प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'दो बार पीएम' बनने वाला क़िस्सा क्यों सुनाया ?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में शब्दों का चयन और क़िस्से - कहानियों का ज़िक्र बहुत सोच समझ कर करते हैं. उनके राजनीतिक जीवन को क़रीब से देखने और उस पर लिखने वाले ख़ुद इस बात की तस्दीक भी करते हैं.
इस वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरूच में दिए गए भाषण की चर्चा ख़ूब हो रही है. भरूच में 'उत्कर्ष समारोह' के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वेलफेयर स्कीम के लाभार्थियों को संबोधित कर रहे थे, जिसमें उन्होंने एक क़िस्से का ज़िक्र किया.
"मुझे एक दिन बहुत बड़े नेता मिले. वरिष्ठ नेता हैं, हमारा लगातार विरोध भी करते रहते हैं. मैं उनका आदर भी करता हूं. कुछ बातों को लेकर उनकी नाराज़गी थी. एक दिन मिलने आए. उन्होंने कहा, मोदी जी, क्या करना है. दो-दो बार देश ने आपको प्रधानमंत्री बना दिया. अब क्या करना है?
उनको लगता था कि दो बार प्रधानमंत्री बन गया, तो बहुत कुछ हो गया. उनको पता नहीं है कि मोदी किसी अलग मिट्टी का है. इस गुजरात की धरती ने उसको तैयार किया है. और इसलिए जो भी हो गया, अच्छा हो गया, चलो अब आराम करना है, नहीं, मेरा सपना है सैचुरेशन. 100 प्रतिशत लक्ष्य की तरफ़ आगे बढ़ें."
सैचुरेशन से प्रधानमंत्री मोदी का मतलब केंद्र सरकार की वेलफेयर स्कीम के सभी लाभार्थियों तक पहुँचने की बात कर रहे थे.
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भाषण के इस अंश को समझने के लिए कुछ अहम बातों को परिप्रेक्ष्य में रखने की ज़रूरत है.
- ये भाषण उन्होंने गुजरात में दिया गया जो पीएम मोदी का गृह राज्य है और 27 साल से वहाँ बीजेपी का लगातार शासन रहा है.
- गुजरात में इसी साल अंत में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.
- गुजरात का भरूच वो इलाका है जहाँ मुसलमानों की आबादी अच्छी ख़ासी है.
- साल भर बाद साल 2024 के लोकसभा चुनाव भी होंगे.
ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी को अपने गृह राज्य की जनता को वर्चुअल रैली में संबोधित करते हुए अपने किसी विपक्ष के वरिष्ठ नेता की बात याद आती है तो ये महज संयोग नहीं हो सकता.
वो भी तब जब उनसे किसी ने इस बारे में सवाल नहीं पूछा था.

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बिना सवाल के जवाब के क्यों?
उनके भाषण के इस अंश पर बीजेपी : कल, आज और कल किताब के लेखक और वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं, "इस अंश का एक मैसेज निकाला जा सकता है - प्रधानमंत्री का पद अभी ख़ाली नहीं है. लोग अभी से सपने ना देखें कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा?
प्रधानमंत्री साल 2024 को टारगेट कर रहे हैं. 'नो वेकैंसी' का मैसेज बीजेपी और विपक्षी पार्टी दोनों के लिए है. बीजेपी में जो लोग सोच रहे हैं कि प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी दावेदारी है उनको भी अपने ख़्याली घोड़े नहीं दौड़ाने चाहिए. साथ ही यहीं संदेश विपक्ष के लिए भी है.
विजय त्रिवेदी आगे कहते हैं, "इस बयान को देखने का एक नज़रिया ये भी हो सकता है कि मनमोहन सिंह भी दो बार प्रधानमंत्री रहे हैं. दो बार प्रधानमंत्री बनना मोदी का मक़सद नहीं हो सकता. पीएम मोदी को उनसे तो एक क़दम आगे जाना ही होगा."
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक किंगशुक नाग कहते हैं, "मोदी ने ये भाषण भले ही छोटे से समारोह में कही हो. लेकिन वो ये जानते हैं कि वो जो बोलते हैं वो चारों तरफ़ फैल जाती है. मैं ये नहीं कहता कि उन्होंने पूरी प्लानिंग के तहत ये बात कही है लेकिन एक इशारा तो किया ही है कि वो तीसरी बार भी पीएम की रेस में हैं."

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उम्र की सीमा
प्रधानमंत्री मोदी फिलहाल 71 साल के हैं.
बीजेपी में 75 साल से ऊपर के लिए मार्गदर्शक मंडल का प्रावधान उन्होंने ही शुरू किया था. बीजेपी में अघोषित नियम के मुताबिक़ 75 साल की उम्र के बाद मंत्रिमंडल में रहने की प्रथा नहीं है.
उस लिहाज से पीएम मोदी के इस भाषण के संदेश को पढ़ने की कोशिश करें तो साल 2024 तक पीएम मोदी 73 साल के ही होंगे. तीसरे कार्यकाल के लिए अगर वो अपनी दावेदारी पेश करते हैं तो भी उनके पास 2 साल का वक़्त और होगा.
'मार्गदर्शक मंडल' में शामिल होने और 'उम्र सीमा' वाले अघोषित प्रावधान के दायरे में अगर पीएम मोदी भी भविष्य में आते हैं, तो बीजेपी के भीतर दूसरी कतार के कई नेता ऐसे हैं, जो आगे प्रधानमंत्री के पद की रेस में अपनी जगह तलाश रहे हैं.
साल 2024 की तैयारी

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ये भाषण का अंश क्या ऐसे बीजेपी नेताओं के लिए भी है?
वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय उनके भाषण के इस अंश को साल 2024 की तैयारी के तौर पर देखते हैं. "पीएम मोदी के इस बयान से साफ़ है कि साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में बीजेपी के लिए नेतृत्व परिवर्तन का सवाल नहीं है. ये तय है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ही बीजेपी चुनाव में जाएगी. उनकी सेहत भी भारत सरकार के तमाम मंत्रिगण में सबसे अच्छी है. सबसे ज़्यादा समय भी वो दे रहे है और उनकी लोकप्रियता बढ़ी है. बीजेपी को उन्होंने वहाँ पहुँचा दिया है जहाँ 1920 से 1947 तक कांग्रेस हुआ करती थी."
हालांकि वो मानते हैं कि प्रधानमंत्री का संदेश सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ़ की नेताओं के लिए है.
लेकिन वो ये भी जोड़ते हैं कि बीजेपी में नरेंद्र मोदी के रहते प्रधानमंत्री पद की कल्पना नहीं कर रहा है. जो भी नेता बीजेपी में रह कर प्रधानमंत्री के पद का सपना देख रहा है वो मोदी के बाद के समय के लिए देख रहा है.
नरेंद्र मोदी तीसरी बार पीएम बनने का सपना देख रहे हैं? इस सवाल के जवाब में राम बहादुर राय कहते हैं, " मैं इसे पहली बार, दूसरी बार, तीसरी बार के तौर पर नहीं देखता. कोरोना की वजह से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सभी कोई ट्रांजिशन के दौर से गुज़र रहे हैं. जैसे युद्ध के समय कोई नेतृत्व परिवर्तन की बात नहीं करता उसी तरह से 'ट्रांजिशन' के दौर में भी नेतृत्व परिवर्तन की बात नहीं होनी चाहिए."
गुजरात में मुख्यमंत्री को तौर पर उनको कवर करने वाली वरिष्ठ पत्रकार दीपल त्रिवेदी कहती हैं, "जनता के सामने सार्वजनिक तौर पर इस विजन को शेयर करना मुझे कोई अचरज की बात नहीं लगती. वो किस रोल में रहेंगे, इस पर मैं कुछ नहीं कहना चाहती. 75 साल की उम्र सीमा भले ही उन्होंने ही निर्धारित की हो - लेकिन राजनीति तो बदलाव के लिए ही की जाती है. "

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तुष्टीकरण की राजनीति पर बोले पीएम
भरूच संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि जन कल्याण योजना के '100 प्रतिशत सैचुरेशन' से जनता के अंदर कई मनोवैज्ञानिक परिवर्तन भी होंगे. उनके बारे में विस्तार से बात करते हुए उन्होंने इसके तीन फ़ायदे गिनाएं :
- पहला - देश के नागरिक के अंदर याचक (माँगने) की भावना ख़त्म हो जाती है और कर्तव्य के बीज बो दिया जाता है.
- दूसरा - लाभार्थियों और देने वाले दोनों में भेदभाव का भाव खत्म हो जाता है. लाभार्थी को लगता है कि उसको आज नहीं तो कल योजनाओं का लाभ मिलेगा ही. और देने वाला भी ये नहीं कह सकता है कि तुम मेरे हो इसलिए दे रहा हूं.
- तीसरा - तुष्टीकरण की राजनीति समाप्त हो जाती है.
भाषण के इस अंश में "तुष्टीकरण" वाले हिस्से की बात भी खूब हो रही है.
नीलांजन मुखोपाध्याय ने 'नरेंद्र मोदीः द मैन, द टाइम्स.' नाम से नरेंद्र मोदी पर किताब लिखी है.

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बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "ये कार्यक्रम गुजरात सरकार ने आयोजित किया था. पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही पीएम मोदी गुजरात में आने वाले विधानसभा चुनाव के कैम्पेन में उतर गए हैं. इस भाषण को उसी संदर्भ में देखने की ज़रूरत है.
इस भाषण का एक संदेश ये है कि 2014 में मोदी के दिल्ली चले जाने के बाद गुजरात में एक रिक्त स्थान था, मोदी ये जानते हैं लेकिन जनता के सामने मोदी इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है. इसलिए वो कह रहे हैं, मैं हूं ना. जबकि एक सच्चाई ये भी है कि इन आठ सालों में तीन-तीन मुख्यमंत्री बदलने पड़े हैं.
दूसरा संदेश ये है कि साल 2024 में वो मैदान में हैं और तब तक हैं जब तक सरकारी योजनाएं '100 फ़ीसदी सैचुरेशन' के स्तर पर नहीं पहुँच जाती. वो 100 फ़ीसदी लक्ष्य की प्राप्ति केवल भरूच में नहीं, पूरे गुजरात में नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र में करना चाहते हैं. वो मुख्यत: चार योजनाओं में सैचुरेशन की बात कर रहे हैं - शौचायल, बिजली, बैंक अकांउट और टीकाकरण में. जबकि मोदी सरकार के पिछले आठ सालों के कार्यकाल की बात करें तो सबसे ज़्यादा आघात संवैधानिक अधिकारों का हुआ, संवैधानिक संस्थाओं का हुआ है, न्यायलय पर उंगली उठी है. सरकार की कोशिश रही है कि फ्री राशन जैसी वेलफेयर स्कीम के जरिए इस अधिकारों के हनन की बात ना हो, जनता का मुँह बंद कर दिया जाए, प्रदर्शन ना हो, शाहीन बाग ना बने.
और इसी के बीच में पीएम मोदी 'तुष्टीकरण की राजनीति' की बात भी कर जाते हैं. इन शब्दों का इस्तेमाल बीजेपी की उसी 'साम्प्रदायिक शब्दकोश' का हिस्सा है जिसके ज़रिए वो अपने सपोर्टर को एक संदेश दे जाते हैं कि उनके रहते मुसलमान सिर नहीं उठा सकता."
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