स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का क्यों नहीं हुआ दाह संस्कार, भू-समाधि से जुड़े नियम क्या हैं?

इमेज स्रोत, ANI
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हिंदुओं के सबसे बड़े धर्मगुरुओं में से एक स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने रविवार को आख़िरी सांस ली. उनका निधन मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर ज़िले में बने झोतेश्वर धाम में हुआ. वे शारदा पीठ के शंकराचार्य थे.
प्राण त्यागने के बाद शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का अंतिम संस्कार नहीं किया गया बल्कि उन्हें भू-समाधि दी गई.
सनातन धर्म में अंतिम संस्कार की अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं. इन प्रक्रियाओं में एक भू-समाधि है. भू-समाधि को लेकर लोगों के मन में कई सारे प्रश्न हैं, आख़िर भू-समाधि किसे दी जाती है, कैसे दी जाती है, ये परंपरा कितनी पुरानी है और इसका क्या महत्व है.
इन सभी सवालों को जानने के लिए बीबीसी ने हरिद्वार में हरि सेवा आश्रम में उदासीन बड़ा अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी हरि चेतनानंद और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी से बात की.

भू-समाधि क्या है?
सनातन धर्म में माना जाता है कि व्यक्ति का शरीर पंचतत्व से मिलकर बना है, इसमें भूमि, अग्नि, जल, वायु और आकाश शामिल हैं और मृत्यु के पश्चात शरीर वापस से पंचतत्व में मिल जाता है.
सनातन धर्म में मुख्यत: निधन के बाद व्यक्ति का अंतिम संस्कार किया जाता है जिसमें शरीर को अग्नि के हवाले कर दिया जाता है. इसे अग्नि संस्कार भी कहते हैं.
अग्नि संस्कार के अलावा भू-समाधि, जल समाधि और वायु समाधि भी दी जाती है. अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी के मुताबिक़, भगवान शिव और उनके अवतारों को मानने वालों को शैव कहते हैं. शैव पंथ के सात मुख्य अखाड़े हैं.
इसमें जूना, महानिर्वाणी, आह्वान, निरंजनी, आनंद, अटल, अग्नि अखाड़ा शामिल है. इन अखाड़ों के साधु-संतों को भू और जल समाधि दी जाती है. इसके अलावा वैष्णव पंथ और उदासीन संप्रदाय के साधु संतों का अग्नि संस्कार होता है.

इमेज स्रोत, Getty Images
साधु-संतों को भू-समाधि क्यों दी जाती है?
महामंडलेश्वर स्वामी हरि चेतनानंद के मुताबिक़, हर अखाड़े की अपनी परंपरा है और उसी के हिसाब से साधु-संतों को भू-समाधि दी जाती है.
हिंदू धर्म में सोलह संस्कार होते हैं. संन्यास के समय ही साधु संतों के सभी संस्कार पूरे हो जाते हैं, उनका अग्नि से संबंध ख़त्म हो जाता है. मृत्यु से पहले ही वे पिंडदान तक कर चुके होते हैं. यही वजह है कि उन्हें भू-समाधि दी जाती है.
महंत रविंद्र पुरी कहते हैं कि साधु-संतों को भू-समाधि इसलिए भी दी जाती है ताकि उनकी पूजा करने वाले निधन के बाद भी उनके दर्शन कर पाएं.

भू-समाधि कैसे दी जाती है
स्वामी हरि चेतनानंद बताते हैं कि शिव महापुराण में कैलाश संहिता है. संन्यास लेने से लेकर ब्रह्मलीन होने तक की सारी विधि कैलाश संहिता में दी हुई है. भू-समाधि देते समय इसका ध्यान रखा जाता है.
पार्थिव शरीर को पहले स्नान करवाया जाता है, फिर वैसे ही वस्त्र पहनाए जाते हैं जैसे गुरु धारण करते हैं. इसके बाद भस्म और माथे पर त्रिपुंड लगाया जाता है. भू-समाधि देने से पहले पार्थिव शरीर के साथ शोभायात्रा निकाली जाती है ताकि सभी भक्त दर्शन कर पाएं. आख़िर में पार्थिव शरीर को समाधि स्थल तक लाया जाता है.
सुखआसन और पद्मासन में साधु-संतों को भू-समाधि दी जाती है. समाधि देते वक्त उनका चेहरा उत्तर दिशा में यानी कैलाश पर्वत की तरफ़ किया जाता है. समाधि स्थल में नीचे जाने के लिए एक छोटा-सा रास्ता बनाया जाता है. कई ऐसे मंत्रों का जाप किया जाता है जिसे खुले में बताया नहीं जा सकता है.
भू-समाधि के वक्त नीचे पार्थिव शरीर के साथ एक तांबे की तार लगाई जाती है, बाद में जब समाधि मंदिर बनाया जाता है तो उस तार को वहां लगने वाली मूर्ति के साथ जोड़ा जाता है.

इमेज स्रोत, Getty Images
भू-समाधि के अलावा और कौन-सी समाधि दी जाती है
साधु-संतों को भू-समाधि के अलावा जल समाधि भी दी जाती है. जब किसी साधु-संत के पार्थिव शरीर को बिना अंतिम संस्कार के नदी में बहा दिया जाए तो उसे जल समाधि कहते हैं.
महंत रविंद्र पुरी के मुताबिक सनातन धर्म में कुछ साल पहले तक साधु संतों को अक्सर जल समाधि दी जाती थी लेकिन अब इसे काफी कम कर दिया गया है. जल प्रदूषण की वजह से साल 2010 में हरिद्वार में साधु-संतों ने जल समाधि नहीं देने पर एकराय बनाई.
बरसात के मौसम में जब नदियों में पानी का स्तर काफी अच्छा रहता है तब हरिद्वार में और बनारस में साधु संतों को जल समाधि दी जाती है. उस समय उनका पार्थिव शरीर जल में समा जाता है.
महंत रविंद्र पुरी के मुताबिक़ कुछ समुदायों में वायु समाधि भी दी जाती है. इसमें पार्थिव शरीर को किसी ऊंचे पेड़ पर रख देते हैं ताकि चील-कौए उसे आकर खा लें. समुदाय का मानना है कि ऐसा करने से पार्थिव शरीर पंचतत्व में वापस मिल जाता है.

इमेज स्रोत, Getty Images
भू-समाधि के बाद आगे क्या?
अंतिम संस्कार के बाद सनातन धर्म में 13 दिन बाद ब्राह्मणों को भोजन करवाया जाता है जिसे तेरहवीं कहते हैं. उसी तरह साधु-संत जब भू-समाधि लेते हैं तो 16 दिन के बाद षोडशी का आयोजन होता है.
इस दिन भंडारा लगाया जाता है. दाल, चावल और चीनी की रोटी बनाई जाती है. इस भोजन को प्रसाद की तरह भक्त ग्रहण करते हैं.

भू-समाधि की परंपरा कब से चल रही है?
महामंडलेश्वर स्वामी हरि चेतनानंद बताते हैं कि ''आदि जगद्गुरु शंकराचार्य के समय से भी पहले से ही भू-समाधि की परंपरा चल रही है.
अभी कुछ साल पहले भारत माता मंदिर के संस्थापक पूज्य स्वामी सत्यमित्रानंद जी को भू-समाधि दी गई थी. उस सभा का मैंने संचालन किया था. उसमें भारत सरकार के कई मंत्री थे. यूपी से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पूरे देश का संत समाज ने भी उसमें हिस्सा लिया था.''

इमेज स्रोत, ANI
कौन थे शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती
99 साल की उम्र में स्वामी स्वरूपानंद का निधन हुआ. उनका जन्म मध्य प्रदेश में हुआ था. बचपन में ही उन्होंने अध्यात्म के लिए अपना घर छोड़ दिया था. अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी के मुताबिक़ साल 1950 में उन्होंने धर्म दंडी धारण की थी. धर्म दंडी धर्म की रक्षा करने वालों की दी जाती है.
महामंडलेश्वर स्वामी हरि चेतनानंद के मुताबिक़ स्वामी स्वरूपानंद विद्वान, तपस्वी और स्वतंत्रता सेनानी थी. वे आजादी के आंदोलन में दो बार जेल भी गए थे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















