उत्तर प्रदेश चुनावः निषाद समुदाय का वोट अहम पर सरकारों से क्या मिला - ग्राउंड रिपोर्ट

- Author, रॉक्सी गागडेकर छारा
- पदनाम, बीबीसी गुजराती, वाराणसी से
वाराणसी के सुजाबाद में गंगा के किनारे 65 साल के गोपाल निषाद मछली फंसाने के लिए फेंके गए जाल को खींचने की कोशिश कर रहे हैं.
ज़्यादा मछली फंसाने के लिए वे कई घंटों से जाल पानी में डाले हुए हैं, लेकिन हर दिन की तरह ये दिन भी उनके लिए 'लकी' नहीं रहा.
उनके जाल में उम्मीद से कम मछली फंसी है. उनके मुताबिक़, इसकी वजह नदी का प्रदूषण है.
वाराणसी के सुजाबाद किनारे के दूसरी ओर ऐतिहासिक घाट हैं. इन घाटों की कल्पना उत्तर प्रदेश के निषाद समुदाय के मछुआरों और मल्लाहों के बिना नहीं की जा सकती.
इन लोगों का मानना है कि नदी और निषाद समुदाय एक दूसरे पर निर्भर हैं. निषाद समुदाय के लोगों का दावा है कि उनके समुदाय का अस्तित्व गंगा नदी के अस्तित्व के साथ जुड़ा है.

लेकिन निषाद समुदाय की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में बहुत बदलाव नहीं हुआ. पिछले 10 सालों में पहले समाजवादी पार्टी की सरकार और बाद की भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इस समुदाय से कई वादे किए, लेकिन उन वादों को पूरा नहीं किया गया.
निषाद समुदाय के कई लोगों ने बताया कि हर चुनाव से पहले उन्हें केवल वादे मिलते हैं और उनकी समस्याएं ज्यों की त्यों बनी रहती हैं.
ये स्थिति तब है जब उत्तर प्रदेश में निषाद समुदाय की अच्छी खासी आबादी है.
उत्तर प्रदेश की कुल ओबीसी आबादी में 17 से 18 प्रतिशत आबादी निषादों की है. इस हिसाब से मोटे तौर पर यह आकलन लगाया जाता है कि इनकी आबादी यूपी की करीब 140 विधानसभा सीटों के परिणाम को बदलने की भूमिका में है.
यही वजह है कि निषाद समुदाय के विकास के नाम पर कई राजनीतिक दल खड़े हो गए हैं. इनमें सबसे अहम है निषाद पार्टी, जो इस चुनाव में बीजेपी के साथ चुनावी मैदान में है.
बहरहाल निषाद समुदाय के लोगों की मानें तो अभी भी उनके समुदाय के लिए काफ़ी कुछ किया जाना बाक़ी है. ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि उनकी समस्याएं क्या हैं?

इमेज स्रोत, Reuters
आधुनिकीकरण और निजीकरण
निषाद समुदाय के लोगों की आजीविका मुख्य तौर पर गंगा नदी पर निर्भर है. वाराणसी में निषादों की आमदनी का मुख्य स्रोत यहां के घाटों पर आने वाले पर्यटक हैं जो वरुणा और अस्सी घाट के बीच इनके नावों पर सैर करते हैं.
इन निषादों की आमदनी पिछले साल तब प्रभावित हुई जब सरकार ने यहां के घाटों पर क्रूज़ चलाने की अनुमति दे दी.
स्थानीय लोगों के मुताबिक यह लग्ज़री सेवा एक क्रूज़ से शुरू हुई थी और एक साल के अंत तक चार क्रूज़ में तब्दील हो गई और संभावना है कि आने वाले दिनों में इनकी संख्या लगातार बढ़ती जाएगी.

यानी निषाद मछुआरों को अब अपनी आमदनी क्रूज़ चलाने वालों के साथ बांटना पड़ रहा है. यह स्थिति एक साल पहले तक नहीं थी.
वाराणसी के स्थानीय निषाद नेता हरिचंद ने बीबीसी से बताया, ''जब पहली क्रूज़ शुरू हुई थी तो हमसे कहा गया था कि यहां एक ही क्रूज़ रहेगी और निषाद मछुआरों की आजीविका पर कोई असर नहीं होगा. लेकिन क्रूज़ की संख्या बढ़ रही है और हमारी आमदनी पर असर पड़ रहा है.''
हरिचंद और उनका निषाद समुदाय अभी भी इस मुद्दे पर सरकार से बातचीत कर रहे हैं ताकि विकास का असर उनकी आमदनी पर नहीं पड़ी है.

मछली पकड़ने की अनुमति नहीं
निषाद समुदाय की दूसरी समस्या उन निषादों के सामने है जो मछली पालन पर निर्भर थे.
नदी प्रहरी के स्वयंसेवक दर्शन निषाद बताते हैं, "पिछले कुछ सालों में गंगा में मछलियों की प्रजातियों में भारी कमी देखने को मिल रही है. नदी में बढ़ते प्रदूषण और बढ़ते बांधों की वजह से यह हो रहा है."
दर्शन निषाद बताते हैं कि मछलियों की संख्या में भारी कमी के चलते निषाद समुदाय के लोग दिल्ली, लखनऊ, मुंबई में जाकर दिहाड़ी मज़दूरी करने लगे हैं और वे नदी से कट गए हैं.
दर्शन के मुताबिक जो लोग यहां रह गए हैं, उनके पास नाव की मरम्मत कराने के लिए और नए जाल ख़रीदने के लिए पैसे नहीं हैं. इन समस्याओं के साथ वे लगातार सरकार के साथ भी संघर्ष कर रहे हैं.

नदी प्रहरी के एक दूसरे स्वयंसेवी राजेश निषाद ने बताया कि नदी की पुलिस उन्हें मछली निकालने नहीं देती है और कई बार मछली पकड़ने की कोशिशों के चलते वे पुलिस थाने में पहुंच जाते हैं.
उन्होंने बताया, "यह क्षेत्र एक समय में कछुओं का सेंक्चुअरी घोषित किया गया था लेकिन अब यहां कोई भी कछुआ नहीं है. सेंक्चुअरी भी प्रयागराज की तरफ़ खिसक गया है. इसके बाद भी हमलोगों को मछली पकड़ने की अनुमति नहीं है."

खेती की अनुमति नहीं
निषाद समुदायों के कई लोगों के पास जो ज़मीन है वो गंगा नदी में है, जहां पानी उतरने के बाद लोग सब्जियों की खेती किया करते थे.
राजेंद्र साहनी बताते हैं कि सरकारी अधिकारियों के तंग किए जाने के बाद उन्होंने खेती छोड़ दी है. उन्होंने दावा किया कि बिना किसी ग़लती के भी उन्हें जुर्माना भरना पड़ा है.
निषाद समुदाय के एक अन्य नेता प्रमोद निषाद बताते हैं, "राजेंद्र जैसे कई किसान हैं जो नदी के किनारे खेती नहीं कर पा रहे हैं. उन्हें अपने पूर्वजों की ज़मीन से बेदख़ल होना पड़ा है."

अपराधी समुदाय होने का'कलंक'
प्रमोद निषाद बताते हैं कि ब्रिटिशों ने निषाद समुदाय को अपराधी समुदाय के तौर पर चिह्नित किया था, क्योंकि इस समुदाय ने कभी अंग्रेजों के सामने समर्पण नहीं किया था.
प्रमोद निषाद बताते हैं, "हमारे समुदाय पर आरोप था कि हम लोगों ने गंगा नदी के बीच में ब्रिटिश सैनिकों की हत्या की. एक तरह से हम लोगों ने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी लेकिन सरकारों ने हमारी उपेक्षा की. हम लोगों को मूलभूत अधिकार तक नहीं मिले और ऐसा क्यों हुआ, ये मैं नहीं समझ पाया हूं."
चुनावी वादे क्या हैं
हरिचंद ने बताया, "हम लोगों की मांग है कि निषाद समुदाय को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल किया जाए. लेकिन अब तक हमलोगों को केवल वादे मिले हैं, कोई काम नहीं हुआ है."
वे बताते हैं कि समाजवादी पार्टी और योगी आदित्यनाथ की सरकार ने हमें अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने का वादा किया था, लेकिन इस दिशा में कोई पहल नहीं हुई.

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