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अग्निपथ: पटना हिंसा के दौरान पत्नी का इलाज करा रहे शख़्स को उठा ले गई पुलिस
- Author, दिलनवाज़ पाशा और शाहनवाज़ अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से
जगह-जगह जले हुए वाहन, स्टेशन कंट्रोल रूम से उठता धुआं, जीआरपी पुलिस स्टेशन के बाहर बदहवास बैठे सिपाही, दीवार पर पत्थर मारे जाने के अनगिनत निशान और बमुश्किल अपनी जान बचाने वाले रेलवे कर्मचारियों के चेहरों पर साफ़ नज़र आ रहा ख़ौफ़.
बिहार की राजधानी पटना के मसौढ़ी क्षेत्र का तारेगना रेलवे स्टेशन किसी युद्ध के मैदान जैसा लग रहा था.
केंद्र सरकार की सेना में अस्थायी भर्ती योजना 'अग्निपथ' का हिंसक विरोध लगातार चौथे दिन जारी रहा. शनिवार को तारेगना रेलवे स्टेशन 'अग्निवीरों' की हिंसा का निशाना बना.
राजधानी पटना में विपक्षी दलों के समर्थन से बुलाए गए बिहार बंद का मिला-जुला असर दिखा. मुख्य बाज़ारों में अधिकतर दुकानें बंद नज़र आईं लेकिन सड़कों पर प्रदर्शनकारी नहीं दिखे. जो चुनिंदा लोग प्रदर्शन में जुटे उन्हें पुलिस ने तितर-बितर कर दिया और कई को शाम तक हिरासत में रखा.
लेकिन पटना से बाहर, कई शहरों और क़स्बों से हिंसा की रिपोर्टें आईं. गया में एक रेलवे कोच को आग लगा दी गई. जहानाबाद ज़िले में एक पुलिस चौकी के बाहर खड़े वाहनों को आग लगा दी गई. यहां एक बस को भी जला दिया गया.
शनिवार को पुलिस ने अलग-अलग स्थानों से 250 लोगों को गिरफ़्तार किया और 25 एफ़आईआर दर्ज कीं. बिहार के एडीजी क़ानून-व्यवस्था संजय सिंह के मुताबिक राज्य में अब तक 718 लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है.
शनिवार को सर्वाधिक हिंसा तारेगना में हुई. हज़ारों युवाओं की भीड़ ने यहां अचानक ही रेलवे स्टेशन पर हमला बोल दिया.
बीबीसी से बात करने वाले प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक़, उग्र प्रदर्शनकारियों का हमला अचानक हुआ और तैनात पुलिसवालों और रेलवे कर्मचारियों को बचने का मौका नहीं मिल पाया.
तारेगना रेलवे स्टेशन पर प्रदर्शनकारियों ने जीआरपी थाने और स्टेशन कंट्रोल रूम को आग लगा दी और यहां जमकर तोड़फोड़ की. सीसीटीवी कैमरे और कंप्यूटर भी तोड़ दिए गए.
बीते चार दिनों में कई शहरों में रेलवे स्टेशनों पर हमला किया गया है. प्रदर्शनकारी केंद्रीय संपत्तियों को निशाना बना रहे हैं. हिंसक विरोध प्रदर्शनों के मद्देनज़र उत्तर मध्य रेलवे ने शुक्रवार को 180 ट्रेनों को रद्द कर दिया और 6 ट्रेनों को रास्ते में ही रोक दिया गया. रविवार को भी सुबह चार बजे से रात 8 बजे तक ट्रेनों का संचालन रद्द कर दिया गया है.
कमरे में बंद होकर बचाई जान
स्टेशन मास्टर राजेश कुमार कहते हैं, "अचानक हज़ारों की संख्या में गिट्टी-पत्थर चलाते हुए प्रदर्शनकारी आए, वो प्रदर्शनकारी नहीं उग्रवादी लग रहे थे. उन्होंने यहां पहुंचते ही आग लगानी शुरू कर दी. बुकिंग ऑफ़िस, पूछताछ ऑफ़िस और पैनल ऑफ़िस समेत हर जगह आग लगा दी. हमने एक कमरे में किसी तरह अपने आप को बंद कर लिया. बाद में पुलिस ने गोली चलाई तो वो यहां से भागे और हम किसी तरह अपनी जान बचा सके."
राजेश कहते हैं, "ये विरोध प्रदर्शन या हंगामा नहीं था बल्कि मौत का तांडव था. हमने अपनी आंखों से मौत को देखा. अगर हम उनके हत्थे चढ़ गए होते तो बच नहीं पाते."
यहीं तैनात एक और कर्मचारी बताते हैं, "प्रदर्शनकारियों ने स्टेशन में आग लगा दी. हम सभी कर्मचारी पैनल रूम में आ गए और किसी तरह ताला लगाया. उन्होंने मुख्य दरवाज़े का ताला तोड़ दिया. हम सभी कमरे में बंद हो गए. काफ़ी देर तक उन्होंने दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश की लेकिन तोड़ नहीं पाए. धुआं अंदर भर रहा था और हमारा दम घुट रहा था. दो-ढाई घंटे बाद किसी तरह पुलिस ने हमें बचाया."
जीआरपी थाने के इंचार्ज रामाधार शर्मा बताते हैं, "हमें ये आशंका थी कि पांच-छह सौ लड़के आएंगे और प्रोटेस्ट करेंगे. हमने ये नहीं सोचा था कि हज़ारों लड़के अचानक धावा बोल देंगे. हमें लगता है कि हमलावरों में छात्र कम और अराजक तत्व ज़्यादा थे."
तारेगना रेलवे स्टेशन पर कवरेज कर रहे स्थानीय पत्रकार अजय शर्मा कहते हैं, "ये प्रदर्शन नहीं था, बल्कि सीधा हमला था. आक्रोशित भीड़ ने कवरेज कर रहे पत्रकारों पर भी हमला किया."
अजय शर्मा कहते हैं, "क़रीब ढाई घंटे तक हंगामा चलता रहा. तैनात पुलिसकर्मी भी भाग गए. जब पटना से अधिक बल आए और पुलिस ने हवाई फ़ायरिंग की तब जाकर प्रदर्शनकारी स्टेशन से भागे."
बिहार के एडीजी संजय सिंह ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "शनिवार को दो जगह घटनाएं हुईं. एक जहानाबाद में और दूसरी पटना ज़िला मुख्यालय से दूर मसौढ़ी में आगज़नी की गई. मसौढ़ी में करीब तीन हज़ार लोग आ गए थे. हमारे पांच पुलिसकर्मी भी घायल हुए. पुलिस बलों को पहंचने में समय लगा."
संजय सिंह के मुताबिक, "जहानाबाद की घटना में क़रीब पचास लोगों को और मसौढ़ी में 61 लोगों को गिरफ़्तार किया गया."
संजय सिंह दावा करते हैं कि इन दो हिंसक घटनाओं के अलावा प्रदेश में बंद शांतिपूर्ण रहा और सिर्फ़ छुट-पुट घटनाएं हुईं.
मसौढ़ी में कई प्रत्यक्षदर्शियों ने नाम न ज़ाहिर करते हुए दावा किया कि प्रदर्शनकारियों की भीड़ शहर में संचालित होने वाले कोचिंग संस्थानों की तरफ़ से आई थी. पटना पुलिस भी हिंसा के पीछे कोचिंग संस्थानों की भूमिका की जांच कर रही है.
हालांकि बीबीसी स्वतंत्र रूप से प्रत्यक्षदर्शियों के दावों की पुष्टि नहीं कर सकी. लेकिन ये पुख़्ता तौर पर ज़रूर कहा जा सकता है कि शनिवार को उग्र भीड़ ने कोई नारेबाज़ी या धरना नहीं किया था बल्कि स्टेशन पर सीधा हमला किया गया.
गिरफ़्तार युवाओं के परिजनों का दावा घर से उठा ले गई पुलिस
मसौढ़ी थाने के बाहर गिरफ़्तार किए गए लोगों की भीड़ थी. भारी बारिश के बीच टिन शेड में खड़ी कई महिलाओं ने ये दावा किया कि उनके बेटों को पुलिस ने घर से उठाया. इन महिलाओं का दावा है कि उनके बच्चे प्रदर्शन में शामिल ही नहीं थे.
लकड़ी का काम करने वालीं नीलम देवी दावा करती हैं कि उनके दो बेटों को पुलिस घर से उठाकर ले गई. उनका दावा है कि उनका छोटा बेटा नाबालिग है और हिंसा से उसका कोई संबंध नहीं है.
बमुश्किल अपने आंसुओं को रोकते हुए नीलम देवी कहती हैं, "मेरे बड़े बेटे रवि ने 12वीं पास की है और कल ही बीए में दाख़िला लिया है. वो एनसीसी में भी है. अचानक पुलिस हमारे घर पहुंची और घर में बैठे मेरे बड़े बेटे रवि और छोटे नाबालिग बेटे को उठा ले गई. मेरा बेटा पूरे दिन घर पर ही था."
थाने के बाहर ही खड़ी मोमीना बेग़म दावा करती हैं, "मेरा बेटा शाहिद अलमारियों पर रंग करने का काम करता है. वो बहुत पढ़ा-लिखा नहीं है और किसी तरह की नौकरी की कोई तैयारी नहीं कर रहा है. वो मोहल्ले के एक दामाद के साथ घर से बाहर निकला था जब पुलिस ने उसे पकड़ लिया. वो कभी किसी तरह के प्रदर्शन में शामिल नहीं हुआ है."
रोते हुए और पुलिस पर आक्रोश ज़ाहिर करते हुए मोमीना कहती हैं, "हम मज़दूर लोग हैं, नौकरी हमारे लिए है ही नहीं तो मेरा बेटा नौकरी के लिए दंगा क्यों करेगा. पुलिस असली दंगाइयों को नहीं पकड़ रही है और हम जैसे कमज़ोर लोगों के बच्चों को उठा रही है."
सिर मुंडवाए और सफ़ेद धोती पहने जीतेंद्र कुमार दावा करते हैं कि उनका भाई पिता की मौत के बाद दाह संस्कार का सामान ख़रीदने गांव से मसौढ़ी बाज़ार आया था जब पुलिस ने उसे उठा लिया.
जीतेंद्र कहते हैं, "मैंने पुलिस अधिकारियों से ग़ुहार लगाई कि मेरा भाई मोमेंद्र कुमार बेगुनाह है लेकिन किसी ने मेरी एक ना सुनी और धक्के मारकर मुझे पुलिस स्टेशन से बाहर निकाल दिया. असली दंगाई पुलिस की पकड़ से दूर हैं और जो पुलिस के हत्थे चढ़ रहा है उसे ही दंगाई बना दिया जा रहा है. पिता की मौत से पहले ही हमारा परिवार सदमे में है, अब भाई की गिरफ़्तारी ने हमें और तोड़ दिया है. हम पिता की मौत का ग़म भी नहीं मना पा रहे हैं."
पत्नी अस्पताल में, दवा लेने गया पति गिरफ़्तार
दयानंद पासवान थाने के बाहर भीगते हुए पॉलीथिन में अस्पताल के दस्तावेज़ लिए खड़े थे. उनका दावा है कि उनकी बेटी अंजलि पासवान ने मसौढ़ी के कैलाश अस्पताल में ऑपरेशन से बच्चे को जन्म दिया है और वो एक सप्ताह से अस्पताल में ही भर्ती हैं.
अंजलि के पति पिंटू पासवान पैसों का इंतज़ाम करने और दवा ख़रीदने 12 बजे के क़रीब अस्पताल से निकले थे और उन्हें भी गिरफ़्तार कर लिया गया.
अंजलि कैलाश अस्पताल के बिस्तर पर अपने नवजात के साथ गुमसुम लेटी हैं. पति की गिरफ्तारी से उन्हें गहरा सदमा लगा है. इसी अस्पताल में काम करने वाले संजय कुमार दावा करते हैं कि पिंटू 12 बजे तक अस्पताल में ही थे और अस्पताल में जमा करने के लिए पैसे निकालने गए थे.
संजय कहते हैं, "जो व्यक्ति पिछले एक हफ़्ते से अपनी पत्नी के साथ अस्पताल में हो वो क्या हिंसक भीड़ में शामिल हो सकता है. उनकी यहां मौजूदगी की सीसीटीवी फुटेज है."
दयानंद पासवान ने पुलिस अधिकारियों से मिलकर अपनी बात रखने की कोशिश की लेकिन उन्हें थाने से भगा दिया गया.
बेगुनाहों की गिरफ़्तारी के सवाल पर एडीजी संजय सिंह कहते हैं, "यदि ग़लती से एक-दो बेगुनाह लोगों को पकड़ लिया गया है तो उन्हें जांच-पड़ताल के बाद छोड़ दिया जाएगा."
पिंटू की गिरफ़्तारी के सवाल पर संजय सिंह कहते हैं, "पुलिस ने सबूतों के आधार पर ही गिरफ़्तारियां की हैं, किसी बेगुनाह को पकड़ा नहीं गया है. आपने पिंटू सिंह के बारे में हमें जानकारी दी है, हम इसकी पड़ताल करेंगे."
और भी गिरफ़्तारियां होंगी
इसी बीच बिहार में गठबंधन सरकार में सहयोगी भारतीय जनता पार्टी ने आरोप लगाया है कि बिहार सरकार उपद्रवियों पर कड़ी कार्रवाई करने से बच रही है.
बिहार के 24 से अधिक ज़िलों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए हैं. सरकार ने 12 ज़िलों में इंटरनेट भी बंद कर दिया है. कई शहरों में पुलिस हिंसा में शामिल लोगों की धरपकड़ कर रही है.
एडीजी क़ानून व्यवस्था संजय सिंह कहते हैं, "सीसीटीवी फुटेज और घटनाओं के उपलब्ध वीडियो के आधार पर उपद्रवियों की पहचान की जा रही है. बिहार पुलिस इस मामले में और भी गिरफ़्तारियां करेगी."
युवाओं में बढ़ता जा रहा है आक्रोश
हिंसा और तनाव के बीच युवाओं का आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है. केंद्र सरकार ने युवाओं को भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि ये योजना उनके लाभ में है.
केंद्रीय बलों में अग्निवीरों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण का ऐलान भी सरकार ने किया है. कई राज्यों ने भी अग्निवीरों को नौकरियों में प्राथमिकता देने की घोषणा की है. बावजूद इसके युवाओं का आक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा है.
मसौढ़ी पटना के रास्ते पर एक चाय की दुकान पर मिले कई युवाओं ने अपना नाम न ज़ाहिर करते हुए कहा, "जो लड़के प्रोटेस्ट में जा रहे हैं वो जानते हैं कि पकड़े जाने पर उनका करियर ख़त्म हो जाएगा. लेकिन फिर भी वो प्रोटेस्ट कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लग रहा है कि उनका आगे कोई करियर है ही नहीं. सरकार की इस घोषणा ने युवाओं के सपनों को तोड़ दिया है. अब युवाओं को सरकार पर भरोसा नहीं है. जब तक ये भरोसा दोबारा पैदा नहीं होगा, रह-रहकर इस तरह के प्रोटेस्ट होते रहेंगे."
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