राहुल गांधी की 'हिंदू बनाम हिंदुत्व' बहस कांग्रेस को फ़ायदा पहुंचाएगी या बीजेपी को?

राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी

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    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बीते शनिवार अमेठी में एक पदयात्रा के दौरान एक बार फिर हिंदू बनाम हिंदुत्व की बहस छेड़कर बीजेपी को घेरने की कोशिश की है.

राहुल गांधी ने पीएम मोदी पर तंज कसते हुए कहा है कि 'हिंदुत्ववादी गंगा में अकेला स्नान करता है. हिंदू गंगा में करोड़ों लोगों के साथ स्नान करता है. एक तरफ हिंदू है, दूसरी तरफ हिंदुत्ववादी है. एक तरफ सच है, दूसरी तरफ झूठ है. हिंदू सच बोलते हैं, हिंदुत्ववादी झूठ बोलते हैं.'

बता दें कि पीएम मोदी ने पिछले हफ़्ते काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का लोकार्पण करते हुए गंगा में स्नान किया था.

राहुल गांधी इससे पहले जयपुर में हुई 'महंगाई हटाओ रैली' के दौरान भी हिंदू बनाम हिंदुत्व मुद्दे पर बीजेपी सरकार को घेर चुके हैं.

यही नहीं, कांग्रेस पार्टी सोशल मीडिया से लेकर तमाम दूसरे प्रचार तंत्रों के माध्यम से भी लगातार इस मुद्दे पर बीजेपी को घेरने की कोशिश करती दिख रही है.

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ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह मुद्दा आगामी विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी और उनकी पार्टी को फ़ायदा पहुंचा पाएगा?

राहुल गांधी और हिंदुत्व पर बहस

कांग्रेस पार्टी में मुख्यत: राहुल गांधी हिंदू बनाम हिंदुत्व के मुद्दे पर केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोले हुए हैं.

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अमेठी से पहले जयपुर और साल की शुरुआत में तमिलनाडु चुनाव के दौरान ही नहीं, राहुल गांधी बीते कई सालों से इन दोनों शब्दों के बीच का अंतर बताने की कोशिश कर रहे हैं.

लेकिन क्या राहुल गांधी की इस बात को उनके कार्यकर्ताओं के लिए मतदाताओं के बीच ले जाना आसान होगा.

दशकों से कांग्रेस की राजनीति पर नज़र रख रहीं वरिष्ठ पत्रकार अपर्णा द्विवेदी मानती हैं कि राहुल गांधी का इस मुद्दे पर केंद्रित होना कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए भी एक समस्या है.

वे कहती हैं, "राहुल गांधी इस मुद्दे के ज़रिए कांग्रेस से नाराज़ और निराश लोगों को वापस अपनी ओर लाने की कोशिश कर रहे हैं. वह उस मतदाता वर्ग को टारगेट कर रहे हैं जो कि कभी भी खांटी बीजेपी मतदाता नहीं था. मगर कांग्रेस से नाराज़ था. वह उस मतदाता वर्ग को लुभाना चाहते हैं.

लेकिन जब राहुल गांधी इस मुद्दे पर बात करते हैं तो ये उनके कार्यकर्ताओं के लिए ये एक समस्या बन जाता है. क्योंकि वह आम लोगों के मुद्दे लेकर तो जनता के बीच जा सकते हैं. लेकिन जब उनका नेता हिंदू और हिंदुत्व के मुद्दे पर बात करते हैं तो वह हिल जाते हैं कि वह इस बात को लोगों के बीच कैसे लेकर जाएं. और राहुल गांधी के तर्क को आम लोगों तक कैसे पहुंचाएं, उन्हें ये कैसे समझा पाएं कि राहुल गांधी क्या कहने की कोशिश कर रहे हैं."

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बीते कई सालों से अल्पसंख्यकों के बीच काम कर रहे एक कांग्रेस कार्यकर्ता ने बीबीसी को बताया कि राहुल गांधी को ऐसे मुद्दों से बचना चाहिए.

कोटा के रहने वाले कांग्रेस कार्यकर्ता अब्दुल करीम ख़ाँन कहते हैं, "राहुल जी जब ये मुद्दा उठाते हैं तो हमारे जैसे कार्यकर्ताओं के लिए थोड़ी मुश्किल हो जाती है. क्योंकि जब हम अल्पसंख्यकों के बीच जाते हैं तो लोग कहते हैं कि अब राहुल गांधी भी मोदी की तरह हिंदू - हिंदू करने लगे हैं.

जब बहुसंख्यक समाज में बीजेपी को वोटर के पास जाते हैं तो लोग कहते हैं कि मोदी ने राहुल गांधी को मंदिर - मंदिर चक्कर कटवा दिए.

एक तीसरा वर्ग है जिसका बिजली, सड़क, पानी और स्थानीय मुद्दों से राब्ता है. वह चाहता है कि ऐसे मुद्दों को उठाया जाए जिससे उनकी ज़िंदगियां सीधे तौर पर प्रभावित होती हैं. ऐसे में सीधे - सपाट मुद्दों को जनसामान्य के बीच ले जाना आसान होता है क्योंकि उन पर वह पहले से बंटे हुए नहीं होते हैं."

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राहुल गांधी, प्रियंका गांधी

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इमेज कैप्शन, अमेठी में पदयात्रा के दौरान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी

राहुल गांधी को क्या करना चाहिए?

कांग्रेस के कार्यकर्ता समूहों में इसे लेकर अलग - अलग राय हो सकती है.

लेकिन इतिहास बताता है कि राजनीतिक रैलियों में ज़मीनी मुद्दों पर मनोरंजक ढंग से दिए गए भाषण लंबे समय तक लोगों के ज़हन में रहते हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपने इसी अंदाज़ के लिए जाने जाते थे.

लेकिन सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी को ऐसे मुद्दे उठाने से बचना चाहिए?

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे मानते हैं कि राहुल गांधी को इस समय वह करना चाहिए जो उनके और उनकी पार्टी के लिए ज़रूरी है.

वह कहते हैं, "जब सुप्रीम कोर्ट इस बात को नहीं समझ पाया कि हिंदू धर्म और हिंदुत्व के बीच क्या अंतर है. हिंदू आध्यात्मिकता और हिंदू राजनीतिक एकता, जो कि हिंदुत्व का पर्याय है, के बीच क्या संबंध है. तो फिर आम लोग इस बात को क्या समझेंगे.

राहुल गांधी इस तरह की बहस छेड़कर कुछ भी हासिल नहीं कर सकते. ये मुख्य रूप से एक अकादमिक मुद्दा बनकर रह जाता है. और अकादमिक मुद्दों के आधार पर सार्वजनिक जीवन में किसी की गोटी लाल नहीं होती. राहुल गांधी को ये बात समझ लेनी चाहिए.

इस तरह की बहसें छेड़ने की जगह उन्हें कांग्रेस के संगठन को मजबूत करना चाहिए. कांग्रेस को एक स्थाई अध्यक्ष दें. और जिस तरह प्रदेशों में कांग्रेस बिखरी हुई है, उसे ठीक करें. पंजाब में कांग्रेस अपने संगठन के बिखराव के कारण जीत की स्थिति से हार की स्थिति में पहुंचती जा रही है. ध्यान इस पर ज़्यादा होना चाहिए.

क्योंकि पंजाब में कांग्रेस अगर हार जाती है तो इसका ठीकरा सीधा राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के दरवाज़े पर फूटेगा. ऐसे में ध्यान इस पर दिया जाना चाहिए."

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राहुल गांधी

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इमेज कैप्शन, अमेठी में राहुल गांधी को सुनते हुए लोग

राजनीतिक मज़बूती ज़रूरी

राहुल गांधी पिछले कुछ सालों से हिंदू बनाम हिंदुत्व की बहस छेड़ रहे हैं. और, इसी दौर में कांग्रेस ने एक आम चुनाव समेत कई विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखा है.

अब ये भी सवाल है कि राहुल गांधी की ये रणनीति कितनी काम कर रही है.

अभय कुमार दुबे मानते हैं कि राहुल गांधी की प्राथमिकता कांग्रेस को सांगठनिक मज़बूती देकर उसमें राजनीतिक शक्ति जोड़ना होनी चाहिए.

दुबे अपने तर्क को विस्तार देते हुए कहते हैं, "हिंदुत्व और हिंदू का मुद्दा एक अकादमिक मुद्दा है. और जनता की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है. जनता ये देखती है कि किस नेता के आसपास एक राष्ट्रीय सहमति बन रही है.

कौन सा नेता अपनी दावेदारियां कर रहा है. और कौन सौ नहीं तो पचास, चालीस या तीस फ़ीसदी पूरा करता हुआ दिख रहा है. ये महत्वपूर्ण बात है. और उसके ख़िलाफ़ कोई बदनामी की बात नहीं हो.

आप जब नरेंद्र मोदी को राज्यों के स्तर पर बार - बार चुनाव हराएंगे तब जाकर केंद्र में आपके चुनाव जीतने की स्थिति बनेगी. अभी बीजेपी एक - आध जगह हारती है, बाकी जगह जीत जाती है. जब तक ये स्थिति नहीं बदलेगी तब तक...समस्या है. और ये सेमीनार की जाने वाली बहस है."

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हालांकि, अभय दुबे मानते हैं कि राहुल गांधी की बात पूरी तरह ग़लत नहीं हैं.

वह कहते हैं, "राहुल गांधी ने जब नरेंद्र मोदी के बारे में कहा था कि ये सूट - बूट की सरकार है तो नरेंद्र मोदी हिल गए थे. तो राहुल गांधी को लगता है कि ये कहकर कि ये सरकार पूंजीपतियों की एजेंट है. ये कहकर वह नरेंद्र मोदी को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

लेकिन केवल इतने भर से कुछ नहीं होगा. उनके पक्ष में हवा बनती है लेकिन फिर भी वह फ़ायदा नहीं उठा पाते. और एक बात ये भी है कि राहुल गांधी को सबसे पहले अपने घर में एक राय बनाने की ज़रूरत है. पहले घर को मज़बूत करेंगे तभी न दुश्मन पर हमला बोलेंगे.

उन्हें ये समझने की ज़रूरत है कि वो कौन से पहलू हैं जिनका फ़ायदा उठाकर बीजेपी कांग्रेस को नुकसान पहुंचाकर खुद को मज़बूत कर लेती है. ये उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए."

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राहुल गांधी

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गांधी जितनी बड़ी कसौटी

ये बात भले ही अतार्किक लगे लेकिन राहुल गांधी जितनी ताक़त से हिंदू और हिंदुत्व के बीच अंतर स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं.

सोशल मीडिया से लेकर अन्य प्रचार तंत्रों के माध्यम से बीजेपी एवं दक्षिणपंथी तत्व इस अंतर को धता बताने की कोशिश करते देखे जाते है.

जयपुर में राहुल गांधी की रैली के बाद सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनलों की एंकरान ने ये सिद्ध करने का प्रयास किया कि हिंदुत्व हिंदू से उस तरह जुड़ा है, जैसे मातृत्व और पितृत्व शब्द माता और पिता से जुड़ा है.

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लेकिन सवाल ये उठता है कि अगर राहुल गांधी इस अंतर को स्पष्ट करना चाहते हैं तो इसमें ग़लत क्या है.

इसका जवाब दिल्ली स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष और गांधीवादी लेखक कुमार प्रशांत देते हैं.

वह कहते हैं, "राहुल गांधी का ये प्रयास बहुत ही सकारात्मक और अच्छा कदम है. लेकिन और ये बहुत बड़ा लेकिन है कि क्या राहुल गांधी अपनी बनाई हुई कसौटी पर ख़ुद उतरने को तैयार हैं. अगर तैयार हैं तो ये कांग्रेस को नया जीवन दे सकता है.

भले ही कुछ समय लगे कि जनता को ये बात पकड़ में नहीं आ रही है. लेकिन जनता को ये बात उतनी ही पकड़ में आएगी जितनी उनके पकड़ में आएगी.

ऐसे में अगर कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व ये तय कर ले कि उन्हें इससे डिगना नहीं है तो आप देखिएगा कि सारी धारा बदल जाएगी. लेकिन वो एक बड़ा काम है. अगर कोई आदमी अपनी कथनी को अपनी करनी में भी दिखा सके तो आज भी समाज बदल सकता है.

राहुल गांधी अपनी बनाई कसौटी पर ख़ुद जिस हद तक खरे उतरेंगे, उस हद तक कांग्रेस को नया जीवन दे देंगे. और जिस हद तक इसे एक चाल और एक नारे के रूप में, एक वक़्ती औजार के रूप में इसका इस्तेमाल करना चाहेंगे तो कांग्रेस उतनी ही कमज़ोर और खोखली होगी."

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