पीएम केयर्स फंड पर सरकार ने क्या जानकारी दी है और क्यों उठ रहे हैं सवाल

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बात साल 2020 के मार्च महीने की है जब कोरोनावायरस की लहर की वजह से देश में पाबंदियां लगनी शुरू हो गयीं थी और महामारी तेज़ी से फैल रही थी.
उसी मार्च महीने की 29 तारीख़ को प्रधानमंत्री ने 'पीएम केयर्स फंड' के स्थापना की घोषणा की थी जिसके माध्यम से देश में पैदा हुई महामारी की अप्रत्याशित स्थिति का मुक़ाबला किया जा सके.
हाल ही में 'पीएम केयर्स फंड' की वेबसाइट पर दो सालों का लेखा जोखा पेश किया गया है. जो जानकारी उपलब्ध कराई गयी है उसके अनुसार इस फंड में कुल 10,990 करोड़ रुपये इकठ्ठा हुए हैं. जो जानकारी वेबसाइट पर साझा की गई उसमें बीते वित्तीय वर्ष यानी मार्च 31, 2021 तक हुए ख़र्च का ही ब्योरा दिया गया है.
ऑडिट की रिपोर्ट बताती है कि मार्च 2021 तक इस राशि से 3,976 करोड़ रुपये ख़र्च किए गए, जो कुल जमा राशि का एक तिहाई हिस्सा है.
हालांकि, मौजूदा वित्तीय वर्ष में इस राशि को किस मद में ख़र्च किया गया या कितनी राशि ख़र्च हुई, इसकी जानकारी वेबसाइट पर मौजूद नहीं है.
ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार जो राशि ख़र्च की गई उसमें प्रवासी मज़दूरों के पलायन को देखते हुए राज्य सरकारों को 1,000 करोड़ रुपये दिए गए जबकि देश के विभिन्न सरकारी अस्पतालों में पचास हज़ार के लगभग वेंटिलेटर मुहैया कराए गए जिसपर 1,131 करोड़ रुपये का ख़र्च हुआ है. साथ ही ये भी बताया गया है कि वैक्सीन की 6.6 करोड़ डोज़ के लिए मार्च 2021 तक 1392 करोड़ रुपये भी इसी मद से ख़र्च किए गए हैं.

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विपक्ष ने लगाया आरोप
हालांकि, आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव अंकुश नारंग ने बीबीसी से कहा कि जो वेंटिलेटर इस फंड के ज़रिए दिए गए थे उनमें बहुत सारे ख़राब निकले जिन्हें राज्य सरकार को बदलना पड़ा. इसी तरह की शिकायत देश के कुछ अन्य राज्यों से भी मिलीं.
नारंग का आरोप है कि प्रवासी मज़दूरों के लिए दिल्ली सरकार को कोई राशि उपलब्ध नहीं कराई गई थी.
छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी का कहना था कि जो वेंटिलेटर उन्हें दिए गए उनमें से बहुत सारे वैसे ही पड़े रह गए क्योंकि उनका संचालन करने के लिए स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों को प्रशिक्षण ही नहीं मिल पाया था.
रिपोर्ट से ये भी पता चलता है कि देश के विभिन्न हिस्सों में आरटी/पीसीआर जांच के लिए 16 लैब की स्थापना में 50 करोड़ रुपये ख़र्च किए गए जबकि 20 करोड़ की राशि से कुछ राज्यों में पहले से मौजूद लैब का आधुनिकीकरण किया गया ताकि लोगों को कोविड की जांच कराने में आसानी हो सके.
इसके अलावा देश भर में 160 ऑक्सीजन प्लांट स्थापित करने के लिए 200 करोड़ रुपये से ज़्यादा ख़र्च किए गए. वहीं 50 करोड़ रुपये बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर और पटना में कोविड अस्पताल बनाने के लिए ख़र्च किए गए.
'पीएम केयर्स फंड' का ऑडिट सार्क एसोसिएट्स नाम की ऑडिट फर्म ने किया है जो वेबसाइट पर मौजूद है. इसमें ये भी बताया गया है कि कहाँ से कितनी राशि मिली है. रिपोर्ट में कहा गया है कि जहाँ 7,183 करोड़ देश के अन्दर से ही स्वैच्छिक दान के माध्यम से जमा हुए, लगभग 494 करोड़ रुपये विदेश से मिले अनुदान के ज़रिए जमा किए गए.
'प्रोग्रेसिव मेडिकोस एंड साईंटिस्ट फोरम' के महासचिव डाक्टर सिद्धार्थ तारा ने बीबीसी से कहा कि जो वेंटिलेटर अस्पतालों में आए भी वो दूसरी लहर के ख़त्म होने के बाद ही आए जब वेंटिलेटर ढूँढने में लोगों को बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा.
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कई सवालिया निशान
तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगता रॉय कहते हैं कि इस फंड में कुल जमा राशि का मात्र 30 प्रतिशत ख़र्च होना अपने आप में कई सवाल खड़े करती है.
बीबीसी से बातचीत के क्रम में वो कहते हैं, "वो बात और है कि इस राशि को सूचना के अधिकार से दूर रखा गया. लेकिन इससे भी ज़्यादा अफ़सोस की बात है कि स्वास्थ्य को लेकर अप्रत्याशित दौर चल रहा है. एक तरह के स्वास्थ्य आपातकाल की स्थिति बनी हुई है. इसके बावजूद सुदूर इलाकों में पिछले दो सालों में स्वास्थ्य प्रणाली को दुरुस्त नहीं किया गया और न ही स्वास्थ्य को लेकर आधारभूत संरचना को ही बढ़ाया गया. लोग कोरोना महामारी से अब भी जूझ रहे हैं क्योंकि उनको ऐसे दौर में भी मुफ़्त चिकित्सा नहीं मिल पा रही है."
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस फंड के स्थापना की घोषणा की थी तो विपक्ष ने इस फ़ैसले पर कई सवाल उठाए. कांग्रेस के अध्यक्ष सोनिया गाँधी सहित प्रमुख विपक्षी दलों ने सरकार से सवाल किया था कि जब प्रधानमंत्री राहत कोष मौजूद है तो फिर इस नए फंड की क्या आवश्यकता थी.
विपक्ष का कहना था कि राज्य स्तर पर भी मुख्यमंत्री राहत कोष स्थापित है और इसमें ही पैसे जमा होने चाहिए थे.
वर्ष 2020 के मई महीने में इस फंड को एक ट्रस्ट के माध्यम से स्थापित किया गया. जिसमें प्रधनामंत्री के चेयरमैन होने के अलावा वित्त मंत्री, गृह मंत्री और रक्षा मंत्री को बतौर ट्रस्टी शामिल किया गया.

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अदालत तक पहुंचा मामला
सूचना के अधिकार के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने पिछले दो सालों में इस फंड को लेकर अदालत के दरवाज़े भी खटखटाए और मांग की कि इसे 'सूचना के अधिकार' में लाया जाना चाहिए और इससे संबंधित जानकारी जब मांगी जाए तो उसे उपलब्ध कराया जाए.
मगर पिछले साल सितंबर माह में दिल्ली उच्च न्यायालय में सरकार ने अपनी याचिका में स्पष्ट किया कि 'पीएम केयर्स फंड' सरकार की कोई 'संस्था' नहीं है बल्कि एक दानशील या 'चैरिटेबल ट्रस्ट' है जिसकी वजह से ये सूचना के अधिकार के दायरे में नहीं आ सकती. ये एक ट्रस्ट है जिसका संचालन सिर्फ़ ट्रस्टी ही करेंगे.
तृणमूल कांग्रेस के सौगत रॉय कहते हैं कि अगर इस फंड पर किसी भी तरह की निगरानी नहीं रखी जा सकती है तो फिर इसमें पारदर्शिता कहाँ से आएगी.
वे कहते हैं, "इस फंड में सरकरी कर्मचारियों ने, सरकारी विभागों ने और निजी कंपनियों ने दान किया है. इसलिए इसके कार्यकलापों में पारदर्शिता होनी ही चाहिए. पैसे ख़र्च नहीं होते हैं और जिन लोगों की कोरोना की वजह से मौत हुई है उनके आश्रितों को उचित मुआवजा भी नहीं मिल पाया. ये चिंता की बात भी है."
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