भारत-पाकिस्तान: बंद बोलचाल के दौर में बीबीसी 'बात सरहद पार'

बात सरहद पार
    • Author, राजेश प्रियदर्शी
    • पदनाम, एडिटर, बीबीसी हिंदी

सियासत का असर अगर सिर पर सवार न हो, तो भारत-पाकिस्तान, दोनों तरफ़ के आम लोग एक-दूसरे से जुड़ाव महसूस करते हैं.

जितनी रंज़िशें हैं, दूरियाँ हैं, तल्ख़ियाँ हैं, ग़लतफ़हमियाँ हैं, वो भी कम नहीं हैं, ये सब बातें करने से ही दूर होती हैं.

मीठी हो या कड़वी, बोलियाँ, हमेशा गोलियों से बेहतर होंगी, इसलिए गोलीबारी बंद हो तो अच्छी बात है, बोलचाल बंद हो तो फ़िक्र करनी चाहिए.

दोनों देशों के बीच अपनापन और परायापन दोनों एक साथ हैं, और बेवजह नहीं हैं.

कुछ लोगों का कहना है कि धार्मिक ध्रुवीकरण के इस दौर में सरहद पार बात करने का ये सही समय नहीं है, सही-ग़लत अपनी जगह, लेकिन ऐसी बातें करने का समय यही है, अब से ज़्यादा इसकी ज़रूरत कब थी?

बात सरहद पार

पाकिस्तान की नामी कवियत्री किश्वर नाहिद एक पॉडकास्ट में दोनों देशों के रिश्तों में पड़ी गाँठ के बारे में कहती हैं, "हमारे दोनों मुल्कों के बीच ऐसी गाँठ लगी है, वो कहते हैं न कि गाँठ हाथों से लगाई थी, लेकिन अब दाँतों से खोलनी पड़ेगी."

अगर मनमोहन सिंह पंजाब के उस हिस्से में पैदा हुए जो अब पाकिस्तान में है, तो जनरल मुशर्रफ़ की पैदाइश पुरानी दिल्ली की है. ऐसे लाखों-लाख हिंदू-मुसलमान-सिख परिवार हैं जिनकी संवेदनाओं के तार इसी बुनियादी वजह से सरहद के पार जुड़े हैं.

यही वजह है कि भारत के तकरीबन सभी प्रधानमंत्री पाकिस्तान जा चुके हैं, जिनमें मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं. आपसी रिश्ते बेहतर करने की बातें करते रहे हैं. अटल बिहारी वाजपेयी का लाहौर जाना और पाकिस्तान के नामी शायर अहमद फ़राज़ का शेर पढ़ना--'रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ'--इतिहास का यादगार लम्हा बन चुका है.

दोनों देशों के बीच की सरहद केवल 75 साल पुरानी है. सरहदों के बीच की खाइयों के लगातार गहरे होते जाने की वजहें रही हैं. सरकारें हैं, मीडिया है, हमले हैं, युद्ध हैं, लेकिन दूसरी ओर सरहद को जोड़ने वाले कुछ पुल भी हैं.

बात सरहद पार

क्या हैं वो पुल?

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साझा इतिहास, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रहीं अपने गाँव-घर-शहर की स्मृतियाँ, खान-पान, नाच-गान, पहनावा, भाषा-बोली, साहित्य-सिनेमा और सिर्फ़ दो पीढ़ी पहले तक का सब कुछ साझा.

बीबीसी बात सरहद पार

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बात होगी तभी बात बनेगी, बात होगी तभी मसले सुलझेंगे, बात होगी तभी एक-दूसरे का दुख-दर्द, रंजिश-खलिश, चोट-दर्द सब सामने आएँगे, एक स्वतंत्र और अंतरराष्ट्रीय प्रसारक होने के तौर पर बीबीसी हिंदी और बीबीसी उर्दू ने तय किया कि आज़ादी के 75 साल पूरे होने के मौक़े पर एक ऐसी बातचीत की मेज़बानी की जाए.

बीबीसी हिंदी-उर्दू ने तय किया कि हम एक ही क्षेत्र में काम करने वाले दो लोगों को एक साथ लाएँगे, एक भारत से, और एक पाकिस्तान से, दोनों अपनी ज़िंदगियों, अपने कामकाज, अपनी चुनौतियों, परेशानियों, समाज के दुख-सुख की बातें करेंगे, बिना किसी रोक-टोक के, यानी कोई एंकर या मॉडरेटर भी नहीं होगा, दिल से दिल की बात, बात सरहद पार.

बात सरहद पार

ये काम आसान नहीं था, दो लोगों को राज़ी करना, भारत-पाकिस्तान एक साथ सुनते ही, ज़्यादातर लोग अपनी रज़ामंदी वापस ले लेते. हमें लोगों से बात शुरू करने से पहले उन्हें एक चिट्ठी लिखनी पड़ी, जिसमें वादा किया गया कि हम विवाद, हंगामा, शोर-शराबा या किसी तरह की पब्लिसिटी नहीं चाहते, हमारा मक़सद सिर्फ़ सरहद पार बातचीत का सिलसिला शुरू करना है, जो अभी तकरीबन बंद है.

क्या-क्या मिलेगा सुनने को पॉडकास्ट में

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हम चाहते थे कि बात हो, बात सरहद पार हो, खुलकर हो, दिल खोलकर हो इसलिए हमने दो देशों की दो गायिकाओं सुनिधि चौहान और ज़ेब बंगश को एक-दूसरे से बातें करने को कहा, लेकिन वो केवल बातें ही नहीं करतीं, गाने भी लगती हैं, इसी तरह लेखक-व्यंग्यकार-कॉमेडियन वरुण ग्रोवर और पाकिस्तान में उन जैसा ही काम करने वाले सरमद खूसट ने खरी-खरी बात की, दोनों देशों की नामी कवयत्रियों--अनामिका और नाहिद किश्वर ने सुख-दुख साझा किए, कवितएँ भी सुनाईं.

बात सरहद पार

आप सुन सकते हैं बीबीसी हिंदी के विशेष पॉडकास्ट--'बात सरहद पार' में. हर शुक्रवार को, 15 जुलाई, 2022 से. पहला एपिसोड 15 जुलाई को दोपहर 12 बजे के बाद आप जब चाहें सुन सकते हैं, हर शुक्रवार आपके लिए लाएँगे एक नया एपिसोड, लेकिन आप अगर मिस कर गए हों तो पुराने एपिसोड भी सुन सकते हैं.

ये पॉडकास्ट आप सुन सकते हैं बीबीसी हिंदी की वेबसाइट साइट पर, हमारे यूट्यूब चैनल पर. साथ ही साथ, बीबीसी के पॉडकास्ट पार्टनरों--जियो-सावन, गाना, स्पॉटिफ़ाई, ऐपल पॉडकास्ट पर.

बात निकलेगी तभी तो दूर तलक जाएगी, अभी तो मानो बात भी सरहदों की कैद में है जबकि वो सरहदों की मोहताज नहीं है. आख़िरी मुग़ल बादशाह ने जो कहा वो मानो आज का सच है-- "बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी/ जैसी अब है तिरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी".

सरहदों को पार करती पॉडकास्ट की इस महफ़िल में शामिल हों, आज़ादी के 75 साल पूरे होने के मौक़े पर आइए अतीत और भविष्य दोनों की बातें करते हैं.

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