बिहार: सभी सियासी दलों ने विधायकों को बुलाया पटना, क्या होगा नीतीश का अगला क़दम?

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- Author, विष्णु नारायण
- पदनाम, पटना से बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार के सियासी गलियारे से कुछ ऐसी ख़बरें आ रही हैं, जिसे बड़े फेरबदल की भूमिका के तौर पर देखा जा रहा है. बिहार के तमाम सियासी दलों के विधायकों को पटना तलब किया गया है.
चाहे सत्ता पक्ष- जेडीयू और जीतन राम माझी की हम हों या फिर विपक्षी दल जैसे राजद, कांग्रेस या फिर वामपंथी धड़े हों, सबने अपने विधायकों को पटना तलब किया है.
राज्य के भीतर किसी भी तरह की सियासी उठापठक की सुगबुगाहट तो तब से ही शुरू हो गई थी, जब सीएम नीतीश कुमार लालू-राबड़ी आवास पर दावत-ए-इफ्तार में शामिल होने पैदल चलकर गए थे, और उसके चंद दिनों बाद जद (यू) की ओर से बुलाए गए दावत-ए-इफ्तार में नीतीश कुमार खुद मेज़बान की भूमिका में तेज प्रताप और तेजस्वी की अगवानी करते दिखे थे.
उस वक्त तो जद (यू) के कई सांसदों और नेताओं ने इस बात की खुशी जताई थी कि यदि चाचा और भतीजा (नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव) साथ आ गए तो यह सूबे के लिहाज से अच्छा ही होगा.
जद (यू) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरसीपी सिंह पर अकूत संपत्ति अर्जित करने को लेकर लगे आरोपों के बीच उनके पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा देने और सीएम नीतीश कुमार के पीएम पद की मंशा को लेकर कसे गए तंज के भी कई मायने तलाशे जा रहे हैं.
आरसीपी सिंह ने पार्टी को छोड़ते हुए तो जद (यू) को डूबता जहाज़ तक कह दिया, वहीं जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह "ललन सिंह" ने उन्हें कहा कि जब नाव में पानी भरने लगता है तो सबसे पहले चूहे ही नाव से कूदते हैं.
नीतीश पर नरम और केंद्र पर हमला
सदन से लेकर सड़क तक पर तेजस्वी यादव जिन नीतीश कुमार पर अटैक करने में कोई कोताही नहीं बरत रहे थे, उन्हीं नीतीश कुमार का अब वे नाम भी लेने से बच रहे हैं.
जैसे सात अगस्त के दिन महागठबंधन की ओर से प्रस्तावित "प्रतिरोध मार्च" में जहां वो बेरोज़गारी और महंगाई के सवाल पर भाजपा और एनडीए सरकार पर अटैक करते दिखे, वहीं नीतीश कुमार का ज़िक्र करने से वे बचते नज़र आए. ज़ाहिर तौर पर इस अटैक और सॉफ्टनेस के भी कई मायने तलाशे जाएंगे.

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तमाम दलों ने अपने विधायकों को पटना किया तलब
सूबे के भीतर किसी भी तरह की सियासी उठापटक के लिए जरूरी है कि दूसरे धड़े के पास ज़रूरी या कहें कि जादुई नंबर मौजूद हो. बिहार की विधानसभा के लिहाज से वह जादुई नंबर है 122. सारी कवायद इस नंबर के इर्द-गिर्द पहुंचने के लिए ही की जाती रही है.
जद (यू) की ओर से तमाम विधायकों को पटना तलब किए जाने को लेकर जब प्रेस ने ललन सिंह से सवाल किए तो उन्होंने कहा, "आरसीपी सिंह के प्रकरण के बाद जो परिस्थिति बनी है, उस पर विधायकों की राय जानेंगे".
वहीं जद (यू) संसदीय बोर्ड के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने सूबे के भीतर संभावित सियासी फ़ेरबदल को लेकर मीडियाकर्मियों के सवाल पर कहा कि आप ही लोग (मीडिया) ही तो दिखाते हैं कि क्या चल रहा है. कुछ चल ही नहीं रहा है."

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आरजेडी के विधायकों को पटना बुलाए जाने के सवाल पर विधायक सुधाकर सिंह बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "पार्टी के विधायक दल की एक आपात बैठक बुलाई गई है. मुद्दे अभी साफ़ नहीं, लेकिन बैठक बुलाई गई है".
हालांकि राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने राजद और जद (यू) के साथ आने को लेकर चल रहे कयासों को ख़ारिज कर दिया है. उन्होंने आरजेडी और जेडीयू के साथ आने की ख़बरों को अफ़वाह क़रार दिया.
साथ ही कहा कि राजद और जद (यू) हाथ नहीं मिलाने वाले. विधायक दल की बैठक को लेकर उन्होंने कहा कि उनके दल की बैठक पहले से तय थी. दूसरे दलों के बार में वे नहीं जानते. यह बैठक दल की ओर से चलाए जा रहे सदस्यता अभियान के संदर्भ में है.

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कांग्रेस ने भी अपने विधायकों को पटना तलब किया
कांग्रेस ने भी अपने विधायकों को पटना तलब किया है. कांग्रेस विधायक शकील अहमद ख़ान सियासी उथलपुथल की ख़बरों पर बीबीसी से कहते हैं, "देखिए आज कांग्रेस लेजिस्लेटिव पार्टी (सीएलपी) के सदस्यों की बैठक तो बुलाई गई है. हमारी ओर से तो चीज़ें स्पष्ट हैं कि भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ संघर्ष के मुहिम में चाहे कोई समूह हो या पार्टी वह साथ आए. इसको लेकर हमलोगों ने नीतीश कुमार से आह्वान भी किया है. समान विचारधारा के लोग साथ रहें."
बात अगर वामपंथी धड़े की करें तो सूबे के लिहाज से सबसे बड़े वामपंथी दल- भाकपा (माले) ने भी अपने विधायकों को तत्काल प्रभाव से पटना बुलाया है.
तत्काल प्रभाव से पटना बुलाए जाने की ज़रूरत के सवाल पर पार्टी के राज्य सचिव कुणाल बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "देखिए हमारी पार्टी के लिहाज से कई ज़रूरी कार्यक्रम चल रहे हैं. अभी कल ही राज्यव्यापी प्रदर्शन में पार्टी शामिल रही. रही बात विधायकों को पटना बुलाए जाने की तो यह रूटीन बैठक है. इस बैठक में बहुत सारी चीजें डिस्कस की जाएंगी."
वहीं जब हमने उनसे सूबे के भीतर चल रहे सियासी कयासों को लेकर सवाल किए तो उन्होंने कहा, "देखिए हम लोग बहुत सारे खेल में उस तरह शामिल नहीं रहते. यदि चीज़ें उस दिशा में बढ़ेंगी तो सबके सामने आ ही जाएंगी. यह कोई छिपने वाली बात तो है नहीं."

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क्या कह रही है भाजपा?
सूबे के भीतर सत्ता के संभावित फ़ेरबदल की कहानी के पीछे वैसे तो कई बातें हैं और होंगी लेकिन हाल के दिनों में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के उस बयान को भी उद्धरित करना मानीखेज़ होगा, जहां उन्होंने क्षेत्रीय दलों के ख़त्म हो जाने की बात कही थी. हालांकि केंद्र और राज्य में वे कई क्षेत्रीय दलों के साथ साझा तौर पर सरकार ज़रूर चला रहे हैं.
सूबे के भीतर चल रही सुगबुगाहट पर भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. धीरज शर्मा बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "हमें प्रदेश नेतृत्व की ओर से ऐसे निर्देश हैं कि हमें इस पूरी कवायद पर कुछ नहीं बोलना है. सरकार चलेगी, जैसे चल रही है. वैसे तो हमारा नेतृत्व इस बात को पहले ही कह चुका है कि हम 2024 और 2025 का चुनाव साथ ही लड़ेंगे."
इसके अलावा उन्होंने कहा कि हमलोग नीतीश जी के फ़ैसले का इंतज़ार करेंगे कि वे क्या चाहते हैं. या उनकी पार्टी के लोग क्या चाहते हैं.

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सियासी फे़रबदल की बातों में कितना दम?
वैसे तो इस बात में कोई नई बात नहीं कि बिहार में कभी भी सियासी फे़रबदल हो सकता है. नीतीश कुमार भाजपा का साथ छोड़ आरजेडी का दामन थाम सकते हैं. हर दो-चार महीने में ऐसी बातों को हवा दी जाती है कि नीतीश कुमार बीजेपी की कार्यशैली से खफ़ा हैं.
बीजेपी दबाव की राजनीति कर रही है. बीजेपी का राज्य नेतृत्व कभी उन्हें लॉ एंड ऑर्डर के सवाल पर घेरने की कोशिश करता है, तो कभी केंद्र की नीतियों के मुख़ालफ़त करने पर उन्हें आड़े हाथों लिया जाता है.
केंद्र और प्रदेश में गठबंधन की सरकार चलाने के बावजूद अरुणाचल प्रदेश में जद (यू) के छह विधायकों को तोड़कर भाजपा में शामिल किए जाने को लेकर भले ही जेडीयू नेतृत्व ने खुलकर कुछ नहीं बोला लेकिन पार्टी में तोड़फोड़ का दर्द उन्हें सालता तो होगा.
साल 2020 के विधानसभा चुनाव में नीतीश को कम से कमतर करने की सायास कोशिशें. भले ही उसके लिए 'चिराग पासवान' का इस्तेमाल किया गया हो. खुद नीतीश कुमार भी सार्वजनिक मंचों से इस दर्द को बयां करते रहे हैं कि उनके साथ धोखा हुआ. वे दोस्त और दुश्मन की पहचान करने में चूक गए.
इसके साथ ही आरसीपी सिंह के जद (यू) छोड़ने और नीतीश कुमार को लेकर कसे गए तंज के बाद ललन सिंह ने 'चिराग मॉडल' का जिक्र किया. उन्होंने कहा, "2020 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को कमजोर करने के लिए एक मॉडल का इस्तेमाल किया गया था. चिराग मॉडल, और दूसरा चिराग मॉडल तैयार किया जा रहा था. आगे कभी मौका आएगा तो बताएंगे कि षडयंत्र कहां और कैसे हुआ?".

वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर का बदलते घटनाक्रम पर आकलन

अभी तक जो तस्वीर उभरी है, उससे तो एक बात बिल्कुल साफ़ हो गई है कि गठबंधन के दोनों मुख्य दलों के बीच दबी-छिपी होने वाली बातें सतह पर आ गई हैं. भले ही वो बातें दोनों दलों की ओर से बयान के तौर पर न आई हों, लेकिन उसका मतलब सबको समझ में आ गया है.
दोनों की कटुता ज़ाहिर है. दूसरी बात यह कि जब जेडीयू ने बीजेपी का नाम लिए बिना यह कहा कि दूसरा चिराग मॉडल तैयार किया जा रहा है, तो इसका एक ही अर्थ होता है कि पहले नीतीश कुमार को कमज़ोर करने के लिए चिराग की मदद ली गई, और उसी तरह आरसीपी की मदद से नीतीश को कमजोर करने की कोशिशें हो रही हैं.
अब रही बात कि यह टिकेगा कब तक? यह होना कब है? यह एक-दो दिनों की बात है या फिर इस पर लंबी बात हो सकती है. यह निर्भर करता है कि नीतीश कुमार की ओर से परोक्ष रूप से जो बातें फैलाई हैं, कि कांग्रेस से बात करना. वामपंथी दलों से बात करना. जनता दल से बात करना, तो वे तमाम बातें फैला रहे हैं. वे इस बात को तौलना चाहते हैं कि क्या सरकार में उनका वर्चस्व वाली स्थिति बरक़रार रहेगी? तो वे फिर से एक बार पलट सकते हैं. जो कि वे पहले भी एक बार कर चुके हैं.
बीजेपी को छोड़कर. मेरे आकलन के हिसाब से नीतीश कुमार एक बार फिर से पलटने की तोहमत से बचना चाहेंगे, लेकिन वे ऐसा ज़रूर चाहेंगे कि बीजेपी के बजाय किसी और की सरकार बन जाए जब यह गठबंधन टूटेगा.
या तो नीतीश कुमार बाहर रहकर सपोर्ट करें या फिर उनकी पार्टी में टूट की स्थिति में वे सपोर्ट करें, लेकिन इन तमाम बातों में चौथा और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि क्या बीजेपी ऐसा होने देगी?
क्योंकि बीजेपी के पास राज्यपाल और स्पीकर अपने हैं. बीजेपी भी 77 लोगों की पार्टी है. क्या बीजेपी बिना हाथ-पांव डुलाए नीतीश कुमार को ऐसा करने देगी?
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