंसलर शहजाद ख़ान से कई बार संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उनसे मिलने का वक़्त नहीं मिला.
इसके अलावा स्थानीय विधायक शैलेश परमार को भी कई बार फ़ोन किया, लेकिन किसी की तरफ़ से कोई जवाब अब तक हमें नहीं मिला है. हमें उनकी तरफ़ से कोई जवाब मिलता है तो यहां उसे शामिल किया जाएगा.
पांच दिसंबर को दूसरे चरण के चुनाव हैं, इन चुनावों में एक बार फिर रिलीफ़ कॉलोनियों में रहने वाले लोगों की उम्मीद जगी है कि उनकी ज़िंदगी में बदलाव आएगा, लेकिन बदलती सियासत और सरकार क्या यहां कि ज़िंदगी बदल पाएगी ये बड़ा सवाल है.
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