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जंगलों में पलाश खिले, तो झारखंड में मनेगी होली
- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी के लिए.
'झारखंड के जंगलों में पलाश (टेसू) के फूल खिले हैं. मानो पूरे जंगल में आग लग गई हो. जंगलों के बीच से गुज़रती सड़कें पीले पत्तों से ढकी हैं. वसंत और पतझड़ का यह मिलन किसी पेंटिंग की तरह दिखता है. जैसे यह घरती एक कैनवास हो और कोई चित्रकार अपनी सबसे अच्छी पेंटिंग बना रहा हो. यह नज़ारा भले ही किसी कवि को अपनी प्रेमिका के लिए कुछ लाइनें लिखने पर मजबूर करे, लेकिन झारखंड के लिए यह होली का आमंत्रण है. यह इस बात की मुनादी है कि फागुन (फाल्गुन) पूर्णिमा को होली होगी और चैत (चैत्र) तृतीया को सरहुल.'
पद्मश्री मुकुंद नायक ये पंक्तियां कहते हुए जोश से भर जाते हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "झारखंड इस मायने में इकलौता राज्य है, जहां होली के गीतों में अलग-अलग राग और छंदों का प्रयोग किया जाता है. यहां एक ही गीत में पाँच राग हैं, तो अलग-अलग छंद भी. यही हमारी होली को दूसरों से अलग करता है. यहां की परंपरा में नाचना सबसे बड़ा उत्सव है और गीत हमारी रगों में ख़ून की तरह बहते हैं."
पद्मश्री गायकों की जुगलबंदी
पद्मश्री मुकुंद नायक और पद्मश्री मधु मंसूरी हंसमुख एक साथ बीबीसी से मुख़ातिब हुए.
इन दोनों नामचीन लोक गायकों ने होली की परंपराओं पर विस्तार से बातचीत की. जगह थी - आड्रे हाउस.
ब्रिटिश सिविल सेवा के अधिकारी कैप्टन हैनिंग्टन द्वारा 166 साल पहले (साल-1854) बनवाए गए इस ख़ूबसूरत परिसर में चिड़ियों की चहचहाअट और धूप व बारिश की आंखमिचौनी के बीच हुई बातचीत के दौरान इन्होंने समझाया कि होली कैसे सांप्रदायिक सदभाव का उदाहरण बना है.
पद्मश्री मधु मंसूरी हंसमुख ने कहा, "मैं मुसलमान हूं और मुकुंद नायक घासी (दलित). हम दोनों साथ गाते हैं. होली के एक गीत में घासी और मुसलमान का संवाद होता है. दरअसल, यह गीत सांप्रदायिक सदभाव का सबसे बड़ा उदाहरण है. आज के दौर में देश को ऐसे उदाहरणों की ज़रुरत भी है. हमारे पुरखों (पूर्वजों) ने शायद यही सोचकर ऐसे गीतों की रचना की. आदिवासी समाज हमेशा से ऐसी सामाजिक समरसता का वाहक रहा है. यहां हर जाति-संप्रदाय के लोगों की समान प्रतिष्ठा है."
उन्होंने बीबीसी से कहा, "हिंदू धर्मग्रंथों के मुताबिक़ भगवान राम त्रेता और कृष्ण द्वापर काल के थे. लेकिन, हमारे एक लोकगीत में राम-कृष्ण एक साथ होली खेलते चित्रित किए गए हैं. भगवान कृष्ण अपनी पत्नी राधा के साथ आते हैं, तो राम माता सीता के साथ. इस गीत में एक साथ कई तरह के छंद समाहित किए गए हैं. यह पंचरंगिया के पाँच रागों की तरह है. यही हमारे संगीत का कंट्रास्ट है."
कैसे मनाते हैं होली
रांची विश्वविद्यालय मे जनजातीय भाषा विभाग के अध्यक्ष रह चुके गिरधारी लाल गौंझू ने बीबीसी को बताया कि होली की तैयारी कई दिनों पहले से की जाने लगती है. पलाश के गिरे हुए फूलों को चुनना, उन्हें सुखाना और उससे रंग बनाना मेहनत का काम है. इसके बावजूद आदिवासी समाज इस रंग से ही होली खेलता है. क्योंकि, हमारा समाज मूलतः प्रकृति का उपासक है.
उन्होंने कहा, "आज के दौर में रासायनिक रंगों की बिक्री की जा रही है. केमिकल वाल गुलाल भी बिक रहे हैं. शहरी आबादी पर इसका थोड़ा प्रभाव पड़ा भी है लेकिन गांवों में आज भी पलाश के रंग ही उपयोग में लाए जाते हैं. कुछ शहरी लोग भी इन्हीं रंगों से होली खेलते हैं. इसमें यह नहीं देखते कि कोई हिंदू है या सरना. ईसाई या मुसलमान. यह झारखंडी समाज का त्योहार है. इसके बाद लोग सरहुल की तैयारी करने लगते हैं. तब भी लोग जाति या धर्म नहीं देखते. उसमें पूरा झारखंड शामिल होता है."
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