यूक्रेन से लौटे भारतीय मेडिकल छात्र किस हाल में, अदालत से मिलेगी राहत?

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- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
रूस-यूक्रेन के बीच पिछले सात महीनों से जंग जारी है. इस जंग के बीच यूक्रेन से हज़ारों भारतीय छात्रों को अपनी मेडिकल की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर भारत लौटना पड़ा.
छात्रों की ये वतन वापसी आसान नहीं रही. बम धमाकों के बीच फंसे भारतीयों को निकालने के लिए भारत सरकार ने ऑपरेशन गंगा चलाया. भारत सरकार के चार मंत्री यूक्रेन के पड़ोसी देश में तैनात किए गए. कुल 90 फ्लाइट्स की मदद से 22 हज़ार 500 भारतीयों को यूक्रेन से भारत लाया गया.
वतन वापस लौटने वालों में ज़्यादातर वे छात्र थे जो यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे. इनमें कोई फ़र्स्ट ईयर का छात्र था तो किसी को एमबीबीएस की डिग्री बस मिलने ही वाली थी.
वापस लौटने के सात महीनों के बाद भी छात्रों के सामने सिर्फ एक ही सवाल है और वो है कि उनकी पढ़ाई का आगे क्या होगा? उस सपने का क्या होगा जो उन्होंने यूक्रेन की मेडिकल यूनिवर्सिटी में दाखिला लेते समय देखा था.
हो सकता है कि आप ऑपरेशन गंगा के बाद यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई पढ़ रहे छात्रों को भूल गए हों, लेकिन ये छात्र पिछले सात महीनों से अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं. अब ये लड़ाई सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है.
सुप्रीम कोर्ट में इस पर 16 सितंबर को सुनवाई होगी. लेकिन इस बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफ़नामे में कहा है कि इन छात्रों को भारतीय विश्वविद्यालयों में जगह नहीं दी जा सकती क्योंकि नेशनल मेडिकल कमीशन ऐक्ट में ऐसा
करने का कोई प्रावधान नहीं है.
यूक्रेन से भारत लौटे मेडिकल छात्रों के लिए केंद्र का ये हलफ़नामा एक बड़ा झटका है.
केंद्र ने अपने हलफ़नामे में ये भी कहा ऐसे रिलैक्सेशन से भारत में मेडिकल शिक्षा का स्तर प्रभावित होगा.
एफ़िडेविट में कहा गया है कि, ''ये छात्र दो कारणों से विदेश गए थे - नीट में ख़राब प्रदर्शन और सस्ती शिक्षा की वजह से. ख़राब मेरिट वाले छात्रों को भारत के प्रीमियर मेडिकल कॉलेजों में दाखिला देने से दूसरी तरह की क़ानूनी समस्याएं पैदा होंगी. साथ ही ये छात्र यहां की फ़ीस का ख़र्च भी वहन नहीं कर पाएंगे.''
आइये समझते हैं कि इन छात्रों की मांगें और ये पूरी क़ानूनी लड़ाई क्या है.
'हम युद्ध पीड़ित हैं'

रूस-यूक्रेन युद्ध से क़रीब 20 हजार भारतीय मेडिकल छात्र प्रभावित हुए हैं. इन्हीं में से एक हैं केरल की रहने वाली अपर्णा वेणुगोपाल. ओडेसा नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी की छात्रा अपर्णा वेणुगोपाल ने साल 2017 में नीट की परीक्षा पास की थी. अपर्णा मेडिकल की पढ़ाई में तीन साल पूरे कर चुकी हैं. भारत लौटने के बाद उनकी पढ़ाई पूरी तरह से बंद है.
बीबीसी से बातचीत में अपर्णा कहती हैं, "यूक्रेन में छह साल की एमबीबीएस होती है. शुरू के तीन साल में पढ़ाई नॉन क्लीनिकल होती है, उसमें प्रैक्टिकल नहीं होते. ऐसे में ऑनलाइन पढ़ाई हो सकती है, लेकिन इसके बाद पढ़ाई के दौरान प्रैक्टिकल होते हैं तो ऑनलाइन पढ़ाई से संभव नहीं है. अब मैं कैसे पढ़ाई कर पाऊंगी, मुझे कुछ भी नहीं पता."
अपर्णा बताती हैं कि भारत में प्राइवेट कॉलेज में मेडिकल की पढ़ाई काफी महंगी है, जबकि यूक्रेन में 25 लाख रुपये तक में आसानी से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी हो जाती है. वो कहती हैं, "जब सरकार को हमारी पढ़ाई की कोई चिंता ही नहीं है तो फिर उन्होंने हमें यूक्रेन से बाहर क्यों निकाला. हम युद्ध पीड़ित हैं. सरकार को हमारी मदद करनी चाहिए और हमें भारत के मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिया जाना चाहिए."

'क्लास की जगह युद्ध शुरू हो गया'

ऐसी ही कहानी बिहार में औरंगाबाद के रहने वाले सौरभ कुमार सिद्धार्थ की है. सौरभ के पिता पेशे से किसान हैं. घर में पांच बीघा ज़मीन है जिस पर धान लगाते हैं. पिता ने बेटे को डॉक्टर बनाने के लिए रिश्तेदारों से क़र्ज़ लिया और इस साल फ़रवरी महीने में बेटे को एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए यूक्रेन भेज दिया.
सौरभ बताते हैं, "यूक्रेन की खारकीएव नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी में ऐडमिशन लेने के लिए पिता ने 9 हज़ार डॉलर रुपये खर्च किए. ये ख़र्च एक साल का था. मैं 14 फ़रवरी को यूक्रेन पहुंचा. 24 फ़रवरी को क्लास शुरू होनी थी, लेकिन क्लास की जगह युद्ध शुरू हो गया और मुझे 8 मार्च को ही मजबूरी में भारत लौटना पड़ा."
सौरभ फ़र्स्ट ईयर के छात्र हैं जो क़रीब सात लाख रुपये खर्च कर चुके हैं. इतना पैसा खर्च करने के बाद भी भविष्य का क्या होगा उन्हें कुछ नहीं पता. सौरभ अपनी मुश्किल लेकर स्थानीय सांसद और ज़िलाधिकारी के पास भी गए, लेकिन मदद के नाम पर उन्हें सिर्फ़ आश्वासन ही मिला.
सौरभ ने पहला सेमेस्टर ऑनलाइन ही पूरा किया और अब सितंबर से दूसरा सेमेस्टर शुरू होने वाला है जो फ़रवरी 2023 तक चलेगा.
युद्ध रुकने और यूक्रेन वापसी के सवाल पर सौरभ कहते हैं, "मां का 2015 में देहांत हो गया, पिता अकेले हैं और डरे हुए हैं. वापसी अब मुश्किल है. अगर पैसे नहीं दिए होते तो किसी और देश के मेडिकल कॉलेज में दाखिला ले लेता, लेकिन अब बुरी तरह से फंस गया हूं."
ये कहानी महज़ अपर्णा और सौरभ की ही नहीं है. ऐसे हज़ारों छात्र हैं जो अपनी मेडिकल की पढ़ाई को लेकर बीच मझधार में फंसे हुए हैं.

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

यूक्रेन से मेडिकल की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर आने वाले छात्रों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में 12 रिट पिटीशन और तीन जनहित याचिकाएं दायर की गई हैं. सुप्रीम कोर्ट ने सभी 12 रिट पिटीशन को एक साथ मिला दिया है जिस पर सुनवाई होनी है.
इसमें से एक रिट पिटीशन 'पेरेंट्स एसोसिएशन ऑफ़ यूक्रेन एमबीबीएस स्टूडेंट्स' की तरफ़ से लगाई गई है. याचिका में छात्रों को भारत के मेडिकल कॉलेज में दाखिला देने की गुहार लगाई गई है.
इस एसोसिएशन के अध्यक्ष आर बी गुप्ता ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "हमने मार्च में एसोसिएशन बनाया ताकि हम अपनी बात सरकार तक पहुंचा सकें. मार्च में छात्रों को भारतीय मेडिकल कॉलेज में देने का मुद्दा संसद में भी उठा, लेकिन कुछ नहीं हुआ."
"अप्रैल में हम लोग शिक्षा मंत्री धर्मेंद प्रधान और स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया से भी मिलने गए. मई में सिग्नेचर कैंपेन चलाया, जून में जंतर मंतर पर भूख हड़ताल की, जुलाई में रामलीला मैदान में चार दिन की भूख हड़ताल की. क़रीब 500 छात्रों के परिवार वालों ने इसमें हिस्सा लिया. इसके बाद जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई."
आख़िर में पेरेंट्स एसोसिएशन ऑफ़ यूक्रेन एमबीबीएस स्टूडेंट्स ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. एसोसिएशन ने यूक्रेन से लौटी बेंगलुरु की छात्रा भूमिका पटनायक को मुख्य याचिकाकर्ता बनाया है.
आर बी गुप्ता के मुताबिक़ 500 से ज्यादा छात्रों ने वकालतनामे पर हस्ताक्षर किए हैं. छात्रों की मुख्य मांग है कि उनकी बची हुई मेडिकल की पढ़ाई भारत में पूरी कराई जाए.
पेरेंट्स एसोसिएशन ऑफ़ यूक्रेन एमबीबीएस स्टूडेंट्स के अध्यक्ष आर बी गुप्ता कहते हैं कि ''देश में क़रीब 600 मेडिकल कॉलेज हैं और क़रीब 20 हज़ार बच्चे यूक्रेन से लौटे हैं. सभी छात्र नीट की परीक्षा पास करके ही यूक्रेन गए थे, अगर एक कॉलेज में पांच बच्चों को भी शिफ़्ट कर दिया जाए तो समस्या आसानी से सुलझ सकती है और भारत के भविष्य को बचाया जा सकता है.''
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क्या है मोबिलिटी प्रोग्राम?

6 सितंबर को भारत के नेशनल मेडिकल कमीशन ने यूक्रेन से वापस आने वाले छात्रों को राहत देते हुए मोबिलिटी प्रोग्राम को हरी झंडी दी है. मोबिलिटी प्रोग्राम के तहत यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्र किसी दूसरे देश की मेडिकल यूनिवर्सिटी में अपनी पढ़ाई पूरी कर सकते हैं.
ये व्यवस्था टेंपररी तौर पर की गई है. इस प्रोग्राम के तहत बच्चों को एमबीबीएस की डिग्री यूक्रेन की यूनिवर्सिटी से ही मिलेगी.
मोबिलिटी प्रोग्राम का लाभ उठाने के लिए यूक्रेन की मेडिकल यूनिवर्सिटीज़ को अपने स्तर पर दुनियाभर की यूनिवर्सिटीज़ से क़रार करने होंगे जिसके बाद छात्र उन देशों में कुछ समय के लिए अपनी पढ़ाई जारी रख सकते हैं.
इस प्रोग्राम का सबसे ज़्यादा फ़ायदा आख़िरी वर्ष के छात्रों को होगा. ऐसे छात्र अपने बच्चे हुए एक साल की पढ़ाई किसी दूसरे देश में पूरी कर यूक्रेन की यूनिवर्सिटी से अपनी डिग्री ले सकते हैं.
वहीं भारतीय छात्रों को यूक्रेन के मेडिकल कॉलेज भेजने वाले एजुकेशन सेंटर्स का कहना है कि नेशनल मेडिकल कमीशन को मोबिलिटी प्रोग्राम के तहत भारत की प्राइवेट मेडिकल यूनिवर्सिटीज को भी छूट देनी चाहिए जिससे भारत के छात्र भारत में ही रहकर अपनी पढ़ाई पूर कर लें और अपनी डिग्री यूक्रेन की यूनिवर्सिटी से हासिल कर लें.
नोटिस से पहले तक विदेशों में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे छात्र अपने कॉलेज या यूनिवर्सिटी को छोड़कर दूसरी जगह ट्रांसफ़र नहीं ले सकते थे. यूक्रेन से लौटे छात्रों की मुश्किलों को देखते हुए एनएमसी ने ये फ़ैसला लिया है.
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मोबिलिटी प्रोग्राम को लेकर नाराज़गी

फ़ैसले की जहां एक तरफ़ तारीफ़ हो रही है, वहीं दूसरी तरफ़ कुछ छात्रों ने नाराज़गी भी ज़ाहिर की है. हरियाणा के रहने वाले कुलदीप यूक्रेन की डेनिप्रो स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी के छात्र हैं और अपनी तीन साल की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं.
कुलदीप बताते हैं, "यूक्रेन की जितनी भी यूनिवर्सिटी मोबिलिटी प्रोग्राम देने की बात कर रही हैं, उन्होंने सिर्फ़ एक ही यूनिवर्सिटी को चुना है. उसका नाम है जॉर्जिया नेशनल यूनिवर्सिटी. हज़ारों बच्चों को सिर्फ़ एक ही यूनिवर्सिटी में कैसे भेजा जा सकता है. ये असंभव है."
"हमें जॉर्जिया भेजने की बात कर रहे हैं. उस देश में भारत का दूतावास तक नहीं है. वहां हमारा जाना सुरक्षित नहीं है. वहीं यूक्रेन की कुछ यूनिवर्सिटीज़, यूक्रेन की ही दूसरी यूनिवर्सिटी में बच्चों को शिफ़्ट करने के लिए कह रही हैं."
कुलदीप जैसी ही परेशानी केरल की रहने वाली अपर्णा की भी है. अपर्णा को यूक्रेन की ही एक दूसरी मेडिकल यूनिवर्सिटी में पढ़ाई पूरी करने के लिए कहा जा रहा है जो अपर्णा के लिए इस वक्त संभव नहीं है.
नई यूनिवर्सिटी जाना कितना मुश्किल

कुछ छात्र यूक्रेन छोड़कर जॉर्जिया में एडमिशन ले रहे हैं, लेकिन उनके सामने भी चुनौतियां कम नहीं हैं. छात्रों का कहना है कि यूक्रेन छोड़कर जॉर्जिया, रोमानिया जैसे देशों में ऐडमिशन लेने पर अतिरिक्त फ़ीस देनी पड़ रही है और ये एक तरह से टेम्पररी व्यवस्था है. उन्हें वापस यूक्रेन शिफ़्ट कर दिया जाएगा.
आर बी गुप्ता के मुताबिक़, एक साल की पढ़ाई का जो ख़र्च यूक्रेन में पांच लाख रुपये आ रहा था वो अब नए किसी देश में जाने पर 9 लाख रुपये तक पहुंच रहा है. ऐसे में छात्रों के लिए इतना पैसा देना संभव नहीं है.
बिहार के रहने वाले सौरभ खारखीएव नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी में फ़र्स्ट ईयर के छात्र हैं. बीबीसी से बातचीत में सौरभ बताते हैं, "18 नवंबर 2021 के बाद जिन बच्चों ने यूक्रेन के मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया है वो इस मोबिलिटी प्रोग्राम का फ़ायदा नहीं उठा सकते हैं. ऐसे में हमारे लिए और मुश्किल पैदा हो गई है."
फ़र्स्ट ईयर के छात्रों की मांग है कि उन्हें भी भारत के ही मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिया जाए.
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यूक्रेन से लौटे छात्रों से वायदे

दो महीने पहले जुलाई में ओडिशा में कटक से बीजेडी सांसद भर्तृहरि महताब ने यूक्रेन से भारत लौटे मेडिकल छात्रों का मुद्दा संसद में उठाया था.
उन्होंने कहा था कि ''1930 में रंगून (आज का म्यांमार) और दूसरे देशों से लौटे छात्रों का भारतीय मेडिकल कॉलेजों में एक बार सेटलमेंट किया गया था. हालांकि उस समय मेडिकल की सीटें भी बहुत कम हुआ करती थी. उसी तरह 1947 में भी ढाका, कराची और लाहौर से आने वाले मेडिकल छात्रों को भी भारत के अलग-अलग कॉलेजों में दाखिला दिया गया था. उसी तरह यूक्रेन से लौटे छात्रों को भी सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों में दाखिला दिया जाना चाहिए.''
सड़क परिवहन राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह ने भी भारतीय छात्रों के लिए पोलैंड में पढ़ाई पूरी करने की बात कही थी. पोलैंड में भारतीय छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था, "अगर आपकी पढ़ाई पूरी नहीं हुई तो पोलैंड के जितने भी लोगों से मिला हूं, वो कह रहे हैं कि हम जितने भी बच्चे यूक्रेन में थे उनकी पढ़ाई करवाने का ज़िम्मा लेते हैं."
इतना ही नहीं विदेश मंत्री एस जयशंकर भी कई बार यूक्रेन से लौटे मेडिकल के छात्रों को दूसरे देशों में पढ़ाई पूरी करवाने की बात कह चुके हैं. बावजूद इसके हज़ारों छात्रों की पढ़ाई अधर में लटकी हुई है. छात्रों का इंतज़ार है तो सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले का जिससे उन्हें वापस किसी दूसरे देश में ना जाना पड़े और भारत में ही उनकी पढ़ाई पूरी हो जाए.
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