PFI पर बैन या मदरसों के सर्वे पर चुप क्यों है मुसलमानों की ये संस्था? - प्रेस रिव्यू

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देश के सबसे पुराने मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद और बीजेपी के बीच बढ़ती नजदीकियां चर्चा का विषय बनती जा रही हैं.
'द हिंदू' ने अपने एक विश्लेषण में कहा है कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद बगैर कोई शोर किए चुपचाप बीजेपी के साथ रिश्ते अच्छे करने में लगा है.
अख़बार ने लिखा है कि जमीयत-उलेमा-ए-हिंद बग़ैर किसी औपचारिक एलान या चुनाव में खुलेआम समर्थन का प्रदर्शन किए बगैर बीजेपी को समर्थन देता आ रहा है. चाहे वह पीएफआई पर बैन का मामला हो या यूपी में गैर सरकारी मदरसों के सर्वेक्षण का. हालांकि ज्यादातर मामलों में इसने बीजेपी का चुपचाप समर्थन किया है.
'द हिंदू' में छपे विश्लेषण में कहा गया है कि जब देश में पीएफआई की दफ्तरों और इमारतों पर छापे पड़ रहे थे और इसके सैकड़ों नेताओं की गिरफ्तारी हो रही थी तो जमीयत ने चुप्पी साध ली. जमीयत के एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ''ऐसा लग रहा था जैसे मुगलकाल के आखिरी वक्त में मोहम्मद शाह रंगीला चुप्पी साध लेते थे.''
यहां तक कि जमात-ए-इस्लामी ने भी निष्पक्षता की पारदर्शिता की मांग की. लेकिन जमीयत ने हाथ झाड़ लिया. जमीयत के प्रवक्ता ने कहा, ''न तो हम उनके साथ हैं और न ही उनके खिलाफ़. कानून को अपना काम करने दीजिए.''

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मदरसों के सर्वे को समर्थन

यूपी में योगी सरकार की ओर से मदरसों के सर्वे के कदम पर तो जमीयत का रुख और भी चौंकाने वाला था.
इस मामले में जमीयत के चीफ अरशद मदनी ने तुरंत अपना रुख बदलते हुए न सिर्फ सर्वे का समर्थन किया बल्कि यह भी कहा कि अगले साल दारुल उलूम देवबंद में सिर्फ उन्हीं को दाखिला मिलेगा, जिन्होंने सीबीएसई से दसवीं पास की हो.
उसने कहा, ''सर्वे को लेकर अब तक जो स्थिति सामने आई है उसमें डर या आशंका जैसी कोई बात नहीं है.''
जमीयत का ये बयान दिल्ली में उसकी इस बैठक के बाद आया, जिसमें उत्तर प्रदेश के अलग-अलग मदरसों के लगभग 200 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था. इस मीटिंग में संगठन ने 'किसी भी कीमत पर इन मदरसों को बचाने' का वादा किया था. उसने कहा था मदरसों का सर्वे बुरी नीयत से किया जा रहा है.

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अख़बार लिखता है कि जमीयत के इस मौजूदा रुख पर 2019 में संसद में पारित सीएए बिल को इसके जनरल सेक्रेट्री महमूद मदनी के समर्थन की याद दिला दी. मदनी ने उस समय गृह मंत्री के उस बयान का समर्थन किया था कि इस बिल का हिंदुस्तान के मुसलमानों का कोई लेना-देना नहीं है.
लेकिन जब इसके खिलाफ शाहीन बाग में आंदोलन हुआ था तो मदनी सीएए का विरोध करने वाले बुद्धिजीवियों में शामिल हो गए. इसके बाद वो मोहन भागवत से भी मिलने चले गए.
इससे पहले अरशद मदनी आरएसएस दफ्तर में भागवत से मिलने की वजह से आलोचना के घेरे में आ चुके थे. बहरहाल जमीयत का बदला हुआ यह रुख सबको चौंका रहा है.
आज़ादी के बाद से यह कांग्रेस का समर्थन करता रहा था. यूपी में ये समाजवादी पार्टी को समर्थन देता रहा था लेकिन फिलहाल यह बीजेपी से नज़दीकियां बढ़ाता दिख रहा है.

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उत्तराखंड में सरकार और बीजेपी में बदलाव की आहट

उत्तराखंड में अंकिता भंडारी की हत्या के खिलाफ बढ़ रहे विरोध और भर्ती घोटाले के बाद बीजेपी प्रदेश सरकार और पार्टी इकाई में बदलाव की तैयारी करती दिख रही है.
'इंडियन एक्सप्रेस' में छपी रिपोर्ट में सरकार में बदलाव करने की पार्टी की योजना का जिक्र किया गया है. लेकिन इसमें सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि पार्टी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को नहीं बदलेगी.
अख़बार के मुताबिक हाल में धामी दिल्ली आए थे और बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन सचिव बीएल संतोष से उनकी लंबी बातचीत हुई थी. लेकिन इसके बाद संतोष उत्तराखंड पहुंचे और उन्हें वहां पार्टी के अलग-अलग खेमों के नेताओं से बात की.

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अखबार ने धामी के नजदीकी नेताओं के हवाले से लिखा है कि मुख्यमंत्री इस मौके को सरकार और पार्टी में 'परेशान करने वाले तत्वों' से निजात पाने के तौर पर देख रहे हैं. वहीं धामी के आलोचकों का कहना है कि धामी इस संकट का इस्तेमाल कर अपने नज़दीकियों को सरकार में अहम पदों पर बिठाना चाहते हैं.
इस रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा है कि धामी जल्द ही अपनी कैबिनेट में बदलाव करेंगे और बीजेपी की उत्तराखंड इकाई में भी परिवर्तन के संकेत हैं. लेकिन पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व फिलहाल उत्तराखंड बीजेपी अध्यक्ष महेंद्र भट्ट को बदलने के मूड में नहीं है.
उत्तराखंड में बीजेपी के पूर्व मंत्री विनोद आर्या के बेटे के रिसॉर्ट में काम करने वाली अंकिता भंडारी की हत्या के बाद लोगों के विरोध प्रदर्शन ने पार्टी को परेशान कर दिया है. कांग्रेस इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठा रही है. बीजेपी ने दोनों को पार्टी से निकाल दिया है. लेकिन पार्टी के ही कुछ नेताओं ने इस मुद्दे पर सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया पर सवाल उठाया है. सूत्रों का कहना है कि जब इस मामले पर लोगों की प्रतिक्रिया तेज़ हुई तभी सरकार हरकत में आई.
पुष्कर सिंह धामी को इस साल चुनाव से छह महीने पहले सीएम बनाया गया था. उन्हें तीरथ सिंह रावत की जगह पर सीएम बनाया गया था. इसके बाद पार्टी की जीत के बाद उन्हें दोबारा सीएम बनाया गया. पिछले दिनों धामी दिल्ली पहुंच कर पार्टी नेतृत्व से कह चुके थे कि राज्य इकाई में बदलाव जरूरी है.

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गुजरात में किसानों को लुभाने की कोशिश में बीजेपी

गुजरात में चुनाव से पहले बीजेपी और आम आदमी पार्टी ने अपना अभियान तेज़ कर दिया है. गुजरात में बीजेपी ने किसानों पर फोकस करना शुरू किया है वहीं केजरीवाल ने कहा है कि अगर आम आदमी पार्टी सत्ता में आई तो वह गुजरात के हर गांव में सरकारी स्कूल खोलेगी.
पिछले महीने जेपी नड्डा ने पार्टी की ओर से वहां 'नमो किसान पंचायत' शुरू की थी. हिन्दुस्तान टाइम्स की ख़बर के मुताबिक ये अभियान किसानों को फायदा पहुंचाने वाली सरकार की स्कीमों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए शुरू किया गया है.
अखबार ने लिखा है कि 2017 में जब पार्टी की सीटें 115 से गिर कर 99 पर पहुंच गईं तो इसकी वजह पाटीदारों की नाराज़गी मानी गई. माना गया कि पाटीदार जीएसटी से नाराज़ थे लेकिन यह भी कहा जा रहा है कि किसानों की सामने आ रही दिक्कतें भी इसकी वजह हैं.
इस साल की शुरुआत में बिजली की पर्याप्त सप्लाई न होने पर किसानों ने आंदोलन किया था. कई फसलों की कम कीमत मिलने पर भी किसान विरोध कर रहे थे. किसान नमक का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी मांग रहे हैं.
अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक अरविंद केजरीवाल भगवंत सिंह मान के साथ गुजरात का दौरा कर रहे हैं. दो दिनों के दौरे के दौरान उन्होंने कच्छ ज़िले में रैली की.
उन्होंने कहा, ''दिल्ली में लोगों ने आम आदमी की सरकार बनवाई तो हमने वहां के सरकारी स्कूलों को बदल दिया. लेकिन मैंने सुना है कि बीजेपी कच्छ में सरकारी स्कूलों को बंद कर रही है. अगर आप सत्ता में आई तो वह गुजरात के हर गांव में सरकारी स्कूल खोलेगी.''
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