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पश्चिमी उत्तर प्रदेशः क्या किसी असमंजस में हैं मुसलमान मतदाता?
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अमरोहा ज़िले के एक गांव में हुक्का गुड़गुड़ा रहे एक मुसलमान बुज़ुर्ग से जब ये पूछा गया कि चुनाव में इरादा क्या है तो उन्होंने पलट कर सवाल किया, 'हमारा इरादा ना पूछें, ये बताएं कि हमारे पास विकल्प क्या है?'
उत्तर प्रदेश में क़रीब बीस फ़ीसदी मुसलमान हैं जिनकी अधिकतर आबादी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 20 ज़िलों में मुसलमानों की आबादी 25 फ़ीसदी से भी अधिक है.
इन 20 ज़िलों में से 11 ज़िलों की 58 सीटों पर पहले चरण में 10 फ़रवरी को मतदान होना है. जबकि 9 ज़िलों की 55 सीटों पर दूसरे चरण में 14 फ़रवरी को मतदान होना है.
अशिक्षा, ग़रीबी, बेरोज़गारी के अलावा सामाजिक सुरक्षा यहां लोगों के लिए बड़ा मुद्दा है. लेकिन लोगों से बात करके ये अंदाज़ा लगता है कि चुनाव में वोट डालते समय शायद मुद्दों पर पहचान हावी हो जाए.
डॉक्टर हुस्न बानो अमरोहा के हाशमी गर्ल्स डिग्री कॉलेज की वाइस प्रिंसिपल हैं. बीबीसी से बात करते हुए हुस्न बानों कहती हैं, "मुद्दे बहुत हैं, मतदाता के तौर पर हम इन पर स्पष्टता चाहते हैं. रोज़गार एक बड़ा मुद्दा है. हम चाहते हैं कि सरकार भले ही राशन ना दे लेकिन रोज़गार दे. महिलाओं की सुरक्षा भी अहम मुद्दा है. आज भी दहेज की समस्या है. लेकिन कोई इन सब मुद्दों पर बात नहीं कर रहा है."
डॉक्टर हुस्न बानो कहती हैं, "हम भारत के नागरिक हैं. भारत के नागरिक के तौर पर हमारे कई अहम मुद्दे हैं. लेकिन मुसलमानों के लिए विडंबना ये है कि कहीं ना कहीं उनकी पहचान उनके मुद्दे पर हावी हो जाती है."
डक्टर. बानो कहती हैं, "सबका साथ सबका विकास की बात की जाती है. लेकिन सबका विकास कहां हैं? कोई अच्छा था वो और बेहतर हुआ ये विकास नहीं है. विकास ये होता है कि कोई खड़ा था, परेशान था, उसे कुर्सी मिली, सुक़ून मिला. हम चाहते हैं कि ऐसा विकास हो जिसमें सब शामिल हों."
सरकार ने दावा किया है कि तीन तलाक़ का क़ानून लाकर मुसलमान महिलाओं को आज़ादी दी है, लेकिन मुसलमान महिलाएं मानती हैं कि ये बस दिखावा है, इससे महिलाओं की स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है.
अमरोहा की ही रहने वाली एक पर्देदार महिला कहती हैं, "सरकार कहती है तीन तलाक़ का क़ानून लाई. लेकिन इससे हमें क्या मिला. मुसलमानों ने तो इसका विरोध ही किया, हमने भी विरोध किया. सवाल ये है कि क्या इससे मुसलमानों की स्थिति में बदलाव आया है. ना रोज़गार है, ना आर्थिक संसाधन."
ये महिला कहती हैं, "महंगाई इतनी ज़्यादा है कि हमने घर में बिजली के उपकरण इस्तमाल करने बंद कर दिए हैं कि कहीं मीटर तेज़ ना घूम जाए. महंगाई हमारे लिए सबसे बड़ा मुद्दा है, लेकिन कोई इस पर बात ही नहीं कर रहा है."
महिलाएं जहां घर के ख़र्च को लेकर चिंतित हैं वहीं युवा मुसलमान मतदाताओं में अपनी पहचान को लेकर एक छटपटाहट दिखाई देती है.
कई युवाओं को ये लगता है कि सभी राजनीतिक दल मुसलमानों से एक दूरी बनाने की कोशिश कर रहे हैं और ऐसी परिस्थितियों में मुसलमानों को अपना नेतृत्व खड़ा करना चाहिए. उनका इशारा असदउद्दीन ओवैसी की तरफ़ था. हालांकि बहुत कोशिशों के बाद भी असदउद्दीन ओवैसी चुनावों में मुसलमानों को ख़ास प्रभावित करते नहीं दिख रहे हैं.
मुसलमान प्रत्याशियों से परहेज़?
पहले चरण की 40 सीटों पर समाजवादी पार्टी ने 12 मुसलमान प्रत्याशियों को उम्मीदवार बनाया है जबकि बीएसपी ने 58 में से 16 और कांग्रेस ने 58 में से 11 मुसलमान उम्मीदवार उतारे हैं. बीजेपी ने यहां से एक भी मुसलमान उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है.
सबसे ज़्यादा चर्चा मुज़फ़्फ़रनगर की हो रही है जहां एक तिहाई से अधिक आबादी मुसलमानों की है. यहां बुढ़ाना, मीरापुर और चरथावल विधानसभा क्षेत्रों में मुसलमानों की बड़ी आबादी है. लेकिन ज़िले की सभी छह विधानभा सीटों में से किसी पर भी समाजवादी पार्टी गठबंधन ने एक भी मुसलमान उम्मीदवार नहीं उतारा है.
स्थानीय पत्रकार अमित सैनी बताते हैं, "मुज़फ़्फ़रनगरर की छह विधानसभा सीटों में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के गठबंधन ने एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया है. इसे लेकर मुज़फ़्फ़रनगर और आसपास के ज़िले के मसलमानों में एक टीस नज़र आ रही है. गठबंधन के प्रत्याशी इस मुग़ालते में नज़र आते हैं कि मुसलमान समाज पूरी तरह से उनके ही साथ हैं, लेकिन जिस तरह से मुज़फ़्फ़रनगर में गठबंधन ने कोई मुसलमान उम्मीदवार नहीं दिया है, उसकी नाराज़गी मतदाताओं में दिख जाती है."
सैनी कहते हैं, "मायावती ने इस परिस्थिति को भुनाने की कोशिश की है और मुज़फ़्फ़रनगर की 6 विधानसभा में से तीन सीटों पर मुसलमान उम्मीदवार उतार दिए हैं. ऐसा लग रहा है मायावती गठबंधन का खेल ख़राब करना चाहती हैं."
सैनी कहते हैं, "मुसलमान मतदाता अभी ख़ामोश हैं, कुछ भी खुलकर नहीं बोल रहे हैं. हमें लगता है कि वोट करने से पहले मतदाता ये सोचेगा कि उनका जो उम्मीदवार जीत रहा है उसे ही वोट किया जाए. सपा और रालोद गठबंधन ये दावा कर रहे हैं कि सभी मुसलमान उनके साथ हैं, लेकिन ऐसा नहीं है."
पैदल हुए बड़े मुसलमान राजनेता
सहारनपुर के चर्चित अल्पसंख्यक नेता इमरान मसूद कांग्रेस छोड़कर समाजवादी पार्टी में आए हैं, लेकिन उन्हें टिकट नहीं दिया गया है. वहीं मुज़फ़्फ़रनगर का राणा परिवार भी चुनाव मैदान में नहीं है.
कैराना से पूर्व सांसद और मुज़फ़्फ़रनगर के दिग्गज नेता अमीर आलम खां और उनके बेटे नवाज़िश आलम भी रालोद से टिकट चाहते थे, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला.
वहीं मेरठ में याक़ूब क़ुरैशी और शाहिद अख़लाक़ जैसे नेता भी टिकट नहीं पा सके. हालांकि किठोर सीट से शाहिद मंज़ूर ज़रूर उम्मीदवारी कर रहे हैं.
वहीं अमरोहा की नौगांवा सादात से टिकट मांग रहे पूर्व मंत्री कमाल अख़्तर को समाजवादी पार्टी ने मुरादाबाद की कांठ सीट पर भेज दिया है.
मुरादाबाद ज़िले में सर्वाधिक टिकट मुसलमान उम्मीदवारों को दिए गए हैं. यहां कुंदरकी सीट पर समाजवादी पार्टी ने विधायक हाजी रिज़वान का टिकट काट कर संभल से सांसद डॉक्टर शफ़ीकुर्रहमान बर्क़ के पोते ज़ियाउर्रहमान को दिया है. हाजी रिज़वान अब बहुजन समाज पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं.
पश्चिमी यूपी के वरिष्ठ पत्रकार ओबैदुर्रहमान मानते हैं कि मुसलमान नेताओं के टिकट काटने की नाराज़गी मतदाताओं में दिखाई दे रही है. ओबैदुर्रहमान कहते हैं, "हालांकि अधिकतर मुसलमान मतदाता किसी एक ख़ास दल की तरफ़ ही अपना रुख़ बनाए हुए हैं, लेकिन इस बार उस दल में भी कद्दावर मुस्लिम नेताओं को दरकिनार कर उनके टिकट काट देने से मुस्लिम मतदाताओं का मोहभंग हो गया है और वह नाराज़ दिखाई दे रहे हैं.''
रहमान कहते हैं, "जिन कद्दावर नेताओं के टिकट काटे गए हैं वह बग़ावत कर अन्य दलों से चुनाव लड़ रहे हैं जिससे मुसलमान मतदाताओं के वोटों का बंटवारा होना निश्चित है. इसके अलावा मुसलमान बहुल सीटों पर भाजपा के सिवा अन्य सभी दलों ने ज़्यादातर मुसलमान प्रत्याशियों को ही चुनाव मैदान में उतारा है उससे भी मुसलमान मतों का विभाजन होता नज़र आ रहा है. मुसलमान मतदाता परिवर्तन चाहते हैं, लेकिन वह अलग-अलग रास्तों पर बंटे हुए दिखाई दे रहे हैं. "
असमंजस में हैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुसलमान?
पश्चिमी यूपी में जितने भी मुसलमान मतदाताओं से हमने बात की उनमें से ज़्यादातर का झुकाव समाजवादी पार्टी गठबंधन की तरफ़ नज़र आया, भले ही उनमें पार्टी नेताओं के प्रति नाराज़गी हो.
हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि मुसलमान मतदाता असमंजस में नज़र आ रहे हैं. वरिष्ठ पत्रकार ओबैदुर्रहमान कहते हैं, "पश्चिमी यूपी के मुसलमान मतदाता असुरक्षा और भेदभाव की वजह से इस बार असमंजस की स्थिति में दिखाई दे रहे हैं. वैसे तो हर बार की तरह इस बार भी किसी एक दल को सत्ता दिलाने और दूसरे दल को सत्ता से रोकने के अलावा उनका कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं दिखाई दे रहा है, लेकिन फिर भी इस बार कुछ मतदाता मुसलमानों की अपनी पार्टी और अपना नेता के पक्षधर ज़रूर दिखाई दे रहे हैं."
रहमान मानते हैं कि मौजूदा चुनावी माहौल में मुसलमानों के मुद्दे कहीं पीछे छूट गए हैं. वो कहते हैं, "साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण में शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोज़गारी और क़ानून व्यवस्था जैसे मुद्दे कहीं पीछे छूट गए हैं और नेता जातियों और धर्मो के आंकड़ों के हिसाब से बयानबाज़ी कर वोटों को अपने अपने पक्ष में करने में जुटे हुए हैं."
स्थानीय राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार मुस्तकीम का नज़रिया इससे अलग है. मुस्तकीम कहते हैं, "इस बार चुनाव में सांप्रदायिकता कुछ कम नज़र आ रही है. ऐसा लग रहा है कि मतदाता अपने मुद्दों को भी अहमियत दे रहे हैं. इसकी एक वजह ये भी है कि मतदाता अब जागरुक हो गए हैं. वोटर इस बात पर फ़ोकस कर रहा है कि कौन नेता समाज को जोड़कर रख पाएंगे. मतदाता आपराधिक छवि के उम्मीदवारों को भी नकारना चाहते हैं. मुझे लगता है कि अभी हिंदू-मुसलमान की राजनीति थोड़ा कमज़ोर पड़ रही है."
हालांकि वो मानते हैं कि राजनीतिक दल किसी भी तरह से सांप्रदायिकता के आधार पर वोट हासिल करना चाहते हैं. ऐसे प्रयास भी हो रहे हैं. नेताओं को ऐसा लगता है कि सांप्रदायिक भाषा बोलने से उसका मतदाता उत्साहित हो जाता है.
मुस्तकीम कहते हैं, "मुरादाबाद मंडल की अधिकतर सीटों पर गठबंधन और दूसरे दलों ने मुसलमान मतदाताओं पर दांव खेला है जबकि बीजेपी ने अन्य पिछड़ा वर्ग को अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश की है. फ़िलहाल मुसलमान मतदाता किसी एक दल या उम्मीदवार पर एकजुट नज़र नहीं आ रहे हैं बल्कि वो अपनी सीट के उम्मीदवार पर फ़ोकस कर रहे हैं."
राजनीतिक विश्लेषक और स्थानीय मतदाता ये मानते हैं कि कहीं ना कहीं समाजवादी पार्टी गठबंधन मुसलमानों की पहली पंसद बना हुआ है.
हालांकि अखिलेश यादव ने मुसलमानों और उनके मुद्दों से एक निश्चित दूरी बनाई हुई है. वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि अखिलेश नहीं चाहते कि वो मुसलमानों के अधिक क़रीब दिखें और इससे काउंटर पोलराइज़ेशन हो.
वहीं वरिष्ठ पत्रकार मुस्तकीम कहते हैं, "अखिलेश यादव ने पिछली बार मुसलमानों को 18 फ़ीसदी आरक्षण देने का वादा किया था, लेकिन इस दिशा में कोई क़दम नहीं उठाया. स्कूल कॉलेजों में उर्दू टीचरों की जगहें खाली पड़ी रहीं. मुसलमानों के प्रति अखिलेश की कथनी करनी में फ़र्क रहा. यही वजह है कि पढ़ा-लिखा मुसलमान कहीं ना कहीं अखिलेश से भी नाराज़ है. हालांकि अखिलेश को लगता है कि मुसलमान हमारे पास नहीं आएंगे तो कहां जाएंगे."
तो क्या मुसलमान मतदाता बीजेपी को भी वोट दे सकते हैं. इस सवाल पर मुस्तकीम कहते हैं, "हालांकि ये स्पष्ट नज़र आ रहा है कि मुसलमान बीजेपी को वोट करने नहीं जा रहा है. इसकी वजह ये है कि बीजेपी उदार नहीं रही है. जो कठोर भाषा बीजेपी ने इस्तेमाल की उसकी वजह से मुसलमान बीजेपी की तरफ़ नहीं जा रहे हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो बड़ी तादाद में मुसलमान बीजेपी के लिए वोट करते. भले ही बीजेपी सरकार ने योजनाओं में भेदभाव न किया है, लेकिन मुसलमानों के प्रति कठोर भाषा स्पष्ट नज़र आती है और इसे लेकर मुसलमानों में नाराज़गी है."
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