लालू यादवः चारा घोटाले में कितने मामले, कितनों में मिली सज़ा, क्या है ये घोटाला?

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को झारखंड के रांची में सीबीआई की विशेष अदालत ने सोमवार को चारा घोटाले के पाँचवें (डोरंडा कोषागार केस नंबर : आरसी 47-ए/96) मामले में पाँच साल की क़ैद और 60 लाख रुपये के जुर्माने की सज़ा सुनाई है. कोर्ट ने 15 फ़रवरी को उन्हें दोषी ठहराया था.
झारखंड में लालू प्रसाद यादव के ख़िलाफ़ पशुपालन (चारा) घोटाला का यह पाँचवा और अंतिम मामला था.
इसमें डोरंडा ट्रेजरी से कुल 139.35 करोड़ रुपये की अवैध निकासी के आरोप थे. लालू प्रसाद यादव को झारखंड के अन्य चार मामलों में भी सज़ा हो चुकी है.
सीबीआई ने घोटाले को लेकर कुल 66 मामले दर्ज कराए थे. इनमें से छह में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को भी अभियुक्त बनाया गया था.
अब उनके ख़िलाफ़ सिर्फ़ एक मामला लंबित है. उसकी सुनवाई बिहार की राजधानी पटना की सीबीआई कोर्ट में चल रही है. साल 2000 में बिहार बँटवारे से पहले इन सभी मामलों की सुनवाई पटना की विशेष सीबीआई कोर्ट में ही चल रही थी. झारखंड बनने के बाद इनमें से पाँच मामले झारखंड ट्रांसफ़र कर दिए गए थे.
लालू यादव 15 फ़रवरी को दोषी ठहराए जाने के बाद से राँची के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (रिम्स) में भर्ती हैं और कस्टडी में रहते हुए इलाज करा रहे हैं.
74 साल के लालू यादव को कई तरह की बीमारियाँ हैं. वो सोमवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिग के माध्यम से ही कोर्ट की कार्यवाही शामिल हुए.

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सात बार गए जेल
लालू प्रसाद यादव पशुपालन घोटाले के मामलों में अब तक कुल सात बार जेल जा चुके हैं. चाईबासा ट्रेजरी से अवैध निकासी के मामले में 3 अक्टूबर 2013 को पहली बार सज़ा मिलने के बाद से वो तीन साल से अधिक वक्त जेल में गुज़ार चुके हैं.
हालाँकि इसमें से सिर्फ़ 8 महीने उन्होंने राँची की बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल में गुज़ारा है.
बाक़ी वक्त न्यायिक हिरासत में ही वे इलाज के लिए राँची, दिल्ली और मुंबई के अस्पतालों में भर्ती रहे.
उनके वकील प्रभात कुमार ने बीबीसी से बातचीत के दौरान इसकी पुष्टि की.

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कई नेता बने अभियुक्त
लालू प्रसाद यादव के अलावा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्र, पूर्व मंत्री विद्यासागर निषाद, चंद्रदेव प्रसाद वर्मा व भोलाराम तूफानी और डॉ आर के राणा, जगदीश शर्मा, ध्रुव भगत जैसे राजनेता भी पशुपालन घोटाला के अभियुक्त बनाए गए थे.
इन नेताओं ताल्लुक़ आरजेडी, जेडीयू, कांग्रेस और बीजेपी जैसी पार्टियों से रहा है. इनमें से अधिकतर लोगों को कोर्ट ने सजा भी सुनायी. हालाँकि, डॉ जगन्नाथ मिश्र को सज़ा सुनाने के बाद कोर्ट ने ख़राब सेहत को देखते हुए बाद में उन्हें बरी कर दिया. बाद में उनका निधन हो गया.
इनके अलावा बेक जूलियस, सजल चक्रवर्ती, अरुमुगम, फूलचंद सिंह, महेश प्रसाद, श्रीपति नारायण दुबे जैसे वरिष्ठ आइएएस भी इन मामलों के अभियुक्तों में शामिल रहे हैं और इन्हें अलग-अलग मामलों में सजा हुई.

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लालू यादव को कब, कितनी सज़ा
- 3 अक्टूबर 2013, पहली सज़ा
चाईबासा ट्रेजरी के (आरसी 20-ए/ 96) मामले में सीबीआई के तत्कालीन जज पी के सिंह ने लालू प्रसाद यादव को पाँच साल की क़ैद और 25 लाख रुपये के जुर्माने की सज़ा सुनाई. तब वे दो महीने के लिए राँची की बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल में भी रहे. 13 दिसंबर को उन्हें सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिल गई. इसके बाद वे जेल से बाहर आ गए. इस कारण उन्हें लोकसभा की अपनी सदस्यता गँवानी पड़ी थी. यह 37.7 करोड़ की अवैध निकासी का मामला था.
- 6 जनवरी 2018, दूसरी सज़ा
देवघर ट्रेजरी के (आरसी 64-ए/96) मामले में उन्हें साढ़े तीन साल की क़ैद की सज़ा सुनायी गयी थी. यह कोषागार से 89.27 लाख की अवैध निकासी का केस था.
- 23 जनवरी 2018, तीसरी सज़ा
चाईबासा ट्रेजरी से 33.67 करोड़ की अवैध निकासी के मामले (आरसी 68-ए/96) में सीबीआई कोर्ट ने लालू प्रसाद यादव को पाँच साल की क़ैद और 10 लाख रुपये जुर्माना की सज़ा सुनाई थी.
- 15 मार्च 2018, चौथी सज़ा
दुमका ट्रेजरी से 3.13 करोड़ की अवैध निकासी के इस मामले (आरसी 38-ए/ 96) में सीबीआई कोर्ट ने उन्हें पीसी एक्ट और आइपीसी एक्ट में दोषी करार देकर सात-सात साल की अलग-अलग क़ैद की सज़ा सुनाई. उन पर एक करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया गया.
- 21 फ़रवरी 2022, पाँचवी सज़ा
डोरंडा कोषागार से अवैध निकासी के मामले में उन्हें सोमवार (21 फ़रवरी) को पाँच साल की क़ैद और 60 लाख रुपये के जुर्माने की सज़ा सुनायी गई.

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क्या है पशुपालन (चारा) घोटाला?
अस्सी और नब्बे के दशक में पशुपालन विभाग ने बिहार के विभिन्न कोषागारों से फ़र्ज़ी बिल्स के आधार पर क़रीब 900 करोड़ रुपये की अवैध निकासी की. अधिकारियों के मुताबिक ट्रेजरी की जाँच के क्रम में जब ये बातें अधिकारियों को पता चलीं, तो उनके लिए यह यक़ीन करना मुश्किल था. क्योंकि, तय बजट से अधिक की राशि खर्च की जा रही थी. साल 1985 में बिहार के तत्कालीन महालेखाकार ने भी इस पर आपत्ति की. तब उन्हें जरुरी ब्योरे नहीं मिल रहे थे. तब बिहार में कांग्रेस पार्टी की सरकार थी और डॉ जगन्नाथ मिश्र बिहार के मुख्यमंत्री थे.
इस बीच बिहार की सत्ता बदली और साल 1990 में तत्कालीन जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने. इसके बावजूद अवैध बिल पर धन निकासी जारी रही.
साल 1996 में यह पहली बार व्यापक चर्चा का विषय बना. तब बिहार सरकार ने युवा आइएएस अधिकारी अमित खरे को चाईबासा (पश्चिम सिंहभूम) ज़िले का उपायुक्त बनाकर भेजा. उन्होंने चाईबासा ट्रेजरी में छापा मारकर कई लोगों के ख़िलाफ़ रिपोर्ट दर्ज करायी और ट्रेजरी को सील कर दिया. उसके बाद यह घोटाला पकड़ में आया. तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के आदेश पर कई कोषागारों में छापेमारी की गयी और बिहार पुलिस ने कई रिपोर्टें दर्ज की. हालाँकि बाद में यह मामला सीबीआई को चला गया और तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को भी अभियुक्त बनाया गया.
तब पहली एफ़आइआर करने वाले अमित खरे अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं और इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सलाहकार हैं.
इधर,लालू प्रसाद यादव को इस घोटाले के कारण 25 जुलाई 1997 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा. उसी साल 30 जुलाई को उन्होंने पटना में सरेंडर किया और वे इस घोटाले में पहली बार जेल गए.

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