उत्तर प्रदेश: स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान के इस्तीफ़े के बीजेपी, समाजवादी पार्टी के लिए क्या मायने

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- Author, वात्सल्य राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दारा सिंह चौहान ने उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार से इस्तीफ़ा दे दिया है. प्रदेश सरकार में उनके पास वन, पर्यावरण और जंतु उद्यान मंत्रालय की ज़िम्मेदारी थी.
योगी आदित्यनाथ सरकार को दो दिन में ये दूसरा झटका लगा है. इसके पहले मंगलवार को श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा देते हुए भारतीय जनता पार्टी से राहें अलग करने के एलान किया था.
दारा सिंह चौहान ने भी स्वामी प्रसाद मौर्य की ही तरह भारतीय जनता पार्टी की योगी आदित्यनाथ सरकार को कठघरे में खड़ा किया है.
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दारा सिंह चौहान ने राज्यपाल के नाम लिखे पत्र में कहा है, " पिछड़ों, वंचितों, दलितों, किसानों और बेरोजगार नौजवानों की घोर उपेक्षात्मक रवैए के साथ-साथ पिछड़ों और दलितों के आरक्षण के साथ जो खिलवाड़ हो रहा है, उससे आहत होकर मैं उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा देता हूं."
उत्तर प्रदेश सरकार में उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने मंगलवार को स्वामी प्रसाद मौर्य को मनाने की कोशिश की थी और बुधवार को उन्होंने दारा सिंह चौहान से अनुरोध किया कि वो अपने फ़ैसले पर दोबारा विचार करें.
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वहीं, इसके पहले, बुधवार को ही भारतीय जनता पार्टी ने जानकारी दी कि कांग्रेस विधायक नरेश सैनी, समाजवादी पार्टी की टिकट पर विधायक चुने गए हरिओम यादव और समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक धर्मपाल सिंह बीजेपी में शामिल हो गए हैं.
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हरिओम यादव फिरोजाबाद से विधायक हैं. वो समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के रिश्तेदार बताए जाते हैं लेकिन कुछ वक्त पहले समाजवादी पार्टी ने उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की थी.
इसकी वजह बीजेपी के साथ उनकी नजदीकी बताई गई थी. फिर भी बीजेपी में उनके शामिल होने को मिली चर्चा की बड़ी वजह समाजवादी पार्टी के साथ रही उनकी लंबी साझेदारी को ही बताया गया.
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दारा सिंह चौहान के योगी सरकार से इस्तीफ़े के बाद समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने टविटर पर लिखा 'हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन!'
अखिलेश यादव ने स्वामी प्रसाद मौर्य के इस्तीफ़े के बाद भी ऐसी प्रतिक्रिया दी थी.
अखिलेश यादव ने चौहान के साथ अपनी तस्वीर भी ट्विटर पर पोस्ट की. उन्होंने मंगलवार को स्वामी प्रसाद मौर्य के इस्तीफ़े के बाद उनके साथ भी अपनी तस्वीर पोस्ट की थी.
राजनीतिक गलियारों में समाजवादी पार्टी और बीजेपी की प्रतिक्रियाओं को लेकर कई संकेत निकाले जा रहे हैं.

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मंत्री क्यों छोड़ रहे हैं बीजेपी?
उत्तर प्रदेश में बीते कुछ महीनों से नेताओं के पाला बदलने का क्रम जारी है लेकिन विधानसभा चुनाव की तारीखों के एलान के साथ इसमें तेज़ी आई है.
वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी इसे 'स्वाभाविक' बताते हैं.
त्रिपाठी कहते हैं, "चुनाव के पहले रिएलाइनलमेंट होता है. ये स्वाभाविक है. लेकिन इस समय बीजेपी छोड़कर जाने वालों की संख्या ज़्यादा दिख रही है.मंत्री भी जा रहे हैं."
रामदत्त त्रिपाठी दावा करते हैं कि इसकी एक वजह ये हो सकती है कि इन नेताओं को बीजेपी के सत्ता में वापसी की संभावना कम दिख रही हो.
वो कहते हैं, "मूल बात ये है कि वो क्यों गए? उनके आंकलन के हिसाब से वो बीजेपी से नहीं जीत सकते या फिर बीजेपी सत्ता में नहीं आ रही है. अगर उनको ये भरोसा होता तो बीजेपी पावर में आ रही है तो वो नहीं जाते."
त्रिपाठी ये भी कहते हैं, "बीजेपी ने जिन ग़ैर यादव पिछड़ी जातियों पर डोरे डाले थे, उनका अब मोहभंग हो रहा है. बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व इसे समय पर भांपने में नाकाम रहा."

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'बीजेपी को नुक़सान'
उत्तर प्रदेश की राजनीति पर करीबी नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अंबिकानंद सहाय कहते हैं कि स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे मंत्रियों के जाने से बीजेपी को नुक़सान हो सकता है.
सहाय कहते हैं, "चुनाव के पहले कुछ लोग पार्टियां छोड़ते हैं. लेकिन स्वामी प्रसाद मौर्य उस कैटेगरी में नहीं हैं. ये एक बड़ी घटना है. इससे बीजेपी को नुक़सान हो सकता है."
सहाय के मुताबिक बीजेपी भले ही मौर्य को मनाने की कोशिश में जुटी हो लेकिन वो साफ़ कर चुके हैं कि 'तीर कमान से निकल गया है और अब वो वापस नहीं आएगा.'
सहाय दावा करते हैं कि इसका सीधा फ़ायदा अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को मिल सकता है. उनके मुताबिक अखिलेश इस बार बीजेपी की रणनीति की काट खोज रहे हैं.
वो कहते हैं, "बीजेपी ने समाजवादी पार्टी को यादवों की पार्टी डिक्लेयर कर दिया था और काफी हद तक वो ऐसा इंप्रेशन देने में भी कामयाब हुई थी. लेकिन इस बार अखिलेश यादव की रणनीति पिछड़ों को एकजुट करने की है और वो इसमें कामयाब भी हो रहे हैं."
हालांकि, वो हरिओम यादव के बीजेपी में शामिल होने को सिर्फ़ 'सांकेतिक' फ़ैसला बताते हैं.

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अखिलेश की रणनीति
अंबिकानंद सहाय याद दिलाते हैं कि अखिलेश यादव ने छोटी-छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन किए हैं जो अभी असरदार दिख रहे हैं.
वो कहते हैं, "(ओपी) राजभर, मौर्य, कुशवाह और सैनी उनसे जुड़े हैं. मल्लाह बहुत हद तक जुड़े हैं. अनुप्रिया पटेल बीजेपी के साथ हैं लेकिन कृष्णा पटेल अखिलेश यादव के साथ हैं."
सहाय ये भी दावा करते हैं कि स्वामी प्रसाद मौर्य के पास भी समाजवादी पार्टी के अलावा अब कोई दल नहीं है, जहां वो अपना भविष्य देखते हों.
वो कहते हैं, "मेरी सूचना है कि वो समाजवादी पार्टी में जा रहे हैं. बीजेपी में नहीं लौटेंगे. मायावती के यहां दरवाजा बंद है. वहां तो नहीं ही लौटेंगे. "
सहाय कहते हैं, "मौर्य पुराने और ज़मीनी नेता हैं. इनके पास अपने समर्थक भी हैं. कुशवाहा, सैनी और कोइरी वर्ग के लोग इनके साथ रहे हैं."
स्वामी प्रसाद मौर्य ने बीजेपी से अलग होने के बाद दावा किया था कि 'बीजेपी को इसका असर नज़र आएगा.'

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'असरदार हैं मौर्य'
रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि मौर्य का असर तो है.
वो कहते हैं, "मौर्य प्रतापगढ़ के रहने वाले हैं. कुशीनगर से चुनाव लड़ते रहे हैं. उनकी बेटी बंदायू से सांसद है. ऐसा नहीं है कि वो सिर्फ अपनी सीट के लीडर हैं."
त्रिपाठी दावा करते हैं कि मौर्य और चौहान जैसे नेताओं का बीजेपी से मोहभंग हो रहा है.
वो कहते हैं, "लोअर ओबीसी बीजेपी को पावर में लाई थी. पावर में शेयर न मिलने से उन्हें लग रहा है कि उन्हें सत्ता में उचित साझेदारी नहीं मिली. ऐसी राय रखने वालों में राजभर हैं, सैनी हैं, मौर्य हैं. यही किसान भी हैं. "

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धार्मिक कार्ड का कितना असर?
रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "ग्रामीण इलाकों में बीते छह-सात सालों में जो आर्थिक तबाही हुई है, उसकी धर्म की राजनीति से भरपाई मुमकिन नहीं है."
अंबिकानंद सहाय भी आर्थिक दिक्कतों को बड़ा मुद्दा बता रहे हैं.
वो कहते हैं, "बुनियादी मुद्दा है महंगाई. लोग त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहे हैं, ये बहुत बड़ा फैक्टर है. "
सहाय ये भी दावा करते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बीजेपी इसी वजह से '80 बनाम 20' और 'मथुरा' जैसे मुद्दे उठा रही है.
वो कहते हैं, "बीजेपी के पास इसके अलावा कोई कार्ड नहीं है. अगर ये कामयाब हुआ तो वैतरणी पार नहीं तो गाड़ी तो फंसी हुई है."
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