देश के हज़ारों मनरेगा मज़दूर दिल्ली में क्यों कर रहे हैं प्रदर्शन

मनरेगा मजदूरों का प्रदर्शन

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    • Author, अभिनव गोयल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"मैं अपनी मज़दूरी का हक मांगने के लिए दिल्ली आई हूं. मनरेगा वाला पैसा समय से नहीं मिलता है. बिहार में मनरेगा वालों को 200 रुपये भी नहीं मिलते, इतने में पेट नहीं भरा जा सकता. 200 रुपये किलो तो तेल हो गया है."

ये शब्द बिहार के अररिया से आईं संजीदा के हैं जो दिल्ली में मनरेगा मज़दूरी बढ़ाने को लेकर धरना प्रदर्शन कर रही हैं.

संजीदा के घर में तीन बेटियाँ हैं. घर चलाने की सारी ज़िम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है और इस सबके लिए वे मनरेगा पर निर्भर हैं. उन्होंने दिल्ली आने में एक हज़ार रुपये किराए में खर्च किए हैं, ताकि सरकार तक अपनी बात पहुंचा सके.

संसद से करीब दो किलोमीटर दूर देशभर से आए मज़दूरों ने एक मोर्चा लगा रखा है. एक मंच और उसके सामने कई सौ मज़दूर बैठे हैं. मंच से नारा लगता है, 'सही समय पर पूरा काम' तो एक साथ कई सौ मुठ्ठियां उस नारे को पूरा करते हुए कहती हैं 'सही समय पर पूरा दाम'.

हाथों में झंडे लिए सैंकड़ों लोग देश के करीब 15 राज्यों से दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचे हैं. बीच बीच में मंच से कुछ गीत भी सुनाई देते हैं. मंच पर कुछ महिलाओं को भाषण देते हुए भी सुना जा सकता है.

मंच के पीछे 'नरेगा संघर्ष मोर्चा' का एक बड़ा सा बैनर लगा हुआ है, जिसके तहत ये लोग दिल्ली पहुंचे हैं. ये वो लोग हैं जो दुनिया की सबसे बड़ी रोज़गार देने वाली योजना का हिस्सा हैं. एक ऐसी योजना जो 15 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोज़गार देती है.

इसका नाम है महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट. एक ऐसा कानून जिसमें प्रत्येक ग्रामीण परिवार के सभी वयस्कों को एक न्यूनतम मज़दूरी पर 100 दिनों का रोज़गार देने की बात कही गई है.

क्या है ये पूरी योजना और मौजूदा समय में इसकी कितनी ज़रूरत है, सब पर बात करेंगे लेकिन सबसे पहले बात उन लोगों की जो जंतर मंतर पर इस कानून में बदलाव करने की मांग कर रहे हैं. कहानी शुरू हो उससे पहले ज़रूरी है कि उन लोगों की बात सुनी जाए जिनकी ज़िंदगी का हिस्सा है मनरेगा.

कमला देवी
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कमला देवी की उम्र करीब 55 साल है. राजस्थान के राजसमंद जिले से ट्रेन पकड़कर दिल्ली पहुंची हैं. परिवार में आठ लोग हैं जिसमें तीन मनरेगा के तहत काम करते हैं.

कमला देवी कहती हैं, "घर में कोई काम धंधा नहीं है. मनरेगा के सहारे ज़िंदगी चल रही है. एक दिन मज़दूरी करने के 231 रुपये मिलते हैं. साल में मुश्किल से 100 दिन काम मिल पाता है. 231 रुपये काफी कम है, इतनी महंगाई में घर चलाना बहुत मुश्किल है. इतने पैसे में क्या ही होता है लेकिन मजबूरी है कि करना पड़ता है."

किस राज्य में कितनी है मनरेगा मज़दूरी दर

महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून के तहत हर राज्य में अलग अलग दरों से पैसा दिया जाता है.

नीचे दिए आंकड़ों से पता चलता है कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार और त्रिपुरा में मनरेगा के तहत सबसे कम पैसे दिए जाते हैं.

इन राज्यों में प्रतिदिन मनरेगा न्यूनतम मज़दूरी दर 220 रुपये से भी कम है.

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वहीं हरियाणा, गोवा, केरल, कर्नाटक और पंजाब ऐसे राज्य हैं जो दूसरों की तुलना में अधिक पैसा देते हैं.

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मनरेगा के तहत मिलने वाली न्यूनतम मज़दूरी को लेकर कई सामाजिक संगठन सालों से इसे बढ़ाने की मांग कर रहे हैं. मनरेगा के तहत अकुशल ग्रामीण लोगों को काम दिया जाता है. राज्य सरकारों की न्यूनतम मज़दूरी दर को देखने से पता चलता है कि मनरेगा में इस दर से भी कम पैसे मिलते हैं.

हर राज्य अपने यहां अलग अलग वर्गों के लिए मज़दूरी दर तय करता है. जिसमें अकुशल कामगारों को सबसे नीचे रखा जाता है.

नीचे दिए आंकड़ों को देखने से पता चलता है कि केरल, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड और उत्तराखंड राज्य में ये भेद काफी बड़ा है.

केरल में न्यूनतम मज़दूरी दर 490 रुपये है जबकि मनरेगा के तहत सिर्फ 311 रुपये दिए जाते हैं. वहीं उत्तर प्रदेश में न्यूनतम मज़दूरी से 154 रुपये कम दिए जाते हैं.

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नरेगा संघर्ष मोर्चा से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे कहते हैं कि सरकार ने कई कमेटियों में कहा कि न्यूनतम म़जदूरी 350 रुपये होनी चाहिए लेकिन मनरेगा में ये पैसा नहीं दिया जाता.

निखिल डे कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर आप न्यूनतम मज़दूरी दर से कम पर किसी से काम करवा रहे हैं तो उसका मतलब है कि आप बेगार करवा रहे हैं. इतना ही नहीं मनरेगा मज़दूरों के काम को कम बताकर भी कुछ पैसे काट लिए जाते हैं."

कितने दिनों में पैसा मिलना चाहिए

दिल्ली में जंतर मंतर पर जुटे मनरेगा मज़दूरों की एक मुख्य समस्या पैसे का समय पर नहीं मिलना है.

महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी कानून के तहत जब किसी व्यक्ति को काम मिलता है तो उसे उसके काम का पैसा 15 दिनों के अंदर मिल जाना चाहिए.

मनरेगा एक्ट के मुताबिक पैसा खाते में पहुंचने के लिए दो चरण हैं. मनरेगा के तहत काम पूरा करने पर पंचायत या ब्लॉक स्तर पर फंड ट्रांसफर ऑर्डर तैयार किया जाता है, जिसे केंद्र सरकार को भेजा जाता है. ये ज़िम्मेदारी राज्य सरकार की होती है जिसे 8 दिनों के अंदर पूरा कर लिया जाना चाहिए.

वहीं दूसरे चरण में केंद्र सरकार फंड ट्रांसफर ऑर्डर को प्रोसेस करती है और पैसा सीधे काम करने वाले व्यक्ति के अकाउंट में भेजती है. एक्ट के मुताबिक ये काम 7 दिनों के अंदर पूरा कर लिया जाना चाहिए.

दिल्ली के जंतर-मंतर पर मनरेगा मजदूरों का प्रदर्शन

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पैसा मिलने में कितनी देरी ?

'हेवी वेट' रिपोर्ट में इस बात का पड़ताल की गई है कि केंद्र सरकार पैसे ट्रांसफर करने में कितनी देर करती है. इसके लिए अप्रैल 2021 से सितंबर 2021 के बीच करीब 18 लाख ट्रांज़ैक्शन का अध्ययन किया गया है. अध्ययन करते समय 10 राज्यों को इसमें शामिल किया गया.

रिपोर्ट बताती है कि 71 प्रतिशत पैसा केंद्र सरकार निर्धारित सात दिनों के अंदर अकाउंट में ट्रांसफर नहीं कर पाई. वहीं 44 प्रतिशत ट्रांज़ैक्शन 15 दिनों के बाद और 14 प्रतिशत ट्रांज़ैक्शन 30 दिनों के बाद की गई.

इसमें सबसे ज्यादा नुकसान झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों को उठाना पड़ा. इन राज्यों में मनरेगा का पैसा सबसे देर में पहुंचा है.

मनरेगा मजदूरों का प्रदर्शन

मनरेगा का कितना बजट

राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून साल 2005 के सितंबर महीने में लागू किया गया था. कानून में न्यूनतम मजदूरी पर 100 दिनों के रोजगार की गारंटी की बात है.

कानून के तहत व्यक्ति के मांगने पर 15 दिनों में रोज़गार देना होगा. अगर सरकार काम देने में नाकाम रहती है तो आवेदक बेरोज़गारी भत्ता पाने के हकदार होंगे.

देश भर में 30 करोड़ से ज्यादा लोग मनरेगा से जुड़े हुए हैं जिसमें करीब 15 करोड़ से ज्यादा एक्टिव वर्कर हैं यानी इतने बड़े पैमाने पर लोगों को रोज़गार दिया जाता है.

इसके लिए केंद्र सरकार को सालाना हजारों करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं. साल 2018-19 में सरकार ने मनरेगा के लिए 61 हजार करोड़ का बजट पास किया था. वहीं कोरोनाकाल में इसे बढ़ाकर 111 हजार करोड़ कर दिया गया था.

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सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों का कहना है कि कोरोना में मनरेगा ने लाखों लोगों की ज़िंदगी को बचाने का काम किया है. लाखों मज़दूर जब बड़े शहरों को छोड़कर अपने गांव लौटे तो मनरेगा के तहत ही उन्हें काम मिला.

हालांकि साल 2022-23 का अनुमानित बजट मनरेगा के लिए 73 हजार करोड़ रुपये रखा गया. 21 जुलाई तक ही इस बजट का दो तिहाई हिस्सा खर्च हो चुका है.

अगले आठ महीनों के लिए करीब 25 हजार करोड़ रुपये ही बचे हैं. ऐसे में मनरेगा से जुड़े सामाजिक संगठनों का कहना है कि इतने कम पैसे में लोगों को रोज़गार देना संभव नहीं है.

अनुमान के मुताबिक पिछले साल मनरेगा के तहत काम करने वाले लोगों को इस साल में सिर्फ 21 दिन ही काम दिया जा सकता है, जबकि कानून में गारंटी 100 दिन काम देने की है.

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