महाराष्ट्र के बाद अब झारखंड में हेमंत सोरेन क्या बदलेंगे करवट- प्रेस रिव्यू

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कांग्रेस का संकट ख़त्म होता नहीं दिख रहा है. महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी की सरकार में कांग्रेस भी शामिल थी और यह सरकार गिर गई.
अब बगल के राज्य गोवा में कांग्रेस के कुल 11 विधायक टूटते दिख रहे हैं. रविवार को गोवा कांग्रेस ने कहा है कि बीजेपी गोवा में उसके कुल 11 विधायकों में से दो तिहाई को अलग करने की कोशिश में लगी है.
गोवा कांग्रेस प्रभारी दिनेश गुंडु राव ने कहा है कि कांग्रेस नेता माइकल लोबो और दिगंबर कामत बीजेपी को दलबदल की कोशिश में मदद कर रहे हैं. कांग्रेस ने लोबो को गोवा के नेता प्रतिपक्ष से हटा दिया है.
गोवा की इस ख़बर को आज सारे अख़बारों ने प्रमुखता से जगह दी है. डीएनए की ख़बर के अनुसार, दिनेश गुंडु राव ने कहा, ''बीजेपी कोशिश कर रही है कि कांग्रेस के कम से कम दो तिहाई यानी 11 में से आठ विधायक पार्टी छोड़ दें. हमारे लोगों को पार्टी छोड़ने के लिए बड़ी रक़म देने का लालच दिया गया है. प्रस्तावित रक़म सुनकर मैं हैरान हूँ. लेकिन हमारे छह विधायक पार्टी के साथ खड़े हैं. मुझे इन पर गर्व है.''
कांग्रेस के सीनियर नेता गिरीश चडनकर ने दावा किया है कि एक-एक विधायक को 40-40 करोड़ रुपए का ऑफर दिया गया है. हालाँकि बीजेपी ने इन आरोपों का ख़ारिज किया है.

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चडनकर ने कहा कि यह साज़िश हमारे दो नेताओं गोवा में नेता प्रतिपक्ष माइकल लोबो और दिगंबर कामत के ज़रिए रची जा रही है. उन्होंने कहा, ''दिगंबर कामत के ख़िलाफ़ कई मुक़दमे हैं और वह इससे बचने के लिए ऐसा कर रहे हैं. दूसरी तरफ़ माइकल लोबो को सत्ता का लालच है. बीजेपी विपक्ष को ठिकाने लगाना चाहती है.''
ठीक तीन साल पहले इसी महीने 10 जुलाई को गोवा कांग्रेस में बग़ावत हुई थी और तब के विपक्षी नेता चंद्रकांत बाबू कावलेकर के नेतृत्व में 10 विधायकों का समूह बीजेपी में शामिल हो गया था. तब कांग्रेस के कुल 15 विधायक थे.
हालांकि 40 सदस्यों वाली गोवा विधानसभा में बीजेपी के कुल 20 विधायक हैं और पाँच अन्य का समर्थन है. मतलब बीजेपी सरकार को अल्पमत में नहीं है. लेकिन मई महीने में बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव और गोवा के पार्टी प्रभारी सीटी रवि ने कहा था कि 2022 के अंत तक बीजेपी के पास 30 विधायक हो जाएंगे.

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हेमंत सोरेन क्या बदलेंगे पाला?
लेकिन कांग्रेस का संकट केवल गोवा तक ही सीमित नहीं है. झारखंड में कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के समर्थन से चल रही हेमंत सोरेन की सरकार को लेकर भी कई तरह की अटकलें हैं. अंग्रेज़ी अख़बार इकॉनमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी की सरकार गिरने के बाद झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार को लेकर भी सस्पेंस बढ़ गया है.
इकनॉमिक टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''राष्ट्रपति चुनाव को लेकर हेमंत सोरेन का रुख़ कांग्रेस से अलग जा रहा है और दूसरी तरफ़ वह केंद्रीय एजेंसियों की जाँच के दायरे में घिरते दिख रहे हैं. भ्रष्टाचार के मामले में उनके क़रीबी सहयोगियों के यहाँ रेड पड़ी है. यहाँ तक कि मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ भी चुनाव आयोग और अदालत में कथित अनुचित कोयला खदान आवंटन को लेकर अयोग्य ठहराने की याचिका दाखिल की गई है.''
हालाँकि झारखंड का सत्ताधारी गठबंधन यह जताने की कोशिश कर रहा है कि सब कुछ ठीक है. लेकिन दिल्ली और रांची में सत्ता के गलियारों में ढाई साल पुरानी हेमंत सोरेन की सरकार को लेकर कई तरह की बातें कही जा रही हैं.
राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी मूर्मु को वोट करना जेएमएम की मजबूरी है क्योंकि वह संथाल आदिवासी हैं. हेमंत सोरेन भी संथाल आदिवासी ही हैं. द्रौपदी मुर्मू झारखंड की राज्यपाल भी रही हैं.
लेकिन इसके अलावा एक तथ्य यह भी है कि आदिवासियों को लेकर संवेदनशील रहने वाले जेएमएम ने 2012 में बीजेपी के साथ गठबंधन में रहने के बावजूद एनडीए के जनजाति उम्मीदवार पीए संगमा के बदले यूपीए के प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति चुनाव में समर्थन दिया था. कहा जा रहा है कि मुर्मू के प्रति हेमंत सोरेन उत्साह दिखाकर दिल्ली दरबार को ख़ुश करने की कोशिश कर रहे हैं.
2012 में राष्ट्रपति चुनाव के कुछ महीने बाद ही हेमंत सोरेन ने बीजेपी से गठबंधन तोड़ लिया था और कांग्रेस के साथ आ गए थे. कई लोगों का कहना है कि इस राष्ट्रपति चुनाव के बाद भी झारखंड में हेमंत सोरेन कुछ उलट-फेर कर सकते हैं.

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चंडीगढ़ में हरियाणा की विधानसभा को लेकर विवाद
हरियाणा को चंडीगढ़ में नई विधानसभा के लिए ज़मीन देने को लेकर पंजाब-हरियाणा में सियासत गर्मा गई है.
हिन्दी अख़बार दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब की भगवंत मान सरकार में स्वास्थ्य मंत्री चेतन सिंह जोड़ामाजरा ने कहा है कि चंडीगढ़ पंजाब का है और यहाँ हरियाणा की विधानसभा नहीं बन सकती.
चेतन सिंह जोड़ामाजरा ने कहा, ''चंडीगढ़ पंजाब का हिस्सा है और रहेगा. हरियाणा को अपनी अलग विधानसभा बनानी ही है तो पंचकूला, फ़रीदाबाद या कुरुक्षेत्र में कहीं पर भी बना सकते हैं. चंडीगढ़ में हरियाणा की नई विधानसभा नहीं बनेगी."
वहीं, वित्त मंत्री हरपाल चीमा ने कहा, चंडीगढ़ पंजाब से निकला है और इस पर पंजाब का ही हक़ रहेगा. हमारा हक़ कोई नहीं छीन सकता.
दूसरी तरफ़ शिरोमणि अकाली दल (बादल) के प्रधान और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने इस मुद्दे पर 12 जुलाई को कोर कमिटी की मीटिंग बुलाई है.
सुखबीर ने रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मान सरकार पर पंजाब के हक़ त्याग देने का आरोप लगाया. बोले, मौजूदा संकट के लिए सीएम ज़िम्मेदार हैं.

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पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस के साथ मीटिंग में मुख्यमंत्री मान ने हाई कोर्ट के लिए ज़मीन की मांग की थी.
इसी कारण हरियाणा को केंद्र शासित प्रदेश में अपनी विधानसभा के लिए ज़मीन मांगने का मौक़ा मिल गया.
बादल ने कहा- "मुख्यमंत्री का सरेंडर अरविंद केजरीवाल द्वारा निर्देशित है. केजरीवाल अब हरियाणा को ख़ुश करने के लिए पंजाब के हितों की क़ुर्बानी देना चाहते हैं."
इस मुद्दे पर उनकी पार्टी जल्द ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाक़ात कर एतराज जताएगी.
चेतन जोड़ामाजरा के बयान पर हरियाणा विधानसभा के स्पीकर ज्ञानचंद गुप्ता ने कहा,"पंजाब के सीएम कुछ कहते हैं और मंत्री कुछ और. हम पैसे देकर ज़मीन ख़रीद रहे हैं. यहाँ हज़ारों बिल्डिंग ख़रीदी और बेची जाती है. हम मुफ़्त में ज़मीन नहीं ले रहे. पंजाब भी ज़मीन ख़रीदकर अपनी बिल्डिंग बना ले. विरोध सिर्फ़ सियासी है."
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