मेडिकल की पढ़ाई हिन्दी में, अमित शाह का आग़ाज़, छात्र क्या बोल रहे?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, शुरैह नियाज़ी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए, भोपाल से
मध्य प्रदेश में मेडिकल की पढ़ाई अब हिन्दी में भी की जा सकेगी. साथ ही मध्य प्रदेश देश का वो पहला राज्य होगा जहाँ हिन्दी में मेडिकल की पढ़ाई करवाई जाएगी.
हिन्दी में मेडिकल की पढ़ाई करवाने का मक़सद क्या है? ये कैसे करवाया जाएगा?
इसके जवाब में प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा मंत्री विश्वास सारंग बताते हैं, "इसका मक़सद पढ़ाई को ग्रामीण क्षेत्रों और हिन्दी मीडियम से पढ़ने आने वाले छात्रों के लिए आसान बनाना है."
वह कहते हैं कि यह किसी भी तरह से अंग्रेज़ी में मेडिकल पढ़ाई का विकल्प नहीं है बल्कि छात्रों को एक ऐसा प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराना है, जिससे वो आसानी से विषय के बारे में समझ सकें.
विश्वास सारंग ने ही इस पूरे प्रोजक्ट की रूप रेखा तैयार की है. उन्होंने बताया कि इसकी शुरुआत उन्होंने फ़रवरी में एक मीटिंग करके की. पहले तो डॉक्टरों और शिक्षकों को इसे लेकर संदेह था लेकिन लगातार बैठक के बाद सभी इस प्रोजेक्ट के लिए जुट गए.
इस प्रोजेक्ट के तहत सबसे पहले एमबीबीएस के प्रथम वर्ष के तीन विषयों एनाटॉमी, फिजियोलॉजी और बायोकेमिस्ट्री की किताबों को हिन्दी माध्यम में किया गया है. लेकिन धीरे-धीरे इसे आगे के वर्षों के लिए भी लागू किया जाएगा.

इमेज स्रोत, Getty Images
तकनीकी शब्दों में नहीं किया गया बदलाव
जब विश्वास सारंग पूछा गया कि कहीं इससे ये न हो कि हिंदी विषय में पढ़ने वाले छात्रों अंग्रेज़ी वालों से पिछड़ जाएं तो उन्होंने बताया, "ऐसा मुमकिन ही नहीं है. क्योंकि तकनीकी शब्दों को नहीं बदला गया है. बस उसे देवनागरी में लिखा गया है ताकि छात्र उसे आसानी से पढ़, समझ सकें."
उन्होंने कुछ उदाहरण देते हुए बताया कि, "जैसे स्पाइनल कॉर्ड को देवनागरी में 'स्पाइनल कॉर्ड' लिखा गया है, उसे मेरूदंड नहीं लिखा गया है. तो कोशिश यही है कि छात्र विषय को अपनी भाषा में आसानी से समझ सकें. उसके साथ ही अंग्रेज़ी में भी लिखा होगा तो उसे समझने में आसानी होगी."
इस पूरे प्रयोग को मध्य प्रदेश सरकार देश में पहला प्रयोग बता रही है. वहीं उनका मानना है कि इससे दूसरे प्रदेशों में वहाँ की स्थानीय भाषाओं में भी बदलने का रास्ता खुलेगा.
इस पूरे प्रोजक्ट के लिए भोपाल के सरकारी गांधी मेडिकल कॉलेज में एक वॉर रूम स्थापित किया गया है. इसका नाम मंदार रखा गया, जहाँ पर प्रदेश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों के 97 डॉक्टर्स ने इस काम को अंजाम दिया है.

इमेज स्रोत, SHURAIH NIAZI
प्रोजेक्ट पर काम करने वाले डॉक्टरों का क्या है कहना?
वहीं इस विषय को तैयार करने वालें एक डॉक्टर दीपक शर्मा ने बताया कि यह काम चुनौतीपूर्ण था.
उन्होंने कहा, "इसे आसान काम तो नहीं कहा जा सकता है. कोशिश यही रही कि जो भी तकनीकी शब्द हैं, उनके साथ छेड़छाड़ न किया जाए और जो भी बदलाव किए जाएं वो पढ़ने वालों को आसानी से समझ आ जाएं."
डॉक्टर दीपक शर्मा ने कहा कि इस काम के लिए महीनों से वे और उनके साथी लगे रहे तब जाकर अब ये किताबें तैयार हो पाई हैं.
वहीं एक अन्य डॉक्टर रश्मि दवे शर्मा ने भी कहा कि काम तो मुश्किल था लेकिन अब जबकि इसकी शुरुआत हो गई है तो ये काम अब आगे ही बढ़ता जाएगा.
उन्होंने बताया, "तकनीकी शब्दों को नहीं बदला गया है. अगर उसे बदलते तो निश्चित तौर पर छात्रों को दिक्क़त आती. लेकिन इसमें सिर्फ़ उन्हें देवनागरी में लिखा गया है, जिसकी वजह से उन्हें समझने में आसानी होगी."

इमेज स्रोत, BBC/SHURIAH NIAZI
नेशनल एजुकेशन प्रोग्राम के तहत किया गया बदलाव
विश्वास सारंग कहते हैं, "यह पूरा प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लागू किए गए नेशनल एजुकेशन प्रोग्राम के तहत किया गया है, जिसकी मंशा यह थी कि छात्रों को शिक्षा उनकी मातृभाषा में उपलब्ध कराई जाए. नेशनल एजुकेशन प्रोग्राम 2020, पुरानी शिक्षा प्रणाली को बदलकर लाया गया है. नए पाठ्यक्रम में बच्चों को शिक्षित करने के साथ ही उनके समग्र विकास पर ध्यान दिया गया है."
शहर के गांधी मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं का मानना है कि हिन्दी में किताबें उपलब्ध कराने से हिन्दी मीडियम से आने वाले विद्यार्थियों को काफ़ी हद तक फ़ायदा होगा.
एमबीबीएस के पांचवें वर्ष की छात्रा अरुबा सदफ़ का कहना है, "मुझे लगता है कि जो छात्र-छात्राएं हिंदी मीडियम से आते हैं तो उन्हें इसे समझने में आसानी होगी. वहीं अगर हिन्दी में पढ़े छात्र आगे डॉक्टर बनने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में प्रैक्टिस करते हैं तो वहाँ पर भी गाँव के लोगों के इलाज के दौरान उनसे बात करने, उन्हें समझाने में इससे आसानी होगी."
उनका कहना है कि अभी तो यह मालूम पड़ता है कि इससे इलाज करना आसान होगा.
वहीं अपना नाम न बताने वाली एक छात्रा का कहना था अगर ये छात्र डॉक्टर बनने के बाद दूसरे देशों में जाकर प्रैक्टिस करना चाहेंगे तो ज़रूर उन्हें थोड़ी दिक्क़त आ सकती है.
वहीं गांधी मेडिकल कॉलेज के दूसरे वर्ष के मेडिकल स्टूडेंट मोहित गोगिया का कहना है कि हिन्दी माध्यम वालों के लिए तो यह अभी ठीक मालूम पड़ता है.
वह कहते हैं, "इसमें कोई बुराई नहीं है. बस समझने में आसानी होगी वर्ना हिन्दी मीडियम वालों को परेशानी तो होती ही थी."

इमेज स्रोत, BBC/SHURIAH NIAZI
पब्लिशर्स क्या कहते हैं?
मेडिकल की किताबों को हिन्दी में छापने वाले पब्लिशर्स का कहना है कि यह प्रयोग नया है क्योंकि हिंदी में मेडिकल की किताबें उपलब्ध नहीं रही हैं.
एल्सेवियर पब्लिशर्स के जीतेंद्र त्रिपाठी ने बताया, "इस पूरी प्रक्रिया की वजह से किताबों की साइज़ बढ़ गई है. कई किताबें दो वॉल्यूम में हो गई हैं. इसकी वजह यह है कि अब वही शब्द हिंदी में भी आ गए हैं जो किताबों में अंग्रेज़ी में पहले से मौजूद थे."
उन्होंने बताया कि इसके लिए एक सरकारी समिति बनाई गई थी जिसने उन्हीं किताबों का चयन हिंदी में तैयार करने के लिए किया जो उस विषय की सबसे अच्छी किताबें थीं.
इसमें इस बात का भी ख़्याल रखा गया कि किसी भी तरह से कॉपीराइट का उल्लंघन न हो. इसलिए सरकार ने पब्लिशर्स के साथ पहले ही समझौता कर लिया.
हिन्दी में मेडिकल के पाठ्यक्रम की शुरुआत 16 अक्टूबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भोपाल में करने जा रहे हैं. इन किताबों का विमोचन अमित शाह 50 हज़ार छात्रों की उपस्थिति में शहर के लाल परेड ग्राउंड पर करेंगे.

इमेज स्रोत, Getty Images
यह कार्यक्रम ऐसे समय में किया जा रहा है जब गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता वाली संसदीय राजभाषा समिति की सिफ़ारिशों को लेकर भी बयानबाज़ी हो रही है.
इस समिति ने सिफ़ारिश की है कि हिंदी भाषी राज्यों के आईआईटी, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और केंद्रीय विद्यालय जैसे तकनीकी और ग़ैर-तकनीकी उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षा का माध्यम हिन्दी होना चाहिए. देश के अन्य हिस्सों में स्थानीय भाषाओं में शिक्षा उपलब्ध कराई जानी चाहिए.
लेकिन दक्षिण के राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इसे लेकर केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि वो हिन्दी को पूरे देश पर थोपना चाहती है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















