राहुल गांधी मीडिया में अपनी बात कहने के मामले में मोदी से काफ़ी पीछे: बीबीसी विश्लेषण

मोदी राहुल
    • Author, गौरव दुआ
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग

देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को आमतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखा जाता है.

मीडिया सर्वेक्षणों में उनकी तुलना प्रधानमंत्री पद के दावेदार के दौर पर की जाती है. लेकिन संवाद के मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना में वो काफ़ी नीचे नज़र आते हैं.

राजनीतिक तौर पर उनकी अहमियत के हिसाब से लोगों से उनका सार्वजनिक संवाद नरेंद्र मोदी की तुलना में बहुत सीमित है.

इसके लिए वो मुख्य रूप से सोशल मीडिया पर पोस्ट होने वाले उनके लिखित कंटेंट पर निर्भर है. इससे देश के प्रभावशाली टीवी न्यूज़ चैनलों पर उनकी बातों को कम अहमियत मिल पाती है.

राहुल गांधी हालांकि सरकार के कड़े आलोचक हैं, लेकिन अहम साबित हो सकने वाले कई मसलों पर वे अक्सर मौन रह जाते हैं.

राहुल गांधी

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लिखित संदेशों पर राहुल ज़्यादा निर्भर

राहुल गांधी अपनी बात कहने के लिए सोशल मीडिया पर बहुत ज़्यादा भरोसा करते हैं, पर वहां भी वो नरेंद्र मोदी से पीछे हैं.

पिछले महीने यानी नवंबर की बात करें तो उस दौरान राहुल गांधी ने ट्विटर के अपने अकाउंट से 51 ट्वीट किए. उसी दौरान नरेंद्र मोदी ने अपने निजी अकाउंट से 258 ट्वीट किए.

राहुल गांधी ने नवंबर में अपने यूट्यूब अकाउंट पर पांच वीडियो पोस्ट किए, जबकि प्रधानमंत्री मोदी के यूट्यूब अकाउंट पर 150 से भी अधिक वीडियो डाले गए.

वैसे फ़ेसबुक पर नवंबर में राहुल अपने प्रतिद्वंद्वी नरेंद्र मोदी से आगे रहे. बीते महीने उनके फ़ेसबुक अकाउंट पर 63 पोस्ट प्रकाशित किए गए, जबकि मोदी के अकाउंट पर 35 पोस्ट हुए.

ऐसा लगता है कि राहुल गांधी को टेक्स्ट मैसेज पर बहुत अधिक भरोसा है. दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी वीडियो संदेशों पर काफ़ी भरोसा करते हैं.

इसका नतीजा है कि मीडिया में प्रधानमंत्री को अक्सर सरकारी कार्यक्रमों और सार्वजनिक समारोहों को संबोधित करते हुए दिखाया जाता है.

सोशल मीडिया

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राहुल गांधी के वीडियो संदेश

न्यूज़ चैनलों पर राहुल गांधी के वीडियो को ठीक-ठाक अहमियत मिलती है. उनके वीडियो आमतौर पर पहले से रिकॉर्ड किए गए एकतरफ़ा संदेश या सार्वजनिक समारोहों के अलावा प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए भाषण होते हैं. वैसे ये भी ज़रूरी नहीं होता कि न्यूज़ चैनलों पर उनके बयानों का सकारात्मक कवरेज ही हो.

उदाहरण के लिए, 29 नवंबर को सरकार समर्थक माने जाने वाले हिंदी न्यूज़ चैनल ज़ी न्यूज़ और अंग्रेजी चैनल इंडिया टुडे ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए उनके 10 मिनट के भाषण को लाइव प्रसारित किया. उस दौरान राहुल गांधी ने सरकार पर तीन विवादास्पद कृषि क़ानूनों को रद्द करने के फ़ैसले पर चर्चा करने से "डरने" का आरोप लगाया.

वहीं 12 नवंबर को ज़ी न्यूज़ ने उनके वीडियो संदेश से 4 मिनट की एक क्लिप को प्रसारित किया. उसमें राहुल गांधी "हिंदू धर्म" और "हिंदुत्व" (हिंदू राष्ट्रवाद) के बीच अंतर बताने की कोशिश कर रहे थे. इसमें उन्होंने हिंदुत्व को नकारात्मक तौर पर पेश किया था.

वामपंथी झुकाव वाले हिंदी न्यूज़ चैनल एनडीटीवी इंडिया ने उनकी इस टिप्पणी पर 3 मिनट की एक रिपोर्ट प्रसारित की. लेकिन सरकार समर्थक माने जाने वाले अंग्रेज़ी चैनल रिपब्लिक टीवी ने इस बारे में 50 मिनट की बहस पेश की. इनमें से अधिकांश ने हिंदुत्व के नकारात्मक चित्रण के लिए राहुल गांधी की आलोचना की गई थी.

सोशल मीडिया पर राहुल गांधी के लिखित संदेश ख़ासकर उनके ट्वीट न्यूज़ चैनलों पर छोटे समाचार ही बनकर रह जाते हैं.

उदाहरण के लिए, राज्यसभा से ग़लत व्यवहार के आरोप में विपक्षी दलों के 12 सांसद निलंबित कर दिए गए. उनके निलंबन के बारे में उन्होंने 30 नवंबर को ट्वीट किया था. लेकिन उनके इस ट्वीट पर इंडिया टीवी और टीवी9 भारतवर्ष ने केवल 30 सेकंड की रिपोर्ट दिखाई.

19 नवंबर को प्रधानमंत्री मोदी ने जब तीनों विवादास्पद कृषि क़ानूनों को रद्द करने की घोषणा की, तो अंग्रेजी चैनल टाइम्स नाउ ने राहुल गांधी के ट्वीट पर 3 मिनट की एक रिपोर्ट प्रसारित की. इस रिपोर्ट में उन्होंने इन क़ानूनों के विरोध प्रदर्शन के दौरान मारे गए किसानों को श्रद्धांजलि दी थी.

दूसरी ओर ये देखा गया है कि समाचार चैनल मोदी के संदेशों, ख़ासकर उनके पोस्ट किए गए वीडियो को अधिक अहमियत और ज़्यादा वक़्त देते हैं.

उदाहरण के लिए, 25 नवंबर को हिंदी के आज तक, एबीपी न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ के साथ अंग्रेजी के इंडिया टुडे और रिपब्लिक टीवी ने उत्तर प्रदेश में एयरपोर्ट के एक शिलान्यास समारोह को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी के 30 मिनट लंबे भाषण को प्रसारित किया.

मोदी

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सरकार की आलोचना कम ही

राहुल गांधी सरकार की आलोचना अपेक्षाकृत कम करते हैं. 19 नवंबर को जब सरकार कृषि क़ानूनों को रद्द करने की योजना बना रही थी, तब इन क़ानूनों के ख़िलाफ़ लंबा अभियान चलाने के बावजूद वो सबके सामने नहीं आए.

इसके बजाय, उन्होंने केवल किसानों को उनकी "जीत" पर बधाई देते हुए ट्वीट किया. साथ ही सरकार पर आरोप लगाया कि वो किसानों के जीवन की "रक्षा करने में विफल" रही.

इसके विपरीत, उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा और उत्तर प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों अखिलेश यादव और मायावती ने किसानों को बधाई देते और सरकार की आलोचना करते हुए सार्वजनिक प्रदर्शन में भाग लिया. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सहित विपक्ष के दूसरे नेताओं ने भी ऐसा किया.

इसी तरह, भारत-चीन की सीमा पर गलवान घाटी में 20 भारतीय सैनिकों की मौत की बरसी के मौक़े पर 15 जून को भी वे सबके सामने नहीं आए. हालांकि चीन के साथ सीमा पर जारी तनाव को लेकर उन्होंने पीएम मोदी की जमकर आलोचना की.

उनकी मां और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कांग्रेस के ट्विटर अकाउंट पर लिखा कि "चीन के साथ सैनिकों को हटाने के लिए हुए समझौते से भारत का नुक़सान हुआ है."

वहीं राहुल गांधी ने बहुत कम फ़ॉलोअर होने के बाद भी अपनी बात कहने के लिए इंस्टाग्राम अकाउंट का चुनाव किया. उन्होंने कहा कि "सरकार को लोगों के सामने कई चीज़ों को साफ़ करना चाहिए."

ममता बनर्जी

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राहुल का विकल्प बनने की ममता की कोशिश

देश के अगले आम चुनाव 2024 में होने हैं. मीडिया में ऐसी अटकलें लग रही हैं कि इस चुनाव में नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी को चुनौती देने के लिए विपक्ष का चेहरा राहुल गांधी के बजाय कोई और भी हो सकता है. उन चेहरों में सबसे प्रमुख नाम पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी का है.

दिसंबर में ममता बनर्जी ने "कांग्रेस को हटाकर महागठबंधन बनाने की बात" कही. साथ ही उन्होंने क्षेत्रीय ताक़तों से अपील की कि वे नरेंद्र मोदी को चुनौती देने के लिए एक साथ आएं. उनके इन बयानों को देश के कई मीडिया संस्थानों ने काफ़ी अहमियत मिली.

अंग्रेजी अख़बार 'द इकोनॉमिक टाइम्स' के लिए लिखने वाले पत्रकार संजय बारू ने इस बारे में अपनी राय रखी. उन्होंने लिखा कि ममता बनर्जी का मौजूदा लक्ष्य कांग्रेस पार्टी को ये समझाना होगा कि वो "अब ग़ैर-बीजेपी गठबंधन के अपने नेतृत्व का दावा करने की स्थिति में नहीं हैं."

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