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अग्निवीरों की भर्ती से भारत सरकार को कितनी आर्थिक राहत मिल पाएगी?
- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्या अग्निपथ योजना लागू करने से भारत का रक्षा बजट कम हो जाएगा या इसके चलते ख़र्च पहले से भी ज़्यादा होगा...ऐसा होगा तो क्या भारत इसके लिए तैयार है?
ये सवाल अहम क्यों है, इस पर हम बात करेंगे.
लेकिन पहले ये जान लेते हैं कि क्या सरकार की ओर से इस सवाल का जवाब दिया गया है.
मैं पहला शख़्स नहीं हूं जिसने इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश की है.
पिछले दो हफ़्तों में कई प्रेस वार्ताओं और इंटरव्यूज़ के दौरान सरकार के प्रतिनिधियों से इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश की गयी है.
अग्निपथ योजना की ख़ास बातें
- भर्ती होने की उम्र 17 साल से 21 साल के बीच होनी चाहिए
- शैक्षणिक योग्यता 10वीं या 12वीं पास
- भर्ती चार सालों के लिए होगी
- चार साल बाद सेवाकाल में प्रदर्शन के आधार पर मूल्यांकन होगा और 25 प्रतिशत लोगों को नियमित किया जाएगा
- इस योजना के तहत भर्ती होने वाले जवान ताउम्र अग्निवीर कहे जाएंगे
- पहले साल की सैलरी प्रति महीने 30 हज़ार रुपये होगी
- चौथे साल 40 हज़ार रुपये प्रति महीने मिलेंगे
मैंने ऐसे ही 20 इंटरव्यूज़ का विश्लेषण किया है और कुछ प्रेस वार्ताओं में हिस्सा लिया है ताकि इस सवाल का जवाब मिल सके. ये वो सारे जवाब हैं, जो सरकार की ओर से आए हैं.
भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि "पैसे के बारे में भूल जाइए, अगर पैसे की ज़रूरत होगी तो हम ख़र्च करने को तैयार हैं. इस मामले में ख़र्च से जुड़ा मसला खड़ा होने का सवाल ही नहीं है."
सैन्य कार्य विभाग में अपर सचिव लेफ़्टिनेंट जनरल अनिल पुरी ने कहा है, "अग्निवीर और पैसों के बीच कोई संबंध नहीं है. हम उन्हें ट्रेनिंग देने और रखने में ज़्यादा ख़र्च करने जा रहे हैं, कोई असर नहीं है. अगर मैं ये भी कहूं कि आप पेंशन में ख़र्च होने वाला पैसा बचाने जा रहे हैं, तो भी आपको क्या लगता है कि इसका असर कब पड़ेगा? इसका कोई असर नहीं है. मेरे पूरे विश्लेषण में आर्थिक पहलू नहीं है."
भारतीय नौसेना के कार्मिक प्रमुख वाइस एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने कहा है, "इस स्कीम का मुख्य उद्देश्य आर्थिक मसले से ऊपर है. हमें किसी भी मौके पर अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए पैसे की कमी महसूस नहीं हुई. अगर इस स्कीम की वजह से पैसा बचेगा तो वह निश्चित रूप से (वापस आएगा)."
क्या आपको इस सवाल का जवाब मिला?
इस सवाल का ठीक-ठीक जवाब जानने के लिए मैंने अपने सवालों के साथ भारतीय रक्षा मंत्रालय से संपर्क किया.
मुझे अब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिला है. लेकिन अब समझते हैं कि ये सवाल अहम क्यों है.
क्यों ख़ास है ये सवाल
बीती 1 फरवरी, 2022 को जारी आम बजट के मुताबिक़, भारतीय रक्षा बजट 5.25 लाख करोड़ का है जो कि आम बजट का 13.31 फीसद है.
इसमें नए इक्विपमेंट खरीदने और नई क्षमताओं के विकास के लिए 1.52 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान है. और 1.19 लाख करोड़ रुपये रक्षा क्षेत्र के कर्मचारियों की पेंशन के लिए है.
जब आम बजट की घोषणा हुई थी तो रक्षा मंत्रालय ने इसका स्वागत किया था. और रक्षा मंत्री ने सोशल मीडिया पर इसके अलग-अलग पहलुओं की तारीफ़ की थी.
लेकिन इन तारीफ़ों के पीछे भारतीय रक्षा बजट से जुड़ा एक चिंताजनक पहलू छिप गया. ये पहलू वेतन और पेंशन पर होने वाले ख़र्च में वृद्धि और इसकी वजह से नई क्षमताओं के विकास, शोध और नए हथियार ख़रीदने में किए जाने वाले निवेश पर पड़ने वाले असर से जुड़ा है.
पढ़िए, सरकार के 15वें वित्त आयोग ने अक्तूबर 2020 को क्या कहा है -
"इसी अवधि (2011-12 से 2018 -19) के दौरान केंद्र सरकार के कुल ख़र्च में से रक्षा ख़र्च का अनुपात 16.4 फीसद से बढ़कर 17.4 फीसद हुआ है.
सरकार के कुल ख़र्च में रक्षा मद में होने वाला ख़र्च 2011-12 में 12.6 फीसद था, जो सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद 2018-19 में बढ़कर 15.1 फीसद हो गया. ये वृद्धि मुख्य रूप से वेतन और पेंशन मद पर खर्च में हुई.
वहीं, दूसरी ओर इसी अवधि के दौरान केंद्र सरकार के कुल राजस्व व्यय में रक्षा पूंजी व्यय का हिस्सा 43.8 फीसद से घटकर 32.4 फीसद था."
इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि 2011 से 2021 के बीच पेंशन पर होने वाला ख़र्च 15.7 फीसद की दर से बढ़ा है, वहीं पूरे रक्षा क्षेत्र पर होने वाले ख़र्च 9.6 फीसद की दर से बढ़ा है. और कुल संसाधन सीमित होने की वजह से पेंशन पर बढ़ने वाले ख़र्च का असर रक्षा क्षेत्र के आधुनिकीकरण के लिए ज़रूरी कोष पर पड़ा है."
इस रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि "सरकार को वेतन एवं पेंशन से जुड़ी देयताओं को कम करने के लिए अविलंब उपाय करने चाहिए और विशिष्ट रोडमैप के साथ रक्षा आयातों पर अपनी निर्भरता को कम करना चाहिए"
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 'अग्निपथ स्कीम' उन विशेष उपायों में शामिल है?
योजना का आर्थिक पहलू
जैसा कि आपने देखा कि रक्षा मंत्रालय ने इस मुद्दे पर खुलकर कोई बयान नहीं दिया है.
ऐसे में बीबीसी ने लगभग 15 सालों तक रक्षा बजट का अध्ययन करने वाले जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ लक्ष्मण बेहेरा से बात की है.
डॉ बेहेरा ने बताया है कि अग्रिपथ स्कीम सेना को युवा बनाने की समस्या का हल तो है, सरकार ने इसका दावा भी किया है लेकिन वित्तीय कारणों ने भी एक भूमिका निभाई है.
वह कहते हैं, "सरकारों के सामने कई मजबूरियां हैं, विशेषत: तब जब रोजगार से जुड़ी नीतियों से इतनी भावनाएं जुड़ी हों. और ये बिलकुल स्पष्ट है कि सरकार वित्तीय पक्ष पर बात नहीं करना चाहती है. लेकिन मेरा मानना है कि इस योजना के पीछे वित्तीय मजबूरियां और संसाधनों की कमी है, जिसका हम सामना कर रहे हैं."
लेकिन सवाल उठता है कि रक्षा बजट के मामले में संसाधनों की कमी का मतलब क्या है.
डॉ बेहेरा इसे समझाते हुए कहते हैं, "इस स्कीम की घोषणा से पहले रक्षा बजट में कर्मचारियों से जुड़ा ख़र्च 60 फीसद था. और सिर्फ 40 फीसद पैसा सैन्य साजो-सामान ख़रीदने, शोध और आवागमन के लिए बचता था जो कि पर्याप्त नहीं था. स्थिति इतनी ख़राब हो गयी है कि सरकार के पास करार करने के बाद भुगतान करने के लिए पैसे नहीं बचे जिससे जो सामान 5 साल में आ जाना था, उसे इससे भी ज़्यादा वक़्त लगने लगा क्योंकि आपके पास पैसे नहीं थे, जिसकी वजह से सामान मंगवाने में देरी करनी पड़ी. इसके साथ ही मौजूदा उपकरणों के रखरखाव पर भी असर पड़ रहा था. इसका मतलब ये है कि आपके पास एक उपकरण है लेकिन अगर उसकी सही समय पर सर्विस नहीं होती है तो उसका असर कम हो जाता है. संसाधनों में कमी बेहद गंभीर प्रभाव छोड़ती है."
ऐसे में सवाल उठता है कि बजट की दृष्टि से अग्निपथ स्कीम कैसे मददगार साबित होगी.
इस सवाल के जवाब में डॉ बेहेरा कहते हैं, "सरकार द्वारा कर्मचारियों पर जो ख़र्च किया जाता है, उसमें बड़ी कमी आएगी. मैं ये क्यों कह रहा हूं? क्योंकि अग्निवीरों की उच्चतम तनख़्वाह 40 हज़ार होगी जो सरकार द्वारा वरिष्ठ सैनिकों को दी जाने वाली तनख़्वाह लगभग 80 हज़ार रुपये से काफ़ी कम है. वेतन के मामले में सरकार प्रति व्यक्ति 20 से 30 हज़ार रुपये बचाएगी. वहीं. पेंशन पर सरकार को तीन चौथाई कर्मचारियों की बचत होगी क्योंकि किसी भी एक बैच में भर्ती होने वाले अग्निवीरों में से 75 फीसद को पेंशन नहीं मिलेगी. इसका बजट पर कितना असर पड़ेगा, ये देखने के लिए हमें दस साल का इंतज़ार करना होगा. लेकिन, पांच सालों में हमें कुछ बदलाव देखने को मिलेगा."
सेना में कितने पद खाली हैं
सेना में मौजूद रिक्त स्थानों की संख्या पर नज़र डालें तो पता चलता है कि इससे जवानों की संख्या कम होगी.
हालांकि, सरकार ने इस मुद्दे पर भी स्पष्ट रूप से कुछ नहीं बोला है.
उदाहरण के लिए, जब लेफ़्टिनेंट जनरल पुरी से पूछा गया तो उन्होंने कहा, "ये पूरी स्कीम एक फ़ैक्टर पर टिकी है और वो है यूथफुलनैस. कुल संख्या कम या ज़्यादा करना उद्देश्य नहीं है. हां, हम संख्या को सही करने की प्रक्रिया में है. रिपेयर और रखरखाव के मामले में हम सेवाएं आउटसोर्स कर सकते हैं. ऐसे में अगर हमें संख्या कम करनी होगी तो हम ऐसे क्षेत्रों से करेंगे जो कि रिपेयर आदि से जुड़े हैं. न कि सशस्त्र बलों से."
आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर 2021 में आर्मी, नेवी और एयरफोर्स में जवान श्रेणी में कुल 1,13000 रिक्तियां थीं. और इसमें उन जवानों की संख्या जोड़िए जो कि हर साल रिटायर होंगे या वक़्त से पहले रिटायरमेंट लेंगे. आर्मी में ऐसे जवानों की संख्या 75 हज़ार है.
अब तक सरकार ने जो कुछ बताया है, उसके मुताबिक़, पहले साल में 46 हज़ार अग्निवीरों की भर्तियां होंगी. इसके बाद 4-5 सालों में ये संख्या साल दर साल 50000-60000 तक पहुंचेगी. इसके बाद 90000-100000 होगी.
ऐसे में इसकी संभावना काफ़ी कम है कि अग्निवीर स्कीम इन रिक्तियों को भी भर पाएगी जिससे वेतन और पेंशन से जुड़ा आर्थिक भार कम होगा.
सरकार द्वारा इस सवाल का स्पष्ट रूप से जवाब न दिए जाने की वजह से हमारा मूल प्रश्न अब तक हल नहीं हुआ है कि क्या अग्निपथ योजना लागू करने से भारत का रक्षा बजट कम हो जाएगा या इसके चलते ख़र्च पहले से भी ज़्यादा होगा...और ऐसा होगा तो क्या भारत इसके लिए तैयार है?
सरकार का कहना है कि इस स्कीम का उद्देश्य रक्षा बजट पर वित्तीय बोझ कम करना नहीं है. लेकिन शायद सरकार इस योजना के ज़रिए इसी उद्देश्य को पूरा करना चाहती है.
हालांकि, अगर खर्च ज़ारी रहता है या बढ़ता है और सरकार खुद को उसी स्थिति में पाती है, जिसमें वह अभी है तो क्या भारत इस स्थिति का सामना कर सकता है?
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