आज़ादी के 75 साल: पाकिस्तान जाने वालों का दिल्ली के इस गुमनाम रेलवे स्टेशन से क्या है नाता?

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    • Author, विवेक शुक्ला
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

लोधी कॉलोनी रेलवे स्टेशन पर इन दिनों सन्नाटा पसरा रहता है. उदासी इस रेलवे स्टेशन का स्थायी भाव है. क्या इसकी वजह ये तो नहीं है कि इसने देश के बंटवारे के बाद सैकड़ों मुसलमानों की सिसकियां सुनी हैं और और हज़ारों को नम आंखों से वतन और अपनों से दूर जाते हुए देखा है.

राजधानी दिल्ली 1947 से अब तक बहुत बदली मगर लोधी कॉलोनी रेलवे स्टेशन का चेहरा-मोहरा कमोबेश पहले जैसा ही है. इसके अंदर-बाहर पांच-छह लोग भी मिल जाएं तो ग़नीमत होगी.

इसके आगे बने हैं सरकारी कर्मचारियों के दो मंज़िला फ्लैट. ये कॉलोनी सन 1946 में बनी थी और इसे 'गोरों की राजधानी' में बनाई गई आखिरी कॉलोनी माना जाता है.

लोधी कॉलोनी रेलवे स्टेशन पर न कुली हैं और ना ही कोई मुसाफ़िर दिखाई देता है. इधर है सिर्फ उदासी.

लाहौर के लिए चलती थीं स्पेशल ट्रेनें

देश के बंटवारे के बाद इसी रेलवे स्टेशन से न जाने कितने मुसलमानों ने अपने वतन को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कहा था. कुछ सिसकियां भरते हुए रेल के डिब्बे के अंदर बैठे थे. कुछ अपनों से गले मिलते हुए बिलख रहे थे. उनके लिए यहाँ से चला करती थीं लाहौर के लिए स्पेशल ट्रेनें.

पाकिस्तान के गुज़रे दौर के ऑलराउंडर और आजकल क्रिकेट कमेंटेटर के रूप में मशहूर सिकंदर बख़्त के पिता जवां बख़्त और उनके परिवार के दूसरे सदस्यों ने भी इसी स्टेशन से पाकिस्तान जाने वाली ट्रेन पकड़ी थी.

जवां बख़्त करोल बाग में रहते थे और कुछ समय तक सेंट स्टीफंस कॉलेज में भी पढ़े थे.

सिकंदर बख़्त को क्रिकेट की दुनिया ने तब कायदे से जाना था, जब उन्होंने भारत के ख़िलाफ़ फिरोजशाह कोटला टेस्ट मैच में 69 रन देकर भारत के आठ विकेट लिए थे. यह 1979-80 में खेली गई सिरीज़ की बात है. वे तब करोल बाग भी गए थे अपने परिवार का घर देखने के लिए.

उसकी एक-एक दीवार को उन्होंने छुआ था. सिकंदर बख़्त बताते हैं कि उनके परिवार का पाकिस्तान शिफ़्ट करने को लेकर इरादा साफ नहीं था. वह कहते हैं, "हमारे परिवार के सदस्यों के बीच मतभेद थे. पर आखिर में तय हुआ कि पाकिस्तान शिफ्ट कर लिया जाए."

भारत विभाजन

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इमेज कैप्शन, आजकल लोधी कॉलोनी रेलवे स्टेशन पर सन्नाटा पसरा रहता है

विभाजन के दौर के दंगे और करोलबाग

उन दिनों दिल्ली में दंगे भड़क गए थे. करोल बाग में रोज़ इंसानियत मर रही थी. करोल बाग में डॉ. एनसी जोशी को उनके ही एक नौकर ने मार दिया था.

एनसी जोशी आज़ादी से पहले देश के नामी सर्जन थे और उन्होंने करोल बाग में 1930 में एक अस्पताल बनवाया था.

वे दंगे शांत करवाने की कोशिश कर रहे थे. उन्हें उनके नौकर ने ही कत्ल कर दिया था. उनका बनवाया हुआ अस्पताल आज डॉ. एनसी जोशी मेमोरियल अस्पताल के नाम से जाना जाता है.

दिल्ली और लाहौर के बीच रेलगाड़ियां 1947 के अगस्त महीने के दूसरे हफ्ते से शुरू होकर 22 नवंबर1947 तक चली थीं. लोधी कॉलोनी स्टेशन से रोज़ दो-तीन ट्रेनें लाहौर के लिए चला करती थीं.

एक सुबह सात बजे और दूसरी दिन में नौ बजे चलती थी. अगर तीसरी चलती थी तो वह भी दिन में 12 बजे तक यहां से छूट जाती थी. इन ट्रेनों के छूटने का समय इस तरह से रखा गया था ताकि ये सब ट्रेन दिन के उजाले में लाहौर तक पहुंच जाएं.

उस भयानक दौर में दंगाइयों के निशाने पर रेलगाड़ियां खासतौर पर थीं. इतिहासकार प्रोफ़ेसर ज्ञानेन्द्र पांडेय कहते हैं कि पाकिस्तान जाने वालों को तब कनॉट प्लेस के 'एल' ब्लॉक में पाकिस्तान सरकार के एक अस्थायी दफ्तर से अपनी टिकट वगैरह लेनी होती थी. इसी दफ्तर से ही मुसाफिरों को जांच-पड़ताल के बाद पाकिस्तान भेजा जा रहा था.

लोधी कॉलोनी से पाकिस्तान जाने वाली ट्रेनों में मुसाफिरों को भेड़-बकरियों की तरह ठूंस दिया जाता था. इनमें बूढ़े, बच्चे और गर्भवती महिलाएँ सब रहते थे. कुछ यात्री छतों पर सवार होते थे.

यहां से उन लुटे-पिटे मुसलमानों को पाकिस्तान ले जाया जा रहा था जो पुराना किला और हुमायूँ के मकबरे के कैंपों में रह रहे थे.

करोलबाग

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इमेज कैप्शन, आज का करोल बाग

रेलवे की सबसे बड़ी कॉलोनी से मुसलमानों का पलायन

रेलवे बोर्ड के पूर्व मेंबर डॉ. रविन्द्र कुमार बताते हैं, "लोधी कॉलोनी स्टेशन से छूटने के बाद ट्रेन कुछ मिनटों में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुँच जाती थी. यहाँ ट्रेन में कुछ डिब्बे उन सरकरी मुलाज़िमों के लिए जोड़ दिए जाते थे, जो पाकिस्तान जा रहे होते थे. इनमें रेलवे के मुलाज़िमों की संख्या सर्वाधिक रहती थी."

ऐसा शायद सरकारी अधिकारियों को आम लोगों की धक्का-मुक्की और अफ़रा-तफ़री से बचाने के लिए किया जाता था.

वो बताते हैं, "राजधानी में रेलवे की सबसे बड़ी आवासीय कॉलोनी किशनगंज के करीब 25 फीसदी घर खाली हो गए थे. किशनगंज को दुनिया की सबसे बड़ी रेलवे कॉलोनी माना जाता है. यह 1920 में स्थापित हुई थी. यहां रहने वाले सैकड़ों मुसलमान रेलकर्मी पाकिस्तान चले गए थे. इनमें खलासी, लाइनमैन, गार्ड वगैरह होते थे. सब्ज़ी मंडी रेलवे कॉलोनी से भी खासी तादाद में रेल कर्मियों के परिवार पाकिस्तान चले गए थे."

पाकिस्तान जाने वाली ट्रेन आज के हरियाणा के कुछ शहरों के स्टेशनों जैसे सोनीपत, करनाल, अंबाला वगैरह पर कुछ पलों के लिए रुकते हुए अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ जाया करती थी.

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मुर्शरफ़ का परिवार कैसे गया सरहद पार?

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ का परिवार भी इसी तरह सरहद पार गया होगा. उनके पिता सईद मुशर्ऱफउद्दीन भी सरकारी सेवा में थे और मिन्टो रोड के सरकारी आवास में सपरिवार रहते थे.

चूंकि सरकारी कर्मी रेल से ही सफर कर रहे थे इसलिए माना जा सकता है कि सईद मुशर्ऱफउद्दीन ने अपने परिवार के साथ वही ट्रेन ली होगी जिसमें उन जैसे रेलवे स्टाफ़ के लिए नई दिल्ली स्टेशन पर अलग से कोच जोड़े जाते थे.

मिन्टो रोड और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बीच की दूरी आधा किलोमीटर से अधिक नहीं है. तब तक नई दिल्ली रेलव स्टेशन का अजमेरी गेट की तरफ रास्ता नहीं बना था इसलिए सईद मुशर्ऱफउद्दीन ने नई दिल्ली स्टेशन के मेन गेट, जो पहाड़गंज की तरफ है, वहां से जाकर ही रेल पकड़ी होगी.

मुशर्रफ

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जब मुशर्रफ के पिता ने कहा, 'हम पाकिस्तान जा रहे हैं'

कनॉट प्लेस की मशहूर बुक शॉप सेंट्रल न्यूज़ एजेंसी के मालिक आरपी पुरी सईद मुशर्ऱफउद्दीन के सरकारी घर में हॉकर के रूप में अख़बार देते थे. 14 अगस्त 1947 को दुनिया के नक्शे में पाकिस्तान आ गया. देश का बंटवारा हो चुका था. सारे देश में देश की आजादी खुशी के साथ देश के बँटवारे का दुख और गुस्सा भी था.

पुरी साहब ने मुझे ये क़िस्सा कुछ यूँ सुनाया था, ''उस दौरान, एक दिन सईद मुशर्ऱफउद्दीन सुबह मेरा इंतजार कर रहे थे कि मैं अख़बार लेकर आऊँगा. आज उन्हें एक बड़े फैसले की जानकारी देनी थी. मैं आसपास के सरकारी घरों में अख़बार डालता था. जब सईद साहब के घर में अखबार डालकर मैं चलने लगा तो उन्होंने आवाज़ देकर रोका. कहा, "सुनो, तुम्हारे से बात करनी है." पुरी रुक गए. सईद साहब ने कहा, "पुरी भाई, आपके साथ हमारा बहुत अच्छा मेल-जोल रहा. अब हमें अखबार देना बंद कर देना. हम यहां से पाकिस्तान जा रहे हैं."

पुरी साहब ने आगे चलकर कनॉट प्लेस में सेंट्रल न्यूज एजेंसी खोली. वे बताते थे कि मुशर्रफ का परिवार बहुत सुशिक्षित था. उनके सभी बच्चों का जन्म मिन्टो रोड के करीब कमला मार्केट स्थित गिरधारी लाल मेटरेनिटी अस्पताल में हुआ था.

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सेंट स्टीफंस कॉलेज से पढ़े एसएम अब्दुल्ला भी तब ही अपने कुछ ऱिश्तेदारों के साथ पाकिस्तान चले गए थे. वे सेंट स्टीफंस कॉलेज में जनरल ज़िया उल हक़ के सहपाठी थे. वे 1947 में 23 साल के थे. तब दिल्ली के पंजाबी सौदागरान बिरादरी के कई परिवार लाहौर के रास्ते कराची चले गए थे.

मशहूर लेखिका सादिया देहलवी के मामू अब्दुल्ला साहब बताते थे कि वे पाकिस्तान जाते हुए सोच रहे थे कि नया मुल्क जन्नत होगा. दिल्ली में मुस्लिम लीग के नेता पाकिस्तान को जन्नत से कम नहीं बताते थे पर कराची जाकर जन्नत की हकीकत कुछ अलग नजर आई.

कुछ दिनों तक रहने के बाद वे वापस अपनी दिल्ली आ गए. उन्हें कराची में कुछ भी इस तरह की खासियत नहीं मिली जो उन्हें वहां पर रोकती. अब्दुल्ला साहब दिल्ली वापस आने के बाद फिर से कनॉट प्लेस के वोल्गा रेस्तरां में दोस्तों के साथ बैठने लगे.

कराची में दिल्ली बनाने वाले कौन?

दिल्ली की पंजाबी सौदागरान बिरादरी के संरक्षक हैं 85 साल के प्रोफ़ेसर रियाज़ उमर. वे दिल्ली के जाकिर हुसैन कॉलेज के प्रिंसिपल भी थे. उन्हें याद है कि जब उनके कुछ करीबी रिश्तेदार सरहद के उस पार चले गए थे. उनमें एसएम अब्दुल्ला भी थे.

बहरहाल, भारत और पाकिस्तान का पंजाबी सौदागरान समाज अब भी एक-दूसरे से निकट से जुड़ा है. जो पाकिस्तान चले गये थे उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान को कायम रखा. ये सच्चे कारोबारी हैं. नौकरी नहीं करते. ये सरहद पार भी कारोबार करने लगे.

इन्होंने कराची में अपने रहने के लिए बनाई दिल्ली कॉलोनी. पॉश क्लिफ्टन एरिया में दिल्ली पंजाबी सौदागरान सोसायटी और दिल्ली मर्केन्टाइल सोसायटी स्थापित की.

इनमें पंजाबी सौदागरान परिवारों की अगली पीढ़ियां आबाद हैं. इसमें सिर्फ दिल्ली से गए पंजाबी मुसलमानों को ही मेंबरशिप मिली थी.

दिल्ली से करीब 1100 किलोमीटर दूर कराची में ये 70 वर्षो के बाद भी दिल्ली वाले ही बने हुए हैं. इन्होंने कराची के बर्न रोड पर दिल्ली पंजाबी सौदागरान अस्पताल भी बनाया.

सिंध प्रांत की राजधानी कराची में भी है दिल्ली कॉलेज. उसे वहाँ पर बसे सभी दिल्ली वालों ने मिलकर स्थापित किया था.

आजकल कनाडा के शहर टोरंटो में रहने वाले पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय स्कवैश खिलाड़ी सज्जाद मुनीर बताते हैं कि अगस्त 1947 के तीसरे हफ्ते में उनके नाना खान मोहम्मद तुफैल मोहम्मद और दादा अल्लाह दित्ता के परिवार दिल्ली के गोल मार्केट के पास डॉक्टर्स लेन और पहाड़गंज के अपने घरों को छोड़ चुके थे.

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय स्कवेश खिलाड़ी सज्जाद मुनिर के नाना खान मोहम्मद तुफैल (बाएं बैठे हैं)

पाकिस्तान जाने वालों से गुज़ारिश

ये लोग कुछ समय पुराना किला के कैंप में रहे. पाकिस्तान जा रहे मुसलमान पुराना किला में ठहराए गए थे. तब लगातार बारिश हो रही थी.

ये बदनसीब लोग अपनी कोठियों को खाली करके पुराना किला में खुले आसमान के नीचे रह रहे थे. जब इनका नंबर आया तो ये लोधी कॉलोनी स्टेशन से लाहौर के लिए रवाना हुए. मुनीर साहब के नाना-दादा दिल्ली में सिविल इंजीनियर थे.

लोधी कॉलोनी रेलवे स्टेशन पर कांग्रेस के नेता लाला देशबंधु गुप्ता, मीर मुश्ताक अहमद, लाला रूप नारायण, चौधरी ब्रह्म प्रकाश, सरला शर्मा जैसे कद्दावार नेता हाथ जोड़कर पाकिस्तान जाने वालों से गुज़ारिश कर रहे थे कि वे पाकिस्तान जाने का इरादा छोड़ दें.

वे भारत में ही रहें. इनके समझाने के बाद इक्का-दुक्का लोग रेलवे स्टेशन से ही वापस लौट जाते थे.

लेकिन अधिकतर लोग अपने सफ़र पर निकल जाते थे. बेहद प्रखर वक्ता मीर मुश्ताक अहमद दिल्ली के मुख्य कार्यकारी पार्षद (मुख्यमंत्री के समकक्ष) रहे. उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना की करोल बाग तथा दरियागंज की कई सभाओं में उनके खिलाफ नारेबाजी की थी.

ब्रह्म प्रकाश दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री रहे. वे चौधरी चरण सिंह की सरकार में मंत्री भी रहे. सरला शर्मा का इस साल के शुरु में 101 साल की उम्र में निधन हो गया. उनके परिवार ने ही राजधानी में लड़कियों का पहला स्कूल 'इंद्रप्रस्थ कन्या विद्यालय' चांदनी चौक में खोला था और महिलाओं के लिए 'इंद्रप्रस्थ कॉलेज' स्थापित किया था.

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इमेज कैप्शन, मीर मुश्ताक

जिन्ना उड़कर गए पाकिस्तान

सात अगस्त 1947 को दिल्ली का आसमान साफ नीला दिखाई दे रहा था. मोहम्मद अली जिन्ना ने 1929 में बने सफदरजंग एयरपोर्ट पर विमान के भीतर जाने से पहले दिल्ली के आसमान को कुछ पलों के लिए देखा. शायद वे सोच रहे होंगे कि अब वे इस शहर में फिर कभी नहीं आएँगे.

वो अपनी छोटी बहन फातिमा जिन्ना, एडीसी सैयद एहसान और बाकी करीबी स्टाफ के साथ कराची के लिए रवाना हो रहे थे.

दरअसल, जिन्ना का पाकिस्तान कुछ दिनों के बाद दुनिया के नक्शे में आ रहा था. वे पिछले आठ वर्षों से दिल्ली में मुंबई से ज्यादा रहे थे. इसलिए वे कुछ हद तक दिल्ली वाले हो चुके थे.

उस दिन उन्होंने सूट पहना हुआ था, तपती हुई गर्मी और उमस के बावजूद. वे आम तौर पर सूट-बूट में ही रहना पसंद करते थे. वे अपने 10, औरंगजेब रोड (अब एपीजी अब्दुल कलाम रोड) के राजसी बंगले को भी हमेशा के लिए छोड़कर निकल रहे थे.

उन्होंने अपना शानदार बंगला सेठ रामकृष्ण डालमिया को बेच दिया था. डालमिया की पत्नी दिनेश नंदिनी डालमिया राजधानी के पॉश सिकंदरा रोड में रहती थीं. उन्होंने इस लेखक को एक बार बताया था कि जिन्ना ने अपना बंगला बेचने से पहले उनके पति के साथ बहुत मोलभाव किया था.

दिल्ली में दंगे भड़के हुए थे और उस दौर में आठ साल की ममनून फातिमा बंगाली मार्केट के पास बाबर रोड के सरकारी फ्लैट में रहती थीं. वो बाबर रोड का फ्लैट ममनून फातिमा के पिता गुलाम साबिर काजमी को मिला था. वो सरकारी नौकरी में थे.

फातिमा के बेटे हमज़ा फारूक हबीब पाकिस्तान के एआरवाई न्यूज चैनल से जुड़े जाने-माने पत्रकार हैं.

उन्होंने मुझे बताया कि बँटवारे से पहले उनके नाना का तबादला कराची हो गया था और उनका परिवार दिल्ली में रहता था. उनके नाना के परिवार में पांच सदस्य थे. उसमें उनकी मां और दादी भी थीं. जब दिल्ली में दंगे जगह-जगह होने लगे तो उनकी दादी ने अपने भाई से कहा कि वे उन्हें जल्दी से जल्दी दिल्ली से निकाल दें. हमजा फारूक हबीब की मां, दादी और परिवार के शेष सदस्य हवाई जहाज से कराची आए.

हमजा फारूक हबीब को उनकी मां ने न जाने यह बात कितनी बार बताई थी कि उन्हें बाबर रोड के हिन्दू पड़ोसियों ने अपने घर के पूजा वाले कमरे में छिपा दिया था ताकि वे सुरक्षित रहें.

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इमेज कैप्शन, ममनून फातिमा जी 1947 में दिल्ली में थीं. तस्वीर में वह लाल और काली रंग की साड़ी पहनी हुई हैं. इतिहासकार इरफान हबीब बिल्कुल दाईं ओर खड़े हैं.

भास्कर राममूर्ति ने उस दौर के किस्से अपने पिता कैप्टन वी राममूर्ति से खूब सुने हैं जब लोधी कॉलोनी रेलवे स्टेशन से ट्रेनें पाकिस्तान जाती थीं. 1946 के अंत में यह परिवार लोधी रोड के ब्लॉक-12 में रहता था.

कैप्टन राममूर्ति ने देखे थे वे दिल दहलाने वाले नज़ारे जब मुसलमान पाकिस्तान जा रहे थे. भास्कर राममूर्ति ने बताया कि चूंकि बंटवारे का असर दक्षिण भारत में नहीं था इसलिए मेरे पिता को बड़ा अजीब लग रहा था कि यहाँ से क्यों इतने लोग नए मुल्क में जा रहे हैं.

क्यों चुना गया लोधी कॉलोनी रेलवे स्टेशन?

लोधी कॉलोनी रेलवे स्टेशन के बाहर इसके इतिहास के बारे में कुछ नहीं लिखा है. ये कभी समझ नहीं आया कि इस छोटे-से स्टेशन को इतने बड़े काम के लिए क्यों और किसने चुना.

हालांकि कहने वाले कहते हैं कि लोधी कॉलोनी स्टेशन को इतने अहम काम के लिए इसलिए चुना गया था क्योंकि ये उन दोनों जगहों के करीब था जहाँ पर पाकिस्तान जाने वाले मुसलमानों को ठहराया गया था.

एक कारण यह भी था कि रेलवे विभाग सरहद पार से आने वालों को उनसे दूर रखना चाहता था जो पाकिस्तान जा रहे थे. पाकिस्तान की तरफ़ से आने वाले पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतर रहे थे.

लोधी कॉलोनी स्टेशन पर एक महिलाकर्मी मिलीं. उन्होंने बताया कि वहाँ रोज 10-15 टिकट बिक जाते हैं. सिर्फ रिंग रेलवे की गाड़ियां ही रुकती हैं. यकीन मानिए कि स्टेशन पर सिर्फ दो लोग बैठे बीड़ी पी रहे थे.

लोधी रोड स्टेशन के पास ही खन्ना मार्केट है. उसकी अधिकतर दुकानों के मालिक पाकिस्तान से आए परिवारों के लोग हैं. कइयों ने सुन रखा था कि इधर पाकिस्तान के लिए विशेष रेलें चला करती थीं. इससे ज्यादा जानकारी किसी के पास नहीं थी.

एक सज्जन ने बताया कि स्टेशन के बाहर एक साधू राम नाम का शख्स 1940 के दशक से बैठा करता था. वह वहाँ पर फल बेचता था. फिर उसका बेटा बंसी बैठने लगा. वे यहाँ विभाजन के दौर के मंजर को बयान करते थे. पर कोविड काल के बाद बंसी भी स्टेशन नहीं आते जो किसी को दर्द भरी कहानियां सुना सकें.

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