चीन ने तिब्बत के मुद्दे पर भारतीय सांसदों को भेजा नाराज़गी भरा पत्र

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- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
चीनी दूतावास ने तिब्बत से जुड़े एक कार्यक्रम में शामिल होने पर भारतीय सांसदों को एक नाराज़गी भरा पत्र भेजा है.
चीन ने इस पत्र में तिब्बत को अपना अविभाज्य अंग बताते हुए तिब्बत की निर्वासित सरकार को एक अवैध संगठन बताया है.
इस कार्यक्रम में शामिल रहे बीजू जनता दल के राज्यसभा सांसद सुजीत कुमार ने चीन के इस कदम की कड़ी निंदा की है.
सांसद सुजीत कुमार ने ट्विटर पर लिखा है, "भारत स्थित चीनी दूतावास से भेजे गए इन पत्रों की निंदा की जानी चाहिए."
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इसके साथ ही उन्होंने लिखा है, "पूरी दुनिया को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा तिब्बत के सांस्कृतिक जनसंहार के ख़िलाफ़ खड़े होना चाहिए."
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यही नहीं, तिब्बत की निर्वासित सरकार की ओर से भी इस चीन के इस कदम की निंदा करते हुए बयान जारी किया है.
आख़िर क्या है मामला?
बता दें कि बीती 21 दिसंबर को भारतीय सांसदों का एक दल दिल्ली के इंपीरियल होटल में आयोजित किए गए एक डिनर रिसेप्शन में शामिल हुआ था.
इस कार्यक्रम में ऑल पार्टीज़ इंडियन पार्लियामेंट फोरम फॉर तिब्बत को एक बार फिर सक्रिय करके सुजीत कुमार को इसका संयोजक बनाया गया.
तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रवक्ता तेनजिन लेक्ष्य ने बीबीसी हिंदी से बात करके इस कार्यक्रम के बारे में बताया है.
उन्होंने कहा, "भारतीय सांसदों का एक दल शाम के भोज पर आमंत्रित किया गया था जिसमें कुछ केंद्रीय मंत्री और सांसद शामिल हुए थे.
बीजू जनता दल के सांसद सुजीत कुमार को इंडो - तिब्बत पार्लियामेंट फोरम का संयोजक चुना गया. इस कार्यक्रम में कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी, और नेता जयराम रमेश समेत कई लोग शामिल हुए थे."

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इस कार्यक्रम में बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर और सांसद मेनका गांधी भी शामिल थीं.
लेक्ष्य बताते हैं, "ये एक नियमित कार्यक्रम था. और इस फोरम की स्थापना साल 1970 में एमसी चागला द्वारा की गयी थी. और बीते कई सालों में बहुत से नेता इस फोरम के संयोजक बने हैं. इनमें यशवंत सिन्हा, जॉर्ज फर्नांडीज़ से लेकर शांता कुमार आदि शामिल हैं.
इस डिनर कार्यक्रम के दौरान सुजीत जी को फोरम का संयोजक बनाने पर चर्चा हुई. इससे पहले बीजेपी शांता कुमार इसके संयोजक थे. और इस बार सदस्यों ने सुजीत कुमार जी को संयोजक बनाने का फ़ैसला किया."
तेनजिन लेक्ष्य ने भारतीय सांसदों को भेजे गए पत्र को बीबीसी के साथ साझा किया है.
चीन ने अपने पत्र में क्या लिखा?
बीबीसी के साथ साझा किए गए पत्र में चीनी दूतावास ने सांसदों के इस कार्यक्रम में शामिल होने पर नाराज़गी जताई है.
इस पत्र में राजनीतिक सलाहकार झाओ यंगशेंग लिखते हैं, "मैंने देखा है कि आपने तथाकथित "ऑल इंडियन पार्लियामेंट्री फोरम फॉर तिब्बत" के एक कार्यक्रम में तथाकथित "तिब्बत की निर्वासित सरकार" के साथ बातचीत की है. मैं इस मुद्दे पर अपनी चिंता व्यक्त करना चाहूंगा."
इसके बाद यंगशेंग ने लिखा, "जैसा कि सभी जानते हैं, तथाकथित "तिब्बत की निर्वासित सरकार" एक अलगाववादी राजनीतिक समूह और पूरी तरह से चीन के संविधान और कानूनों का उल्लंघन करने वाला एक अवैध संगठन है.
दुनिया के किसी भी देश ने इसे मान्यता नहीं दी है. तिब्बत प्राचीन काल से चीन का एक अविभाज्य अंग रहा है, और तिब्बत से संबंधित मामले चीन के आंतरिक मामले हैं जो किसी भी विदेशी हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देते हैं."
बता दें कि तिब्बत के मुद्दे पर भारत और चीन में ऐतिहासिक रूप से तनातनी का माहौल रहा है.
यंगशेंग अपने पत्र में लिखते हैं, "चीन दृढ़ता से 'तिब्बत की स्वाधीनता' के लिए काम कर रहीं ताक़तों द्वारा चीन विरोधी अलगाववादी गतिविधियों का विरोध करता है, चाहें वह किसी भी प्रकार और किसी भी देश में हों. और चीन किसी भी देश के अधिकारियों द्वारा इन ताक़तों से संपर्क किए जाने का विरोध करता है."
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तिब्बत की निर्वासित सरकार ने दिया जवाब
तिब्बत की निर्वासित सरकार ने चीनी दूतावास द्वारा जारी किए गए इस पत्र पर कड़ी प्रतिक्रिया जारी की है.
प्रवक्ता तेनजिन लेक्ष्य ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "चीनी दूतावास ने इस पत्र में कहा है कि तिब्बत प्राचीन काल से चीन का अविभाज्य अंग रहा है जो कि सच नहीं है. यह आधारहीन बात है. तिब्बत 1949 से पहले तक चीन का हिस्सा नहीं था. इसके बाद पीआरसी की स्थापना हुई और उन्होंने तिब्बत पर कब्जा किया. और इस समय तिब्बत चीन के कब्जे में है.
पत्र में तिब्बतन सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेशन जिसे तिब्बत की निर्वासित सरकार कहा जाता है, उसे एक अलगाववादी एवं अवैध संगठन करार दिया गया है. ये भी सच नहीं है.
बीते 50 सालों से हम एक लोकतांत्रिक ढांचे के साथ हैं. यही नहीं, सभी तिब्बती लोग तिब्बतन सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेशन में आस्था रखते हैं."
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लेक्ष्य ने चीनी नेताओं को ध्यान दिलाते हुए कहा, "हम चीनी नेताओं को ये याद दिलाना चाहते हैं कि तिब्बत चीन का आंतरिक मामला नहीं है, जैसा कि पत्र में बताया गया है. तिब्बत का जो मसला है, वो तिब्बत का मसला है, चीन का मसला नहीं है. ऐसे में चीनी कब्जे वाले तिब्बत में कुछ भी होता है, तो उसके परिणाम पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है.
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क्या बोले भारतीय सांसद
इस फोरम के नए संयोजक बनने वाले भारतीय सांसद सुजीत कुमार ने चीन के इस कदम की कड़ी निंदा की है.
उन्होंने कहा, "मैं चीन की इस प्रतिक्रिया को लेकर अचंभित नहीं हूं. मुझे इससे पहले दो साल में चार पत्र आ चुके हैं. मैं ये कहूंगा कि इन पत्रों की उतनी निंदा करनी चाहिए जितनी ज़रूरत है.
ऐसे मसलों के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल है जिसका पालन करना होता है. चीनी दूतावास को भारतीय विदेश मंत्रालय से बात करनी चाहिए थी. लेकिन इसकी जगह उन्होंने सीधे भारतीय सांसदों को पत्र लिख दिया है जो कि मेरे मुताबिक़ बचपने की हरक़त जैसा है."
लेकिन क्या भारतीय विदेश मंत्रालय को इस मुद्दे पर किसी तरह की प्रतिक्रिया देनी चाहिए.
इस सवाल पर सुजीत कुमार कहते हैं, "इसे नज़रअंदाज़ करना चाहिए क्योंकि ये इतना बड़ा मसला नहीं है जिस पर अपना समय और संसाधन ख़र्च किए जाएं. ये चीन का फ्रस्ट्रेशन है. भारतीय विदेश मंत्रालय इस पर आधिकारिक विरोध दर्ज करा सकता है. लेकिन इससे ज़्यादा इसे अहमियत नहीं दी जानी चाहिए."
वहीं, कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने इस पर टिप्पणी देते हुए अपने ट्वविटर अकाउंट पर लिखा है कि "अगर चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने पत्र लिखा होता तो वह इस पर प्रतिक्रिया देने पर विचार करते."
हालांकि, समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए सुजीत कुमार ने भारत सरकार को चीन के संबंध में अपनी नीति पर पुनर्विचार करने की सलाह दी है.
उन्होंने कहा है कि "चीन ये बताने वाला कौन होता है कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं. चीन की भारतीय सांसदों को पत्र भेजने की हिम्मत कैसे हुई. भारत को एक मजबूत कदम उठाते हुए वन चाइना पॉलिसी पर पुनर्विचार करना चाहिए. अगर भारत चीन से सम्मान चाहता है तो हमें मजबूती से उसका सामना करना चाहिए."
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