उत्तर प्रदेश चुनाव: मुज़फ़्फ़रनगर में कितनी बाकी है 'दंगे की आंच'- ग्राउंड रिपोर्ट

    • Author, वात्सल्य राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुज़फ़्फ़रनगर

"वोट देने में ग़लती मत करना नहीं तो मुज़फ़्फ़रनगर फिर से जल उठेगा. "

गृह मंत्री अमित शाह शनिवार को मुज़फ़्फ़रनगर आए तो यही संदेश दिया. संदेश सिर्फ़ वोटरों ही नहीं, अपने कार्यकर्ताओं के लिए भी था.

साल 2013 के बाद से मुज़फ़्फ़रनगर के ज़िक्र के साथ सियासी गलियारों में भले ही दंगों पर चर्चा शुरू हो जाती हो लेकिन इस ज़िले की पहचान गन्ने और गुड़ की मिठास के लिए भी रही है.

'डोर टू डोर' जनसंपर्क में अमित शाह जहां घूमे वहां से महज कुछ किलोमीटर पर वो गुड़ मंडी है, जिसे एशिया की तमाम गुड़ मंडियों में अव्वल बताया जाता है.

शाह के दौरे के कुछ ही घंटे बाद गुड मंडी के कारोबारी सुरेश चंद जैन ने बीबीसी से कहा, "ख़तरा है कि इस बार छह में से दो सीट हाथ से जा सकती है."

खुद को भारतीय जनता पार्टी का समर्थक बताने वाले जैन मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले की छह विधानसभा सीटों का ज़िक्र कर रहे थे.

साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने सभी छह (सदर, बुढ़ाना, पुरकाजी, खतौली, चरथावल और मीरापुर) सीटों पर जीत हासिल की थी.

किस मुद्दे का कितना ज़ोर?

राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि बीजेपी की कामयाबी में जाट वोटरों के समर्थन की बड़ी भूमिका रही.

वहीं, जैन का आंकलन है, "जब से बीजेपी सरकार आई है तब से क़ानून व्यवस्था बेहतर हुई है लेकिन किसान आंदोलन जो चला, उसकी वजह गठबंधन का समर्थन मजबूत हुआ है."

वो कहते हैं, "जो जाट हैं, जिनके दिमाग में ये घुस गया है कि मुझे तो देना ही नहीं है, वो वोट बीजेपी को नहीं पड़ेगा. किसान आंदोलन का असर है. चाहे हम कितना भी प्रयास कर लें लेकिन 25-30 प्रतिशत तो असर रहेगा."

कई लोग महंगाई, बेरोज़गारी, आमदनी न बढ़ने की शिकायत करते हुए इन्हें भी मुद्दा बताते हैं, लेकिन ज़्यादातर लोगों की राय में किसान आंदोलन और किसानों से जुड़े मुद्दे बहुत अहम हैं.

मसलन, आवारा पशुओं, गन्ना भुगतान और किसान नेताओं को लेकर सरकार के रुख से जुड़े मामले और इनका असर चुनाव नतीजों पर भी दिख सकता है.

'स्कोर रहेगा 6/6'

हालांकि, बीजेपी नेता दावा करते हैं कि उनका 'किला सुरक्षित' है.

ज़िले की सदर सीट से विधायक और प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार में स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री कपिलदेव अग्रवाल ने बीबीसी से बातचीत में दावा किया, " जनपद की सभी छह सीटें हम जीत रहे हैं. मैं ज़िम्मेदारी से ये बात कह रहा हूं."

ऐसा ही दावा समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल गठबंधन के नेता भी कर रहे हैं.

राष्ट्रीय लोकदल के राष्ट्रीय सह संयोजक सुधीर भारतीय मुज़फ़्फ़रनगर में गठबंधन प्रत्याशियों के प्रचार की कमान थामे हुए हैं.

सुधीर भारतीय ने बीबीसी से कहा, " हमारा स्कोर होगा छह में से छह."

मुज़फ़्फ़रनगर की राजनीति पर दशकों से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रणवीर सिंह कहते हैं, "यहां लड़ाई सीधी है. सभी छह सीटों पर मुक़ाबला बीजेपी और गठबंधन के बीच है."

रणवीर सिंह और कई दूसरे राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि दोनों दलों के सामने दिक्कतें भी करीब-करीब एक सी हैं.

कई सीटों पर गठबंधन और बीजेपी प्रत्याशियों का इन दलों के समर्थक ही विरोध कर रहे हैं.

बीजेपी को किसी सीट पर बाहरी बनाम स्थानीय प्रत्याशी की चुनौती से निपटना पड़ रहा है तो कहीं अलोकप्रिय नेता को टिकट देने की शिकायत झेलनी पड़ रही है. इसे भी बीजेपी की कमज़ोर कड़ी बताया जा रहा है. लेकिन, कपिलदेव अग्रवाल का दावा है, "अब कोई नाराज़गी नहीं."

'बीजेपी चाहती थी हम मुस्लिम को टिकट दें'

वहीं, राष्ट्रीय लोकदल के कार्यकर्ता अपने सिंबल पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार उतारने को लेकर शिकायत कर रहे हैं.

एक बड़ी शिकायत ये भी है कि ज़िले में करीब 30 फ़ीसदी मुसलमान वोटर होने के बाद भी राष्ट्रीय लोकदल और समाजवादी पार्टी गठबंधन ने किसी मुसलमान को टिकट नहीं दिया.

इस पर सुधीर भारतीय कहते हैं, "हम भारतीय जनता पार्टी की पिच पर बिल्कुल नहीं खेलना चाहते."

वो दावा करते हैं, " भारतीय जनता पार्टी चाहती थी कि हम एक मुस्लिम को मुज़फ़्फ़रनगर में टिकट दें और जहां हम मुस्लिम प्रत्याशी उतारते, अमित शाह जी वहीं से चुनाव प्रचार शुरू करते."

सुधीर भारतीय कहते हैं कि ध्रुवीकरण की राजनीति का सबसे ज़्यादा नुक़सान राष्ट्रीय लोकदल को हुआ.

वो कहते हैं, "जब किसान, किसान न रहकर हिंदू मुसलमान हो गया तब हमें ही तो नुक़सान होना था. बांटना बहुत आसान है, जोड़ना बहुत मुश्किल काम है. 2013 में एक घटना हुई. लोगों तक 2013 दंगे वाली बात जाती है लेकिन उसके बाद वाली बात नहीं जाती है. 2014, 2017 और 2019 में हमने खामियाजा भुगता."

सुधीर भारतीय कहते हैं कि उनके गठबंधन ने मुसलमान प्रत्याशी भी उतारे हैं. उनके मुताबिक "सिवालखास (मेरठ) की जाट बहुल सीट पर जाटों का टिकट काटकर मुस्लिम को दिया है."

वो आरोप लगाते हैं, "भारतीय जनता पार्टी ने मुज़फ़्फ़रनगर को दंगों की प्रयोगशाला बनाकर रख दिया था. खाई पटाने के मक़सद से चौधरी अजित सिंह ने (2019 के लोकसभा चुनाव में) यहां से चुनाव लड़ने की हिम्मत दिखाई. हार के बाद भी उन्होंने लोगों से कहा कि जिस मक़सद से मैं यहां आया था, वो पूरा हो गया कि हिंदू और मुस्लिम ने एक जगह वोट किया है."

'मुसलमानों का वोट सबसे ज़्यादा'

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के संजीव बालियान ने चौधरी अजित सिंह को करीब छह हज़ार वोटों के अंतर से हराया था. बालियान अब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में राज्यमंत्री हैं.

अजित सिंह का बीते साल निधन हो गया. अब उनके बेटे और राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख चौधरी जयंत सिंह मुज़फ़्फ़रनगर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वोटरों को अजित सिंह की याद दिला रहे हैं.

हालांकि, मुज़फ़्फ़रनगर में किसी मुसलमान को गठबंधन का टिकट नहीं मिलने का मुद्दा दूसरे विरोधी भी उठा रहे हैं.

बहुजन समाज पार्टी के सेक्टर प्रभारी ज़ियाउर रहमान दावा करते हैं कि मुस्लिम समाज को 'सम्मान न मिलने से' कई लोग समाजवादी पार्टी से नाराज़ हैं.

कई विश्लेषक भले ही बीएसपी को मुख्य मुक़ाबले में नहीं बता रहे हों लेकिन ज़ियाउर रहमान का दावा कुछ और है.

वो कहते हैं, "ये (सपा-आरएलडी) गठबंधन जो हुआ है, मुसलमानों के वोट को लेकर ही हुआ है. यहां मुस्लिम समाज का सबसे ज़्यादा वोट है. "

रहमान आगे कहते हैं, "गठबंधन ने यहां एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया है. हमारी पार्टी ने मुस्लिम समाज के, मेरे समाज के तीन लोगों को टिकट दिया है. हम छह की छह सीटों पर मजबूती के साथ चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन बुढ़ाना, मीरापुर और चरथावल में हमारा आधार सबसे मजबूत है."

कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष दीपक कुमार पुरकाजी (सुरक्षित) सीट पर अपना पलड़ा भारी बता रहे हैं. वो यहां ख़ुद उम्मीदवार हैं. पिछले चुनाव में उन्हें करीब नौ हज़ार वोटों से हार झेलनी पड़ी थी.

वो दावा करते हैं, "पिछली बार दूसरे नंबर पर था. इस बार मैं ही जीतूंगा. बीएसपी का हश्र तो बहुत खराब होने जा रहा है. बाकी जगह मुसलमानों का वोट भले ही गठबंधन को मिले लेकिन यहां मेरे लिए डिवीजन होगा."

दंगों के सवाल पर क्या बोले बीजेपी नेता?

उधर, भारतीय जनता पार्टी का पूरा ध्यान अखिलेश यादव और चौधरी जयंत सिंह के गठबंधन से मिलने वाली चुनौती पर है. बीजेपी नेता और कार्यकर्ता इस गठबंधन और उनके समर्थकों की कमज़ोर कड़ियां तलाशने की कोशिश में हैं.

प्रदेश सरकार के मंत्री कपिलदेव अग्रवाल बीजेपी के दूसरे नेताओं की तरह चौधरी जयंत सिंह के प्रति नरमी दिखाते हैं.

वो कहते हैं, "सब साथ आएं इसमें क्या बुराई है. अगर कोई हमसे रूठा है तो उसे मनाना हमारी ज़िम्मेदारी है."

लेकिन, समाजवादी पार्टी को लेकर वो हमलावर दिखते हैं.

कपिलदेव अग्रवाल आरोप लगाते हैं, "ये लोग हमेशा गुडों को, माफियाओं को, आतंकियों को संरक्षण देने का काम करते हैं."

क्या 2013 में हुए दंगे अब भी कोई मुद्दा हैं, इस सवाल पर वो कहते हैं, "निश्चित रूप से ये मुद्दा रहेगा. ये कैसे ख़त्म हो सकता है."

यानी, हर पार्टी ने लाइन तय कर ली है और अब वोटरों पर है कि वो किस तरफ आगे बढ़ते हैं.

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