भूपेंद्र चौधरी कौन हैं जिन्हें बीजेपी ने यूपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया

भूपेंद्र सिंह चौधरी

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    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारतीय जनता पार्टी ने गुरुवार को उत्तर प्रदेश सरकार में पंचायती राज मंत्री भूपेंद्र सिंह चौधरी को अपना प्रदेश अध्यक्ष बनाने का एलान किया है.

बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह ने इस बारे में एक पत्र जारी बताया है कि 'बीजेपी के अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा जी ने श्री भूपेंद्र सिंह को उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है. ये नियुक्ति तत्काल प्रभाव से लागू होगी.'

भूपेंद्र सिंह चौधरी इस समय उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य हैं. वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आते हैं और जाट वोट बैंक में उनका अच्छा दखल माना जाता है.

कौन हैं भूपेंद्र सिंह चौधरी

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भूपेंद्र सिंह चौधरी ने 1991 में बीजेपी के साथ अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था. इसके बाद 1999 के लोकसभा चुनाव में संभल सीट पर उनका सामना मुलायम सिंह यादव से हुआ. इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

इसके बाद उन्होंने संगठन में अलग-अलग स्तर पर कई ज़िम्मेदारियों को निभाया जिनमें क्षेत्रीय मंत्री और क्षेत्रीय अध्यक्ष आदि शामिल हैं.

इसके बाद 2016 में बीजेपी ने चौधरी को एमएलसी के लिए नामित किया. और साल 2017 में सरकार बनने के बाद उन्हें पंचायती राज विभाग का अध्यक्ष बनाया गया.

इस तरह भूपेंद्र सिंह चौधरी को राज्य मंत्री का दर्जा योगी सरकार के पहले कार्यकाल में ही मिल गया.

वहीं, योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल में उन्हें एक बार फिर पंचायती राज विभाग का मंत्री बनाया गया. इस तरह उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया.

इसके बाद अब उन्हें संगठन में बड़ी ज़िम्मेदारी दी गयी है.

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अमित शाह के क़रीबी?

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भूपेंद्र सिंह चौधरी को अध्यक्ष बनाए जाने की ख़बर आने से पहले लखनऊ में दो अन्य नामों पर चर्चा की जा रही थी. इन दो नामों में मौजूदा उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और पूर्व मंत्री श्रीकांत शर्मा का नाम शामिल था.

लंबे समय से उत्तर प्रदेश की राजनीति देखते आ रहे वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान मानते हैं कि इस राजनीतिक घटनाक्रम में केंद्रीय नेतृत्व की मुख्य भूमिका नज़र आती है.

वे कहते हैं, "मुझे समझ नहीं आ रहा है कि भूपेंद्र सिंह चौधरी को किस समीकरण के तहत प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है. क्योंकि बीजेपी जातीय समीकरणों को लेकर काफ़ी संवेदनशील रहती है.

भूपेंद्र सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट समुदाय से आते हैं. हालिया चुनावों में बीजेपी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वैसे भी अच्छा समर्थन मिला था. और जाट समुदाय सिर्फ सात-आठ ज़िलों तक सीमित हैं. ऐसे में इन्हें क्यों चुना गया है, ये समझ नहीं आता."

राजनीतिक हल्कों में ये भी कयास लगाए जा रहे हैं कि भूपेंद्र सिंह चौधरी को अमित शाह के क़रीबी होने की वजह से ये ज़िम्मेदारी मिली है.

इस सवाल पर शरत प्रधान कहते हैं, "माना जा रहा था कि बीजेपी या तो पिछड़े समाज से किसी नेता को चुनेगी क्योंकि बीजेपी और ख़ुद नरेंद्र मोदी दलितों और पिछड़ों को लुभाने में लगे हैं. इसके साथ ही ब्राह्मण समाज मानकर चल रहा था कि इस बार उनके किसी नेता को अध्यक्ष का पद मिल सकता है.

और जाटों को लुभाने के लिए तो वैसे ही उप-राष्ट्रपति बना चुके हैं. ऐसे में ये किसी की भी राजनीतिक समझ से बाहर की बात लगती है कि इन्हें क्या सोचकर अध्यक्ष पद दिया गया है. इन्हें पॉपुलर नेता भी नहीं कहा जा सकता. ऐसे में यही कहा जा सकता है कि इन्हें केंद्रीय नेतृत्व की वजह से ये ज़िम्मेदारी दी गयी है. क्योंकि और कोई वजह समझ नहीं आती है."

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जाटों को साधने की कोशिश

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लेकिन इसे जाटों को साधने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है. बीजेपी ने उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में किसान आंदोलन के केंद्र रहे लखीमपुर खीरी से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दूसरे ज़िले में भी अच्छा प्रदर्शन किया है.

चुनाव से ठीक पहले पीएम मोदी ने तीनों विवादित कृषि बिलों को वापस लेने का एलान किया था जिसके बाद उन्हें रद्द कर दिया गया था. इसके बाद दिल्ली की सीमाओं पर एक साल तक डटे रहे किसान भी अपने-अपने घरों की ओर लौट गए.

लेकिन अब एक बार फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान नेताओं के बयानों ने सुर्खियां बटोरना शुरू कर दिया है.

उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों को समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र इसे बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व का मास्टर स्ट्रोक मानते हैं.

वे कहते हैं, "भूपेंद्र सिंह चौधरी का प्रदेश अध्यक्ष बनना ये बताता है कि बीजेपी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय को लेकर गंभीर है. किसान आंदोलन मूलत: जाट समुदाय की पहल वाला आंदोलन था. और अब एक बार फिर जाट आंदोलन की सुगबुगाहट आना शुरू हो गयी है. ऐसे में भूपेंद्र सिंह चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर जाट समुदाय को लुभाने की कोशिश की गयी है. ये बीजेपी के सबसे समर्पित नेताओं में से एक हैं. नब्बे के दशक से बीजेपी के साथ राजनीति शुरू की. इसके बाद लड़े भी, हारे भी लेकिन बीजेपी कभी छोड़ी नहीं.

अब देखने की बात ये है कि बीजेपी के पास फिलहाल जाट और गुर्जर नेता नहीं है. ऐसे में गुर्जर नेता के रूप में सुरेंद्र नागर को लेकर आए. जाट नेता के रूप में जिस शख़्स को खड़ा किया, मंत्री बनाया, वो जाट नेता बहुत प्रभावशाली साबित नहीं हुआ. क्योंकि उस जाट नेता के पास जाट बिरादरी को सुनने की शक्ति नहीं है.

इनके बारे में अच्छी बात ये है कि ये लोगों को सुनना जानते हैं, संगठन में लंबे समय तक रहे हैं. ऐसे में अगर जाट समुदाय को अपना असंतोष जाहिर करने का मौका नहीं मिलेगा तो बीजेपी को इसका फायदा 2024 के चुनाव में होगा. ऐसे में अखिलेश यादव अब तक जयंत चौधरी के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी को चुनौती देते थे, ये उसका जवाब हो गया है."

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