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झारखंडः क्या मुसलमानों ने वाक़ई कहा कि हाथ जोड़कर प्रार्थना नहीं करनी- ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, आनंद दत्त
- पदनाम, गढ़वा से, बीबीसी हिंदी के लिए
झारखंड के गढ़वा ज़िले का एक स्कूल इन दिनों काफ़ी चर्चा में है. कोरवाडीह गांव के इस स्कूल के बारे में बीती 4 जुलाई को मीडिया में एक ख़बर ख़ूब चली, जिसका शीर्षक था, ''मुस्लिम बोले- हमारी आबादी 75 प्रतिशत, इसलिए नियम भी हमारे अनुसार बनें.''
ख़बर में यह भी लिखा था कि गांव के मुसलमानों ने स्कूल पर इस बात के लिए दबाव बनाया था कि स्कूल में होने वाली प्रार्थना हाथ जोड़ कर नहीं, बल्कि हाथ बांधकर हो. ख़बर के मुताबिक़, स्कूल में 'दया कर दान विद्या का...' प्रार्थना को बदलकर 'तू ही राम है, तू रहीम है, तू करीम कृष्ण ख़ुदा हुआ...' प्रार्थना करवाई जा रही है.
इस ख़बर के छपने के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई. राज्य के बीजेपी विधायक भानु प्रताप शाही ने राज्य के शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो से मुलाक़ात की. उन्होंने कहा कि तुष्टिकरण की राजनीति ज़रा भी स्वीकार्य नहीं होगी.
इसके जवाब में शिक्षा मंत्री महतो ने कहा, ''आपसी भाईचारे को बिगाड़ने का किसी भी स्तर पर प्रयास होगा तो हम कठोरता से निबटेंगे. शिक्षा को मज़हब के नाम पर कलंकित करने वालों पर पूरी सख़्ती होगी, जिसके लिए गढ़वा के ज़िलाधिकारी और पुलिस से बात कर दिशा-निर्देश दिए गए हैं.''
इसके बाद गढ़वा के ज़िलाधिकारी रमेश घोलप के आदेश पर ज़िला शिक्षा पदाधिकारी कुमार मयंक भूषण ने स्कूल का दौरा किया और सबको हिदायत दी कि हाथ बांधकर नहीं, हाथ जोड़कर ही प्रार्थना करनी है.
क्या है इस दावे का सच?
रांची ज़िला मुख्यालय से 217 किलोमीटर दूर राजकीय उत्क्रमित मध्य विद्यालय, कोरवाडीह में गुरुवार सात जुलाई की सुबह नौ बजे बीबीसी हिंदी की टीम जब वहां पहुंची तब स्कूल की सफ़ाई हो रही थी. ठीक 9.30 बजे कक्षा एक से आठ तक के छात्र-छात्राओं को प्रार्थना के लिए पंक्ति में खड़ा किया गया.
आठवीं की छात्रा अनुराधा कुमारी, सुहाना ख़ातून और शहाना ख़ातून ने पहले हाथ जोड़े और फिर 'तू ही राम है, तू रहीम है, तू करीम कृष्ण ख़ुदा हुआ...' गाया. देखा-देखी बाक़ी बच्चों ने भी इसे गाया.
इसके ख़त्म होते ही सभी बच्चों ने 'जन गण मन...' गाया और फिर 'भारत माता की जय' के नारे लगाए. उसके बाद शिक्षकों ने बारी-बारी से बच्चों को उनके कक्षा में जाने के लिए कहा.
इस स्कूल के प्रिंसिपल युगेश्वर राम इसी गांव के रहनेवाले हैं. उन्होंने बताया कि उनकी प्राथमिक शिक्षा भी इसी स्कूल से हुई है और अब वो यहां के प्रिंसिपल हैं.
बीबीसी हिंदी को उन्होंने बताया, ''प्रार्थना में थोड़ा सा अंतर था कि कई सारे बच्चे हाथ जोड़ कर नहीं करते थे. हम लोग प्रयास किए कि हाथ जोड़कर करें, लेकिन बच्चे नहीं माने. फिर हमें लगा कि बच्चे ऐसे ही करना चाहते हैं, तो फिर हमने कुछ नहीं कहा. चाहे हाथ जोड़ कर करें या हाथ बांध कर, कैसे भी हो, लेकिन नाम तो भगवान का ही लिया जा रहा है.''
इसमें ग़लत क्या?
इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं, ''गलत इसमें ये था कि बच्चे हाथ जोड़ कर नहीं कर रहे थे. पहले इन बच्चों में मुस्लिम शामिल थे. धीरे-धीरे हिंदू बच्चे भी हाथ बांधकर ही प्रार्थना करने लगे. हम लोगों ने देखा कि विषमता आ रही है, इसको दूर करने का प्रयास किया.''
हालांकि उन्होंने यह ज़रूर कहा कि प्रार्थना कैसे हो, इसे लेकर गांव की ओर से कभी कोई आपत्ति नहीं हुई.
तो फिर प्रार्थना पद्धति क्यों बदली गई, इस सवाल के जवाब में प्रिंसिपल युगेश्वर राम कहते हैं, ''मीडिया में ख़बर आने के बाद शिक्षा विभाग के सभी पदाधिकारी स्कूल पहुंचे. उन्होंने बताया कि हाथ जोड़ कर ही प्रार्थना होगी. उसके बाद से सभी ऐसे ही करने लगे हैं. किसी बच्चे ने कोई आपत्ति नहीं की, सब ने वैसे ही किया.''
इस पर ज़िला शिक्षा अधिकारी कुमार मयंक भूषण कहते हैं, ''देखिये प्रार्थना के संबंध में राज्य सरकार की तरफ़ से जो गाइडलाइन है, उसमें पद्धति को लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं है. चूंकि सदियों से प्रार्थना हाथ जोड़कर ही की जाती रही है, इसलिए हमने स्कूल जाकर बच्चों, शिक्षकों, ग्रामीणों से कहा कि हाथ जोड़कर ही प्रार्थना की जानी चाहिए.''
बच्चों ने क्या कहा?
आठवीं की छात्रा अनुराधा कुमारी कहती हैं, 'हम लोग शुरू से ही दोनों तरीक़े से प्रार्थना करते आ रहे हैं. शहाना ख़ातून मेरी दोस्त है, वह हाथ बांधकर करती थी और मैं हाथ जोड़ कर. लेकिन ऐसा करने के लिए हमें किसी ने सिखाया नहीं, न ही हमारे अभिभावकों ने इस पर कुछ कहा.''
इन दोनों की दोस्त सुहाना ख़ातून भी यही बात दोहराती हैं. वो कहती हैं, ''प्रार्थना में राम और रहीम दोनों का नाम लेते हैं. शिक्षक या माता-पिता इसे लेकर कुछ नहीं कहते.''
इसी कक्षा के एक और छात्र औरंगज़ेब ने भी अपनी बात रखी. उन्होंने कहा, ''पहले हिंदू छात्र हाथ जोड़ कर प्रार्थना करते थे, बाक़ी हाथ बांध कर. लॉकडाउन के बाद जब स्कूल खुला तो सब हाथ बांध कर ही करने लगे. अभी कुछ अधिकारी स्कूल आए थे, तो उन्होंने कहा कि अब हाथ जोड़ कर ही प्रार्थना होगी.''
औरंगज़ेब ने यह भी बताया कि ये बात झूठ है कि कुछ लोग आकर ये कहने लगे कि 75 प्रतिशत मुस्लिम बच्चे हैं, तो स्कूल में हाथ बांध कर ही प्रार्थना होगी.
कोरवाडीह पंचायत की कुल आबादी लगभग आठ हज़ार है. वहीं कोरवाडीह गांव की आबादी लगभग पांच हज़ार.
इस पंचायत के मुखिया शफ़ीक़ अंसारी के मुताबिक़ इस गांव में लगभग 55 प्रतिशत मुस्लिम और 45 प्रतिशत हिंदू हैं. गांव में एक मस्जिद और दो मंदिर हैं. शिव मंदिर और मस्जिद की दूरी बमुश्किल 150 मीटर है.
मुखिया बनने के पहले शफ़ीक़ अंसारी 14 साल तक इस विद्यालय के प्रबंधन समिति के अध्यक्ष रहे थे.
बीबीसी हिंदी से बातचीत में उन्होंने कहा, ''इस विद्यालय के जो भी बच्चे हैं, वो जैसे भी प्रार्थना करते हैं, उस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है. किसी जाति-धर्म का कोई आपत्ति नहीं है.''
वो आगे कहते हैं, ''बच्चे को जब स्कूल भेजते हैं, तो गेट के बाद हमारी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो जाती है. ये पूरी तरह से स्कूल के शिक्षकों की ज़िम्मेदारी है कि वो कैसे पढ़ाते हैं, कैसे प्रार्थना करवाते हैं. बच्चे राम का, रहीम का, कृष्ण का नाम ले रहे हैं, तो इस पर हमें कोई आपत्ति नहीं है. ये तो एक ही नाम हैं.''
तो फिर ये हंगामा क्यों? इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं, ''ये मीडिया के द्वारा फैलाया गया है. हम इसकी घोर निंदा करते हैं. गांव में हिंदू-मुसलमान की एकता चट्टान की तरह है.''
वो आगे कहते हैं, ''सवाल ये आया कि दबाव बनाकर प्रार्थना बदलवा दी. हम तो कहते हैं, अभी जो रहा है, क्या वो शरीयत का मामला है? ये केवल राजनीति का हिस्सा है. शिक्षा के मंदिर को शिक्षा का मंदिर ही रहने दिया जाए, इसे राजनीति की जगह नहीं बनाया जाना चाहिए. यहां सभी धर्मों के लोग पढ़ते हैं. ये सरकारी विद्यालय है, इसमें सरकार का जो नियम है, देश का जो संविधान है, उस पर हमें यक़ीन है. हम उसी पर चलते हैं.''
वहीं एक ग्रामीण रामेश्वर चौधरी कहते हैं, ''देखिए प्रार्थना हाथ बांध कर करें या हाथ जोड़ कर, किसी में भी कोई आपत्ति नहीं है. हमें कोई जानकारी नहीं है कि 'प्रार्थना हाथ बांध कर ही हो' इसे लेकर स्कूल पर कोई दबाव बनाया गया है. दबाव देकर प्रार्थना न हाध बांधकर करना चाहिए, न ही हाथ जोड़कर. सबका अपना-अपना अधिकार है. हम स्कूल के बगल में ही रहते हैं, हमें कोई सूचना नहीं है कि दबाव बनाया जा रहा है.''
वहीं एक अन्य ग्रामीण मक़सूद अंसारी का कहना है, ''मेरे हिसाब से दोनों सही है. हम लोग जब पढ़ते थे, तब भी दोनों तरीक़े से प्रार्थना होती थी. किसी ने अलग से नहीं बताया कि हाथ बांध कर करना है या हाथ जोड़ कर. मेरा मानना है कि स्कूल की जो गाइडलाइन है, उसी के हिसाब से होना चाहिए.''
क्या कहता है क़ानून?
इस बारे में झारखंड हाईकोर्ट के वकील सोनल तिवारी कहते हैं, ''28 अक्तूबर, 2013 को बॉम्बे हाईकोर्ट के जज जस्टिस अभय श्रीनिवास ओका और जस्टिस रेवती मोहिते देरे की बेंच ने इस बारे में एक फ़ैसला दिया. अदालत ने बौद्ध धर्म मानने वाले एक शिक्षक संजय साल्वे के मामले में यह फ़ैसला सुनाया था.''
उनके अनुसार, ''इस फ़ैसले के मुताबिक़, स्कूल में किसी को भी हाथ जोड़ने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. हालांकि प्रार्थना गाते समय स्कूल का अनुशासन मानना बाध्यकारी है, लेकिन हाथ जोड़ना नहीं.''
वैसे झारखंड की आबादी की बात करें तो 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य में मुसलमानों की आबादी क़रीब 48 लाख है. प्रतिशत में देखें तो यह आंकड़ा राज्य की कुल आबादी का 14.60 फ़ीसदी है, जबकि गढ़वा ज़िले में मुसलमान आबादी का प्रतिशत 14.7 है. प्रतिशत वाले ये दोनों ही आंकड़े राष्ट्रीय औसत से क़रीब आधा फ़ीसदी ज़्यादा हैं.
बहरहाल, इस गांव के बाहर इस मामले को लेकर भले कितना भी शोर मचा हो, लेकिन गांव में पूरी तरह शांति है. वैसे मीडिया के लोगों और अधिकारियों के आने से इस गांव में थोड़ी हलचल ज़रूर है, पर स्कूल में बच्चों का आना-जाना और गांव में नमाज़ और भजन-कीर्तन का होना पहले की ही तरह जारी है.
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