कांवड़ यात्रा क्या है, क्या है इसका महत्व?

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हिंदू धर्म में सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा-अर्चना, सोमवार के व्रत और कांवड़ियों के शिवलिंग के जलाभिषेक का विशेष महत्व है.
सावन का महीना आ गया है और दो साल बाद एक बार फिर देश भर के शिव भक्त कांवड़ यात्रा पर निकल रहे हैं.
कोरोना महामारी की वजह से बीते दो सालों के दौरान इस कांवड़ यात्रा पर रोक लगाई गई थी.
अब ये रोक नहीं है तो इस साल देश के कई राज्यों में कांवड़िए बम-बम भोले, हर-हर महादेव, बोल-बम जैसे जयकारे लगाते कांवड़ लटकाए दिखेंगे.
इस दौरान राजधानी दिल्ली और इसके आसपास पश्चिम उत्तर प्रदेश, हरियाणा के रास्तों पर आपको बड़ी संख्या में कांवड़िया दिखेंगे.
कांवड़ यात्राः कब शुरू, कब होगी ख़त्म
इस वर्ष कांवड़ यात्रा 14 जुलाई से शुरू हो रही है.
सावन के महीने अथवा श्रावण मास में भोलेनाथ के भक्त गंगा तट पर जाते हैं. वहां स्नान करने के बाद कलश में गंगा जल भरते हैं. फिर कांवड़ पर उसे बांध कर और अपने कंधे पर लटका कर अपने-अपने इलाके के शिवालय में लाते हैं और शिवलिंग पर अर्पित करते हैं.
कांवड़ बांस या लकड़ी से बना डंडा होता है जिसे रंग बिरंगे पताकों, झंडे, धागे, चमकीले फूलों से सजाया जाता है और उसके दोनों सिरों पर गंगाजल से भरा कलश लटकाया जाता है.
कांवड़ यात्रा के दौरान सात्विक भोजन किया जाता है. इस दौरान आराम करने के लिए कांवड़ को किसी ऊंचे स्थान या पेड़ पर लटका कर रखा जाता है.
साथ ही यह पूरी कांवड़ यात्रा नंगे पांव करना होता है.

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क्या है कांवड़ यात्रा का महत्व?
हिंदू धर्म की मान्यता के मुताबिक चतुर्मास में पड़ने वाले श्रावण के महीने में कांवड़ यात्रा का बड़ा महत्व है.
माना जाता है कि शिव को आसानी से प्रसन्न किया जा सकता है. उन्हें केवल एक लोटा जल चढ़ा कर प्रसन्न किया जा सकता है. वहीं यह भी मान्यता है कि शिव बहुत जल्दी क्रोधित भी होते हैं.
लिहाजा ऐसी मान्यता भी है कि इस कांवड़ यात्रा के दौरान मांस, मदिरा, तामसिक भोजन नहीं करना चाहिए और न ही कांवड़ का अपमान (ज़मीन पर नहीं रखना चाहिए) किया जाना चाहिए.
कांवड़ यात्रा शिवो भूत्वा शिवम जयेत यानी शिव की पूजा शिव बन कर करो को चरितार्थ करती है.
यह समता और भाईचारे की यात्रा भी है. सावन जप, तप और व्रत का महीना है.
शिवलिंग के जलाभिषेक के दौरान भक्त पंचाक्षर, महामृत्युंजय आदि मंत्रों का जप भी करते हैं.

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कहां कहां होती है कांवड़ यात्रा?
भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए भक्त गंगा, नर्मदा, शिप्रा आदि नदियों से जल भर कर उसे एक लंबी पैदल यात्रा कर शिव मंदिर में स्थित शिवलिंग पर उसे चढ़ाते हैं.
उत्तराखंड में कांवड़िया हरिद्वार, गोमुख, गंगोत्री से गंगा जल भर कर इसे अपने अपने इलाके के शिवालयों में स्थित शिवलिंगों पर अर्पित करते हैं.
तो मध्य प्रदेश के इंदौर, देवास, शुजालपुर आदि जगहों से कांवड़ यात्री वहां की नदियों से जल लेकर उज्जैन में महादेव पर उसे चढ़ाते हैं.
देवघर, ग़रीबनाथ और डाकबम
बिहार में कांवड़ यात्रा सुल्तानगंज से देवघर और पहलेजा घाट से मुज़फ़्फ़रपुर तक होती है.
बिहार में श्रद्धालु सुल्तानगंज से गंगाजल भरकर क़रीब 108 किलोमीटर पैदल यात्रा कर झारखंड के देवघर में बाबा बैद्यनाथ (बाबाधाम) में जल चढ़ाते हैं.
वहीं सोनपुर के पहलेजा घाट से मुज़फ़्फ़रपुर के बाबा ग़रीबनाथ, दूधनाथ, मुक्तिनाथ, खगेश्वर मंदिर, भैरव स्थान मंदिरों पर भक्त गंगा जल चढ़ाते हैं.
इतना ही नहीं इस दौरान यहां 'डाकबम' का भी चलन है.
जो कांवड़िए गंगाजल भरने के बाद अगले 24 घंटे के अंदर उसे भोलेनाथ पर चढ़ाने के संकल्प लिए दौड़ते हुए इन शिवालयों में पहुंच कर शिवलिंगों पर यह जल अर्पित करते हैं उन्हें 'डाकबम' कहते हैं.

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देवघर कांवड़ यात्रा की कहानी
अजगैबीनाथ की नगरी सुल्तानगंज में गंगा नदी उत्तरवाहिनी हैं.
पौराणिक कथाओं के मुताबिक, राजा सगर के साठ हज़ार पुत्रों के उद्धार के लिए जब उनके वंशज भागीरथ यहां से गंगा को लेकर आगे बढ़ रहे थे, तब इसी अजगैबीनाथ में गंगा की तेज़ धारा से तपस्या में लीन ऋषि जाह्न्वी की तपस्या भंग हो गई.
इससे क्रोधित होकर ऋषि पूरी गंगा को ही पी गए. बाद में भागीरथ की विनती पर ऋषि ने जंघा को चीरकर गंगा को बाहर निकाला. यहां गंगा को जाह्न्वी के नाम से जाना जाता है.
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, गंगा के इसी तट से भगवान राम ने पहली बार भोलेनाथ को कांवड़ भरकर गंगा जल अर्पित किया था.
आज भी शिवभक्त इस कथा को काफी भक्तिभाव से बांचते हैं. सदियों से चली आ रही यह परम्परा आज भी जारी है.
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