फ़रीदाबाद: 'ना जाने कितने मर गए, इंसाफ़ के नाम पर कुछ नहीं मिलता'- ग्राउंड रिपोर्ट

विशाल

इमेज स्रोत, BBC/Kirti Dubey

इमेज कैप्शन, मारे गए सफ़ाईकर्मी विशाल के परिजन उनकी तस्वीर के साथ, शुक्रवार को उनकी शोकसभा थी.
    • Author, कीर्ति दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बुधवार को राजधानी दिल्ली से सटे फ़रीदाबाद के एक निजी अस्पताल में चार सफ़ाईकर्मियों की ज़हरीली गैस सूंघने के कारण मौत हो गई.

विशाल, रवि गोलकर, रोहित और रवि कुमार ये चारों लड़के वाल्मीकि समुदाय से आते हैं. इन चारों का अंतिम संस्कार परिवार वालों ने गुरुवार देर शाम नौ बजे किया.

इन चारों की मौत फ़रीदाबाद के एस निजी अस्पताल क्यूआरजी में एक सेप्टिक टैंक की सफ़ाई के दौरान हुई थी. ये काम मैनुअल स्कैवेंजिंग (मैला ढोना या हाथ से नालों-टैंक की सफ़ाई करना) के दायरे में आता है जो ग़ैर-क़ानूनी है.

लाइन

दक्षिणपुरी दिल्ली की चौड़ी व्यस्त सड़क के बग़ल में लगभग डेढ़ मीटर संकरी गली वाला ये इलाक़ा संजय कैंप है.

गली इतनी पतली कि केवल एक व्यक्ति ही चल सकता है. एक छोटी सी किराने की दुकान पर बैठे बुज़ुर्ग से मैं पूछती हूं कि ठजो चार लड़के...." अभी मैं अपना वाक्य पूरा कर पाती इससे पहले ही वो बोल उठते हैं- "हां जो लड़के मरे हैं ना वही? आगे टक्कर से मुड़ जाना एक पार्क में सब बैठे हैं."

मैं आगे बढ़ती हूँ, तो रोती औरतों की गाढ़ी चीख़ कानों को भेद देती हैं. कुछ क़दम आगे चल कर दिल्ली नगर निगम का एक पार्क मिलता है.

शाम के साढ़े पाँच बजे हैं और यहां लगे एक टेंट में महिलाओं का एक बड़ा समूह बैठा है. ये महिलाएं चारों लड़कों की रिश्तेदार हैं जो उनके शव का इंतज़ार कर रही हैं.

संजय कैंप
इमेज कैप्शन, संजय कैंप का पार्क जहां शव का लोग इंतजार कर रहे हैं.

यहां मेरी मुलाक़ात विशाल की मां रजनी से हुई. 25 साल के विशाल मरने वाले उन चार लड़कों में से एक हैं.

पीले दुपट्टे से सिर ढक कर टेंट के कोने में बेसुध पड़ी रजनी किसी से बात नहीं करतीं. वहां मौजूद महिलाएं मुझे उनके पास ना जाने की सलाह देती हैं इसके बावजूद मैं पास जा कर उन्हें अपना परिचय देती हूं.

वह अपने आंसू पोंछते हुए कहती हैं, ''साढ़े आठ बजे घर से चाय पी कर निकला था. बोला था कि मैं फ़रीदाबाद काम पर जा रहा हूं, दो-तीन बजे तक आ जाऊंगा. मैंने कहा था कि मत जाओ, आज त्योहार है घर पर रहो, शाम को हम मेला जाएंगे. जब मैं शाम को चार बजे काम से लौटी तो पूरे मोहल्ले में भीड़ जुटी थी और सब कह रहे थे कि चार लड़के जो फ़रीदाबाद गए थे वो मर गए. फिर मैं भाग कर घर पहुँची तो पता चला कि मेरा बेटा चला गया.''

रजनी दक्षिणी दिल्ली की कोठियों में सफ़ाई का काम करती हैं.

रजनी

इमेज स्रोत, Alamy

इमेज कैप्शन, गुरुवार को अपने बेटे विशाल के शव का इंतज़ार करतीं मां रजनी

जिस बेटे के साथ रजनी विजयादशमी का मेला देखने जाने वाली थीं उन्हें क्या पता था कि वह उस सुबह उन्हें आख़िरी बार देख रही हैं.

line

फ़रीदाबाद के सेक्टर-16 में स्थित क्यूरजी अस्पताल में सेप्टिक टैंक की सफ़ाई के दौरान विशाल, रवि गोलकर, रोहित और रवि कुमार की मौत हो गई थी.

पुलिस क्या कह रही है?

इस मामले में विशाल के भाई गौरव ने फ़रीदाबाद के सेक्टर-17 के पुलिस स्टेशन में एफ़आईआर दर्ज कराई है.

ये मामला- 304 (।।)- ग़ैर-इरादतन हत्या, 2013 में मैनुअल स्कैवेंजिंग (हाथ से मैला उठाने वाले) नियोजन प्रतिषेध और पुनर्वास अधिनियम की धारा 9 और एससी-एसटी एक्ट की धारा 3 के तहत दर्ज किय गया है.

एफ़आईआर क्यूआरजी अस्पताल और एक निजी कंपनी संतुष्टि अलायड के ख़िलाफ़ दर्ज की गई है.

दरअसल, विशाल, रवि गोलकर, रोहित और रविकुमार दिहाड़ी (प्रतिदिन का मेहनताना) पर काम करते थे. उन्हें हर दिन काम के 400 रुपये मिलते थे. संतुष्टि अलायड एक निजी कंपनी है जिसका क्लाइंट क्यूआरजी अस्पताल है. बुधवार को कंपनी के ठेकेदार की ओर से ही इन चारों को अस्पताल में टैंक की सफ़ाई करने के लिए भेजा गया था.

एफ़आईआर में कहा गया है कि "ये लोग सेप्टिक टैंक की सफ़ाई का काम नहीं करते थे, लेकिन इन्हें बिना किसी सुरक्षा उपकरण के सेप्टिक टैंक साफ़ करने को कहा गया."

इस मामले की जाँच फ़रीदाबाद के असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस महेंद्र वर्मा की देखरेख में हो रही है.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने बताया कि "एक बजे हमें सूचना मिली कि दो लोगों की मौत हुई है. 15-20 मिनट में हम वहां पहुँचे, लेकिन वहां चार लोगों की मौत हुई थी. फ़ायर ब्रिगेड की एक टीम की मदद से हमने उन्हें बाहर निकाला. लेकिन उनकी मौत हो चुकी थी. इस मामले में जाँच चल रही है लेकिन अभी तक कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई है."

जब हम हरियाणा के क्यूआरजी अस्पताल के एडमिन ब्लॉक में पहुँचे तो हमें सिक्योरिटी गार्ड ने बताया कि प्रशासन का एक भी शख़्स मौजूद नहीं है. इसके बाद हमने अस्पताल के मेडिकल सुप्रीटेंडेंट से फ़ोन के ज़रिए संपर्क किया लेकिन उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया.

फरीदाबाद

इमेज स्रोत, BBC/Kirti Dubey

इमेज कैप्शन, संजय कैंप में गुरुवार देर शाम चारों शव लाए गए.
line

पार्क में गूंजती माओं की गाढ़ी चीख़ें

गुरुवार की शाम के साढ़े छह बजे हैं, संजय कैंप का ये पार्क सैकड़ों लोगों की भीड़ से भर गया है. इतने में एंबुलेंस की आवाज़ आती है और लोगों के बीच हलचल मच जाती है.

एक-एक करके चारो शव एंबुलेंस से उतारे जाते हैं और पार्क में फैला सन्नाटा चीख़ों में तब्दील हो जाता है.

इन लड़कों की माओं के दुख की जैसे कोई थाह ही नहीं. पार्क के एक कोने में खड़ी मैं चुप-चाप रोती-बिलखती और बेसुध पड़ी इन माओं को चीख़ते देखती और सुनती हूं.

मरने वाले इन चार लोगों में रोहित और रवि कुमार सगे भाई हैं.

संजय कैंप

इमेज स्रोत, BBC / Kirti Dubey

इमेज कैप्शन, रोहित की पत्नी काजल पति के शव को देख बिलखती हुई

रोहित की पत्नी काजल और रवि की पत्नी विनीता बिलख कर कहती हैं, ''मेरे पति को जगा दो, कल उसे काम पर जाना है ना!''

अपने दो जवान बेटों को खो देने वाली मां रोते-रोते ज़मीन पर गिर जाती है, लोग उन्हें पानी पिलाने की कोशिश करते हैं लेकिन वो कोई हरकत नहीं करतीं.

रोहित और रवि की बहन नीना रोते हुए कहती हैं, ''मैं गोद में थी तो बाप चला गया, अब मेरे दोनों भाई चले गए. कौन है हमारा.''

line

'हमारे घर एक भी मर्द नहीं बचा'

शुक्रवार को मैं एक बार फिर उनके परिवार से मिलने गई.

24 साल के रोहित की पत्नी काजल की उम्र महज़ 21 साल है. उनके पास उनका एक साल का बेटा खड़ा है, अपनी मां पर टूटे दुखों के पहाड़ से अनजान वह दोनों हाथों में बिस्कुट थामे खेल रहा है. काजल अब भी बोल पाने की स्थिति में नहीं हैं.

पास में बैठी रवि कुमार की पत्नी विनीता कहती हैं, "दशहरा के एक दिन पहले चार अक्टूबर को ही रात में मेरे पति को ठेकेदार ने बता दिया गया था कि उनको कल अस्पताल में जा कर सफ़ाई करनी है. दोनों भाई घर से आठ बजे निकले. उन लोगों का काम कुछ और था सेप्टिक टैंक वो साफ़ नहीं करते थे. उनका काम 12.30 तक पूरा हो गया था. फिर अस्पताल के ही आदमी ने उनसे कहा कि कुछ ले लेना और सेप्टिक टैंक साफ़ कर दो. फिर तो मुझे चार बजे शाम को पता चला जब मेरे अग़ल-बग़ल रहने वालों ने शोर मचाया. उनकी मौत तो 2.30 बजे ही हो गई थी."

संचय कैंप

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, रवि की पत्नी विनीता

विनीता कहती है, "लोग बता रहे हैं पहले विशाल-रवि गोलदार टैंक में उतरे जब काफ़ी देर तक वो बाहर नहीं आए और हलचल नहीं हुई तो रवि और रोहित भी अंदर उतरे और अब कोई नहीं बचा. कोई सेफ़्टी नहीं दी, कुछ नहीं किया उनके लिए."

विनीता के अनुसार वो लोग सात बजे बीके अस्पताल गए तब उन्हें पता चला कि वो लोग मुर्दाघर में हैं. गुरुवार शाम को उन्हें शव मिले.

रूंधी हुई आवाज़ में विनीता कहती हैं, "हमारे घर में एक भी मर्द नहीं बचा, मेरा सब कुछ उजड़ गया है. मेरी सास विधवा थीं और अब हम भी विधवा हो गए. मेरे बच्चों के लिए पैसे मिल जाएं और मुझे सरकारी नौकरी मिल जाए. बस यही चाहते हैं."

संतुष्टि एलायड: कंपनी जिसने चारों को काम पर भेजा

संतुष्टि एलायड कंपनी जिसका नाम बार-बार सामने आ रहा है आख़िर वो कंपनी कहां है? जब हमने इसकी पड़ताल की तो पता चला कि सतीश और मुनेश नाम के दो शख़्स ये कंपनी चलाते हैं और मुनेश भी संजय कैंप के रहने वाले हैं.

शुक्रवार को लोगों से पता पूछ कर जब मैं मुनेश के घर पहुँची तो वहां लोगों भीड़ लगी थी. पता चला कि बुधवार शाम से मुनेश पुलिस स्टेशन में हैं और उनसे पूछताछ चल रही है.

संजय कैंप
इमेज कैप्शन, संतुष्टि एलायड कंपनी के मालिक का घर, यहीं से कंपनी चलाई जाती है.

हमें पता चला कि संतुष्टि अलायड का कोई दफ़्तर नहीं है, मुनेश और सतीश घर से ही इस कंपनी का काम चलाते हैं. ज़्यादातर काम वे फ़ोन पर ही करते हैं.

मुनेश के बेटे विशाल बताते हैं, "लगभग 10 साल से मेरे पापा ये काम कर रहे हैं. कुछ साल पहले ही ये कंपनी रजिस्टर हुई. ये लोग दिहाड़ी पर काम करते थे. और इससे पहले भी हम इस बस्ती से लोगों को क्यूआरजी अस्पताल भेज चुके हैं. हमने सेप्टिक टैंक की सफ़ाई के लिए नहीं भेजा था. पता नहीं अस्पताल वालों ने इन चारों को क्या कहा. ये लोग ख़ुद टैंक साफ़ करने गए. हमारे पापा तो ख़ुद वाल्मिकी समाज के हैं. ये तो हममें से एक हैं. "

विशाल एक निजी कंपनी के साथ मार्केटिंग का काम करते हैं.

ग़ैर-क़ानूनी काम जिसमें हर साल कई मारे जाते हैं

यहां यह समझना होगा कि साल 2013 में मैनुअल स्कैवेंजिंग (हाथ से मैला उठाने वाले) नियोजन प्रतिषेध और पुनर्वास अधिनियम लाया गया था और यहां सरकार ने 'मैनुअल स्कैवेंजर' की परिभाषा तय की है.

इस परिभाषा के मुताबिक़ "ऐसा व्यक्ति जिससे स्थानीय प्राधिकारी हाथों से मैला ढुलवाए, साफ़ कराए, ऐसी खुली नालियां या गड्ढे जिसमें किसी भी तरह से इंसानों का मल-मूत्र इकट्ठा होता हो उसे हाथों से साफ़ करे तो वो शख़्स 'मैनुअल स्कैवेंजर' कहलाएगा."

इस अधिनियम के तीसरे अध्याय का सातवां बिंदु कहता है कि कोई स्थानीय अधिकारी या कोई अन्य व्यक्ति किसी भी शख़्स को सेप्टिक टैंक या सीवर में 'जोख़िम भरी सफ़ाई' करने का काम नहीं दे सकता है.

अधिनियम में सेप्टिक टैंक और सीवर के संदर्भ में 'जोख़िम भरी सफ़ाई' को भी परिभाषित किया गया है.

विशाल
इमेज कैप्शन, विशाल, जिनकी मौत सफ़ाई के दौरान ज़हरीली गैस के कारण हुई.

इसका मतलब है कि सभी स्थानीय प्राधिकरणों को हाथ से मैला उठाने की व्यवस्था ख़त्म करने के लिए सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफ़ाई के लिए आधुनिक तकनीकों को अपनाना होगा. कोई भी ठेकेदार या प्राधिकरण सेप्टिक टैंक और सीवर साफ़ कराने के लिए बिना सुरक्षा गियर दिए सफ़ाईकर्मी से सफ़ाई नहीं करा सकता. यह पूरी तरह प्रतिबंधित है.

हरियाणा नगर पालिका कर्मचारी संघ के प्रमुख नरेश शास्त्री ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "सबसे पहले तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश और सरकारी नियमों के मुताबिक़ किसी से भी मैला ढुलवाना अपराध है. लेकिन यहां तो सुरक्षा के लिए कोई उपकरण भी नहीं दिया गया. जो भी टैंक या सीवर में उतरता है उसे एक कॉस्टयूम दिया जाता है, मास्क के साथ ऑक्सीजन सिलेंडर दिया जाता है ताकि वह ज़हरीली गैस से बच सके. एक रस्सी-नुमा बेल्ट के सहारे सफ़ाई करने वाला नीचे उतरता है. कोई परेशानी होने पर वह उसे हिलाता है ताकि टैंक के बाहर बैठे लोग उसे तुरंत ऊपर खींच लें."

संतुष्टि अलायड ने क्या इन चार लोगों को कोई सुरक्षा उपकरपण दिया था?

विशाल कहते हैं, "मेरे पापा तो थाने में हैं आपको ये जवाब शायद वही दे पाएंगे. लेकिन हम दोषी नहीं है."

एफ़आईआर में साफ़ लिखा है कि इन चारों के पास इस तरह के कोई उपकरण नहीं थे.

बहरहाल दोषी कौन है इसका पता जो जाँच के बाद चलेगा लेकिन इन चार परिवारों के लिए दशहरा के त्यौहार के मायने बदल गए हैं, अब ये इन परिवारों के लिए मातम और शोक का दिन है.

जब मैं वापसी का रुख़ करती हूं तो रोहित की पत्नी धीमी सी आवाज़ में कहती हैं, "यही तो होता है मैडम, ऐसे ही कितने मर गए, इंसाफ़ के नाम पर कुछ नहीं मिलता."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)