मारुति सुज़ुकी आख़िर एयर बैग बढ़ाने में क्यों हिचक रही है

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जब कार दुर्घटनाग्रस्त होती है तो एयरबैग फूल जाते हैं और ये दशकों से दुनियाभर में ड्राइवरों और कार यात्रियों की जान बचा रहे हैं. एयरबैग को सीटबेल्ट के बाद से वाहनों में सबसे अहम सुरक्षा उपाय माना जाता है.
भारत सरकार सभी कारों में 6 एयरबैग लगाने की योजना को इस साल से लागू करने जा रही है. लेकिन भारत की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुज़ुकी ऐसा करने में हिचक रही है.
वर्ल्ड बैंक के आँकड़ों के मुताबिक़ दुनिया भर में कार हादसों में मारे जाने वाले हर 10 व्यक्तियों में से एक भारतीय होता है.
मारुति सुज़ुकी में बड़ी हिस्सेदारी जापानी कंपनी सुज़ुकी मोटर कोर्प की है. इस कंपनी का कहना है कि एयरबैग की संख्या बढ़ाने से क़ीमत बढ़ जाएगी जिसका असर छोटी कारों की बिक्री पर होगी. भारत में छोटी कारों के सेगमेंट में मारुति सुज़ुकी सबसे आगे है.
कंपनी के चेयरमैन आर सी भार्गव ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, "इससे उन छोटे और ग़रीब लोगों को चोट पहुँचेगी जो महंगी कार नहीं ख़रीद सकते हैं."
भारतीय कारों में आगे बैठने वाले यात्री और ड्राइवर के लिए पहले से ही दो एयरबैग लगाना अनिवार्य है. एक अनुमान के मुताबिक़ चार और एयरबैग लगाने से क़ीमत कम से कम 18500 रुपए बढ़ेगी.
भारत में सिर्फ़ आठ प्रतिशत परिवारों के पास ही कार है. भारतीय बाज़ार में कार की शुरुआती क़ीमत कम से कम तीन लाख 40 हज़ार रुपए है.
भार्गव कहते हैं, "कार बाज़ार में कम क़ीमतों वाले सेगमेंट में नुक़सान बहुत ज़्यादा होगा. यहाँ पहले से ही दामों लेकर बहुत ज़्यादा संवेदनशीलता है."
भारत में 44 फ़ीसदी वाहन और इंजन बनाने वाली कंपनियों की प्रतिनिधि संस्था सोसायटी ऑफ़ इंडियन ऑटोमोबिल मैन्युफैक्चरर्स के मुताबिक़ भारत में बीते साल 30 लाख कारें बिकीं जो उससे पिछले वित्तीय वर्ष के मुक़ाबले 13 प्रतिशत अधिक थीं.
भारत में अधिकतर लोग छोटी और सस्ती कारें ख़रीदते हैं लेकिन हाल के सालों में यूटिलिटी, स्पोर्ट्स और मल्टी यूटिलिटी कारों के ख़रीदारों की संख्या भी बढ़ी है.
भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा कार बाज़ार है. कार उद्योग में क़रीब तीन करोड़ लोग सीधे और परोक्ष रूप से काम करते हैं. भारतीय जीडीपी में कार बाज़ार का योगदान क़रीब 6 प्रतिशत का है.

इमेज स्रोत, Getty Images
कारों से जुड़ी अच्छी बातें यहीं ख़त्म होती हैं. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक़ भारत में दुनिया भर की एक प्रतिशत के क़रीब कारें हैं लेकिन कार हादसों से जुड़ी 10 प्रतिशत मौतें भारत में ही होती हैं.
भारत में साल 2020 में 130000 से अधिक लोगों ने सड़क हादसों में जान गंवाई. मरने वालों में से 70 प्रतिशत के क़रीब लोग 18-45 आयु वर्ग के थे. इनमें से आधे से अधिक वे थे जो सड़क पर पैदल चल रहे थे या फिर साइकिल या मोटरसाइकिल चला रहे थे.
भारत में कार हादसों की वजह से हर साल क़रीब तीन प्रतिशत जीडीपी का नुक़सान होता है. भारत ने साल 2025 तक सड़क हादसों में मौतों को आधा घटाने का लक्ष्य तय किया है.
ऐसे करने के लिए सरकार वाहनों में सुरक्षा मानक बढ़ाना चाहती है. कारों में छह एयरबैग को अनिवार्य करने के लिए अलावा सरकार भारत एनसीएपी भी लागू करना चाहती है.
ये कार सेफ्टी संस्था कारों के लिए सेफ्टी रेटिंग सिस्टम लागू करेगी जिसमें एक से लेकर पाँच स्टार तक दिए जाएंगे. ये क्रैश परीक्षण पर आधारित होंगे. ये वाहनों में बैठे वयस्क यात्रियों के अलावा बच्चों की सुरक्षा तकनीकों पर आधारित होंगे.
केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के मुताबिक़ इससे भारत को दुनिया का नंबर एक ऑटोमोबिइल हब बनाने के मिशन को भी बढ़ावा मिलेगा.
भारत में कार ख़रीदार दामों को बहुत ध्यान में रखते हैं. भारतीय बाज़ार में स्थानीय स्तर पर निर्मित कारें 340000 रुपये से लेकर तीस लाख रुपये तक में मिलती हैं.
बावजूद इसके भारत में छोटी कारों की मांग कम हो रही है. कच्चे माल के दाम बढ़ रहे हैं, टैक्स बढ़ रहा है जिससे कारें महंगी हो रही हैं और जो लोग दोपहिया वाहनों की जगह कार लेना चाहते हैं, कारें उनके बजट से बाहर हो रही हैं. ईंधन के दाम भी बढ़ गए हैं.
दीर्घकालिक आर्थिक गिरावट की वजह से अधिकतर भारतीय की आय एक ही जगह अटकी हुई है. जो लोग अपग्रेड कर सकते हैं वो भी सेडान कार या यूटिलिटी वाहन ले रहे हैं, जिससे छोटी कारों का बाज़ार और भी सिकुड़ रहा है.
मारुति सुज़ुकी स्वीकार करती है कि बीते चार सालों में हैचबैक कारों का बाज़ार 25 प्रतिशत कम हुआ है.

इमेज स्रोत, Getty Images
क्या भारतीय कारें सुरक्षित हैं?
कारों के सुरक्षा मानकों पर नज़र रखने वाली ब्रितानी संस्था ग्लोबलएनसीएपी के मुताबिक़ भारत में सुरक्षा मानकों को लेकर तस्वीर मिश्रित है.
ग्लोबल-एनसीएपी ने साल 2014 में भारतीय कारों की क्रैश टेस्टिंग शुरू की थी. तब भारतीय बाज़ार में सबसे चर्चित पाँच छोटी कारें, जो कुल कार बिक्री का 20 प्रतिशित थीं, टेस्ट में नाकाम हो गईं थीं. इनमें टाटा, फोर्ड, फॉल्क्सवेगन और हुंदै के मॉडल शामिल थे.
तब से संस्था ने भारत में 50 से अधिक कार मॉडलों का टेस्ट किया है. टाटा और महिंद्रा की कारें को इनमें सबसे सुरक्षित आंका गया है. पाँच सीटों वाली एसयूवी कार टाटा नेक्सॉन पहली भारतीय कार है जिसने एनसीएपी की पांच स्टार रेटिंग हासिल की है. ये रेटिंग वयस्क कार सवारों की सुरक्षा के मानकों पर मिली है.
ग्लोबल-एनसीएपी के महासचिव एलेखांद्रो फुरास कहते हैं, "वाहनों के सुरक्षा डिज़ाइन में काफ़ी सुधार किया गया है लेकिन हम ताज़ा नतीजों के आधार पर ये कह सकते हैं कि भारतीय ग्राहकों की सुरक्षा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है."

इमेज स्रोत, Getty Images
फुरास कहते हैं कि भारतीय कार निर्माताओं ने सुरक्षा मानक बढ़ाए हैं लेकिन "बड़े वैश्विक ब्रैंड भारत में तो सुरक्षा मानक पूरे नहीं करते हैं लेकिन वैश्विक बाज़ारों में आसानी से इन ज़रूरतों को पूरा कर रहे हैं." इसका नतीजा ये होता है कि कारों से सुरक्षा फीचर कम कर दिए जाते हैं ताकि भारतीय बाज़ार में उन्हें सस्ती क़ीमत पर उतारा जा सके.
वहीं ऑटोमोबिल पत्रिका ऑटोएक्स के मैनेजिंग एडीटर ध्रुव बहल कहते हैं कि अगर सामान्य तौर पर देखा जाए तो बीते एक दशक में भारतीय कारें 'काफ़ी सुरक्षित हो गई हैं'.
ध्रुव बहल मानते हैं कि एक बार जब बड़े पैमाने पर निर्माण होगा तो सुरक्षा मानक बढ़ाने पर होने वाला ख़र्च भी कम हो जाएगा.
गाड़ियों पर लिखने वाले कुशन मित्रा कहते हैं कि बावजूद इस सबके सबसे सुरक्षित सेफ्टी फीचर वाली कार भी उतनी ही सुरक्षित है जितना की उसका ड्राइवर.
वो कहते हैं, "भारतीय क़ायदे से गाड़ी नहीं चलाते हैं. हम सुरक्षा को लेकर बहुत जागरूक भी नहीं है. मेरा बेटे एक पॉश प्री स्कूल में पढ़ता है. बावजूद इसके वहाँ आने वाले दस प्रतिशत बच्चे भी चाइल्ड सीट में बैठकर नहीं आते हैं."

इमेज स्रोत, GLOBAL NCAP
मित्रा की बात सही भी है. बच्चे आमतौर पर सहयात्री की गोद में बैठते हैं, पीछे बैठने वाले यात्री तो सीटबेल्ट भी नहीं पहनते हैं, लोग सही लेन में गाड़ी नहीं चलाते हैं.
ग्रिडलॉक सड़कों पर भी भारत में लोग उल्टी तरफ़ गाड़ी चला देते हैं. भारत में कई नए एक्सप्रेसवे बने हैं. इन पर शराब पीकर तेज़ रफ़्तार में गाड़ी चलाना आम बात है.
हाइवे पर कार लेन में भारी वाहन पार्क कर दिए जाते हैं. यहाँ तक कि राइड शेयर करने वाली कैब में पिछली सीट बेल्ट होती ही नहीं है. कई तो सड़कों का ही डिज़ाइन ख़राब है. और इस सबके ऊपर ट्रैफ़िक नियमों का पालन भी कड़ाई से नहीं होता है.
फ़ेडरेशन ऑफ़ ऑटोमोबिल डीलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विंकेश गुलाटी कहते हैं कि जब लोग नई का ख़रीदने आते हैं तो वो लेदर सीटों, सनरूफ़ और कार के स्टीरियो सिस्टम के बारे में पूछते हैं. बहुत से कार ख़रीदारों की सुरक्षा मानकों में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं होती है.
वो कहते हैं, "एक ख़रीदते वक़्त सुरक्षा मानकों को बहुत अहमियत नहीं दी जाती है. कार ख़रीदार सुरक्षा मानकों की वजह से ऑर्डर कैंसल नहीं करते हैं. हालांकि इस बारे में धीरे-धीरे जागरूकता ज़रूर बढ़ रही है."
अर्चना तिवारी पंत भी ऐसी ही एक ख़रीदार हैं. 58 वर्षीय गृहिणी अर्चना जल्द ही एक एसयूवी कार ख़रीदने जा रही हैं. वो कहती हैं कि वो अधिक एयर बैग और एंटी लॉक ब्रेकिंग सिस्टम वाली का ख़रीदने पर जोर देंगी.
एंटी लॉक ब्रेकिंग सिस्टम ऑटोमैटिक ब्रेक लगाने के दौरान कार को फिसलने से रोकते हैं. इसके अलावा वो रियर पार्किंग सेंसर भी देखेंगी. वो कहती हैं कि सुरक्षा मानकों पर कुछ अधिक ख़र्च करने से उन्हें कोई गुरेज़ नहीं है.
"मैं चाहती हूं कि मेरी कार मुझे सुरक्षित रखे."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















