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किसान आंदोलनः सरकार के ड्राफ़्ट पर किसानों की सहमति, आधिकारिक पत्र का इंतज़ार, गुरुवार को फिर होगी बैठक
संयुक्त किसान मोर्चा ने बुधवार की बैठक के बाद बताया कि किसान आंदोलन पर फ़ैसला गुरुवार को होगा.
बैठक के बाद एसकेएम के नेताओं ने बताया, "सरकार की ओर से जो ड्राफ़्ट आया था उसे हमने कुछ सुधारों की मांग के साथ उन्हें वापस लौटा दिया था. आज फिर ड्राफ़्ट आया है, उस पर हमारी तरफ़ से सहमति बन गई है. हमने एसकेएम की तरफ़ से उस पर सहमति जता दी है. एक बार सरकार की तरफ़ से आधिकारिक पत्र आ जाए तो हम कल इस पर फ़ैसला लेंगे."
किसान नेताओं ने ज़ोर देकर कहा कि "आज जो ड्राफ़्ट आया है उस पर हमारी तरफ़ से सहमति बन गई है. हमने एसकेएम की तरफ़ से उस पर सहमति जता दी है."
इससे पहले बुधवार की सुबह संयुक्त किसान मोर्चा की पाँच सदस्यीय कमिटी के सदस्य अशोक धावले ने कहा कि केंद्र ने किसानों को जो प्रस्ताव भेजा है, उसमें कुछ कमियां हैं, जिन्हें सुझावों के साथ सरकार को वापस भेजा गया है.
उन्होंने मांग की है कि केंद्र सरकार पंजाब सरकार की तरह आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले किसानों के परिजनों को मुआवज़ा दे.
धावले ने कहा, "सरकार हमसे बातचीत करने को तैयार है, ये सराहनीय है. वह हमें लिखित में दे रही है, जो अच्छी बात है. लेकिन सरकार ने जो हमें प्रस्ताव भेजा था, उसमें कुछ ख़ामियाँ थीं, इसलिए मंगलवार रात, हमने इसे कुछ संशोधनों के साथ वापस भेज दिया और अब उनकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार है."
"किसान संघ के सदस्यों के साथ एमएसपी पर केंद्रित समिति के गठन की ज़रूरत है. सरकार ने यह भी कहा कि आंदोलन ख़त्म करने के बाद किसानों के ख़िलाफ़ दर्ज मामले वापस ले लिए जाएंगे. ये ग़लत है क्योंकि हम यहां अपनी पसंद से ठंड में नहीं बैठे हैं."
मंगलवार को दिल्ली-हरियाणा सीमा पर बैठे किसानों के संगठन संयुक्त किसान मोर्चा ने लंबी बैठक की थी. मीटिंग के बाद किसान नेताओं ने कहा था कि वे बुधवार को दो बजे फिर से बैठक करेंगे.
एमएसपी का पेच
कुछ किसानों ने कहा था कि गृह मंत्रालय के प्रस्ताव की भाषा को ठीक कर दिया जाए तो वे आंदोलन ख़त्म करने को तैयार हैं. भारतीय किसान यूनियन के राकेश टिकैत ने कहा कि सरकार को किसान नेताओं के सामने वार्ता के लिए बैठना चाहिए.
एमएसपी गारंटी को क़ानूनी कवच देना, टिकैत के समर्थकों के लिए अब भी एक बड़ा मुद्दा है. देश के दूसरे हिस्सों में हरियाणा और पंजाब की तरह मौजूदा एमसएपी सिस्टम प्रभावी नहीं है. दूसरी तरफ़ गृह मंत्रालय ने अपने प्रस्ताव में एमएसपी गारंटी को लेकर महज़ कमिटी बनाने की बात कही है और इस कमिटी में संयुक्त किसान मोर्चा के लोगों को भी शामिल किया जा सकता है. इस कमिटी में एमएसपी के साथ अन्य मुद्दों पर भी बात होगी.
किसानों की मांग है कि आंदोलन ख़त्म होने से पहले किसानों पर लगे मुक़दमे वापस हो जाने चाहिए. ये मुक़दमे उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली पुलिस के हैं. पंजाब में भारतीय किसान यूनियन के नेता बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा, "आंदोलन तभी ख़त्म होगा जब मुक़दमे वापस होंगे और इसमें कोई शर्त नहीं होनी चाहिए."
बीकेयू के दूसरे धड़े का नेतृत्व करने वाले हरियाणा के किसान नेता गुरुनाम सिंह चढूनी ने कहा कि समय सीमा के भीतर किसानों पर दर्ज मुक़दमे वापस होने चाहिए और जिन आंदोलनकारी किसानों की मौत हुई है, उनके परिजनों को आर्थिक मुआवजा भी दिया जाना चाहए.
गुरुनाम सिंह ने कहा कि सभी राज्य पंजाब की तर्ज़ पर मुआवज़ा दें. पंजाब ने मृतक किसानों के परिजनों को पाँच-पाँच लाख रुपये का मुआवज़ा दिया है.
तीनों कृषि क़ानून वापस
कृषि क़ानूनों के रद्द होने के बाद भी किसान आंदोलन जारी है. प्रदर्शन कर रहे किसानों का कहना है कि जब तक सरकार हमारी बाक़ी मांगें नहीं मान लेती, आंदोलन जारी रहेगा.
किसान अब भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी का क़ानून और आंदोलन के दौरान मारे गए किसानों को मुआवज़े की मांग कर रहे हैं. किसान संगठन किसानों पर लगे पुलिस केसों को वापस लिए जाने की भी मांग कर रहे हैं.
सालभर से अधिक दिल्ली के बॉर्डर पर डटे रहे किसान
बीते एक साल से भी अधिक समय से पंजाब, हरियाणा के हज़ारों किसान राजधानी दिल्ली से सटी सीमाओं पर विवादास्पद तीन कृषि क़ानूनों को वापस लेने की मांग पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. उन्हें देश भर के किसानों, ख़ास कर यूपी के किसानों का भारी समर्थन मिला.
हालांकि इस वर्ष प्रकाश पर्व के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों से माफ़ी मांगते हुए तीनों कृषि क़ानूनों को रद्द करने की घोषणा की और संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान सरकार ने तीनों कृषि क़ानूनों को वापस ले लिया.
लेकिन कृषि उपज पर न्यूनतम समर्थन मूल्य को क़ानूनी रूप से लागू करने और किसानों पर दर्ज सभी मुक़दमों (धारा 302 और 307 के केस छोड़कर) को वापस लेने की मांग पर किसानों ने दिल्ली की सीमा पर डटे रहने का फ़ैसला किया.
इसी संदर्भ में और आंदोलन की आगे की रणनीति तय करने के मक़सद से संयुक्त किसान मोर्चा ने चार दिसंबर को सिंघु बॉर्डर पर बैठक की. सिंघु बॉर्डर पर हुई इस बैठक में संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं ने एक कमिटी का एलान किया था.
किसान नेता राकेश टिकैत ने बताया था कि संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से एक पाँच सदस्यीय कमिटी बनाई गई है. उन्होंने कहा, "इस समिति में बलबीर सिंह राजेवाल, शिव कुमार काका, अशोक भावले, युद्धवीर सिंह और गुरुनाम सिंह चढ़ूनी शामिल होंगे."
इसी कमिटी के सदस्य अशोक भावले ने बुधवार सुबह मीडिया से बात की थी. इस कमिटी को तमाम अधिकार दिए गए हैं और यही समिति सरकार के पास जाने वाले लोगों के नाम तय करेगी.
चार दिसंबर की बैठक में किसान नेता जोगिंदर सिंह उगराहां ने कहा था कि वे सरकार से अपनी बाक़ी बची मांगों पर लिखित आश्वासन चाहते हैं. मीटिंग में किसान नेताओं ने तीन कृषि क़ानूनों को वापस लिए जाने को देश भर के किसानों और मज़दूरों की जीत बताया था और उनके सहयोग के लिए धन्यवाद कहा था.
एमएसपी की गारंटी, किसानों पर दर्ज मुक़दमे (धारा 302 और 307 के केस छोड़कर) की वापसी और जान गंवाले वाले किसानों के परिवार को मुआवज़ा दिए जाने की मांग के अलावा बिजली बिल 2020 को रद्द किए जाने और पराली जलाने पर होने वाली कार्रवाई को रोकने की मांग भी किसानों ने की है.
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