हिंदू राष्ट्रः कैसे तैयार हो रहे हैं हिंदुत्व के सिपाही

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
कुछ साल पहले तक जब धर्मनिरपेक्ष भारत को हिंदू राष्ट्र की दिशा में ले जाने की बात कोई करता था, तो संविधान के आधार पर ऐसी बातें केवल काल्पनिक लगती थीं.
आज भारत की स्वाधीनता के 75वें वर्ष में हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना पर ढके-छिपे नहीं खुलकर मीडिया में बात हो रही है, भाषण दिए जा रहे हैं और वीडियो बनाए जा रहे हैं.
हाल ही में भाजपा के हरियाणा से एक विधायक ने भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का संकल्प लिया.
बिहार बीजेपी से भी हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग उठी है.
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि भारत हिंदू राष्ट्र है और इस पर बहस नहीं हो सकती.
गोवा में हुए अखिल भारतीय हिंदू राष्ट्र अधिवेशन के आयोजक हिंदुत्व संगठन 'हिंदू जनजागृति समिति' ने कहा कि साल 2025 तक हिंदू राष्ट्र की स्थापना हो जाएगी.
हिंदू राष्ट्र बनाने की कानूनी, सामाजिक पेचीदगियां तो एक तरफ़ है ही, इस मांग को आगे बढ़ाने में हिंदुत्ववादी संगठनों और नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका भी रही है. इन संगठनों की संख्या पिछले सालों में बढ़ी है. लेकिन कितनी बढ़ी है, इस बारे में आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं.
इन गुटों की कोशिश रहती है कि वो अपनी नियमित गतिविधियों, विवादित और सांप्रदायिक भाषणों से आम हिंदुओं के बीच ख़ुद को प्रासंगिक बनाए रखें. उन्हें पता है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए सोशल मीडिया चैनलों का इस्तेमाल कैसे किया जाए और मीडिया में कैसे प्राइम टाइम पर पकड़ बनाई जाए.
कई हलकों में इन्हें 'फ़्रिंज गुट' और 'शैडो आर्मी' कहा जाता है, जिनके असर सीमित हैं, लेकिन एक दूसरी सोच ये है कि ये गुट फ्रिंज यानी हाशिए पर नहीं बल्कि मुख्यधारा में हैं. समाज में धर्म के नाम पर कट्टरता को आगे बढ़ा रहे हैं. हिंदू समाज की सोच को बड़े तौर पर प्रभावित कर रहे हैं. हर धर्म के ऐसे कट्टर गुटों की भूमिका और काम करने का ढंग इसी तरह का होता है.

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हिन्दू राष्ट्र की महत्वाकांक्षा
आख़िर इन गुटों के फलने-फूलने का राजनीतिक लाभ किसे मिल रहा है? इन "फ्रिंज" संगठनों की स्वीकार्यता आम ज़िंदगी में कैसे बढ़ती गई.
पत्रकार और लेखक धीरेंद्र झा लंबे अरसे से हिंदुत्ववादी विचारधारा की बढ़ती पकड़ पर काम कर रहे हैं.
अपनी किताब "शैडो आर्मीज़ फ्रिंज ऑर्गेनाइज़ेशंस एंड फुट सोल्जर्स ऑफ़ हिंदुत्व" में वो लिखते हैं कि पिछले तीन दशकों में भारत में हिन्दुत्व की राजनीति हैरतअंगेज तरीक़े से मज़बूत हुई है. हिन्दुत्व ब्रैंड पॉलिटिक्स की कई परते हैं- न केवल भारतीय जनता पार्टी बल्कि इसकी छाया में काम करने वाले भी अहम भूमिका में आ गए हैं."
वो लिखते हैं, "ये सभी एक ही मक़सद को लेकर काम कर रहे हैं कि एक ख़ास समुदाय यानी हिन्दुओं के पास विशेष अधिकार हो और वे ही राष्ट्रीय पहचान को पारिभाषित करें."
उनका मानना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसा संगठन इस तरह की राजनीति की अगुवाई करता है.
आरोप लगते रहे हैं कि हिंदू हितों की बात करने वाले हिंदुत्व गुटों का सीधे तौर पर आरएसएस से संबंध न हो लेकिन उनकी सोच, उनका एजेंडा आरएसएस से प्रभावित रहा है.
आरएसएस विचारक और सांसद राकेश सिन्हा इन आरोपों से इनकार करते हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "130 करोड़ के देश में विविधताओं के कारण आपस में विरोधाभास हैं. उसके कारण छिटपुट समस्याएं आ रही हैं. छिटपुट बयान सभी जगह से आ रहे हैं. जिन संस्थाओं का नाम ले रहे हैं, उन संस्थाओं को साइनबोर्ड के अतिरिक्त, कुछ सदस्यों के अतिरिक्त कौन जानता हैं?''
''कौन पहचानता है? कौन उसके समर्थन में खड़ा होता है? यदि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं होता तो संभवत: वो संस्थाएं दुनिया तक पहुँच नहीं पातीं. ये तो मीडिया विमर्श के अपने दोष हैं. इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कैसे दोषी है?"
हिंदुत्व के झंडाबरदार

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आइए एक नज़र डालें कुछ फ्रिंज यानी हाशिए पर समझे जाने वाले हिंदू संगठनों और इनसे जुड़े कुछ लोगों पर.
ये जानना दिलचस्प होगा कि वे अपनी विचारधारा को किस तरह से समझते हैं. उसको अमल में लाने के लिए क्या और किस हद तक तैयार हैं?
इसमें कोई शक़ नहीं कि वे राजनीति के कैनवस पर सीमित दिखते हों लेकिन अपनी विचारधारा को ज़मीन पर उतारने के लिए किसी भी हथकंडे का इस्तेमाल करने और उसके लिए कोई भी क़ीमत देने के लिए तैयार रहते हैं.
इन लोगों की लंबी लिस्ट में बजरंग मुनि हैं. सीतापुर में बैठे बजरंग मुनि से ज़ूम पर बातचीत हुई.
बंजरंग मुनि खैराबाद स्थित महर्षि श्री लक्ष्मण दास उदासी आश्रम के महंत है.
कुछ महीने पहले बजरंग मुनि का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वो मुसलमान बहू-बेटियों के साथ बलात्कार की धमकी देते हुए दिखे. वीडियो पर काफ़ी हंगामा हुआ जिसके बाद में बजरंग मुनि ने माफ़ी मांग ली. उन्हें अप्रैल माह में इस मामले में बेल मिल गई है.
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बीबीसी से बातचीत में बजरंग मुनि ने अपने मुस्लिम बहू-बेटियों से बलात्कार वाले बयान पर कहा था, "मैंने यही कहा कि अगर तुम हमारी हिंदू बहू-बेटियों के साथ ऐसा करोगे तो ऐसा होगा. मैं आज भी मान रहा हूं कि वो चार शब्द मेरे मुँह से ग़लत निकले, लेकिन वो भी मैं कंडिशनल बोला था."
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मुसलमानों और ईसाइयों की नागरिकता ख़त्म करने और जनसंख्या नियंत्रण क़ानून बनाने जैसी मांग करने वाले बजरंग मुनि कहते हैं, "धर्म के आधार पर हमारा बँटवारा हुआ. (हम) हिंदू राष्ट्र पहले ही हैं. इनको भगाने की ज़रूरत है."
उन्होंने बताया कि फ़रवरी 2021 को किसी ने उनकी रीढ़ में चाकू मार दिया था जिसके कारण वो चल भी नहीं पाते हैं और उन्हें "चौबीसों घंटे दर्द रहता है."
उन्होंने बताया, "मेरे ऊपर नौ हमला हो गया, चाकू से गोद दिया गया मुझे. किसी मीडिया ने नहीं दिखाया."
प्रतापगढ़ ज़िले के अव्वार गाँव के रहने वाले बजरंग मुनि के पिता मध्य प्रदेश पुलिस में काम करते थे. इंदौर से बीबीए करने के बाद उनका कोयंबटूर में साल 2007 में जेट एअरवेज़ में कैंपस सिलेक्शन हो गया. वहीं उनकी संतों से मुलाक़ात हुई, जिसके बाद वो धीरे-धीरे हिंदुत्व की ओर आकर्षित हुए.
शुरुआत में वो गोरक्षा से जुड़े रहे और "गो-तस्करी में जुटी जितनी भी गाड़ियां होती थीं, उन्हें पकड़ने की कोशिश करता था."

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बजरंग मुनि ऑस्ट्रेलियाई नागरिक ग्राहम स्टेंस और उनके दो बच्चों की हत्या मामले में दोषी पाए गए दारा सिंह को "देवदूत" मानते हैं क्योंकि "उन्होंने निःस्वार्थ भाव से काम किया".
ऑस्ट्रेलियाई ईसाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो लड़कों को साल 1999 में उड़ीसा के गाँव में जला कर मार दिया गया था. वो वहाँ कुष्टरोग के मरीज़ों के लिए काम करते थे.
कट्टरवादी हिंदू गुटों का आरोप था कि वो ग़रीब हिंदुओं का धर्म ज़बर्दस्ती बदलवाते थे.
बजरंग मुनि के मुताबिक़ "सेक्युलर लोग तो कहेंगे कि उसने ग़लत किया... जो व्यक्ति 19 सालों से जेल में है और उसे कोई हिंदू सूखी रोटी भी नहीं दे रहा है, वो इतनी प्रताड़ना को झेल रहा है. अगर कोई दूसरा व्यक्ति होता तो अलग बात करता लेकिन उस व्यक्ति ने कहा, मैं जेल से बाहर निकलूंगा तो धर्म रक्षा ही करूंगा."
सीतापुर से थोड़ी दूर राज्य उत्तर प्रदेश के एक अन्य शहर आगरा के गोविंद पाराशर राष्ट्रीय हिंदू परिषद भारत के प्रमुख हैं.
38 साल के पाराशर का दावा है कि विश्व-प्रसिद्ध ताजमहल एक वक्त तेजो महल मंदिर था जिसे तोड़ दिया गया था. उनके दावे के पक्ष में कोई पुरातात्विक सबूत नहीं हैं.
कुछ साल पहले जब उन्होंने और अन्य हिंदूवादी संगठनों ने ताजमहल में आरती की मांग की, तब वो सुर्खियों में आए.
ताजमहल के भीतर कब्रों के बारे में वो कहते हैं, "वो मजार नहीं है, तेजो महल की पिंडी है जिस पर पानी टपकता है."
गोविंद पाराशर पहले बजरंग दल से जुड़े थे जहां उनका काम गायों को बचाना, 'लव जिहाद के लिए लड़ाई लड़ना' आदि थीं..
फिर आया वो वक़्त जब ताजमहल में आरती के ऐलान पर उन्हें गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया.
गोविंद पाराशर का आरोप है कि उनकी जेल की ज़िंदगी के दौरान उन्हें बजरंग दल की ओर से कोई मदद नहीं मिली जिस कारण उन्होंने संगठन छोड़ दिया और अपना खुद का संगठन बनाया.
पाराशर का दावा है कि पूरे देश में राष्ट्रीय हिंदू परिषद भारत के करीब दो लाख सदस्य हैं और उनके कामों में "हिंदुओं को आगे बढ़ाना, हिंदुओं को समझाना, कि अपने भाइयों, बहनों की मदद कैसे करनी है, गोमाता की मदद कैसे करनी है" जैसे काम हैं.
आगरा से दूर भोपाल के हिंदुत्ववादी गुट 'संस्कृति बचाओ मंच' का ध्येय वाक्य है- हमारी संस्कृति, हमारी धरोहर.
मंच के चंद्रशेखर तिवारी का मानना है कि वैलेंटाइन डे, रेव डांस पार्टी, ये सब भारतीय संस्कृति को बिगाड़ने का षडयंत्र है.
मंच के कामों में हिंदू मुसलमान के बीच शादी रोकने का प्रयास करना, "हिंदू बच्चे बच्चियों को समझाना, संस्कारों के शिविर लगाना, लोगों को मंदिर में जाने के लिए प्रेरित करना, घरों में रामायण, हनुमान चालीसा का पाठ के लिए प्रेरित करना" शामिल हैं.
ये वो कुछ नाम और संगठन हैं जिनका उदय पिछले कुछ सालों में हुआ है.
सालों से सनातन संस्था, हिंदू युवा वाहिनी, बजरंग दल, श्री राम सेने, हिंदू एक्या वेदी, आदि संगठन और उनके कार्यकर्ता सक्रिय रहे हैं.
अब मैदान में राम सेना, हिंदू सेना, सनातन धर्म प्रचार सेवा समिति, करणी सेना, विश्व हिंदू महाकाल सेना जैसे कई हिंदुत्ववादी गुट हैं.

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ये संगठन कैसे काम करते हैं?
पत्रकार और लेखक धीरेंद्र झा के मुताबिक़ पिछले कुछ सालों में पैदा हुए नए हिंदुत्व संगठनों, गुटों की संख्या पता लगाना संभव नहीं क्योंकि बहुत से गुटों का अस्तित्व कुछ समय के लिए ही रहता है. वो एक ख़ास मक़सद, विवाद के लिए अस्तित्व में आते हैं, और मक़सद पूरा हो जाने के बाद वो ग़ायब हो जाते हैं.
वो कहते हैं, "पिछले कुछ सालों में जो नए नाम उभरे हैं, वो किसी मक़सद को अंजाम देने के लिए हैं. (इन गुटों के) फुट सोल्जर्स छोटे-छोटे प्रलोभन में आ जाते हैं लेकिन अगर आप लीडर्स का ट्रैक-रिकार्ड देखेंगे तो उनका किसी न किसी स्थापित हिंदुत्व संगठन से लंबे समय से जुड़ाव रहा है."
आगरा के एक वरिष्ठ पत्रकार नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं कि पिछले तीन-चार सालों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में करीब 60 छोटे गुटों का उदय हुआ है. इनमें से कई को तो न कोई जानता है, न उनका रजिस्ट्रेशन है और बिना नियंत्रण के लोग अपने-अपने हिसाब से उन्हें चला रहे हैं.
इस पत्रकार के मुताबिक़ चंद सदस्यों वाले ये गुट बड़े संगठनों के संरक्षण में काम करते है और जब आग फैलती है तो बड़े संगठन अपना पल्ला झाड़ लेते हैं.
वो कहते हैं कि बहुत से गुट किसी छोटे मंदिर से अपनी गतिविधि संचालित करते हैं और आम लोगों या व्यापारियों आदि से चंदा इकट्ठा करके अपनी गतिविधियों को फंड करते हैं.
अखिल भारतीय हिंदू महासभा प्रवक्ता संजय जाट कहते हैं, "जब से योगी सरकार आई है, तब से कहीं न कहीं (हिंदुत्ववादी संगठनों की संख्या का) ग्राफ़ बढ़ा है. इस बात की हम पुष्टि करते हैं."
उनके मुताबिक "एक अलख जगी है हिंदुत्व की. भगवान राम और केसरिया ध्वज के प्रति प्यार बढ़ा है. जो मुगलों के द्वारा दबाए हुए थे, वो दबे कुचले बैठे हुए थे पिछले कई दशकों से. जब बीजेपी सरकार आई तो नए-नए संगठनों की उत्पत्ति हुई."

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पिछले कुछ सालों में हिंदुत्ववादी संगठनों की संख्या क्यों बढ़ी?
गोविंद पाराशर कहते हैं भाजपा के शासनकाल में "कुछ तो अपने प्राण बचाने के लिए भगवा में आए हैं, कुछ अपराधी भी आए हैं जो संगठन में जुड़ गए. 100 रुपए का दुपट्टा डाल दिया और भगवाधारी हो गए. कोई संगठन में घुस गया, कोई संघ परिवार में घुस गया."
वो कहते हैं कि ऐसे भी मामले हैं जब इन संगठनों के लोग जब पुलिस के हत्थे चढ़ते हैं तो वो खुद को हिंदुत्ववादी संगठनों का बताकर उम्मीद करते हैं कि पुलिस उनसे नरमी से पेश आएगी और पुलिस भी थोड़ी नरम हो भी जाती है, क्योंकि उन्हें लगता है कि (एक हिंदुत्ववादी पार्टी) सत्ता में हैं, (और ये लोग) बवाल करेंगे."
पत्रकार और लेखक धीरेंद्र झा कहते हैं, "ये कहना सही होगा कि पिछले सात आठ सालों में ये गुट बहुत ऐक्टिव हो गए हैं. वजह ये है कि इनको प्रशासन का संरक्षण मिल रहा है. ये उन राज्यों में ज्यादा ऐक्टिव हैं जहां भाजपा की सरकार है. भाजपा की राजनीति का आधार है पोलराइजेशन. भाजपा एक राजनीतिक दल है जो संविधान से बंधी हुई है, इसलिए वो उस काम को नहीं कर पाती है जिस काम की ज़रूरत होती है- जैसे ध्रुवीकरण को पैदा करना. ये काम ये संगठन करते हैं."
हालांकि भाजपा नेता ध्रुवीकरण की राजनीति से इनकार करते हैं और सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास के नारे की बात करते हैं.
आरएसएस के विचारों से जुड़े और बीजेपी के सासंद राकेश सिन्हा कहते हैं, "इस तरह की जो विवादों से भरी बातचीत होती है, वो किसी समाज के विमर्श को शामिल नहीं करती. समाज की सोच नहीं बनाती. उन बातों को बहुत अधिक तरजीह देकर वास्तव में हम अपने पूर्वाग्रह का परिचय देते हैं. किसी संस्था, किसी आंदोलन जिसकी ऐतिहासिक भूमिका है आरएसएस की, हिंदुत्व आंदोलन की, उस पर आक्रमण करने के लिए, उसको दोषी ठहराने के लिए, हाशिए के लोगों के द्वारा दिए गए बयान, किए गए कार्यों को लाकर पूरे सौ साल पुराने आंदोलन और संस्था, उसके नेतृत्व, उसकी विचारधारा को कटघरे में खड़ा करना, ये दुष्प्रचार का एक तरीका है. इससे हमें बाहर निकलना चाहिए."
स्विट्ज़रलैंड के ज़्यूरिक विश्वविद्यालय में वरिष्ठ रिसर्चर और सामाजिक मानवविज्ञानी या एंथ्रोपॉलजिस्ट सत्येंद्र कुमार ऐसे संगठनों की बढ़ती संख्या की वजह गिनाते हैं.
सत्येंद्र कुमार के मुताबिक़ देश में नौकरी के मौक़े कम हुए हैं. राजनीतिक दुश्मन पैदा किए गए हैं. समाज के आख़िरी पायदान पर खड़े लोगों में हिंदू होने और दिखाने की पहचान बढ़ी है.
अंग्रेज़ी को श्रेष्ठता से जोड़ने वाले हिन्दुस्तान के कुलीन वर्ग के ख़िलाफ़ भाषाई लोगों का रोष है. डिग्री मिलने के बाद भी युवा बिना नौकरी के घूम रहे हैं. आइडेंटिटी राजनीति का ज़ोर बढ़ा है. आम लोगों को लगता है कि सरकारी इंस्टिट्यूशंस उन्हें मानसिक तौर पर सुरक्षा नहीं देते.
वो कहते हैं, "नौकरी नहीं होने से वैसे ही आपकी कोई इज्ज़त नहीं करता. ऐसे में जब आप संस्था के कार्डधारक बनते हैं तो आपको लगता है कि आपका कोई कुछ नहीं कर सकता."
पत्रकार और लेखक धीरेंद्र झा कहते हैं, "जब समाज में बेरोज़गारी इतनी ज़्यादा है, जो बेरोज़गार युवक हैं उनको रोज़गार देने की जगह पर सरकार कुछ भी नहीं कर रही हैं, बल्कि रोज़गार और ख़त्म किए जा रहे हैं. नतीजा ये हो रहा है कि लड़के बहुत आसानी से उस जाल में चले जाते हैं. उनको ताकत का एहसास होता है."
सत्येंद्र कुमार उन दिनों को याद करते हैं, जब उत्तर प्रदेश के एक विश्वविद्यालय में पढ़ाते वक़्त उन्होंने पाया कि ज़्यादातर छात्र हिंदू संगठनों से जुड़े हैं.

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वो कहते हैं, "युवाओं का एक बड़ा वर्ग है जिसके लिए कोई मौक़े नहीं हैं. मौक़े के नाम पर आठ-दस हज़ार रुपए की नौकरी है. ये युवा 20 साल बाद भी ऐसे ही 8-10 हज़ार की नौकरी करेंगे. न उनके पास कोई बचत होगी, न घर, न मेडिकल सुविधा. वो माता-पिता के घरों में रहते होंगे.
"साथ ही एक सांस्कृतिक जाल का निर्माण हुआ है कि कैसे कोई आपका दुश्मन है- वो जो आपकी नौकरी खाते हैं. उसमें आप्रवासी हैं, दूसरे धर्म के लोग हैं. पहचान धर्म की है एथिक्स या नैतिकता की नहीं है. वो पहचान दिखाने की है कि हम हिंदू हैं और किसी से कम नहीं हैं.
"जो अंग्रेज़ी या पंजाबी मीडियम से पढ़कर आते थे, उन्हें अपमानित किया गया. उन्हें लगता है कि वो पश्चिम के सांस्कृतिक हमले के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं. गर्व के साथ हिंदू बनना है क्योंकि हिंदुओं को कोई पूछ नहीं रहा था. ये सारे फैक्टर एक साथ आ गए."
सत्येंद्र कुमार के मुताबिक़ इन कथित "फ्रिंज" संस्थाओं को पता था कि अपने भाषाई और सांस्कृतिक अपमान को लेकर लोगों में बेचैनी है.
वो कहते हैं, "साल 2014 में ये सभी फैक्टर एक साथ आ गए. ये बहुत दिन से चला आ रहा था मामला. इसमें पुरानी सरकारों की भी नाकामी है. बाहर से आए लोग और हम पर राज करके चले गए - ये एहसास लोगों में था. इस भावना का इस्तेमाल किया गया."
हिंदुत्व संगठनों में 'उच्च जाति' का प्रभुत्व?
किताब 'शैडो आर्मीज़ फ्रिंज ऑर्गनाइज़ेशंस एंड फुट सोल्जर्स ऑफ़ हिंदुत्व' में लेखक धीरेंद्र झा लिखते हैं हिंदुत्ववादी संगठनों में ज़मीन पर ज़्यादातर काम करने वाले वैसी जाति के होते हैं, जिन्हें समाज में 'निचली जाति' के नाम से जाना जाता है और वो इस बात को शायद ही पहचान पाते हैं कि जिस हिंदुत्व के लिए उन्होंने अपनी सारी ताक़त लगा रखी है, वो और कुछ नहीं ब्राह्मणवाद है.
वो लिखते हैं, "वो हिंदू धर्म में बढ़ती धार्मिकता में और 'दूसरे' से घृणा में इतने अंधे हो गए हैं कि वो देख नहीं पा रहे हैं कि वो जिस हिंदुत्व के लिए काम कर रहे हैं वो कैसे ब्राह्मणों और उच्च जाति के ऐतिहासिक अधिपत्य को दोबारा जीवित करना चाहता है."
किताब में ज़िक्र है कि श्रीराम सेना के प्रमोद मुतालिक की पिछड़ी जाति के साथी शिकायत करते हैं कि कैसे उनके साथ संघ परिवार में कथित तौर पर जाति के आधार पर भेदभाव होता था.
एक साथी कहता है, "संघ में आपसे कोई नहीं कहेगा, लेकिन वहाँ सब कुछ ब्राह्मणों को फ़ायदा पहुंचाने के लिए होता है. निचली जाति के लोगों के निचला काम करना पड़ता है- आप उसे गंदा काम कह सकते हैं- जैसे सड़कों पर लड़ना."
आरएसएस में ब्राह्मणों या उच्च जाति के प्रभाव को लेकर उसकी लंबे समय से आलोचना होती रही है.

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हालांकि संघ इस आलोचना को नहीं स्वीकारता. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि हिंदू समाज से छुआछूत, असामनता बड़ी समस्याएं हैं और उनसे निपटने में वक़्त लगेगा.
मोहन भागवत ने एक दूसरी जगह कहा कि एक दलित भी आरएसएस प्रमुख बन सकता है.
जाति के आधार पर हो रहे भेदभाव पर कड़े शब्दों में मोहन भागवत ने कहा कि हम जातिगत भेदभाव में विश्वास नहीं रखते हैं. हम संघ में लोगों की जाति नहीं पूछते हैं. ये हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है.
लेकिन संघ के अब तक के 97 साल के इतिहास में सवर्ण ही संघ प्रमुख रहे हैं. संघ के चौथे प्रमुख राजपूत जाति के राजिंदर सिंह उर्फ़ रज्जू भैया रहे हैं, इनके अलावा अब तक केवल ब्राह्मण ही संघ प्रमुख रहे हैं.
भोपाल के चंद्रशेखर तिवारी पहले बजरंग दल में थे. उन्होंने 12 साल की उम्र से मंदिर की सेवा की शुरुआत की और "हिंदुत्व के लिए" काम करते-करते तीन दशक से ज़्यादा हो चुके हैं.
कांग्रेस के दिग्विजय सिंह के शासनकाल में उन्होंने 18 साल पहले 'संस्कृति बचाओ मंच' की स्थापना की. संगठन का ध्येय वाक्य है- 'हमारी संस्कृति हमारी धरोहर'.
चंद्रशेखर तिवारी के मुताबिक़, हिंदुत्व संगठनों में 'उच्च जाति' का दबदबा मात्र एक भ्रांति है ताकि हिंदू समाज संगठित न हो.
वो कहते हैं, "मेरा ज़िला अध्यक्ष धानुक समाज का है. हम पिछले आठ सालों से चुनरी यात्रा निकालते हैं और विधि-विधान से हम उस मंदिर में दोनों मिलकर पूजन, आरती करते हैं और वहाँ से हमारी यात्रा प्रारंभ होती है."
पूर्व आरएसएस कार्यकर्ता और राम मंदिर के लिए 1990 में पहली कारसेवा में हिस्सा ले चुके दलित भंवर मेघवंशी इससे सहमत नहीं हैं.
भंवर के मुताबिक़ 1991 में उनसे कहा गया कि हिंदू संगठनों से जुड़े साधु संत उनके यहाँ खाना नहीं खाएंगे और वो खाना पैक कर दें ताकि अगले गाँव में उन्हें वही खाना खिला दिया जाए, ये बताए बिना खाना एक दलित के घर बना था. बाद में उन्हें पता चला कि खाने के पैकेट को फेंक दिया गया.
भीलवाड़ा के सिरदियास गाँव के रहने वाले और अभी जयपुर में रह रहे भंवर कहते हैं, "मैंने सोचा, मैं आपके लिए राम मंदिर के लिए मरने के लिए तैयार हूँ और आप मेरे घर में खाना खाने के लिए तैयार नहीं हैं."
भंवर के मुताबिक़ उन्होंने अपनी शिकायत को स्थानीय अधिकारियों के साथ उठाया लेकिन बाद में कोई सुनवाई नहीं होने पर आरएसएस छोड़ दिया.
वो कहते हैं कि इतने सालों में जहाँ हिंदू संगठनो से जुड़ने वालों में ओबीसी और दलितों की संख्या बढ़ी है, सत्ता अभी भी 'उच्च-जाति' के लोगों के पास ही है.

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भविष्य का भारत
हिंदुत्व संगठन लगातार हिंदू राष्ट्र बनाने की बात कर रहे हैं.
उत्तर प्रदेश में हिंदू युवा वाहिनी के संस्थापक मंत्री राम लक्ष्मण के मुताबिक़, "हम लोग चाहते हैं कि भारत एक हिंदू राष्ट्र बने और हिंदुत्व की तरफ़ आकर्षित हो. नेपाल हमारा ऐसा देश था, जो पूरी तरह हिंदू राष्ट्र था, लेकिन वो भी ख़त्म हो गया. हम लोगों के सामने ख़त्म हो गया."
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ साल 2002 में बनी हिंदू युवा वाहिनी के मुख्य संरक्षक हैं.
राम लक्ष्मण के मुताबिक़ उनका "ग़ैर-राजनीतिक, सांस्कृतिक संगठन" वहाँ काम करता है, "जहाँ हिंदू प्रताड़ित होगा, जहाँ हिंदुओं पर चोट आएगी, जहाँ हिंदू धर्म और संस्कृति को ख़तरा आएगा."
उनके संगठन के प्रति पुलिस प्रशासन के रुख़ पर वो कहते हैं, "अगर हम ग़लत हैं तो हमें जेल भेजा जाए. हिंदुत्व का काम करना ग़लत है तो हम सौ ग़लती करेंगे... हम संविधान के तहत काम करते हैं."
लेकिन चाहे यति नरसिंहानंद हों या हिंदुत्व संगठनों के नेता, प्रशासन पर उन पर नरम होने के आरोप लगते रहे हैं. पुलिस ऐसे आरोपों से इनकार करती रही है, लेकिन आरोपों का लगना जारी है.
यति नरसिंहानंद और नूपुर शर्मा के ख़िलाफ़ पुलिस के रवैये की तुलना मोहम्मद ज़ुबैर जैसे मामलों से होती रही है और हिंदुत्व गुटों को राजनीतिक संरक्षण मिलने के आरोप लगते रहे हैं.
पत्रकार और लेखक धीरेंद्र झा भाजपा नेता जयंत सिन्हा के लिंचिंग मामले में शामिल अभियुक्तों को माला पहनाने की घटना की ओर याद दिलाते हैं.
ऐसे में सवाल ये है कि इन हिंदुत्व संगठनों का भविष्य की राष्ट्रीय नीतियों पर कितना असर पड़ेगा, भारत की राजनीति और लोकतांत्रिक चुनावों पर क्या प्रभाव रहेगा.
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