लालू यादव को चारा घोटाले के पाँचवें मामले में पाँच साल की सज़ा और 60 लाख जुर्माना

लालू प्रसाद यादव

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    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी के लिए

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव को झारखंड में सीबीआई की विशेष अदालत ने चारा घोटाले के पाँचवें मामले में सोमवार को पाँच साल की क़ैद की सज़ा सुनाई. कोर्ट ने उन पर 60 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया. कोर्ट ने उन्हें 15 फ़रवरी को दोषी ठहराया था.

लालू प्रसाद यादव सोमवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए कोर्ट की कार्यवाही में शामिल हुए लेकिन कोर्ट परिसर में भारी भीड़ जमा रही. सुरक्षा के मद्देनज़र पुलिस को अतिरिक्त टुकड़ियां तैनात करनी पड़ी.

लालू प्रसाद यादव के वकील प्रभात कुमार ने बीबीसी हिंदी को बताया, " लालू यादव की उम्र, सेहत और पशुपालन घोटाले के ही दूसरे मामलों में काटी गयी सजा की अवधि को देखते हुए कोर्ट से उनके लिए न्यूनतम सजा की माँग की थी."

लालू यादव के वकील का कहना है कि वो हाई कोर्ट में सज़ा के ख़िलाफ़ अपील करेंगे.

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लालू प्रसाद यादव के बेटे और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने कहा, "ये आख़िरी फ़ैसला नहीं है. इस फ़ैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी जाएगी. मुझे पूर्ण विश्वास है कि निचली अदालत का जो फ़ैसला आया है, वो हाई कोर्ट में बदल जाएगा. लालू जी के पक्ष में ये फ़ैसला आएगा."

अदालत ने जगदीश शर्मा समेत 38 दोषियों को मंगलवार (15 फ़रवरी) को ही सज़ा सुना दी थी. इन्हें तीन साल तक की सज़ा सुनाई गई. इन्हें तुरंत जमानत मिल गई थी.

साल 2017 में चारा और पशुपालन घोटाले के अन्य मामलों में सज़ा मिलने के बाद से लालू यादव कुल आठ महीने जेल में रहे हैं और 31 महीने हॉस्पिटल में. वो आठ महीने रांची स्थित होटवार की बिरसा मुंडा जेल में रहे.

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इसके पहले 15 फ़रवरी को दोषी ठहराए जाने के बाद लालू यादव को रांची के बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल भेजा गया और वहां से वो रिम्स अस्पताल लाए गए. उन्हें यहाँ के पेईंग वार्ड में एडमिट कराया गया ताकि डॉक्टरों की टीम उनके स्वास्थ्य की निगरानी कर सकें.

लालू यादव के वकीलों ने उनकी ख़राब सेहत का हवाला देते हुए सीबीआई कोर्ट में आवेदन किया था जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया.

575 गवाह, 15 ट्रंक सबूत

विशेष लोक अभियोजक बीएमपी सिंह के मुताबिक़ इस मामले में सीबीआई ने 575 गवाह और 15 ट्रंक सबूत अदालत में पेश किए. बचाव पक्ष से सिर्फ़ 25 लोगों ने गवाही दी.

लालू यादव

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लालू यादव के ख़िलाफ़ मामले

नब्बे के दशक के चर्चित करोड़ों रुपये के पशुपालन घोटाले में सीबीआई ने तब कुल 66 मामले दर्ज किए थे.

इनमें से छह मामलों में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को भी आरोपी बनाया गया. बिहार विभाजन के बाद इनमें से पाँच मामले झारखंड में ट्रांसफ़र कर दिए गए.

इन पाँच मामलों में से चार में लालू यादव पहले ही दोषी करार दिए जा चुके हैं. हालाँकि, इन मामलों में उन्हें ज़मानत मिल गई थी.

आरसी 47-ए/96 यहाँ चल रहा पाँचवा और अंतिम मामला था. इसमें साल 1990-91 और 1995-96 के बीच फ़र्ज़ी बिल्स पर अवैध निकासी के आरोप हैं. पैसों की निकासी के लिहाज़ से भी यह सबसे बड़ी निकासी का मामला है.

इसमें लालू प्रसाद यादव के ख़िलाफ़ आइपीसी की धारा 120-बी और भ्रष्टाचार निरोधक क़ानून-1998 की धाराओं 13(2) आर डब्ल्यू 13(1) (सी), (डी) के अंतर्गत आरोप तय किए गए थे.

उनपर आरोप है कि उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए इस मामले में कोई एक्शन नहीं लिया. जबकि कई विधायकों और सांसदों ने क्रमशः विधान परिषद और लोकसभा में यह मामला उठाते हुए कहा था कि पशुपालन विभाग में गड़बड़ियाँ की जा रही हैं और फ़र्ज़ी बिल्स के ज़रिए अवैध निकासी करायी जा रही है.

अदालत में लालू यादव

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कैसे हुई पहली रिपोर्ट

साल 1996 में घोटाले के पर्दाफ़ाश के बाद तत्कालीन बिहार के डोरंडा थाना में 17 फ़रवरी को इसकी एफ़आइआर (नंबर 60/96) दर्ज करायी गयी थी.

उसी साल 11 मार्च को पटना उच्च न्यायालय ने इसकी सीबीआई जाँच का आदेश दिया. इसके बाद सीबीआई ने 8 मई 2001 को 102 आरोपियों के ख़िलाफ़ पहली चार्जशीट दायर की.

फिर 7 जून 2003 को 68 दूसरे आरोपियों पर भी चार्जशीट की गई. 26 सितंबर 2005 को कोर्ट ने कुल 170 अभियुक्तों के ऊपर आरोप तय किया था.

इनमें से 55 अभियुक्तों की मौत ट्रायल के दौरान ही हो गई. आठ दूसरे अभियुक्त सीआरपीसी (दंड प्रक्रिया संहिता 1973) के प्रावधानों के मुताबिक़ सरकारी गवाह (अप्रूवर्स) बन गए. दो अभियुक्तों ने पहले ही दोष स्वीकार कर लिया था.

छह अभियुक्तों का पता नहीं लगा सकी सीबीआई

इस केस की सबसे दिलचस्प बात यह है कि सीबीआई इसके आरोपी छह लोगों का पिछले 25 सालों की लंबी जाँच और क़ानूनी प्रक्रिया के दौरान पता ही नहीं लगा सकी. वे कोर्ट में फ़रार बताए गए हैं.

सीबीआई के वकील बी एम पी सिंह ने मीडिया से बात करते हुए यह बात स्वीकार की.

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