बिहार: अमित शाह के सीमांचल दौरे के क्या हैं सियासी मायने?

अमित शाह

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    • Author, विष्णु नारायण
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

बिहार प्रांत के सीमावर्ती ज़िले बीते कई दिनों से सुर्खियों में हैं. एक तरफ इस इलाक़े के अलग-अलग ज़िलों में राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया के कथित ठिकानों पर छापेमारियां कर रही है, तो वहीं दूसरी तरफ सूबे के सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाजी जारी है. इस बीच देश के गृह मंत्री 'अमित शाह' का पूर्णिया और किशनगंज दौरा भी हो रहा है.

वैसे तो पूर्णिया या किशनगंज जैसे ज़िले सूबे का ही हिस्सा हैं, लेकिन कई लोगों के मन में ऐसे तमाम सवाल हैं कि देश के गृह मंत्री और मोदी के क़रीब माने जानेवाले अमित शाह प्रदेश की राजधानी के बजाय सीमावर्ती ज़िले में जनसभा क्यों कर रहे हैं?

सवाल पूछे जा रहे हैं, अगर वे सूबे की राजधानी से 300 किलोमीटर दूर किसी जनसभा को संबोधित करेंगे तो क्या कुछ बोलेंगे? किस पर हमलावर होंगे और किसे साधने की करेंगे कोशिश?

ऐसे तमाम सवालों के जवाब जानने के लिए बीबीसी की टीम भी पूर्णिया के रंगभूमि मैदान पहुंची जहां गृह मंत्री अमित शाह की आम जनसभा शुक्रवार 23 सितंबर को प्रस्तावित थी.

जनसभा के लिए गृह मंत्री के स्थल पर पहुंचने से पहले बोलने वाले तमाम वक्ताओं ने जहां नीतीश कुमार को पाला बदलने के लिए आड़े हाथों लिया, वहीं प्रदेश भाजपा के नेताओं में शुमार किए जाने वाले सूबे के पूर्व उप मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद सुशील मोदी तो बोलते-बोलते यह भी बोल गए कि वो दिन दूर नहीं जब सीमांचल के चारों ज़िलों में हिन्दु समुदाय अल्पसंख्यक हो जाएगा.

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अमित शाह मंच पर लगभग दोपहर एक बजे पहुंचे. जब उन्होंने बोलना शुरू किया तो भाषण की शुरुआत में उन्होंने बिहार के सियासी उठापटक और लालू प्रसाद यादव पर तंज कसा.

उन्होंने कहा, "मेरे यहां (सीमांचल) आने से लालू-नीतीश की जोड़ी के पेट में दर्द हो रहा है. वो कह रहे हैं कि मैं यहां झगड़ा लगाने आया हूं. वो कह रहे हैं कि कुछ करके जाएंगे. भई, झगड़ा लगाने के लिए मेरी ज़रूरत नहीं है. लालू जी पर्याप्त हैं. आपने पूरे जीवन यही काम किया है."

अमित शाह बोले, "सीमावर्ती ज़िलों के मेरे भाइयों-बहनों मैं यह ज़रूर कहने आया हूं कि लालू-नीतीश की जोड़ी के कारण पूरे बिहार में और विशेषकर सीमावर्ती जिलों में डर का माहौल है. ये ज़िले हिन्दुस्तान का हिस्सा हैं. किसी को डरने की जरूरत नहीं है. क्योंकि यहां पर नरेंद्र मोदी सरकार है."

अमित शाह अपने पूरे भाषण में न सिर्फ नीतीश कुमार पर हमलावर दिखे, बल्कि वे लालू प्रसाद को भी आगाह करते दिखे. उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार को सिर्फ कुर्सी से प्यार है और इसके मोह में उन्होंने सभी को ठगा है, चाहे वो जय प्रकाश नारायण हों या फिर जॉर्ज फर्नांडिज़, चाहे वो शरद यादव या जीतन राम मांझी हों या फिर खुद लालू प्रसाद. भाजपा तो ठगी गई ही है."

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2024 के आम चुनावों की तैयारी

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वैसे तो अमित शाह आज से लगभग दो महीने पहले भी सूबे में आए थे लेकिन तब और अब में बहुत बड़ा फर्क है. तब भाजपा केन्द्र के साथ राज्य की सत्ता में भी सहभागी थी.

अब जब वो विपक्ष के नेता के तौर पर सीमांचल के दौरे पर आए हैं, भाजपा के नेतागण इस बात को कई बार मंच से बोलते दिखे कि प्रदेश की सरकार और संबंधित शासन-प्रशासन अमित शाह की रैली में आने वाली बसों को रोकने की कोशिश कर रही है.

अमित शाह ने अपने भाषण में जहां नई सरकार के गठन होते ही सूबे में क़ानून व्यवस्था के चरमराने की बात कही, वहीं 2024 में लालू-नीतीश के सूपड़ा साफ करने का दावा भी कर दिया.

हालांकि अमित शाह के भाषण पर सूबे के उप मुख्यमंत्री व राजद नेता तेजस्वी यादव ने कहा, "आप ही के विभाग से आंकड़ा निकाला गया है. दिल्ली का क्राइम बिहार से अधिक है. आप जहां बैठते हैं, सोते हैं वो जगह सुरक्षित नहीं. देश की राजधानी सुरक्षित नहीं है और आप बिहार में लोगों को आकर बेवकूफ बनाते हैं. बिहार में तो डबल इंजन की सरकार थी तो फिर बिहार को नंबर वन क्यों नहीं बनाया?"

उन्होंने कहा कि बिहार के साथ भेदभाव किया जा रहा है. उन्होंने कहा, "शिक्षा विभाग में पैसे नहीं दिए जा रहे. ग्रामीण सड़कों के लिए पैसा नहीं दिया जा रहा. भाषण देखकर लगा कि भाई सच में कॉमेडी शो चल रहा है."

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वहीं जदयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने अमित शाह के दौरे को लेकर कहा कि उनके बिहार दौरे से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.

उन्होंने कहा, "अमित शाह भले ही कुछ कहें. लेकिन हमारे नेता ने जो काम किया है वो सब लोग जानते हैं. नीतीश कुमार पूरे विपक्ष को एकजुट करने में लगे हैं. दिल्ली जा रहे हैं, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात करेंगे. बिहार में 2024 का चुनाव मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चेहरे पर लड़ा जाएगा."

नीतीश कुमार

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सीमांचल का इलाक़ा

आम बोलचाल की भाषा में बिहार को पांच से छह हिस्सों में बांटकर देखा जाता है. सूबे का सीमांचल कहा जाने वाला हिस्सा भी उनमें से एक है. पूर्णिया, अररिया, कटिहार और किशनगंज जैसे चार ज़िले के इलाक़ों को मिलाकर सीमांचल कहा जाता है. हालांकि प्रशासनिक तौर पर ऐसी कोई भौगोलिक क्षेत्र अस्तित्व में नहीं है.

भाजपा के नेता पहले से ही इस इलाक़े को लेकर तरह-तरह की बातें कहते रहे हैं. हाल के दिनों में प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष संजय जायसवाल का अररिया-किशनगंज को लेकर दिया गया बयान भी सुर्खियों में था कि यहां लोग अधिक बच्चे पैदा कर रहे. उन्होंने इसकी तुलना इथियोपिया से की थी.

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भाजपा या अन्य दलों के लिए क्यों ज़रूरी है सीमांचल?

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इस इलाक़े में लोकसभा की चार सीटें पड़ती हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में किशनगंज को छोड़कर पूर्णिया, अररिया और कटिहार की सीटों पर एनडीए गठबंधन ने जीत हसिल की थी.

हालांकि तब भाजपा और जदयू के साथ लोजपा भी थी. लेकिन बदले सियासी समीकरण के लिहाज़ से क्या अब भाजपा के लिए इस इलाक़े में सीटें जीतना अब आसान होगा, इस सवाल पर पूर्णिया के स्थानीय पत्रकार बसु मित्र कहते हैं कि यहां पार्टी का जनाधार कम होता गया है.

वो कहते हैं, "पिछले दौर की बात करें तो यहां बीजेपी के लोग जीतते थे, लेकिन धीरे-धीरे यहां बीजेपी का जनाधार कम होता गया. किशनगंज जैसी सीट तो बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गई है. शाहनवाज़ हुसैन के बाद वहां बीजेपी का कोई नेता नहीं जीता."

अमित शाह

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"वहीं राजद जैसे दूसरे दल भी सीमांचल में लगातार जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. विधानसभा चुनावों में जीत हासिल किए एआईएमआईएम के चार विधायकों को भी राजद ने पार्टी में शामिल करा लिया था. सीमांचल के दो विधायकों को प्रदेश मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है. बीजेपी के लिए इस इलाक़े में राजनीति अब आसान नहीं होगी. यहां ध्रुवीकरण आसान नहीं होगा. हालांकि उनकी पूरी कोशिश है कि उन्हें फिर से इस इलाक़े में कामाबी मिले. अमित शाह की रैली को आप साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव की रणभेरी भी मान सकते हैं."

इस जनसभा को लेकर की गई तैयारियों के बारे में बसु मित्र कहते हैं, "इस रैली को सफल बनाने के लिए बीजेपी और आरएसएस के बड़े नेताओं ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर केंद्रीय मंत्री गांव-गांव घूमते रहे. लोगों को बताते रहे कि बदली परिस्थितियों में सीमांचल के लिए बीजेपी ज़रूरी है और कैसे वो इस इलाक़े में विकास ला सकती है."

"खुद शाहनवाज़ हुसैन ने भी इस संदर्भ की बातें कहीं. लेकिन अमित शाह के भाषण ने कई लोगों को निराश किया. लोगों को कोई नई बात देखने-सुनने को नहीं मिली. जैसे अमित शाह ने पूर्णिया हवाई अड्डे की बात कही लेकिन ज़मीनी स्तर पर ऐसा कुछ भी नहीं है. ये मामला अभी भी ज़मीन अधिग्रहण के स्तर पर फंसा है."

एआईएमआईएम

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लोकसभा और विधानसभा में कौन कहां है?

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लोकसभा चुनावों के लिहाज़ से देखें तो सीमांचल में कुल चार सीटें हैं. किशनगंज से कांग्रेस नेता सांसद हैं, तो कटिहार और पूर्णिया से जदयू के सांसद हैं. यहां अररिया एकमात्र सीट है जो भाजपा के खाते में गई थी.

वहीं बात अगर विधानसभा सीटों की करें तो सीमांचल में कुल 24 सीटें हैं. एआईएमआईएम के चार विधायकों के राजद में शामिल होने और पार्टी के एकमात्र विधायक के भी महागठबंधन के साथ सियासी तौर पर खड़े होने के गहरे निहितार्थ हैं.

इसके अलावा बीते विधानसभा चुनाव में सीमांचल ही वो इलाक़ा था जिसकी वजह से जदयू प्रमुख नीतीश कुमार अपना सियासी वजूद बचाने में कामयाब रहे.

वहीं बात अगर विधानसभा चुनावों के आंकड़ों की करें तो इस वक्त सीमांचल की 18 सीटें महागठबंधन के पास हैं और आठ सीटें भाजपा के पास. पांच सीटें कांग्रेस और राजद के पास हैं, चार जदयू के पास तो एक-एक सीट भाकपा (माले) और एआई एमआईएम के पास है.

बिहार में चुनावी रैली

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सीमांचल के चारों ज़िलों का धार्मिक समीकरण

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बिहार के तमाम ज़िलों में वैसे तो हर जगह हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के लोग रहते हैं लेकिन सीमांचल के चार ज़िलों में इनकी संख्या सियासी तौर पर निर्णायक साबित होती है.

  • कटिहार में 54-55 फ़ीसदी हिन्दू हैं और 44-45 फ़ीसदी मुसलमान हैं.
  • अररिया में 56-57 फ़ीसदी हिन्दू हैं और 42-43 फ़ीसदी मुसलमान हैं.
  • पूर्णिया में 60-61 फ़ीसदी हिन्दू हैं और 38-39 फ़ीसदी मुसलमान हैं.
  • किशनगंज में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं. यहां 31-32 फ़ीसदी हिन्दू और 67-68 फ़ीसदी मुसलमान हैं.

स्रोत: साल 2011 की जनगणना

कोरोना वायरस
बिहार में चुनावी रैली

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आबादी के अनुपात के हिसाब से देखा जाए तो समझा जा सकता है कि भाजपा का नेतृत्व इस इलाक़े में होने वाली कथित घुसपैठ और क्राइम को लेकर सरकार पर हमलावर क्यों रहता है.

सूबे में पक्ष और विपक्ष की बदलती भूमिकाओं के इतर एक बात स्पष्ट है कि सीमांचल के भीतर गृह मंत्री अमित शाह की जनसभा से साल 2024 में होने वाले आम चुनाव का शंखनाद हो चुका है.

कांग्रेस जैसे दल जहां 'भारत जोड़ो' यात्रा के माध्यम से अपने कार्यकर्ताओं में जान फूंकने की कोशिश में लगे हैं. वहीं सूबे के भीतर सक्रिय क्षेत्रीय दल भी विपक्षी एकता की बात कहकर खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं.

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