सरदार पटेल के राजनीतिक जीवन में कितना था मणिबेन का योगदान

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- Author, उर्विश कोठारी
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी गुजराती के लिए
वल्लभभाई पटेल के राजनीतिक-सार्वजनिक जीवन में एक महिला हमेशा उनके साथ दिखाई देती रही हैं.
ये महिला मणिबेन पटेल थीं. सरदार पटेल की बेटी और जवाहर लाल नेहरू-इंदिरा गांधी की तरह ही सरदार पटेल-मणिबेन पिता-पुत्री की जोड़ी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय जोड़ी थी.
मणिबेन ने सुखी जीवन को छोड़कर अपने पिता के पदचिन्हों पर चलने में जीवन का अर्थ देखा.
जब तक सरदार पटेल जीवित रहे, मणिबेन ने उनकी निरंतर सेवा की. उनकी आशाओं और निराशाओं, दुखों और ख़ुशियों को बेहद क़रीब से देखा.
सरदार की मृत्यु के बाद, मणिबेन राजनीति में सक्रिय हुईं और लगभग तीन दशकों तक एक सांसद के रूप में समाज सेवा करती रहीं. इस दौरान सादगी के गांधीजी-सरदार पटेल से मिले संस्कारों का आजीवन पालन किया.
वकील की बेटी का सफ़र
सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने से पहले, वकील वल्लभभाई का लक्ष्य पैसा कमाना ही था. शुरुआती दौर में उनका पसंदीदा शगल अहमदाबाद में गुजरात क्लब में पुल खेलना, बातें करना और हुक्का पीना था.
पहले वकील के रूप में अपने करियर में, वह ज़िला अभियोजक बन गए थे, लेकिन उन्होंने देखा कि सरकारी नौकरी की बजाए असली कमाई वकालत में है. इसलिए वे वकालत करने लगे थे.
इस बीच 1909 में जब वल्लभभाई की पत्नी झवेरबा की मृत्यु हुई, तो बेटी मणिबेन पांच साल की भी नहीं थीं और बेटा दयाभाई मणिबेन से डेढ़ साल छोटा था.
वल्लभभाई चाहते थे कि उनके दोनों बच्चे विदेश में पढ़ाई करें. इसकी तैयारी में उन्होंने दोनों बच्चों को मुंबई में एक अंग्रेज़ी महिला मिस विल्सन के घर में रखा, ताकि वे कम उम्र से ही बातचीत के ज़रिए अंग्रेजी सीख सकें. वहां इन दोनों बच्चों के अभिभावक चाचा विट्ल भाई पटेल थे.
जिस दौर में दस-पंद्रह रुपए महीने पर घर आराम से चल रहा था, उस वक्त वल्लभभाई अपने दोनों बच्चों को अंग्रेज़ी पढ़ाने के लिए ढेरों रुपये प्रति महीना ख़र्च कर रहे थे.
इस वजह से गांधीजी के संपर्क में आने से पहले मणिबेन और दयाभाई के बीच पत्राचार अंग्रेज़ी में होता था क्योंकि, दोनों गुजराती लिख-पढ़ नहीं सकते थे, खादी के कपड़े पहने और सीधी सी दिखने वाली मणिबेन की तस्वीरों को देखकर शायद ही इसकी कल्पना की जा सकती है.
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'बापू' और 'बापूजी' के साये में
वल्लभभाई खेड़ा सत्याग्रह से गांधीजी के सिपाही और गुजरात कांग्रेस के नेता बने. इस बीच, मणिबेन 1917 में अपने पिता के साथ अहमदाबाद चली गईं, जबकि चाचा विट्ठलभाई पटेल मुंबई में रह रहे थे. वह गुजरात विद्यापीठ की छात्रा बन गईं और खादी शुरू होने के बाद उन्होंने इसे अपना लिया.
वल्लभभाई ने उनका अनुसरण किया, 1921 से खादी पहनना शुरू किया. तब मणिबेन ने संकल्प किया कि वह धागा कात कर 'बापू' (वल्लभभाई) के लिए धोती तैयार करेंगी. इस संकल्प के थोड़े दिनों के बाद से सरदार के जीवित रहने तक उनके कपड़े मणिबेन के काते धागे से बनते थे.
मणिबेन वल्लभभाई को 'बापू' और गांधी जी को 'बापूजी' कहती थीं. मणिबेन अपने पिता के साथ तब तक व्यवहार करने में असहज थीं, यह परंपरागत तौर तरीक़ों के चलते था.
इसके बारे में बात करते हुए, वल्लभभाई ने महादेवभाई देसाई से कहा था, "वह मुझसे खुलकर बात नहीं कर सकती और अगर मैं बात करने जाता हूं तो उसे यह पसंद नहीं है. लेकिन यह उसकी ग़लती नहीं है. हमारे घर का यही तरीक़ा है. जब तक मैं 30 वर्ष का नहीं हुआ, तब तक मैं अपने बड़ों के सामने कुछ नहीं बोलता था."
सहयोगियों और उनके परिवारों की परवाह करने वाले गांधीजी ने मणिबेन की ज़िम्मेदारी ली. 1927 में वल्लभभाई को लिखे एक पत्र में उन्होंने लिखा, "मणिबेन का इरादा विवाह नहीं करने का है. मैंने बहुत छानबीन किया है, लेकिन वह शादी नहीं करना चाहतीं. हमें उसके फ़ैसले का सम्मान करना चाहिए और प्रोत्साहित करना चाहिए. आप उनकी चिंताओं को छोड़ दें. मैं उनकी चिंता कर रहा हूं और आगे भी करता रहूंगा."

पिता-पुत्री पत्राचार
मणिबेन ने कई संघर्षों में भाग लिया, उन्हें कारावास भुगतना पड़ा, सरदार से अलग रहना पड़ा. वल्लभ भाई के बेटे दयाभाई का सोचने का तरीक़ा अलग था. लेकिन सरदार पटेल मणिबेन को ज़्यादा चाहते थे. उन्होंने अपनी बेटी से सलाह-सुझाव-शिक्षा भी ली, जो बचपन से ही बिना मां के पली-बढ़ी थी.
1924 में, जब मणिबेन इलाज के लिए मुंबई में थीं, तो सरदार ने उन्हें एक पत्र में लिखा, "तुम जैसे मासूम बच्चे का क्या कसूर है? लोग मेरे बारे में सोचते हैं कि मैं तुम्हें बहुत प्रताड़ित कर रहा हूँ अगर तुम सोचते हो कि तुम बहुत बचकानी हो रही हो. दोनों स्थितियां वांछनीय नहीं हैं. आपका स्वाभवगत साहस और आनंद बना रहना चाहिए."
पारिवारिक मामलों में भी सरदार मणिबेन को दयाभाई की पत्नी के साथ रहना सिखाते थे. एक पत्र में उन्होंने लिखा, "यदि आप जनसेवा करना चाहते हैं, तो आपको अलग-अलग स्वभाव के लोगों के साथ काम करना होगा. बड़े पेट के साथ अपमान सहना सीखना चाहिए और यह सबक पहले घर से सीखना चाहिए."
1942 के हिंदू छोड़ो आंदोलन के दौरान सरदार के साथ अहमदनगर जेल और यरवदा जेल में मणिबेन थीं. 1944 में, सरदार 70 साल के हो चुके थे और उनका स्वास्थ्य ख़राब रहने लगा था.
उन्होंने मणिबेन को लिखा, "मुझे लगता है कि इस दुनिया में मेरा समय समाप्त हो गया है. तो आप मेरे साथ कैसे रह सकती हो? यदि आप किसी कार्य क्षेत्र को चुनते हैं और जाते समय उस पर टिके रहते हैं, तो भविष्य की राह आसान नहीं होगी?...हमारी अनेक संस्थाएं हैं. या तो आप कोई नई जगह चुनें या किसी इलाके में बस जाएं, ताकि मेरे जाने के बाद आपको ज्यादा परेशानी न हो."

उप प्रधानमंत्री की बेटी
आज़ादी के क़रीब आने और सरदार सरकार का हिस्सा बनने के बावजूद, उनके और मणिबेन के साधारण आवास में कोई बदलाव नहीं आया. मणि बेन सरदार के घर का प्रबंधन करती थीं जो गृह मंत्री और उप प्रधान मंत्री थे.
मणिबेन ने नोट किया कि दिल्ली में चोरी हो रही थी, यह सुनकर उन्होंने घर पर बहुत पैसा नहीं रखा. इसलिए समय-समय पर सरदार को ख़र्चे के रुपये के चेक पर दस्तखत करने पड़ते थे. सरदार ने फिर उनके बैंक खाते में मणिबेन का नाम दर्ज किया, इसलिए उनके हस्ताक्षर भी चलने लगे थे.
मणिबेन सरदार को दैनिक खर्च का विवरण देती थीं, लेकिन उन्होंने कभी हिसाब-किताब नहीं देखा. पिछली बीमारी के दौरान, कांग्रेस पार्टी के लाखों रुपये का प्रबंधन करने वाले सरदार को चिंता थी कि खाते में रुपये नहीं होने पर मणिबेन शर्मिंदा होंगी इसलिए उन्होंने मणिबेन से पूछना सुनिश्चित किया.
'लाइफ' पत्रिका की प्रसिद्ध फोटोग्राफर मार्गरेट बॉर्के-व्हाइट ने सरदार और मणिबेन के साथ अपनी मुलाकात के बारे में एक नोट में मणिबेन को सरदार से 'अविभाज्य' बताया.
हर सुबह जब सरदार और मणिबेन सैर के लिए निकलते थे तो बड़ी संख्या में लोग उनके साथ हो जाते थे. उस समय, मणिबेन बारी-बारी से एक के बाद एक व्यक्ति को सरदार के साथ चलने का मौका देती थीं. मणिबेन ने मार्गरेट से आने वालों से निपटने के इस कार्य का उल्लेख किया.
मणिबेन द्वारा सरदार के अंतिम क्षणों का वर्णन हृदय विदारक था. उन्होंने लिखा है कि ''मृत्यु से पहले की सुबह सरदार पटेल सीधे बैठे, दोनों पैरों पर हाथ रखकर, मुझे देख रहे थे'.
मणिबेन संतुष्ट थीं कि "अंतिम क्षण तक, अवचेतन अवस्था में भी, उनके पिता खुद में नहीं, बल्कि हैदराबाद और कश्मीर की चिंता में उलझे थे."
राजनीति में बिताए चार दशक
आम धारणा यह है कि सरदार के उत्तराधिकारी राजनीति से दूर रहे, लेकिन मणिबेन और दयाभाई दोनों ही राजनीति में सक्रिय थे. बेशक, सरदार ने उन्हें अपने उत्तराधिकारी के रूप में कभी आगे नहीं बढ़ाया.
सरदार की मृत्यु के दो साल बाद, 1952 में स्वतंत्र भारत के पहले लोकसभा चुनाव में, मणिबेन ने खेड़ा (दक्षिण) सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की. दूसरे लोकसभा चुनाव में उन्होंने आणंद सीट से जीत हासिल की.

वहीं पटेल के बेटे दयाभाई कांग्रेस से निकल कर 'स्वतंत्र पार्टी' में शामिल हो गए, जबकि मणिबेन कांग्रेस में ही रहीं. तीसरा लोकसभा चुनाव 1962 में हुआ था, इससे पहले गुजरात राज्य स्थापित हो चुका था.
इससे पहले जो महागुजरात आंदोलन हुआ था, उसके कारण कांग्रेस की स्थिति अच्छी नहीं थी. सरदार की बेटी होने के बावजूद मणिबेन आणंद सीट से निर्दलीय उम्मीदवार से 22 हजार से अधिक मतों से हार गईं.
लोकसभा में हार के बाद, कांग्रेस ने मणिबेन को 1964 में राज्यसभा भेजा और वह 1970 तक सांसद रहीं. कांग्रेस के विभाजन के बाद 1973 में लोकसभा उपचुनाव में साबरकांठा सीट से मणिबेन ने कांग्रेस (एस) की सीट पर जीत हासिल की.
वह 1977 के आपातकाल के बाद के चुनावों में भारतीय लोक दल के उम्मीदवार के रूप में मेहसाणा सीट से चुनी गई थीं. इस प्रकार, एक सांसद के रूप में उनकी यात्रा, जो 1952 में शुरू हुई, दो साल को छोड़कर, लगभग तीन दशकों तक जारी रही.
अंतिम वर्षों तक वे विभिन्न गांधीवादी संगठनों से जुड़ी रहीं और उन्होंने एक ऐसा जीवन जिया जो इतना सरल था कि मीडिया में उनकी मार्मिक कहानियों को रिपोर्ट किया जाता था.
उनके जैसे चंद लोग ही थे जिन्होंने कभी पूरे देश को रोशन किया,जो नई वास्तविकताओं में अप्रासंगिक हो गए. 1990 में उनकी मृत्यु एक तरह से मौजूदा राजनीति के गिरते मूल्यों से उनकी मुक्ति थी.
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