उत्तराखंड: भर्तियों में अनियमितता, मंत्रियों के क़रीबियों को नौकरी पर सवाल

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- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तराखंड के सबसे लोकप्रिय गायकों, गीतकारों में से एक नरेंद्र सिंह नेगी ने नेताओं पर एक व्यंग्य गीत गाया है- 'मार ताणी आखिरी दौं'. इसमें वोट मांगने पहुंचे नेता से लोग चुनाव जीतने के बाद अपने बच्चों का ख़्याल रखने की बात करते हैं तो नेता कहता है कि 'पहले अपनों को लगाऊंगा, तुम देखते रहना'.
गढ़ रत्न कहे जाने वाले नेगी का यह व्यंग्य उत्तराखंड में आजकल नंगे सच की तरह दिखाई दे रहा है.
दो पूर्व विधानसभा अध्यक्ष मान रहे हैं कि उन्होंने बिना कोई विज्ञप्ति निकाले विधानसभा सचिवालय में मंत्रियों के नज़दीकियों और अपने ही बेटे-बहू तक को नौकरी दे दी है.
विपक्ष के हमलावर होने और सोशल मीडिया पर लगातार आलोचना के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने विधानसभा सचिवालय में सभी नियुक्तियों की जांच की सिफ़ारिश करने की बात की है.
UKSSSC भर्ती में अनियमितता की आग से सुलगा मामला
उत्तराखंड के अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) की स्नातक स्तरीय परीक्षा के पेपर लीक होने की जांच उत्तराखंड की एसटीएफ़ कर रही है.
इसकी जांच के दौरान एसटीएफ़ को पहले आयोजित की गई कई परीक्षाओं में धांधली की जानकारी मिली जिसके बाद और भी कई परीक्षाओं की जांच शुरू की गई.
रोज़गार के लिए युवाओं का पलायन उत्तराखंड का सबसे बड़ा मुद्दा है और इसी को रोकने के लिए अलग राज्य का आंदोलन हुआ था. ऐसे में नौकरियों में घोटालों का मुद्दा मेनस्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया में छाया हुआ है.
सोशल मीडिया में पत्रकार और अन्य लोग विधानसभा सचिवालय में 'बैक-डोर भर्तियों' की भी जांच करवाने की मांग करने लगे.
लोगों की भावनाओं को समझते हुए कांग्रेस ने इस मुद्दे को लपक लिया और 25 अगस्त को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष करन माहरा के नेतृत्व में पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल को एक ज्ञापन देकर भर्तियों में गड़बड़ियों की सीबीआई जांच करवाने की मांग की.
इसके बाद पत्रकारों से बातचीत में करन माहरा ने दावा किया कि पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल ने नेताओं के चहेतों को रेवड़ी की तरह नौकरियां बांटीं.
उन्होंने कहा कि पूर्व कैबिनेट मंत्री और पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक के पीआरओ, कैबिनेट मंत्री रेखा आर्या के पीआरओ, भाजपा के संगठन महामंत्री अजेय कुमार के पीआरओ और मुख्यमंत्री के दो ओएसडी की पत्नी को विधानसभा में नौकरी दी गई है.
माहरा ने यह भी कहा कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की विधानसभा में मात्र 543 कर्मचारी-अधिकारी कार्यरत हैं जबकि वहां 403 विधानसभा सीट हैं. इसके विपरीत उत्तराखंड की 70 सीट वाली विधानसभा में कर्मचारियों की संख्या 560 पार कर गई है.

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स्पीकर के विशेषाधिकार से की भर्तियां
27 अगस्त को पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और मौजूदा कैबिनेट मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल बीजेपी ऑफ़िस पहुंचे तो इस मुद्दे पर पत्रकारों ने उन्हें घेर लिया.
सवालों के जवाब में उन्होंने माना कि उन्होंने कई मंत्रियों के नज़दीकियों को विधानसभा सचिवालय में नौकरी दी है. साथ ही कहा कि यह अस्थायी व्यवस्था है और संविधान के तहत विधानसभा अध्यक्ष को इसका अधिकार होता है.
एक सवाल के जवाब में अग्रवाल ने यह भी माना कि विधानसभा में शोध विभाग के उप-सचिव को चंद महीने में तीन प्रमोशन देकर सचिव बना दिया गया. उन्होंने फिर कहा कि विधानसभा अध्यक्ष को शिथिलता (नियम में छूट देने) का अधिकार होता है और उन्होंने उसी का इस्तेमाल किया.
प्रेमचंद अग्रवाल ने यह भी कहा कि ऐसा (बिना विज्ञप्ति जारी किए भर्ती और नेताओं के चहेतों की भर्ती) कोई पहली बार नहीं हुई है. उन्होंने कहा, "ऐसा पहले भी होता रहा है और उत्तराखंड विधानसभा के इतिहास में पहली बार उनके कार्यकाल में 35 पदों की भर्ती के लिए परीक्षा आयोजित की गई है."
हालांकि यह मामला अभी हाईकोर्ट में है और इसलिए 'ज़रूरत पड़ने पर' 72 लोगों की तदर्थ भर्ती की गई.

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गोविंद कुंजवाल ने दी थी बेटे-बहू को नौकरी
कांग्रेस विधानसभा सचिवालय में 'मनमाने तरीके' से भर्ती को लेकर बीजेपी पर हमलावर हुई तो बीजेपी ने भी कांग्रेस का 'कच्चा-चिट्ठा' खोलना शुरू कर दिया.
बीजेपी ने नेताओं ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के क़रीबी पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद कुंजवाल के कार्यकाल में कथित तौर पर भर्ती हुए उनके नज़दीकियों की सूची जारी कर दी.
इस सूची में कुंजवाल के बेटे और बहू का भी नाम है. कुंजवाल ने यह स्वीकार भी किया कि उन्होंने अपने बेटे-बहू को नौकरी पर लगाया था. उन्होंने कहा कि वह दोनों बेरोज़गार थे इसलिए उन्होंने उन्हें नौकरी दी.
उन्होंने प्रेमचंद अग्रवाल की तर्ज पर यह भी कहा कि विधानसभा अध्यक्ष को भर्ती करने का अधिकार होता है और इसके तहत ही सभी भर्तियां की गईं. इसके अलावा उन्होंने अग्रवाल की एक और बात को दोहराया कि ऐसा पहले भी होता रहा है.
कुंजवाल के अनुसार राज्य के पहले विधानसभा अध्यक्ष प्रकाश पंत से ही ऐसा शुरू हो गया था. पूर्व के कई मुख्यमंत्रियों ने अपने परिवार के लोगों को भी विधानसभा में नियुक्ति देने की सिफारिश की थी क्योंकि यह परिपाटी शुरू से चली आ रही है.

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राहुल गांधी का दखल और सीएम की जांच की सिफ़ारिश
इस मामले में एक नया मोड़ तब आया जब 27 अगस्त को पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी फ़ेसबुक पोस्ट में उत्तराखंड में नौकरियों में अनियमितता का ज़िक्र कर दिया.
राहुल गांधी ने लिखा भाजपा सरकार में ग़रीब और मध्यम वर्ग के हिस्से की नौकरी पैसा लेकर अमीरों और सरकार के क़रीबी लोगों को बेची जा रही है.
इस पोस्ट में लिखा गया कि नौकरियों में भ्रष्टाचार उत्तराखंड की विधानसभा तक आ पहुंचा है. भर्ती पर भर्ती, परीक्षा पर परीक्षा रद्द हो रही है और मुख्यमंत्री सिर्फ जांच के आदेश देकर अपनी नाकामी से पल्ला झाड़ रहे हैं.
राहुल गांधी के पोस्ट के बाद 28 अगस्त को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि सरकारी नौकरियों में धांधलेबाज़ी करने वाले व्यक्ति कितने भी प्रभावशाली क्यों न हो, किसी को छोड़ा नहीं जाएगा.
विधानसभा में भर्तियों को लेकर उठाए जा रहे सवालों को लेकर मुख्यमंत्री ने कहा कि वह विधानसभा अध्यक्ष (ऋतु खंडूड़ी) से आग्रह करेंगे कि विधानसभा में हुई सभी भर्तियों की जांच की जाए. सरकार इसमें पूरा सहयोग करेगी.

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'ऐसे ही लगनी चाहिए नौकरियां तो...'
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद कुंजवाल के समय नौकरियों के लिए दिए गए आवेदन पत्र और उनमें नियुक्ति के आदेश के कई पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हैं.
ज़्यादातर का मज़मून एक जैसा है... सादे क़ाग़ज़ पर अपना नाम, क्वालिफ़िकेशन और आर्थिक स्थिति की जानकारी देकर विधानसभा में किसी भी पद पर नौकरी लगाने का आवेदन किया गया है.
वरिष्ठ पत्रकार योगेश भट्ट कहते हैं कि आदर्श स्थिति में तो नौकरियां ऐसे ही लगनी चाहिए. जिसकी जो योग्यता हो, उसे वह नौकरी मिल जाए.
लेकिन क्या यह संभव है? अगर ऐसा हो तो फिर ये UKSSSC, राज्य और केंद्र की सिविल सेवा परीक्षाओं की ज़रूरत ही न रहे. फिर न अनियमितताएं होंगी और न युवा निराश होंगे.
लेकिन जब छोटी से छोटी नौकरी के लिए पूरी प्रक्रिया अपनाई जाती है तो यहां क्यों नहीं अपनाई गई. ऐसा लग रहा है कि यूं ही चलते-फिरते किसी ने आवेदन दे दिया और उसकी नौकरी लग गई.
भट्ट कहते हैं कि चिंताजनक बात ये है कि ऐसा उस जगह हो रहा है जहां से राज्य के लिए विधान बनता है. जब विधानसभा में ऐसा हो रहा है तो फिर बाकी नौकरियों में घपलों की बात उठाने का कोई मतलब ही कहां रह जाता है?

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नौकरी न मिलने पर आत्महत्या
बता दें कि जिस दिन प्रेमचंद अग्रवाल विधानसभा अध्यक्ष के विशेषाधिकार का हवाला देकर मंत्रियों के चहेतों को नौकरी देने की बात खम ठोककर कह रहे थे और यह भी दावा कर रहे थे कि उप-सचिव को तीन महीने में तीन प्रमोशन देकर (ताकि उन्हें विधानसभा सचिव बनाया जा सके) उन्होंने किसी नियम का उल्लंघन नहीं किया उसी दिन पौड़ी के सतपुली में एक युवक ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी.
बताया जा रहा है कि 23 साल का सुमित कुमार कोटद्वार में हुई अग्निवीर की भर्ती में सफल नहीं हो पाया था और इसलिए बेहद निराश था.
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