मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काऊ भाषण देने वाले यति नरसिंहानंद अब तक जेल में क्यों नहीं?

इमेज स्रोत, SAMEERATMAJ MISHRA/BBC
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, डासना, गाज़ियाबाद
"इस्लाम को धरती से मिटा देना चाहिए... सभी मुसलमानों को ख़त्म कर देना चाहिए."
"आज हम जिन्हें मुसलमान बुलाते हैं, उन्हें पूर्व में राक्षस बुलाया जाता था."
"Islam is an organised gang of criminals. और जिसका आधार औरतों का व्यापार है. जिसका आधार औरतों को बर्बाद करना है. काफ़िर की औरतों को छीनना ये सबसे बड़ा आधार है."
ये भड़काऊ बयान यति नरसिंहानंद सरस्वती के हैं. ग़ाज़ियाबाद ज़िले के डासना क़स्बे में देवी मंदिर के 'पीठाधीश' यति नरसिंहानंद सरस्वती अब जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर भी हैं
ये वही देवी मंदिर है, जिसके गेट के बाहर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है- यहाँ मुसलमानों का प्रवेश वर्जित है.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश में जहाँ ट्वीट करने पर, रिपोर्टिंग करने पर या फिर सीएए के ख़िलाफ़ पोस्टर लगाने पर भी ग़िरफ़्तारी हुई है. सवाल उठ रहे हैं कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ लगातार नफ़रत फैलाने वाले भाषण देने वाले यति नरसिंहानंद सरस्वती अभी भी जेल में क्यों नहीं हैं?
हिंदुत्ववादी नेताओं की लंबी होती कतार में यति नरसिंहानंद सरस्वती सबसे चर्चित पोस्टरब्वॉय हैं.
मुसलमानों के ख़िलाफ़ उनके भड़काऊ बयान पिछले कई सालों से लोगों तक पहुँच रहे हैं.
जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर बने नरसिंहानंद पर आरोप ये भी है कि वो डासना देवी मंदिर और उसकी ज़मीन को अपनी निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.

मुस्लिम-बहुल डासना में कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि यति नरसिंहानंद के भाषणों पर वहाँ कोई ध्यान नहीं देता, लेकिन ग़ाज़ियाबाद पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक़ इन भाषणों से हिंदू और मुसलमानों में ध्रुवीकरण बढ़ा है.
ऐसे वक़्त में जब उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण चुनाव नज़दीक हैं और कई हलकों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण साफ़ देखा जा रहा है, ग़ाज़ियाबाद के इस क़स्बे में जो हो रहा है, उसका असर ज़िले की सीमाओं से दूर पूरे उत्तर प्रदेश में भी महसूस किया जा रहा है.
उत्तर प्रदेश दौरे पर मुझसे कई मुसलमानों ने नरसिंहानंद सरस्वती की 'ज़हरीली भाषा' पर चिंता जताई. लेकिन योगी राज में वो रोके नहीं रुक रहे हैं. आख़िर क्यों?
हाल ही में हरिद्वार में आयोजित धर्म संसद में यति नरसिंहानंद ने कहा, ".... मुसलमानों को मारने के लिए तलवार की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि तलवार से आपसे वो मरेंगे भी नहीं. आपको टेकनीक में उनसे आगे जाना होगा."
इस धर्म संसद में खुलेआम मुसलमानों के नरसंहार की बात करने का आरोप है. सोशल मीडिया पर मचे कोहराम के बाद उत्तराखंड पुलिस ने धर्म संसद में दिए गए हेट स्पीच मामले में एफ़आईआर दर्ज की और जाँच शुरू हो गई है.
एफ़आईआर में यति नरसिंहानंद का नाम बाद में जोड़ दिया गया है. हालाँकि पुलिस ने ये स्पष्ट नहीं किया है कि पहले उनका नाम इस एफ़आईआर में क्यों नहीं जोड़ा गया था.

कौन-कौन से मामले हैं यति नरसिंहानंद के ख़िलाफ़
यति नरसिंहानंद पर एफ़आईआर, मुक़दमों की तो पहले ही कमी नहीं थी.
उनकी वकील और डासना देवी मंदिर की महंत माँ चेतनानंद सरस्वती के मुताबिक़ यति पर क़रीब दो दर्जन मामले अलग-अलग चरणों में हैं, कुछ में चार्जशीट दाखिल है, कुछ मामलों में हाईकोर्ट ने स्टे लगाया हुआ है और कुछ मामलों में जाँच चल रही है.
उत्तराखंड में यति नरसिंहानंद पर दो धाराओं 153-ए और 295-ए के अंतर्गत मामला चलेगा. 153-ए यानी समुदायों के बीच धर्म, भाषा आदि के आधार पर दुश्मनी फैलाना, और धारा 295-ए यानी धार्मिक भावनाओं को आहत करना या उसकी कोशिश करना.
ग़ाज़ियाबाद पुलिस ने जिन 10 मामलों की जानकारी मुहैया करवाई है, उसके मुताबिक़ यति नरसिंहानंद के ख़िलाफ़ आईटी एक्ट के अलावा आईपीसी धाराओं जैसे 306, 307, 395 आदि में मुक़दमे दर्ज हैं.
धारा 306 यानी किसी को आत्महत्या के लिए उकसाना. धारा 307 यानी हत्या का प्रयास. 395 यानी डकैती.
हमने ग़ाज़ियाबाद पुलिस से मिली जानकारी को वरिष्ठ वकील राजेश त्यागी के साथ साझा किया और पूछा कि यति नरसिंहानंद सरस्वती के भाषणों और अन्य मामलों में पुलिस की लगाई गई धाराओं पर वो क्या कहेंगे.
राजेश त्यागी उन 76 वकीलों में से हैं, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर उनका ध्यान हरिद्वार में हेट स्पीच मामले की ओर खींचा है.

मेरठ के रहने वाले राजेश त्यागी ने बताया कि वो लगातार उनके वीडियो देख रहे थे और जिस तरह की भाषा का नरसिंहानंद इस्तेमाल कर रहे हैं, "पुलिस तो उन्हें एक तरह की छूट दे रही है."
वे कहते हैं, "उन पर डकैती, हत्या की कोशिश जैसी धाराएँ लगाई गई हैं. मुझे समझ नहीं आता इन सब मामलों में, जिनमें इन्होंने अपराधों को दोहराया है, उनके अंदर इनको ज़मानत कैसे मिल रही है. इनकी तो ज़मानत रद्द हो जानी चाहिए थी."
"इन्हें सीधे-सीधे सत्ता का संरक्षण हासिल है. उनको पुलिस कुछ नहीं कह रही है, प्रशासन कुछ नहीं कह रहा है. बस मुक़दमा दर्ज किया और छोड़ दिया. तो ये लोग निश्चिंत हैं."
राजेश त्यागी कहते हैं कि जिस तरह का ज़हर बोया जा रहा है, उससे ख़तरा ये है कि बहुत बड़े पैमाने पर क़त्लेआम हो सकता है.
वो कहते हैं, "ये मामला सीधा-सीधा (UAPA) यूएपीए का बनता है लेकिन पुलिस यूएपीए नहीं लगा रही है. हरिद्वार मामले में यूएपीए नहीं लगाया है, जो सीधे-सीधे यूएपीए का मामला है. आपके पास दस्तावेज़ हैं, डिज़िटिल, वीडियो सबूत हैं."

ग़ाज़ियाबाद के एसएसपी पवन कुमार ने बीबीसी से बातचीत में यति नरसिंहानंद सरस्वती के ख़िलाफ़ कार्रवाई में किसी भी राजनीतिक दबाव से इनकार किया.
उत्तराखंड में गढ़वाल के डीआईजी करण सिंह नागन्याल ने भी बीबीसी से बातचीत में कहा है कि पुलिस पर कोई राजनीतिक दबाव नहीं है और वो यति नरसिंहानंद पर 'सॉफ़्ट' नहीं है.
करण सिंह नागन्याल ने यही नहीं बताया कि मामले में गठित एसआईटी की रिपोर्ट कब तक आएगी लेकिन कहा कि "जितनी जल्दी हो सकेगा सबूत इकट्ठा करके आख़िरी चार्जशीट भेजेंगे."
देवी मंदिर के प्रांगण में स्थित एक हॉल में बीबीसी से बातचीत में यति नरसिंहानंद सरस्वती के नज़दीकी और 'छोटा नरसिंहानंद' कहे जाने वाले अनिल यादव ने मुस्कुराते हुए कहा, "मुक़दमों की लाइन लगी हुई है. कोई दिक़्क़त नहीं है. ये तो गहने हैं हमारे."
उनका ये भी कहना था कि कार्रवाई नहीं होने के पीछे केवल एक ही कारण है कि गुरूजी ने कोई गुनाह नहीं किया है और ना ही उनके ख़िलाफ़ कोई सबूत है.
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ग़ाज़ियाबाद पुलिस के अनुसार यति नरसिंहानंद सरस्वती पर दर्ज 13 मुक़दमों में से आधे से ज़्यादा में चार्जशीट लगी हुई है.
पुलिस के मुताबिक़ यति पर गुंडा ऐक्ट लगाने का मामला ज़िला मजिस्ट्रेट के दफ़्तर में लंबित है. ग़ाज़ियाबाद के डीएम राकेश कुमार सिंह से फ़ोन पर संपर्क नहीं हो सका और भेजे गए संदेशों का जवाब नहीं मिला.
यानी उन पर कई मुक़दमे चल रहे हैं. साथ ही दिल्ली प्रेस क्लब और दिल्ली दंगों के दौरान नफ़रत से भरे भड़काऊ भाषणों एवं सांप्रदायिक माहौल के बिगड़ने के ख़तरों के बावजूद, उनके मुसलमान विरोधी बयान लगातार लोगों तक पहुँच पा रहे हैं.
राजनीतिक संरक्षण?

ग़ाज़ियाबाद के एक पुलिस अधिकारी ने बातचीत में यति नरसिंहानंद के ख़िलाफ़ किसी सख़्त कार्रवाई के न होने के पीछे योगी सरकार के कथित संरक्षण को ज़िम्मेदार ठहराया.
अपना नाम न छापे जाने की शर्त पर उन्होंने कहा, "ऊपर से साफ़ इशारे हैं कि उनके ख़िलाफ़ कुछ नहीं करना है." उन्होंने कहा कि यति के ख़िलाफ़ मामलों के आगे बढ़ने की कोई संभावना नहीं है और उन्हें ख़ुद "इस बारे में बुरा लगता है."
इस अधिकारी के मुताबिक़ जो मामले अदालत में हैं, वहाँ यति नरसिंहानंद के वकीलों की कोशिश होती है कि साल में एक या दो से ज़्यादा पेशी न हो पाए और वो लंबी तारीख़ें ले लेते हैं, जिससे क़ानूनी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाती.
यति नरसिंहानंद के ख़िलाफ़ गुंडा एक्ट लगाए जाने पर कथित नर्मी को लेकर गाज़ियाबाद के एक अन्य पुलिस अफ़सर ने कहा कि वो सिस्टम का छोटा सा हिस्सा हैं और अगर सिस्टम को किसी को बचाना होता है, तो तरीक़े भी निकल आते हैं.
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यति नरसिंहानंद सरस्वती की वकील और डासना देवी मंदिर की महंत माँ चेतनानंद सरस्वती राजनीतिक संरक्षण या अदालती मामलों को लंबा खींचने के आरोपों पर पूछती हैं, "कोर्ट में राजनीतिक संरक्षण कैसे चलेगा, आप बताइए?"
उन्होंने हेट स्पीच के मुक़दमों को राजनीतिक बताया और कहा, "कितनी बार हम ऐप्लिकेशन मूव कर सकते हैं कि स्वास्थ्य ख़राब है? (बार-बार ऐसा करने पर) अदालत ग़ैर ज़मानती वारंट जारी कर देगी."
अनिल यादव जो अपने आपको यति नरसिंहानंद की विचारधारा का वारिस बताते हैं, ये कहते हुए नहीं हिचकते "गुरूजी और योगी जी के अच्छे रिश्ते हैं."
उनका ये भी कहना है कि बीजेपी में कई नेता हैं, जो 'गुरूजी' को पूजनीय मानते हैं पर कई बार राजनैतिक गुणा भाग के चक्कर में सामने नहीं आते हैं.

अनिल यादव ने बीजेपी नेता कपिल मिश्रा का ज़िक्र करते हुए कहा कि उनका यहाँ आना-जाना था, फिर एक ट्वीट के बाद दूरी बना ली, और ''हो सकता है कि उनकी पार्टी की मजबूरी हो.''
बीजेपी नेता कपिल मिश्रा को यति नरसिंहानंद के बयानों से कभी दिक़्क़त नहीं हुई और उन्होंने अप्रैल 2021 में उनके लिए चंदा भी इक्ट्ठा किया था.
इसके जवाब में बीबीसी से बातचीत में कपिल मिश्रा कहते हैं, ''यति जी के ऊपर जब हमले की बात हुई, उनके ख़िलाफ़ फ़तवे जारी हुए, तब मुझे लगा कि इस तरह से खुले में धमकी देकर किसी आदमी को मारने की बात की जाए और कमलेश तिवारी जैसा उनका हाल हो, तो उनको सुरक्षा मिलनी चाहिए. उसके लिए हमने एक फ़ंड इकट्ठा किया और उनको उनकी सुरक्षा के लिए 50 लाख इकट्ठा करके दिए. उसके बाद उनके कुछ वक्तव्य आए, जो मुझे ठीक नहीं लगे ख़ासकर महिलाओं के बारे में. तब मैंने ये बोला कि इस तरह के वक्तव्य मंदिर में कोई बैठे हुए व्यक्ति के द्वारा ठीक नहीं लगते हैं. और उनसे मैंने जाना, मिलना बंद किया.''
कपिल मिश्रा ने कहा कि जहाँ तक पार्टी की बात है, ''पार्टी में इन चीज़ों पर कोई चर्चा ही नहीं होती है. पार्टी के पास और बहुत सारे मुद्दे हैं बात करने के लिए. मुझे नहीं लगता कि भाजपा में किसी स्तर पर ऐसे किसी मुद्दे पर कोई चर्चा या संवाद होता है.''
उत्तर प्रदेश भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने यति नरसिंहानंद के किसी भी मामले में सरकारी हस्तक्षेप से इनकार किया और कहा, "उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ जी की सरकार आने के बाद पुलिस को पूरी तरह से फ़्री हैंड दिया गया है कि कोई भी व्यक्ति क़ानून का उल्लंघन करे, उसने हरा वस्त्र पहन रखा हो या भगवा वस्त्र पहन रखा हो, उसकी जाति क्या हो, उसका मजहब क्या हो, उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई हो."
राकेश त्रिपाठी ने कहा कि सरकार किसी भी विभाजनकारी बात की निंदा करती है, जिससे सांप्रदायिक माहौल ख़राब हो.
यहाँ बताना ज़रूरी है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मुसलमानों को टारगेट करते हुए विभाजनकारी भाषा जैसे 'अब्बाजान', 'अली' और 'बजरंगबली' का इस्तेमाल करते रहे हैं.

वो पूर्व में हिंदू और मुसलमान को अलग संस्कृति बता चुके हैं, जो साथ नहीं रह सकते.
उधर ख़ुद को संविधान को मानने वाला बताने वाले 'छोटा यति' अनिल यादव कहते हैं कि यति समर्थक योगी आदित्यनाथ के पक्ष में प्रचार करेंगे.
वो कहते हैं, "बीजेपी में एक नेता है, उसका नाम है योगी आदित्यनाथ."
उन्होंने नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी करते हुए कहा, "माननीय मोदी जी ने मुसलमानों के लिए बहुत सारे ऐसे आयाम खोल दिए हैं. अभी अपने 10 साल के वक्त में उन्हें बहुत ताकतवर भी कर दिया है."
यति नरसिंहानंद और उनके साथ काम कर रही टीम ने उग्र हिंदुत्वादी एजेंडे को अपनाया है और वो 'हिंदू की नसल और फसल' बचाने का आह्वान करते हैं.
डासना मंदिर के प्रांगण में चारों तरफ़ पोस्टर लगे हैं, जिनमें हिंदुओं से कम से कम पाँच बच्चे पैदा करने की अपील है, ताकि हिंदू धर्म बचा रहे.
फैलती सांप्रदायिकता और सरकारी खर्चे पर मंदिर की सुरक्षा
डासना में 80 प्रतिशत से ज़्यादा मुसलमान रहते हैं. यहाँ ज़्यादातर लोग छोटे-मोटे काम, खेती या मज़दूरी से जुड़े हैं.
स्थानीय लोगों से बात करें, तो आपको हिंदू-मुसलमानों के बीच बढ़ते अविश्वास, शक़, दूरी का अहसास होता है, हालाँकि ये भावनाएँ कब से मन में घर बना रही हैं या कितना बड़ा रूप ले चुकी हैं, ये जानना आसान नहीं.

मंदिर के ठीक सामने कांग्रेस के सतीश शर्मा का घर है. उनका जन्म डासना में ही हुआ और दूसरे लोगों की तरह बचपन से ही वो मंदिर में खेलने, साफ़-सफ़ाई करने या वर्जिश करने जाया करते थे.
सुबह की ठंड में खिलती धूप के बीच अपने घर के बाहर प्लास्टिक कुर्सी पर बैठे सतीश शर्मा ने कहा, "मैं पार्टी में बाद में हूँ, कट्टर हिंदू पहले हूँ, लेकिन हिंदुत्ववादी नहीं हूँ."
सतीश शर्मा को विधानसभा चुनाव में पार्टी का टिकट मिलने की उम्मीद है.
वो डासना को गंगा-जमुना तहजीब का क़स्बा बताते हैं, जहाँ हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के दुख-सुख में शामिल होते थे, साथ मंदिर जाते थे और चाहे 1947 हो या 1992, कभी भी यहाँ धार्मिक आधार पर दंगे नहीं हुए.
वो कहते हैं कि पहले राजस्थान या दूसरी जगहों से मुसलमान डासना मंदिर में प्रसाद चढ़ाने आते थे.
सतीश शर्मा के नज़दीकी, डासना निवासी और समाजवादी पार्टी से जुड़े रहे साजिद हुसैन याद करते हैं कि कैसे मंदिर में होने वाली दशहरे की पूजा में वो पैसे दिया करते थे और छठ पूजा में वो शामिल होते थे.
लेकिन आज मंदिर में मुसलमानों का जाना वर्जित है. मंदिर में जाने के लिए पहचान पत्र दिखाना पड़ता है और जानकारी को बाक़ायदा गेट के पास तैनात एक पुलिसकर्मी रजिस्टर में दर्ज करता है.

पुलिस के मुताबिक़ यति नरसिंहानंद को जान का ख़तरा है, जिसके मद्देनज़र हर वक़्त मंदिर में 22-28 पुलिसकर्मी तैनात रहते हैं, जिन पर महीने का 25-30 लाख रुपए का सरकारी ख़र्च आ रहा है.
सतीश शर्मा कहते हैं, "अब जो नफ़रती माहौल बन रहा है, उससे आपसी प्रेम, सौहार्द को नुक़सान पहुँच रहा है. अभी यहाँ मुसलमान आने से डरता है, परहेज़ करता है."
थोड़ा आगे जाने पर इकला और रघुनाथपुर गाँव पड़ता है, जहाँ हिंदुओं ने बातचीत में दावा किया कि मंदिर में यति नरसिंहानंद आने के पहले मंदिर के भीतर और बाहर मुसलमान युवक हिंदू युवतियों के साथ छेड़खानी करते थे और मंदिर में चोरियाँ करते थे, लेकिन अब सब ठीक है.
ऐसी जानकारी उन्हें किस स्रोत से मिली ये साफ़ नहीं, लेकिन रघुनाथपुर गाँव में एक महिला मतनवती ने कहा, "हिंदू लड़के थोड़े ही जाएँगे, ऐसा करेंगे, मुसलमान ही करेंगे. इलाक़ा ही मुसलमानों का है."
क्या वो सुनी-सुनाई बात दोहरा रहे हैं, या फिर वो किसी महिला से मिलवा सकते हैं, जिसके साथ ऐसा हुआ हो, इस पर या तो कोई जवाब नहीं मिला या फिर जवाब ये कि कौन सा परिवार अपनी बहू-बेटी के बारे में ऐसी बात सबके सामने रखना चाहेगा.

एक हिंदू व्यक्ति ने दावा किया कि पूर्व में मंदिर के भीतर मुसलमान युवकों के छेड़छाड़ करने पर या जब झगड़ा या मारपीट होती थी, तब वो भी ख़ुद उसका हिस्सा रहे थे.
इकला गाँव के विकास गूजर कहते हैं, "हम इनकी मस्जिदों में नहीं जाते. ये घुसने भी नहीं देंगे. ये बताइए, कि वहाँ बैठकर हनुमान चालीसा पढ़ लेंगे आप? जैसे (गुरुग्राम में) गुरुद्वारे में बुलाकर, या मंदिर में बुलाकर नमाज़ पढ़वा रहे हैं, या दुर्गा पंडाल में नमाज़ पढ़वा रहे हैं, ये पढ़ने देंगे हनुमान चालीसा वहाँ?"
सड़क के किनारे दुकान चलाने वाले नरेंद्र शर्मा को लगता है कि यति नरसिंहानंद के मंदिर में आने से "हिंदू जागरूक हुए हैं, एक हुए हैं."
थोड़ा आगे चलने पर कुछ हिंदू महिलाओं का उलट दावा था कि मंदिर के भीतर अब छेड़छाड़ की घटनाएँ होती हैं, न कि पहले.
पास के बाजीग्रान मोहल्ला में एक मुस्लिम व्यक्ति से जब यति नरसिंहनंद के वीडियो के बारे में पूछा तो उन्होंने यति को "पागल" करार दिया.
वो कहते हैं, "जब उल्टी सीधी बातें करेगा, तो पागल ही करार कर देंगे इसे. वो यहाँ के माहौल को बिगाड़ने की कितनी कोशिश करते हैं, लेकिन यहाँ सब अच्छी तरह से रहते हैं."

ये वही मोहल्ला है, जहाँ किराए के एक मकान में रहने वाले एक मुस्लिम लड़के को पिछले साल मार्च में देवी मंदिर में पानी पीने के लिए घुसने पर बुरी तरह मारा गया था.
बच्चे का परिवार किराए का मकान छोड़कर कहीं और चला गया है.
प्राचीन देवी मंदिर के आसपास भी बड़ी संख्या में मुसलमान आबाद हैं और आसपास के कई हिंदुओं ने बातचीत में अपनी कम आबादी का ज़िक्र किया.
उनकी बातों और हाव-भाव से ऐसा लगा कि कम आबादी के चलते वो ख़ुद को असुरक्षित महसूस कर रहे थे.
साल 2011 के आँकड़ों के मुताबिक़ ग़ाज़ियाबाद ज़िले में 82.5 प्रतिशत हिंदू थे और 14.18 प्रतिशत मुसलमान.
मंदिर का इतिहास, यति नरसिंहानंद का प्रवेश
सरकारी काग़ज़ों में ज़मीन मंदिर के नाम पर है. मंदिर से जुड़े कई मिथक और कई किंवदंतियाँ जुड़ी हुई हैं.
कांग्रेस के सतीश शर्मा के मुताबिक़ हज़ार साल से ज़्यादा पुराने इस मंदिर में लोग पहले आगे गंगा नहाने जाते वक़्त रात बिताने के लिए रुक जाया करते थे.
मंदिर के पास स्थित तालाब के बारे में मान्यता है कि उसमें नहाने से चर्म रोग ठीक हो जाता है.

मंदिर के अनिल यादव के मुताबिक़ तालाब के पास शिवालय में परशुराम ने ख़ुद शिवलिंग की स्थापना की थी.
मंदिर के बारे में लिखा गया है कि यहाँ लंकापति रावण के पिता ने कई वर्षों तक तपस्या की थी और स्वयं रावण ने भी यहाँ पूजा की.
साथ ही ये भी कि महाभारत युद्ध से पहले कुंती और पाँच पांडवों ने लाक्षागृह से सकुशल बच निकलने के बाद यहाँ भी गुप्त रूप से कुछ समय बिताया था. ये मंदिर प्राचीन है और डासना में इसकी बड़ी मान्यता है.
यति नरसिंहानंद सरस्वती के देवी मंदिर आने से पहले कई सालों तक मौनी बाबा नाम के एक पुजारी ने मंदिर का कार्यभार संभाला था.
स्थानीय लोग बताते हैं कि साल 2005 में चोरों ने मौनी बाबा की पिटाई कर दी और वो कुछ वक़्त बाद मंदिर छोड़कर चले गए.
उनके बाद ख़ुद को मौनी बाबा का चेला बताने वाले गणेश शर्मा उर्फ़ गणेश गिरी ने मंदिर का काम संभाला, लेकिन वो भी देवी मंदिर छोड़कर कहीं चले गए.
अनिल यादव के मुताबिक़ यति नरसिंहानंद सरस्वती साल 2007 में महंत के तौर देवी मंदिर में ऐसे वक़्त आए, जब देवी मंदिर के प्रमुख का पद ख़ाली पड़ा था.

संन्यास लेने से पहले यति नरसिंहानंद का नाम दीपक त्यागी था.
अनिल यादव के अनुसार दीपक त्यागी मॉस्को में पढ़ते थे और उनकी आख़िरी नौकरी लंदन में थी.
बाद में वो राजनीति में आ गए और 1998 में समाजवादी पार्टी के महानगर अध्यक्ष बन गए,लेकिन जब वो 'लव जिहाद' की कथित शिकार एक लड़की की मदद नहीं कर पाए, तो उन्हें ग्लानि हुई.
अनिल यादव के मुताबिक़ धर्म परिवर्तन वजह बताकर दीपक त्यागी मस्जिदों और मदरसों में गए, जिससे उनका "दिमाग़ पूर्ण रूप से बदल गया."
साल 1999-2000 में दीपक त्यागी ने संन्यास ले लिया.
वो भाजपा सासंद बीएल शर्मा प्रेम के संपर्क में आए और 'पूर्ण रूप से हिंदूवादी हो गए.' मंदिर में बीएल शर्मा की मूर्ति है, जिन्हें यति नरसिंहानंद अपना गुरू बताते हैं.
मंदिर की ज़मीन और ट्रस्ट

कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती.
ग़ाज़ियाबाद के ही रहने वाले जिंदल परिवार के गौरव जिंदल के मुताबिक़ जिस ज़मीन पर देवी मंदिर बना हुआ है, वो दरअसल उनके परिवार की थी और क़रीब 500-1,000 साल पहले उनके पूर्वजों ने ये मंदिर बनवाया था, जिसकी देखभाल महारानी देवी मंदिर ट्रस्ट के अंतर्गत होती थी.
पेशे से वकील गौरव जिंदल के मुताबिक़ पहले इस ज़मीन पर खेती होती थी और ज़मीन के नज़दीक तालाब से पानी लिया जाता था.
गौरव के मुताबिक़ एक दिन तालाब से कसौटी पत्थर की माता की मूर्ति निकली, जिसके लिए मंदिर बना दिया गया.
उनके मुताबिक़ मंदिर के इतिहास को पांडवों, परशुराम और रावण से जोड़ना मात्र अफ़वाहबाज़ी है.

गौरव के मुताबिक़ यति नरसिंहानंद सरस्वती का संबंध पहले हिंदू महासभा से था और डासना के एक व्यक्ति उन्हें देवी मंदिर लेकर आए.
गौरव बताते हैं कि संन्यास लेने के बाद यति मंदिर आ गए. गौरव जिंदल के मुताबिक़ यति के कट्टर हिंदू होने की वजह से उनका और उनके स्वर्गीय पिता कृष्ण मुरारी जिंदल का यति के प्रति झुकाव हुआ और ऐसे में यति मंदिर में रहने लगे और फिर उसे छोड़कर नहीं गए.
गौरव कहते हैं कि पूर्व में उनके पिता ने मंदिर में आयोजित एक राजनीतिक कार्यक्रम किए जाने का विरोध किया था, जिसके बाद मामला कहासुनी तक पहुँच गया.
गौरव के मुताबिक़ उसके बाद मंदिर "परिवार के हाथ से निकल गया" हालाँकि उनका परिवार "भय के माहौल में" मंदिर के दर्शन करने आज भी जाता है.
वो चाहते हैं कि उनके परिवार को मंदिर के प्रबंधन का अधिकार मिले.

मंदिर पर तीसरा पक्ष है आनंद गुप्ता, जिनका दावा है कि ज़मीन का एक हिस्सा उनके पूर्वजों ने दान में दिया था और उस ज़मीन पर यति अवैध रूप से रह रहे हैं.
आनंद गुप्ता का घर मंदिर के ठीक सामने है. घर के पहले माले पर बिस्तर पर उन्होंने मंदिर से जुड़े पुराने ढेर सारे काग़ज़ात दिखाए.
आनंद गुप्ता ने बताया कि उन्होंने साल 2010 में अदालत में केस भी दायर किया और मामले की सुनवाई निचली अदालत में चल रही है.
मंदिर के अनिल यादव के मुताबिक़ अदालत में ऐसा कोई मामला नहीं है और ज़मीन के मालिकाना हक़ पर कोई विवाद नहीं है क्योंकि "अब तो वो मंदिर की ज़मीन है."
वो कहते हैं, "मैं आज ये दावा करने लगूँ कि मेरे बाबा और मेरे परदादा किसी ट्रस्ट, मंदिर, धर्मशाला में ज़मीन देकर चले गए और आज मुझे वापस चाहिए, तो ये तो बिल्कुल निरर्थक बात है."

ट्रस्ट की बात करें, तो देवी मंदिर को अलग-अलग ट्रस्ट में विभाजित कर दिया गया और सभी ट्रस्टों के प्रमुख यति नरसिंहानंद सरस्वती हैं.
अनिल यादव के मुताबिक़ साल 2021 में बने तीन ट्रस्ट हैं- यति नरसिंहानंद सरस्वती फ़ाउंडेशन, श्री कृष्ण योगधाम और हर हर महादेव भक्त मंडल, जबकि चौथे ट्रस्ट को बनाने का काम चल रहा है.
यति नरसिंहानंद सरस्वती फ़ाउंडेशन ट्रस्ट के कामों में से है किसी नए काम को शुरू करवाना. दूसरे ट्रस्ट का काम है बच्चों का खेलकूद से परिचय कराना, उन्हें सेना के लिए तैयार करना. तीसरे ट्रस्ट की ज़िम्मेदारी है मंदिर में माँ की सेवा करना, जबकि चौथे ट्रस्ट की ज़िम्मेदारियों में विद्यालय और गौशाला रहेगी.
यादव के मुताबिक़ मंदिर में 25-30 लोगों का स्टाफ़ है और मंदिर पर महीने का ढाई से तीन लाख रुपए का ख़र्च आता है.
अनिल यादव बताते हैं कि मंदिर की अपनी आय कम है, इसलिए स्टाफ़ की तनख़्वाह की ज़िम्मेदारी बाहरी लोगों ने ले रखी है.
यति की सोशल मीडिया पर पहुँच

क्या योगी राज में यति नरसिंहानंद को अभयदान मिला हुआ है?
इस सवाल के पूछते ही अनिल यादव कहते हैं, "हरिद्वार में योगी जी नहीं हैं. दिल्ली में योगी जी नहीं हैं. और पांच साल पहले, 2017 से पहले, योगी जी नहीं थे. और शायद चीज़ें अब से बड़ी थीं. पहुंच कम थी. हो सकता है कि अब से बड़े-बड़े वक्तव्य 2017 से पहले दिए गए हों, लेकिन उस वक्त हमारी पहुंच कम थी."
यति के नज़दीकी अनिल यादव किसी मँझे हुए सोशल मीडिया प्रोफ़ेशनल की समझ के साथ बात करते हैं.
अनिल यादव के मुताबिक़ जब किसी भी सोशल मीडिया पर मंदिर या यति नरसिंहानंद के नाम से हैंडल शुरू होता है, तो उस पर उस प्लेटफ़ॉर्म के सामुदायिक नियमों के उल्लंघन की रिपोर्टिंग के कारण बंद करना पड़ता है.
इससे बचने के लिए वो बड़े सब्सक्राइबर्स वाले यूट्बर्स की मदद लेते हैं. जब मैसेज अलग-अलग हैंडल से डिस्ट्रीब्यूट हो कर जाता है, तो उस पर किसी भी तरह की रिपोर्टिंग का खतरा कम होता है.
वो कहते हैं, "किसी नैरेटिव को एक ही प्लेटफ़ॉर्म पर बार-बार चलाना है, तो उससे रिपोर्टिंग हो जाती है. अगर उसको बदल-बदल कर चलाओगे, तो उसकी रिपोर्टिंग नहीं होती है."

किसी क्लिप को फैलाने के लिए एक व्हाट्सऐप ग्रुप में डाल दिया जाता है, जिसे यति समर्थक अपने सोशल मीडिया हैंडल्स से आगे फैलाते हैं.
अनिल यादव कहते हैं, "व्हाट्सऐप को कोई ब्लॉक कर नहीं सकता."
इन सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स के अलावा अनिल यादव सूर्या बुलेटिन नाम की हिंदी पत्रिका और न्यूज़ पोर्टल के संपादक भी हैं.
वे कहते है कि यहाँ काम कर रहे स्टाफ वेतन पाते हैं. इस प्लेटफ़ॉर्म पर 'ग्रीन कंटेंट' यानी विवादों से परे कंटेट आता है, लेकिन वे कहते हैं कि इस कंटेंट में भी वे अपना वैचारिक संदेश भेज ही देते हैं, जो है हिंदुओं की 'नसल और फसल' को मुसलमानों से ख़तरा.
अक्तूबर 2021 के 50 रुपए के अंक के पन्ने पलटे, तो 'कश्मीर', 'आर्यन ख़ान', 'जिहादियों' जैसे शब्दों से भरी हेडलाइंस के नीचे लेख नज़र आए.

सोशल मीडिया इनके लिए एक ताक़तवर ज़रिया है. अपनी बात बड़ी तादाद तक पहुँचाने का, जो इनके अनुसार हिंदुओं को एकजुट करने का काम भी कर रहा है.
धर्म संसद भी इसी रणनीति का हिस्सा है. पहले साल में एक धर्म संसद हुआ करती थी, लेकिन उत्तर प्रदेश चुनाव के मद्देनज़र कई सारे करने की योजना है.
हरिद्वार में धर्म संसद के बाद नए साल की पहली धर्म संसद का कार्यक्रम डासना में एक और दो जनवरी को होना था, लेकिन हरिद्वार और रायपुर में हुए धर्म संसदों के विवादों में घिरने के बाद डासना धर्म संसद के कार्यक्रम को आगे बढ़ाना पड़ा है.
यति नरसिंहानंद सरस्वती ने हरिद्वार में कहा है कि उत्तराखंड सरकार मुसलमानों के दबाव में है और धर्म संसद हर क़ीमत पर होगी.

ग़ाज़ियाबाद एसएसपी पवन कुमार ने बातचीत में कहा कि पुलिस की इस बात पर नज़र रहेगी कि धर्म संसद में किन विषयों पर चर्चा होने वाली है.
वो कहते हैं, "अगर कोई विवादित टॉपिक है, जिससे कोई दुर्भावना फैल सकती है, या संगीन अपराध करने को बढ़ावा मिल सकता है, तो इसमें निश्चित रूप से कार्रवाई की जाएगी."
लेकिन ये कैसे तय होगा कि धर्म संसद के भीतर क्या बोला जाएगा?
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हरिद्वार और रायपुर के उदाहरण सबके सामने हैं कि इन कार्यक्रमों में खुले तौर पर मुसलमानो के नरसंहार की बात होती है.
पवन कुमार कहते हैं, "पहले के उदाहरण के आधार पर ये नहीं माना जा सकता कि आगे भी ग़लत ही बोला जाएगा."
उत्तर प्रदेश में फैलते नफ़रत के इस ज़हर को कौन रोकेगा? ये सवाल बना हुआ है कि क्या यूपी में योगी आदित्यनाथ की सरकार मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाते इन लोगों पर उचित कार्रवाई करेगी?
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